आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 279
मारीच का छल और सीता-हरण
मारीच रावण का स्वागत करता है, उसे राम से वैर मोल लेने से रोकता है, और मृत्यु की धमकी मिलने पर ही उसकी बात मानता है। रत्नमय मृग का रूप धरकर वह राम को आश्रम से दूर ले जाता है और बाण लगने पर राम के स्वर में पुकारता है; सीता लक्ष्मण पर संदेह करके कठोर वचनों से उन्हें भेज देती हैं। तब रावण संन्यासी के वेश में आकर अपना रूप प्रकट करता है और सीता को लुभाने का प्रयत्न करता है; सीता के तिरस्कारपूर्वक ठुकराने पर वह उन्हें केशों से पकड़कर आकाश में उठ जाता है, जहाँ गृध्र जटायु उन्हें देखते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.279.1)
मारीचस्त्वथ संभ्रान्तो दृष्ट्वा रावणमागतम् । पूजयामास सत्कारैः फलमूलादिभिस्ततः ॥
mārīcastvatha saṃbhrānto dṛṣṭvā rāvaṇamāgatam | pūjayāmāsa satkāraiḥ phalamūlādibhistataḥ
रावण को आया देखकर मारीच घबरा गया, और उसने फल-मूल आदि से आदरपूर्वक उसका सत्कार किया।
श्लोक 2 (3.279.2)
विश्रान्तं चैनमासीनमन्वासीनः स राक्षसः । उवाच प्रश्रितं वाक्यं वाक्यज्ञो वाक्यकोविदम् ॥
viśrāntaṃ cainamāsīnamanvāsīnaḥ sa rākṣasaḥ | uvāca praśritaṃ vākyaṃ vākyajño vākyakovidam
जब रावण विश्राम करके बैठ गया, तब वह राक्षस भी उसके पास बैठ गया और बोलने में कुशल उस राक्षस ने वाक्पटु रावण से विनम्र वचन कहे —
मारीच उवाच
श्लोक 3 (3.279.3)
न ते प्रकृतिमान्वर्णः कच्चित्क्षेमं पुरे तव । कच्चित्प्रकृतयः सर्वा भजन्ते त्वां यथा पुरा ॥
na te prakṛtimānvarṇaḥ kaccitkṣemaṃ pure tava | kaccitprakṛtayaḥ sarvā bhajante tvāṃ yathā purā
"आपका रंग स्वाभाविक नहीं दिखता। आपके नगर में कुशल तो है? क्या सारी प्रजा पहले की भाँति आपकी सेवा करती है?
श्लोक 4 (3.279.4)
किमिहागमने चापि कार्यं ते राक्षसेश्वर । कृतमित्येव तद्विद्धि यद्यपि स्यात्सुदुष्करम् ॥
kimihāgamane cāpi kāryaṃ te rākṣaseśvara | kṛtamityeva tadviddhi yadyapi syātsuduṣkaram
हे राक्षसराज, यहाँ आपके आने का प्रयोजन क्या है? उसे पूरा हुआ ही समझिए, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 5 (3.279.5)
शशंस रावणस्तस्मै तत्सर्वं रामचेष्टितम् । समासेनैव कार्याणि क्रोधामर्षसमन्वितः ॥
śaśaṃsa rāvaṇastasmai tatsarvaṃ rāmaceṣṭitam | samāsenaiva kāryāṇi krodhāmarṣasamanvitaḥ
क्रोध और अमर्ष से भरे रावण ने संक्षेप में उसे राम की सारी करतूत और अपना प्रयोजन बता दिया।
श्लोक 6 (3.279.6)
मारीचस्त्वब्रवीच्छ्रत्वा समासेनैव रावणम् । अलं ते राममासाद्य वीर्यज्ञो ह्यस्मि तस्य वै ॥
mārīcastvabravīcchratvā samāsenaiva rāvaṇam | alaṃ te rāmamāsādya vīryajño hyasmi tasya vai
यह सुनकर मारीच ने भी संक्षेप में रावण से कहा — "राम से भिड़ने की बात छोड़ दीजिए! मैं उसका पराक्रम जानता हूँ।
मारीच उवाच
श्लोक 7 (3.279.7)
