आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 288
लक्ष्मण द्वारा कुम्भकर्ण का वध
कुम्भकर्ण युद्ध के लिए निकलता है; वानर उसे घेरकर प्रहार करते हैं, पर वह हँसता हुआ उन्हें खाने लगता है। सुग्रीव उसके सिर पर साल वृक्ष तोड़ते हैं तो वह उन्हें उठा ले जाता है, तब लक्ष्मण का बाण उस राक्षस का हृदय बेध देता है। कुम्भकर्ण सुग्रीव को छोड़कर शिला लिए लक्ष्मण पर झपटता है; लक्ष्मण उसकी भुजाएँ काटते जाते हैं और नई उगती जाती हैं, अन्त में वे ब्रह्मास्त्र से उसका नाश करते हैं। फिर हनुमान् और नील वज्रवेग और प्रमाथी को मार डालते हैं और सामान्य युद्ध फिर छिड़ जाता है, जिसमें अधिकतर राक्षस ही मारे जाते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.288.1)
ततो निर्याय स्वपुरात्कुम्भकर्णः सहानुगः । अपश्यत्कपिसैन्यं तज्जितकाश्यग्रतः स्थितम् ॥
tato niryāya svapurātkumbhakarṇaḥ sahānugaḥ | apaśyatkapisainyaṃ tajjitakāśyagrataḥ sthitam
तब कुम्भकर्ण अपने अनुचरों के साथ अपने नगर से निकला और उसने सामने खड़ी, विजय के उत्साह से भरी वानर-सेना को देखा।
श्लोक 2 (3.288.2)
स वीक्षमाणस्तत्सैन्यं रामदर्शनकाङ्क्षया । अपश्यच्चापि सौमित्रिं धनुष्पाणिं व्यवस्थितम् ॥
sa vīkṣamāṇastatsainyaṃ rāmadarśanakāṅkṣayā | apaśyaccāpi saumitriṃ dhanuṣpāṇiṃ vyavasthitam
राम को देखने की इच्छा से उस सेना को निहारते हुए उसे हाथ में धनुष लिए खड़े सुमित्रानन्दन दिखाई दिए।
श्लोक 3 (3.288.3)
तमभ्येत्याशु हरयः परिवब्रुः समन्ततः । शैलवृक्षायुधा नादानमुञ्चन्भीषणास्ततः ॥
tamabhyetyāśu harayaḥ parivabruḥ samantataḥ | śailavṛkṣāyudhā nādānamuñcanbhīṣaṇāstataḥ
वानरों ने शीघ्र आगे बढ़कर उसे चारों ओर से घेर लिया; फिर चट्टानों और वृक्षों को हथियार बनाए वे भयंकर गर्जना करने लगे।
श्लोक 4 (3.288.4)
अभ्यघ्नंश्च महाकायैर्बहुभिर्जगतीरुहैः । करजैरतुदंश्चान्ये विहाय भयमुत्तमम् ॥
abhyaghnaṃśca mahākāyairbahubhirjagatīruhaiḥ | karajairatudaṃścānye vihāya bhayamuttamam
उन्होंने बहुत-से विशाल वृक्षों से उस पर प्रहार किया, और दूसरे वानर सारा भय त्यागकर अपने नखों से उसे नोचने लगे।
श्लोक 5 (3.288.5)
बहुधा युध्यमानास्ते युद्धमार्गैः प्लवंगमाः । नानाप्रहरणैर्भीमै राक्षसेन्द्रमताडयन् ॥
bahudhā yudhyamānāste yuddhamārgaiḥ plavaṃgamāḥ | nānāpraharaṇairbhīmai rākṣasendramatāḍayan
युद्ध की अनेक रीतियों से तरह-तरह से लड़ते हुए वानरों ने नाना प्रकार के भयंकर अस्त्रों से उस राक्षसश्रेष्ठ पर प्रहार किया।
श्लोक 6 (3.288.6)
स ताड्यमानः प्रहसन्भक्षयामास वानरान् । बलं चण्डबलाख्यं च वज्रबाहुं च वानरम् ॥
sa tāḍyamānaḥ prahasanbhakṣayāmāsa vānarān | balaṃ caṇḍabalākhyaṃ ca vajrabāhuṃ ca vānaram
मार खाते हुए भी वह हँसता रहा और वानरों को खाने लगा — बल को, चण्डबल नामक वानर को और वानर वज्रबाहु को।
श्लोक 7 (3.288.7)
तद्दृष्ट्वा व्यथनं कर्म कुम्भकर्णस्य रक्षसः । उदक्रोशन्परित्रस्तास्तारप्रभृतयस्तदा ॥
