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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 287

प्रहस्त और धूम्राक्ष का वध; कुम्भकर्ण का जगाया जाना

विभीषण प्रहस्त की गदा का प्रहार सह लेते हैं और सौ घंटियों वाली शक्ति से उसे मार डालते हैं। धूम्राक्ष वानरों को भगा देता है, पर हनुमान् उन्हें फिर जुटाते हैं और उसे घोड़ों, रथ और सारथि सहित मार गिराते हैं। यह समाचार सुनकर व्याकुल रावण सोए हुए कुम्भकर्ण को बड़े यत्न से जगवाता है, उसे राम के समुद्र पार करने और राक्षसों के संहार की बात बताता है, और दूषण के छोटे भाइयों वज्रवेग और प्रमाथी के साथ उसे युद्ध के लिए भेजता है।

अध्याय 286अध्याय-सूचीअध्याय 288

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.287.1)

ततः प्रहस्तः सहसा समभ्येत्य विभीषणम् । गदया ताडयामास विनद्य रणकर्कशम् ॥

tataḥ prahastaḥ sahasā samabhyetya vibhīṣaṇam | gadayā tāḍayāmāsa vinadya raṇakarkaśam

तब प्रहस्त ने सहसा विभीषण पर झपटकर रण में कर्कश गर्जना की और उन पर गदा से प्रहार किया।

श्लोक 2 (3.287.2)

स तयाऽभिहतो धीमान्गदया भीमवेगया । नाकम्पत महाबाहुर्हिमवानिव सुस्थिरः ॥

sa tayā'bhihato dhīmāngadayā bhīmavegayā | nākampata mahābāhurhimavāniva susthiraḥ

भयंकर वेग वाली उस गदा से आहत होकर भी वे बुद्धिमान महाबाहु हिमालय के समान अडिग रहे, तनिक भी नहीं डिगे।

श्लोक 3 (3.287.3)

ततः प्रगृह्य विपुलां शतघण्टां विभीषणः । अनुमन्त्र्य महाशक्तिं चिक्षेपास्य शिरः प्रति ॥

tataḥ pragṛhya vipulāṃ śataghaṇṭāṃ vibhīṣaṇaḥ | anumantrya mahāśaktiṃ cikṣepāsya śiraḥ prati

तब विभीषण ने सौ घंटियों वाली एक विशाल शक्ति उठाई, उसे मन्त्र से अभिमन्त्रित किया और प्रहस्त के सिर पर फेंक दी।

श्लोक 4 (3.287.4)

पतन्त्या स तया वेगाद्राक्षसोऽशनिवेगया । हृतोत्तमाङ्गो ददृशे वातरुग्ण इव द्रुमः ॥

patantyā sa tayā vegādrākṣaso'śanivegayā | hṛtottamāṅgo dadṛśe vātarugṇa iva drumaḥ

वज्र के समान वेग से गिरती उस शक्ति से उस राक्षस का सिर उड़ गया, और वह आँधी से टूटे वृक्ष के समान दिखाई देने लगा।

श्लोक 5 (3.287.5)

तं दृष्ट्वा निहतं सङ्ख्ये प्रहस्तं क्षणदाचरम् । अभिदुद्राव धूम्राक्षो वेगेन महता कपीन् ॥

taṃ dṛṣṭvā nihataṃ saṅkhye prahastaṃ kṣaṇadācaram | abhidudrāva dhūmrākṣo vegena mahatā kapīn

निशाचर प्रहस्त को युद्ध में मारा गया देख धूम्राक्ष बड़े वेग से वानरों पर टूट पड़ा।

श्लोक 6 (3.287.6)

तस्य मेघोपमं सैन्यमापतद्भीमदर्शनम् । दृष्ट्वैव सहसा दीर्णा रणे वानरपुङ्गवाः ॥

tasya meghopamaṃ sainyamāpatadbhīmadarśanam | dṛṣṭvaiva sahasā dīrṇā raṇe vānarapuṅgavāḥ

मेघ-समूह के समान उमड़ती, भयानक दिखने वाली उसकी सेना को देखते ही श्रेष्ठ वानर रण में सहसा तितर-बितर हो गए।

श्लोक 7 (3.287.7)