बाणवेगं हि कस्तस्य शक्तः सोढुं महात्मनः । प्रव्रज्यायां हि मे हेतुः स एव पुरुषर्षभः । विनाशमुखमेतत्ते केनाख्यातं दुरात्मना ॥
bāṇavegaṃ hi kastasya śaktaḥ soḍhuṃ mahātmanaḥ | pravrajyāyāṃ hi me hetuḥ sa eva puruṣarṣabhaḥ | vināśamukhametatte kenākhyātaṃ durātmanā
उस महात्मा के बाणों का वेग कौन सह सकता है? वही पुरुषश्रेष्ठ तो मेरे संन्यास लेने का कारण है। किस दुष्ट ने आपको विनाश के मुख में ले जाने वाली यह बात सुझाई है?"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 8 (3.279.8)
तमुवाचाथ सक्रोधो रावणः परिभर्त्सयन् । अकुर्वतोऽस्मद्वचनं स्यान्मृत्युरपि ते ध्रुवम् ॥
tamuvācātha sakrodho rāvaṇaḥ paribhartsayan | akurvato'smadvacanaṃ syānmṛtyurapi te dhruvam
तब क्रोध से भरे रावण ने उसे डाँटते हुए कहा — "यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे, तो तुम्हारी मृत्यु भी निश्चित है।"
श्लोक 9 (3.279.9)
मारीचश्चिन्तयामास विशिष्टान्मरणं वरम् । अवश्यं मरणे प्राप्ते करिष्याम्यस्य यन्मतम् ॥
mārīcaścintayāmāsa viśiṣṭānmaraṇaṃ varam | avaśyaṃ maraṇe prāpte kariṣyāmyasya yanmatam
मारीच ने सोचा — 'किसी श्रेष्ठ के हाथों मरना अधिक अच्छा है। जब मृत्यु आ ही पहुँची है, तो मैं वही करूँगा जो यह चाहता है।'
श्लोक 10 (3.279.10)
ततस्तं प्रत्युवाचाथ मारीचो रक्षसांवरम् । किं ते साह्यं मया कार्यं करिष्याम्यवशोपि तत् ॥
tatastaṃ pratyuvācātha mārīco rakṣasāṃvaram | kiṃ te sāhyaṃ mayā kāryaṃ kariṣyāmyavaśopi tat
तब मारीच ने उस राक्षसश्रेष्ठ को उत्तर दिया — "मुझे आपकी क्या सहायता करनी है? विवश होकर भी मैं वह करूँगा।"
श्लोक 11 (3.279.11)
तमब्रवीद्दशग्रीवो गच्छ सीतां प्रलोभय । रत्नशृङ्गो मृगो भूत्वा रत्नचित्रतनूरुहः ॥
tamabravīddaśagrīvo gaccha sītāṃ pralobhaya | ratnaśṛṅgo mṛgo bhūtvā ratnacitratanūruhaḥ
दशग्रीव ने उससे कहा — "जाओ, सीता को लुभाओ। रत्नमय सींगों वाला, रत्नों से चित्रित रोमों वाला मृग बन जाओ।
रावण उवाच
श्लोक 12 (3.279.12)
ध्रुवं सीता समालक्ष्यत्वां रामं चोदयिष्यति । अपक्रान्ते च काकुत्स्थे सीता वश्या भविष्यति ॥
dhruvaṃ sītā samālakṣyatvāṃ rāmaṃ codayiṣyati | apakrānte ca kākutsthe sītā vaśyā bhaviṣyati
तुम्हें देखकर सीता निश्चय ही राम को प्रेरित करेगी, और ककुत्स्थवंशी राम के दूर चले जाने पर सीता मेरे वश में होगी।
श्लोक 13 (3.279.13)
तामादायापनेष्यामि ततः स नभविष्यति । भार्यावियोगाद्दुर्बुद्धिरेतत्साह्यं कुरुष्व मे ॥
tāmādāyāpaneṣyāmi tataḥ sa nabhaviṣyati | bhāryāviyogāddurbuddhiretatsāhyaṃ kuruṣva me
मैं उसे उठा ले जाऊँगा; तब पत्नी के वियोग में वह मूर्ख जीवित नहीं रहेगा। मेरी यह सहायता करो।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 14 (3.279.14)
इत्येवमुक्तोमारीचः कृत्वोदकमथात्मनः । रावणं पुरतो यान्तमन्वगच्छत्सुदुःखितः ॥