taddṛṣṭvā vyathanaṃ karma kumbhakarṇasya rakṣasaḥ | udakrośanparitrastāstāraprabhṛtayastadā
राक्षस कुम्भकर्ण का वह पीड़ादायक कर्म देखकर तार आदि वानर भयभीत होकर चिल्ला उठे।
श्लोक 8 (3.288.8)
तानुच्चैः क्रोशतः सैन्याञ्श्रुत्वा स हरियूथपान् । अभिदुद्राव सुग्रीवः कुम्भकर्णमपेतभीः ॥
tānuccaiḥ krośataḥ sainyāñśrutvā sa hariyūthapān | abhidudrāva sugrīvaḥ kumbhakarṇamapetabhīḥ
उन सैनिकों — वानर-यूथपतियों — को ज़ोर से चिल्लाते सुनकर सुग्रीव निर्भय होकर कुम्भकर्ण पर दौड़ पड़े।
श्लोक 9 (3.288.9)
ततो निपत्य वेगेन कुम्भकर्णं महामनाः । सालेन जघ्निवान्मूर्ध्नि बलेन कपिकुञ्जरः ॥
tato nipatya vegena kumbhakarṇaṃ mahāmanāḥ | sālena jaghnivānmūrdhni balena kapikuñjaraḥ
बड़े वेग से कुम्भकर्ण पर झपटकर उस महामना कपिश्रेष्ठ ने पूरे बल से उसके सिर पर साल वृक्ष से प्रहार किया।
श्लोक 10 (3.288.10)
स महात्मा महावेगः कुम्भकर्णस्य मूर्धनि । बिभेद सालं सुग्रीवो न चैवाव्यथयत्कपिः ॥
sa mahātmā mahāvegaḥ kumbhakarṇasya mūrdhani | bibheda sālaṃ sugrīvo na caivāvyathayatkapiḥ
उस महात्मा, महावेगी वानर सुग्रीव ने कुम्भकर्ण के सिर पर साल वृक्ष तोड़ डाला, फिर भी वे उसे तनिक भी विचलित न कर सके।
श्लोक 11 (3.288.11)
ततो विनद्य सहसा सालस्पर्शविबोधितः । दोर्भ्यामादाय सुग्रीवं कुम्भकर्णोऽहरद्बलात् ॥
tato vinadya sahasā sālasparśavibodhitaḥ | dorbhyāmādāya sugrīvaṃ kumbhakarṇo'haradbalāt
साल वृक्ष के स्पर्श से सचेत होकर कुम्भकर्ण सहसा गरजा और सुग्रीव को दोनों भुजाओं में दबोचकर बलपूर्वक ले चला।
श्लोक 12 (3.288.12)
ह्रियमाणं तु सुग्रीवं कुम्भकर्णेन रक्षसा । अवेक्ष्याभ्यद्रवद्वीरः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः ॥
hriyamāṇaṃ tu sugrīvaṃ kumbhakarṇena rakṣasā | avekṣyābhyadravadvīraḥ saumitrirmitranandanaḥ
सुग्रीव को राक्षस कुम्भकर्ण द्वारा ले जाया जाता देख मित्रों को आनन्द देने वाले वीर सुमित्रानन्दन दौड़ पड़े।
श्लोक 13 (3.288.13)
सोऽभिपत्य महावेगं रुक्मपुङ्खं महाशरम् । प्राहिणोत्कुम्भकर्णाय लक्ष्मणः परवीरहा ॥
so'bhipatya mahāvegaṃ rukmapuṅkhaṃ mahāśaram | prāhiṇotkumbhakarṇāya lakṣmaṇaḥ paravīrahā
शत्रुवीरों का संहार करने वाले लक्ष्मण ने आगे झपटकर कुम्भकर्ण पर सोने के पंखों वाला एक महान् वेगवान बाण छोड़ा।
श्लोक 14 (3.288.14)
स तस्य देहावरणं भित्त्वा देहं च सायकः । जगाम दारयन्भूमिं रुधिरेण समुक्षितः ॥
sa tasya dehāvaraṇaṃ bhittvā dehaṃ ca sāyakaḥ | jagāma dārayanbhūmiṃ rudhireṇa samukṣitaḥ
वह बाण उसके कवच और शरीर को भेदकर, रक्त से सना हुआ, धरती को चीरता हुआ निकल गया।
श्लोक 15 (3.288.15)
तथा स भिन्नहृदयः समुत्सृज्य कपीश्वरम् । वेगेन महताऽऽविष्टस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥
tathā sa bhinnahṛdayaḥ samutsṛjya kapīśvaram | vegena mahatā''viṣṭastiṣṭha tiṣṭheti cābravīt
तब हृदय बिंध जाने पर उसने वानरराज को छोड़ दिया और प्रचण्ड आवेग से भरकर बोला — 'ठहर, ठहर!'