ततस्तान्सहसा दीर्णान्दृष्ट्वा वानरपुङ्गवान् । निर्ययौ कपिशार्दूलो हनूमान्मारुतात्मजः ॥

tatastānsahasā dīrṇāndṛṣṭvā vānarapuṅgavān | niryayau kapiśārdūlo hanūmānmārutātmajaḥ

श्रेष्ठ वानरों को सहसा बिखरते देख कपिश्रेष्ठ पवनपुत्र हनुमान् आगे निकल आए।

श्लोक 8 (3.287.8)

तं दृष्ट्वाऽवस्थितं सङ्ख्ये हरयः पवनात्मजम् । महत्या त्वरया राजन्संन्यवर्तन्त सर्वशः ॥

taṃ dṛṣṭvā'vasthitaṃ saṅkhye harayaḥ pavanātmajam | mahatyā tvarayā rājansaṃnyavartanta sarvaśaḥ

हे राजन्, पवनपुत्र को युद्ध में डटा देख सभी वानर बड़ी शीघ्रता से लौट आए।

श्लोक 9 (3.287.9)

ततः शब्दो महानासीत्तुमुलो रोमहर्षणः । रामरावणसैन्यानामन्योन्यमभिधावताम् ॥

tataḥ śabdo mahānāsīttumulo romaharṣaṇaḥ | rāmarāvaṇasainyānāmanyonyamabhidhāvatām

तब राम और रावण की सेनाओं के एक-दूसरे पर टूट पड़ने से रोंगटे खड़े कर देने वाला भारी कोलाहल उठा।

श्लोक 10 (3.287.10)

तस्मिन्प्रवृत्ते संग्रामे घोरे रुधिरकर्दमे । धूम्राक्षः कपिसैन्यं तद्द्रावयामास पत्रिभिः ॥

tasminpravṛtte saṃgrāme ghore rudhirakardame | dhūmrākṣaḥ kapisainyaṃ taddrāvayāmāsa patribhiḥ

रक्त के कीचड़ से भरे उस भयंकर संग्राम में धूम्राक्ष ने अपने बाणों से वानर-सेना को भगा दिया।

श्लोक 11 (3.287.11)

तं स रक्षोमहामात्रमापतन्तं सपत्नजित् । प्रतिजग्राह हनुमांस्तरसा पवनात्मजः ॥

taṃ sa rakṣomahāmātramāpatantaṃ sapatnajit | pratijagrāha hanumāṃstarasā pavanātmajaḥ

शत्रुओं को जीतने वाले पवनपुत्र हनुमान् ने उस श्रेष्ठ राक्षस को आते देख वेगपूर्वक रोक लिया।

श्लोक 12 (3.287.12)

तयोर्युद्धमभूद्घोरं हरिराक्षसवीरयोः । जिगीषतोर्युधाऽन्योन्यमिन्द्रप्रह्लादयोरिव ॥

tayoryuddhamabhūdghoraṃ harirākṣasavīrayoḥ | jigīṣatoryudhā'nyonyamindraprahlādayoriva

एक-दूसरे को जीतने की इच्छा वाले उन वानर-वीर और राक्षस-वीर में इन्द्र और प्रह्लाद के समान घोर युद्ध हुआ।

श्लोक 13 (3.287.13)

गदाभिः परिघैश्चैव राक्षसो जघ्निवान्कपिम् । कपिश्च जघ्निवान्रक्षः सस्कन्धविटपैर्द्रुमैः ॥

gadābhiḥ parighaiścaiva rākṣaso jaghnivānkapim | kapiśca jaghnivānrakṣaḥ saskandhaviṭapairdrumaiḥ

राक्षस ने वानर पर गदाओं और परिघों से प्रहार किया, और वानर ने राक्षस पर तने और डालियों समेत वृक्षों से।

श्लोक 14 (3.287.14)

ततस्तमतिकोपेन साश्वं सरथसारथिम् । धूम्राक्षमवधीत्क्रुद्धो हनूमान्मारुतात्मजः ॥

tatastamatikopena sāśvaṃ sarathasārathim | dhūmrākṣamavadhītkruddho hanūmānmārutātmajaḥ

तब अत्यन्त क्रुद्ध होकर पवनपुत्र हनुमान् ने धूम्राक्ष को घोड़ों, रथ और सारथि सहित मार डाला।

श्लोक 15 (3.287.15)