ityevamuktomārīcaḥ kṛtvodakamathātmanaḥ | rāvaṇaṃ purato yāntamanvagacchatsuduḥkhitaḥ
ऐसा कहे जाने पर मारीच ने अपने लिए ही मरणोत्तर जलांजलि दी, और अत्यन्त दुःखी होकर आगे-आगे चलते रावण के पीछे चल पड़ा।
श्लोक 15 (3.279.15)
ततस्तस्याश्रमं गत्वारामस्याक्लिष्टकर्मणः । चक्रतुस्तद्यथा सर्वमुभौ यत्पूर्वमन्त्रितम् ॥
tatastasyāśramaṃ gatvārāmasyākliṣṭakarmaṇaḥ | cakratustadyathā sarvamubhau yatpūrvamantritam
फिर अक्लिष्टकर्मा राम के आश्रम पर पहुँचकर उन दोनों ने सब कुछ ठीक वैसे ही किया जैसा पहले से तय किया था।
श्लोक 16 (3.279.16)
रावणस्तु यतिर्भूत्वा मुण्डः कुण्डीत्रिदण्डधृत् । मृगश्चभूत्वामारीचस्तं देशमुपजग्मतुः ॥
rāvaṇastu yatirbhūtvā muṇḍaḥ kuṇḍītridaṇḍadhṛt | mṛgaścabhūtvāmārīcastaṃ deśamupajagmatuḥ
रावण मुण्डित सिर वाला, कमण्डलु और त्रिदण्ड धारण करने वाला संन्यासी बना और मारीच मृग बना; इस रूप में दोनों उस स्थान पर पहुँचे।
श्लोक 17 (3.279.17)
दर्शयामास मारीचो वैदेहीं मृगरूपधृत् । चोदयामास तस्यार्थे सा रामं विधिचोदिता ॥
darśayāmāsa mārīco vaidehīṃ mṛgarūpadhṛt | codayāmāsa tasyārthe sā rāmaṃ vidhicoditā
मृगरूपधारी मारीच ने स्वयं को वैदेही को दिखाया, और विधि की प्रेरणा से उन्होंने उस मृग के लिए राम को प्रेरित किया।
श्लोक 18 (3.279.18)
रामस्तस्याः प्रियं कुर्वन्धनुरादाय सत्वरः । रक्षार्थे लक्ष्मणं न्यस्य प्रययौ मृगलिप्सया ॥
rāmastasyāḥ priyaṃ kurvandhanurādāya satvaraḥ | rakṣārthe lakṣmaṇaṃ nyasya prayayau mṛgalipsayā
उनका मन रखने के लिए राम ने शीघ्र धनुष उठाया, रक्षा के लिए लक्ष्मण को वहाँ छोड़ा और मृग को पाने की इच्छा से चल पड़े।
श्लोक 19 (3.279.19)
स धन्वी बद्धतूणीरः खड्गगोधाङ्गुलित्रवान् । अन्वधावन्मृगं रामो रुद्रस्तारामृगं यथा ॥
sa dhanvī baddhatūṇīraḥ khaḍgagodhāṅgulitravān | anvadhāvanmṛgaṃ rāmo rudrastārāmṛgaṃ yathā
धनुष लिए, तरकश बाँधे, खड्ग, गोधा (बाँह का रक्षक) और अंगुलित्र धारण किए राम उस मृग के पीछे वैसे ही दौड़े जैसे कभी रुद्र तारामृग के पीछे दौड़े थे।
श्लोक 20 (3.279.20)
सोऽन्तर्हितः पुनस्तस्य दर्शनं राक्षसो व्रजन् । चकर्ष महदध्वानं रामस्तं बुबुधे ततः ॥
so'ntarhitaḥ punastasya darśanaṃ rākṣaso vrajan | cakarṣa mahadadhvānaṃ rāmastaṃ bubudhe tataḥ
वह राक्षस कभी छिपता, कभी फिर दिखाई देता हुआ उन्हें बहुत दूर खींच ले गया; तब राम उसे पहचान गए।
श्लोक 21 (3.279.21)
निशाचरं विदित्वा तं राघवः प्रतिभानवान् । अमोघं शरमादाय जघान मृगरूपिणम् ॥
niśācaraṃ viditvā taṃ rāghavaḥ pratibhānavān | amoghaṃ śaramādāya jaghāna mṛgarūpiṇam
उसे निशाचर जानकर प्रत्युत्पन्नमति राघव ने अमोघ बाण लेकर उस मृगरूपधारी को मार गिराया।
श्लोक 22 (3.279.22)
स रामवाणाभिहतः कृत्वा रामस्वरं तदा । हा सीते लक्ष्मणेत्येवं चुक्रोशार्तस्वरेण ह ॥
sa rāmavāṇābhihataḥ kṛtvā rāmasvaraṃ tadā | hā sīte lakṣmaṇetyevaṃ cukrośārtasvareṇa ha
राम के बाण से आहत होकर उसने तब राम का स्वर बनाया और आर्त स्वर में 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' कहकर पुकारा।
श्लोक 23 (3.279.23)
शुश्राव तस्य वैदेही ततस्तां करुणां गिरम् । साप्रापतत्ततः सीता तामुवाचाथ लक्ष्मणः ॥
śuśrāva tasya vaidehī tatastāṃ karuṇāṃ giram | sāprāpatattataḥ sītā tāmuvācātha lakṣmaṇaḥ
वैदेही ने उसकी वह करुण पुकार सुनी और सीता तुरंत बाहर दौड़ पड़ीं; तब लक्ष्मण ने उनसे कहा —
लक्ष्मण उवाच
श्लोक 24 (3.279.24)
अलं ते शङ्कया भीरु को रामं प्रहरिष्यति । मुहूर्ताद्द्रक्ष्यसे रामं भर्तारं त्वं शुचिस्मितम् ॥
alaṃ te śaṅkayā bhīru ko rāmaṃ prahariṣyati | muhūrtāddrakṣyase rāmaṃ bhartāraṃ tvaṃ śucismitam
"हे भीरु, यह शंका छोड़ दो! राम पर कौन प्रहार कर सकता है? क्षण भर में तुम अपने मधुर मुस्कान वाले पति राम को देखोगी।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 25 (3.279.25)
इत्युक्ता सा प्ररुदती पर्यशङ्कत लक्ष्मणम् । हता वै स्त्रीस्वभावेन शुद्धचारित्रभूषणा ॥
ityuktā sā prarudatī paryaśaṅkata lakṣmaṇam | hatā vai strīsvabhāvena śuddhacāritrabhūṣaṇā
यह सुनकर सीता रो पड़ीं; शुद्ध चरित्र ही जिनका आभूषण था, वे भी स्त्री-स्वभाव के वश होकर लक्ष्मण पर ही संदेह करने लगीं।
श्लोक 26 (3.279.26)
सा तं परुषमारब्धा वक्तुं साध्वी पतिव्रता । नैष कामो भवेन्मूढ यं त्वं प्रार्थयसे हृदा ॥
sā taṃ paruṣamārabdhā vaktuṃ sādhvī pativratā | naiṣa kāmo bhavenmūḍha yaṃ tvaṃ prārthayase hṛdā
वह साध्वी पतिव्रता उनसे कठोर वचन कहने लगीं — "मूर्ख, जो कामना तुम मन में पाले हो, वह कभी पूरी नहीं होगी।
सीतोवाच
श्लोक 27 (3.279.27)
अप्यहंशस्त्रमादाय हन्यामात्मानमात्मना । पतेयं गिरिशृङ्गाद्वा विशेयं वा हुताशनम् ॥
apyahaṃśastramādāya hanyāmātmānamātmanā | pateyaṃ giriśṛṅgādvā viśeyaṃ vā hutāśanam
मैं शस्त्र लेकर अपने ही हाथों अपने प्राण ले लूँगी, या पर्वत की चोटी से कूद पड़ूँगी, या अग्नि में प्रवेश कर लूँगी,
श्लोक 28 (3.279.28)
रामं भर्तारमुत्सृज्य न त्वहं त्वां कथञ्चन । निहीनमुपतिष्ठेयं शार्दूली क्रोष्टुकं यथा ॥
rāmaṃ bhartāramutsṛjya na tvahaṃ tvāṃ kathañcana | nihīnamupatiṣṭheyaṃ śārdūlī kroṣṭukaṃ yathā
पर अपने पति राम को छोड़कर तुम जैसे नीच के पास कभी नहीं जाऊँगी, जैसे बाघिन सियार के पास नहीं जाती।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 29 (3.279.29)
एतादृशं वचः श्रुत्वा लक्ष्मणः प्रियराघवः । पिधायकर्णौ सद्वृत्तः प्रस्थितो येन राघवः ॥
etādṛśaṃ vacaḥ śrutvā lakṣmaṇaḥ priyarāghavaḥ | pidhāyakarṇau sadvṛttaḥ prasthito yena rāghavaḥ
ऐसे वचन सुनकर राघव के प्रेमी, सदाचारी लक्ष्मण ने कान बंद कर लिए और उसी मार्ग पर चल पड़े जिससे राम गए थे।