ततस्तं निहतं दृष्ट्वा धूम्राक्षं राक्षसोत्तमम् । हरयो जातविश्रम्भा जघ्नुरन्ये च सैनिकान् ॥

tatastaṃ nihataṃ dṛṣṭvā dhūmrākṣaṃ rākṣasottamam | harayo jātaviśrambhā jaghnuranye ca sainikān

श्रेष्ठ राक्षस धूम्राक्ष को मारा गया देख वानरों का साहस लौट आया, और दूसरे वानर शत्रु-सैनिकों को मारने लगे।

श्लोक 16 (3.287.16)

ते वध्यमाना हरिभिर्बलिभिर्जितकाशिभिः । राक्षसा भग्नसंकल्पा लङ्कामभ्यपतन्भयात् ॥

te vadhyamānā haribhirbalibhirjitakāśibhiḥ | rākṣasā bhagnasaṃkalpā laṅkāmabhyapatanbhayāt

विजय से उल्लसित बलवान वानरों की मार खाकर राक्षसों का संकल्प टूट गया और वे भय से लंका की ओर भागे।

श्लोक 17 (3.287.17)

तेऽभिपत्य पुरं भग्ना हतशेषा निशाचराः । सर्वं राज्ञे यथावृत्तं रावणाय न्यवेदयन् ॥

te'bhipatya puraṃ bhagnā hataśeṣā niśācarāḥ | sarvaṃ rājñe yathāvṛttaṃ rāvaṇāya nyavedayan

नगर में पहुँचकर संहार से बचे उन पराजित निशाचरों ने राजा रावण को सारा वृत्तान्त ज्यों का त्यों कह सुनाया।

श्लोक 18 (3.287.18)

श्रुत्वा तु रावणस्तेभ्यः प्रहस्तं निहतं युधि । धूम्राक्षं च महेष्वासं ससैन्यं सहराक्षसैः ॥

śrutvā tu rāvaṇastebhyaḥ prahastaṃ nihataṃ yudhi | dhūmrākṣaṃ ca maheṣvāsaṃ sasainyaṃ saharākṣasaiḥ

जब रावण ने उनसे सुना कि प्रहस्त युद्ध में मारा गया, और महाधनुर्धर धूम्राक्ष भी अपनी सेना और राक्षसों सहित मारा गया,

श्लोक 19 (3.287.19)

सुदीर्घमिव निःश्वस्य समुत्पत्य वरासनात् । उवाच कुम्भकर्णस्य कर्मकालोऽयमागतः ॥

sudīrghamiva niḥśvasya samutpatya varāsanāt | uvāca kumbhakarṇasya karmakālo'yamāgataḥ

तो उसने लम्बी साँस ली, अपने श्रेष्ठ आसन से उछलकर उठा और बोला — 'अब कुम्भकर्ण के पराक्रम का समय आ गया है।'

श्लोक 20 (3.287.20)

इत्येवमुक्त्वा विविधैर्वादित्रैः सुमहास्वनैः । शयानमतिनिद्रालुं कुम्भकर्णमबोधयत् ॥

ityevamuktvā vividhairvāditraiḥ sumahāsvanaiḥ | śayānamatinidrāluṃ kumbhakarṇamabodhayat

यह कहकर उसने अनेक प्रकार के ऊँचे स्वर वाले बाजों से गहरी नींद में सोए कुम्भकर्ण को जगवाया।

श्लोक 21 (3.287.21)

प्रबोध्य महता चैनं यत्नेनाऽऽगतसाध्वसः । स्वस्थमासीनमव्यग्रं विनिद्रं राक्षसाधिपः । ततोऽब्रवीद्दशग्रीवः कुम्भकर्णं महाबलम् ॥

prabodhya mahatā cainaṃ yatnenā''gatasādhvasaḥ | svasthamāsīnamavyagraṃ vinidraṃ rākṣasādhipaḥ | tato'bravīddaśagrīvaḥ kumbhakarṇaṃ mahābalam

भय से घिरे राक्षसराज ने बड़े यत्न से उसे जगाया; और जब कुम्भकर्ण नींद से मुक्त होकर शान्त और स्वस्थ बैठ गया, तब दशग्रीव ने उस महाबली से कहा —

रावण उवाच

श्लोक 22 (3.287.22)

धन्योसि यस्य ते निद्रा कुम्भकर्णेयमीदृशी । य इदं दारुणं कालं न जानीषे महाभयम् ॥

dhanyosi yasya te nidrā kumbhakarṇeyamīdṛśī | ya idaṃ dāruṇaṃ kālaṃ na jānīṣe mahābhayam

हे कुम्भकर्ण, तुम धन्य हो कि तुम्हें ऐसी नींद आती है, जिसके कारण तुम्हें इस महाभयंकर दारुण समय का पता ही नहीं।

श्लोक 23 (3.287.23)

एष तीर्त्वाऽर्णवं रामः सेतुना हरिभिः सह । अवमत्येह नः सर्वान्करोति कदनं महत् ॥

eṣa tīrtvā'rṇavaṃ rāmaḥ setunā haribhiḥ saha | avamatyeha naḥ sarvānkaroti kadanaṃ mahat

यह राम वानरों के साथ सेतु के द्वारा समुद्र पार करके हम सबकी अवहेलना करता हुआ यहाँ भारी संहार कर रहा है।

श्लोक 24 (3.287.24)

मया त्वपहृता भार्या सीता नामास्य जानकी । तां नेतुं स इहायातो बद्ध्वा सेतुं महार्णवे ॥

mayā tvapahṛtā bhāryā sītā nāmāsya jānakī | tāṃ netuṃ sa ihāyāto baddhvā setuṃ mahārṇave

मैंने उसकी पत्नी जनकनन्दिनी सीता का हरण किया है; उसी को ले जाने के लिए वह महासागर पर सेतु बाँधकर यहाँ आया है।

श्लोक 25 (3.287.25)

तेन चैव प्रहस्तादिर्महान्नः स्वजनो हतः । तस्य नान्यो निहन्ताऽस्ति त्वामृते शत्रुकर्शन ॥

tena caiva prahastādirmahānnaḥ svajano hataḥ | tasya nānyo nihantā'sti tvāmṛte śatrukarśana

उसी ने प्रहस्त आदि हमारे बड़े-बड़े स्वजनों को मार डाला है। हे शत्रुसंहारक, तुम्हारे सिवा उसे मारने वाला और कोई नहीं।

श्लोक 26 (3.287.26)

स दंशितोऽभिनिर्याहि त्वमद्य बलिनां वर । रामादीन्समरे सर्वाञ्जहि शत्रूनरिंदम ॥

sa daṃśito'bhiniryāhi tvamadya balināṃ vara | rāmādīnsamare sarvāñjahi śatrūnariṃdama

हे बलवानों में श्रेष्ठ, हे शत्रुदमन, आज तुम कवच पहनकर निकलो और युद्ध में राम आदि सभी शत्रुओं को मार डालो।

श्लोक 27 (3.287.27)

दूषणावरजौ चैव वज्रवेगप्रमाथिनौ । तौ त्वां बलेन महता सहितावनुयास्यतः ॥

dūṣaṇāvarajau caiva vajravegapramāthinau | tau tvāṃ balena mahatā sahitāvanuyāsyataḥ

दूषण के छोटे भाई वज्रवेग और प्रमाथी भी विशाल सेना लेकर तुम्हारे पीछे चलेंगे।

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 28 (3.287.28)

इत्युक्त्वा राक्षसपतिः कुम्भकर्णं तरस्विनम् । संदिदेशेतिकर्तव्ये वज्रवेगप्रमाथिनौ ॥

ityuktvā rākṣasapatiḥ kumbhakarṇaṃ tarasvinam | saṃdideśetikartavye vajravegapramāthinau

वेगवान कुम्भकर्ण से ऐसा कहकर राक्षसराज ने वज्रवेग और प्रमाथी को उनके कर्तव्य का आदेश दिया।

श्लोक 29 (3.287.29)

तथेत्युक्त्वा युतौ वीरौ रावणं दूषणानुजौ । कुम्भकर्णं पुरस्कृत्य तूर्णं निर्ययतुः पुरात् ॥

tathetyuktvā yutau vīrau rāvaṇaṃ dūṣaṇānujau | kumbhakarṇaṃ puraskṛtya tūrṇaṃ niryayatuḥ purāt

रावण से 'ऐसा ही होगा' कहकर दूषण के वे दोनों वीर छोटे भाई साथ मिलकर कुम्भकर्ण को आगे करके शीघ्र ही नगर से निकल पड़े।

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