श्लोक 30 (3.279.30)
स रामस्य पदंगृह्य प्रससार धनुर्धरः । अवीक्षमाणो विम्बोष्ठीं प्रययौ लक्ष्मणस्तदा ॥
sa rāmasya padaṃgṛhya prasasāra dhanurdharaḥ | avīkṣamāṇo vimboṣṭhīṃ prayayau lakṣmaṇastadā
राम के पदचिह्नों को पकड़कर धनुषधारी लक्ष्मण आगे बढ़ गए, और बिम्बफल-से लाल होंठों वाली सीता की ओर उन्होंने मुड़कर नहीं देखा।
श्लोक 31 (3.279.31)
एतस्मिन्नन्तरे रक्षो रावणः प्रत्यदृश्यत । अभव्यो भव्यरूपेण भस्मच्छन्न इवानलः ॥
etasminnantare rakṣo rāvaṇaḥ pratyadṛśyata | abhavyo bhavyarūpeṇa bhasmacchanna ivānalaḥ
इसी बीच राक्षस रावण प्रकट हुआ — अशुभ होते हुए भी शुभ रूप में, राख से ढकी आग के समान;
श्लोक 32 (3.279.32)
यतिवेषप्रतिच्छन्नो जिहीर्षुस्तामनिन्दिताम् । उपागच्छत्स वैदेहीं रावणः पापनिश्चयः ॥
yativeṣapraticchanno jihīrṣustāmaninditām | upāgacchatsa vaidehīṃ rāvaṇaḥ pāpaniścayaḥ
संन्यासी के वेश में छिपा, उस निर्दोष नारी को हर ले जाने की इच्छा से, पाप का निश्चय किए रावण वैदेही के पास आया।
श्लोक 33 (3.279.33)
सा तमालक्ष्यसंप्राप्तं धर्मज्ञा जनकात्मजा । निमन्त्रयामास तदा फलमूलाशनादिभिः ॥
sā tamālakṣyasaṃprāptaṃ dharmajñā janakātmajā | nimantrayāmāsa tadā phalamūlāśanādibhiḥ
उसे आया देखकर धर्म को जानने वाली जनकनन्दिनी ने उसे फल-मूल आदि का भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया।
श्लोक 34 (3.279.34)
अवमत्यततः सर्वं स्वं रूपं प्रत्यपद्यत । सान्त्वयामास वैदेहीं कामी राक्षसपुङ्गवः ॥
avamatyatataḥ sarvaṃ svaṃ rūpaṃ pratyapadyata | sāntvayāmāsa vaidehīṃ kāmī rākṣasapuṅgavaḥ
तब उस सबकी उपेक्षा करके उस राक्षसश्रेष्ठ ने अपना असली रूप धारण कर लिया और कामातुर होकर वैदेही को फुसलाने लगा —
रावण उवाच
श्लोक 35 (3.279.35)
सीते राक्षसराजोऽहंरावणो नाम विश्रुतः । मम लङ्कापुरी नाम्ना रम्या पारे महोदधेः ॥
sīte rākṣasarājo'haṃrāvaṇo nāma viśrutaḥ | mama laṅkāpurī nāmnā ramyā pāre mahodadheḥ
"सीते, मैं राक्षसों का राजा हूँ, रावण नाम से विख्यात। महासागर के उस पार लंका नाम की मेरी सुन्दर नगरी है।
श्लोक 36 (3.279.36)
तत्र त्वं नरनारीषु शोभिष्यसि मया सह । भार्या मे भव सुश्रोणि तापसं त्यज राघवम् ॥
tatra tvaṃ naranārīṣu śobhiṣyasi mayā saha | bhāryā me bhava suśroṇi tāpasaṃ tyaja rāghavam
वहाँ मेरे साथ तुम नर-नारियों के बीच शोभा पाओगी। हे सुन्दरी, मेरी पत्नी बनो; तपस्वी राघव को छोड़ दो।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 37 (3.279.37)
एवमादीनि वाक्यानि श्रुत्वा तस्याथ जानकी । पिधाय कर्णौ सुश्रोणी मैवमित्यब्रवीद्वचः ॥
evamādīni vākyāni śrutvā tasyātha jānakī | pidhāya karṇau suśroṇī maivamityabravīdvacaḥ
उसके ऐसे-ऐसे वचन सुनकर सुन्दरी जानकी ने कान बंद कर लिए और कहा — "ऐसा नहीं हो सकता!"
सीतोवाच
श्लोक 38 (3.279.38)
प्रपतेद्द्यौः सनक्षत्रा पृथिवी शकलीभवेत् । शुष्येत्तोयनिधौ तोयं चन्द्रः शीतांशुतां त्यजेत् ॥
prapateddyauḥ sanakṣatrā pṛthivī śakalībhavet | śuṣyettoyanidhau toyaṃ candraḥ śītāṃśutāṃ tyajet
"नक्षत्रों सहित आकाश गिर पड़े, पृथ्वी के टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ, समुद्र का जल सूख जाए, चन्द्रमा अपनी शीतलता छोड़ दे,
श्लोक 39 (3.279.39)
उष्णांशुत्वमथो जह्यादादित्यो वह्निरुष्णताम् । त्यक्त्वाशैत्यं भजेन्नाहं त्यजेयंरघुनन्दनम् ॥
uṣṇāṃśutvamatho jahyādādityo vahniruṣṇatām | tyaktvāśaityaṃ bhajennāhaṃ tyajeyaṃraghunandanam
सूर्य अपनी उष्णता त्याग दे और अग्नि अपनी गर्मी छोड़कर शीतल हो जाए — पर मैं रघुनन्दन को नहीं त्यागूँगी।
श्लोक 40 (3.279.40)
कथं हि भिन्नकरटं पद्मिनं वनगोचरम् । उपस्थाय महानागं करेणुः सूकरं स्पृशेत् ॥
kathaṃ hi bhinnakaraṭaṃ padminaṃ vanagocaram | upasthāya mahānāgaṃ kareṇuḥ sūkaraṃ spṛśet
जो हथिनी मद से फूटे गण्डस्थल वाले, कमल-से चिह्नों से युक्त वनचारी महान गजराज के पास रह चुकी हो, वह भला सूअर को कैसे छुएगी?
श्लोक 41 (3.279.41)
कथं हि पीत्वा माध्वीकं पीत्वा च मधुमाधवीम् । लोभं सौवीरके कुर्यान्नारी काचिदिति स्मरेः ॥
kathaṃ hi pītvā mādhvīkaṃ pītvā ca madhumādhavīm | lobhaṃ sauvīrake kuryānnārī kāciditi smareḥ
मधुपुष्पों की मदिरा और मधु की माधवी सुरा पी चुकने के बाद कौन स्त्री खट्टी काँजी का लोभ करेगी? यह सोच लो!"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 42 (3.279.42)
इति सा तं समाभाष्य प्रविवेशाश्रमं ततः । क्रोधात्प्रस्फुरमाणौष्ठी विधुन्वाना करौ मुहुः ॥
iti sā taṃ samābhāṣya praviveśāśramaṃ tataḥ | krodhātprasphuramāṇauṣṭhī vidhunvānā karau muhuḥ
उससे ऐसा कहकर, क्रोध से फड़कते होंठों के साथ, बार-बार हाथ झटकती हुई वे आश्रम के भीतर चली गईं।
श्लोक 43 (3.279.43)
तामधिद्रुत्य सुश्रोणीं रावणः प्रत्यषेधयत् ॥
tāmadhidrutya suśroṇīṃ rāvaṇaḥ pratyaṣedhayat
रावण ने उस सुन्दरी के पीछे दौड़कर उसे रोक लिया।
श्लोक 44 (3.279.44)
भर्त्सयित्वातु रूक्षेण स्वरेण गतचेतनाम् । मूर्धजेषु निजग्राह ऊर्ध्वमाचक्रमे ततः ॥
bhartsayitvātu rūkṣeṇa svareṇa gatacetanām | mūrdhajeṣu nijagrāha ūrdhvamācakrame tataḥ
कठोर स्वर में डाँटते हुए उसने अचेत-सी हुई सीता को केशों से पकड़ लिया और फिर आकाश में ऊपर उठ गया।
श्लोक 45 (3.279.45)
तां ददर्श ततो गृध्रो जटायुर्गिरिगोचरः । रुदतीं रामरामेति ह्रियमाणां तपस्विनीम् ॥
tāṃ dadarśa tato gṛdhro jaṭāyurgirigocaraḥ | rudatīṃ rāmarāmeti hriyamāṇāṃ tapasvinīm
तब पर्वत पर रहने वाले गृध्र जटायु ने उस बेचारी तपस्विनी को देखा, जिसे हरकर ले जाया जा रहा था और जो "राम! राम!" पुकारती हुई रो रही थी।