श्लोक 16 (3.288.16)
कुम्भकर्णो महेष्वासः प्रगृहीतशिलायुधः । अभिदुद्राव सौमित्रिमुद्यम्य महतीं शिलाम् ॥
kumbhakarṇo maheṣvāsaḥ pragṛhītaśilāyudhaḥ | abhidudrāva saumitrimudyamya mahatīṃ śilām
महाधनुर्धर कुम्भकर्ण ने शिला को ही अस्त्र बनाकर एक बड़ी चट्टान उठाई और सुमित्रानन्दन पर दौड़ पड़ा।
श्लोक 17 (3.288.17)
तस्याभिपततस्तूर्णं क्षुराभ्यामुच्छ्रितौ करौ । चिच्छेद निशिताग्राभ्यां स बभूव चतुर्भुजः ॥
tasyābhipatatastūrṇaṃ kṣurābhyāmucchritau karau | ciccheda niśitāgrābhyāṃ sa babhūva caturbhujaḥ
जब वह तेज़ी से झपटा, तब लक्ष्मण ने तीखी नोक वाले दो क्षुर बाणों से उसके उठे हुए दोनों हाथ काट डाले; तब वह चार भुजाओं वाला हो गया।
श्लोक 18 (3.288.18)
तानप्यस्य भुजान्सर्वान्प्रगृहीतशिलायुधान् । क्षुरैश्चिच्छेद लघ्वस्त्रं सौमित्रिः प्रतिदर्शयन् ॥
tānapyasya bhujānsarvānpragṛhītaśilāyudhān | kṣuraiściccheda laghvastraṃ saumitriḥ pratidarśayan
शिलाएँ थामे उन सब भुजाओं को भी सुमित्रानन्दन ने अपनी अस्त्र-चालन की फुर्ती दिखाते हुए क्षुर बाणों से काट डाला।
श्लोक 19 (3.288.19)
स बभूवातिकायश्च बहुपादशिरोभुजः । तं ब्रह्मास्त्रेण सौमित्रिर्ददाराद्रिचयोपमम् ॥
sa babhūvātikāyaśca bahupādaśirobhujaḥ | taṃ brahmāstreṇa saumitrirdadārādricayopamam
तब वह अत्यन्त विशालकाय हो गया, अनेक पैरों, सिरों और भुजाओं वाला; पर्वतों के ढेर जैसे उस राक्षस को सुमित्रानन्दन ने ब्रह्मास्त्र से विदीर्ण कर दिया।
श्लोक 20 (3.288.20)
स पपात महावीर्यो दिव्यास्त्राभिहतो रणे । महाशनिविनिर्दग्धः पादपोऽङ्कुरवानिव ॥
sa papāta mahāvīryo divyāstrābhihato raṇe | mahāśanivinirdagdhaḥ pādapo'ṅkuravāniva
दिव्य अस्त्र से आहत होकर वह महापराक्रमी रणभूमि में ऐसे गिर पड़ा जैसे महान् वज्र से झुलसा, अंकुरों से भरा वृक्ष।
श्लोक 21 (3.288.21)
तं दृष्ट्वा वृत्रसंकाशं कुम्भकर्णं तरस्विनम् । गतासुं पतितं भूमौ राक्षसाः प्राद्रवन्भयात् ॥
taṃ dṛṣṭvā vṛtrasaṃkāśaṃ kumbhakarṇaṃ tarasvinam | gatāsuṃ patitaṃ bhūmau rākṣasāḥ prādravanbhayāt
वृत्रासुर के समान वेगवान कुम्भकर्ण को प्राणहीन होकर धरती पर पड़ा देख राक्षस भय से भाग खड़े हुए।
श्लोक 22 (3.288.22)
तथा तान्द्रवतो योधान्दृष्ट्वा तौ दूषणानुजौ । अवस्थाप्याथ सौमित्रिं संक्रुद्धावभ्यधावताम् ॥
tathā tāndravato yodhāndṛṣṭvā tau dūṣaṇānujau | avasthāpyātha saumitriṃ saṃkruddhāvabhyadhāvatām
अपने योद्धाओं को इस प्रकार भागते देख दूषण के दोनों छोटे भाइयों ने उन्हें रोककर स्थिर किया और क्रोध में भरकर सुमित्रानन्दन पर धावा बोल दिया।
श्लोक 23 (3.288.23)
तावाद्रवन्तौ संक्रुद्धौ वज्रवेगप्रमाथिनौ । अभिजग्राह सौमित्रिर्विनद्योभौ पतत्रिभिः ॥
tāvādravantau saṃkruddhau vajravegapramāthinau | abhijagrāha saumitrirvinadyobhau patatribhiḥ
क्रोध में भरे वज्रवेग और प्रमाथी को दौड़कर आते देख सुमित्रानन्दन ने गर्जना की और दोनों को अपने बाणों से रोक लिया।
श्लोक 24 (3.288.24)
ततः सुतुमुलं युद्धमभवद्रोमहर्षणम् । दूषणानुजयोः पार्थ लक्ष्मणस्य च धीमतः ॥
tataḥ sutumulaṃ yuddhamabhavadromaharṣaṇam | dūṣaṇānujayoḥ pārtha lakṣmaṇasya ca dhīmataḥ
हे पार्थ, तब दूषण के छोटे भाइयों और बुद्धिमान लक्ष्मण के बीच रोंगटे खड़े कर देने वाला अत्यन्त घमासान युद्ध हुआ।
श्लोक 25 (3.288.25)
महता शरवर्षेण राक्षसौ सोऽभ्यवर्षत । तं चापि वीरौ संक्रुद्धावुभौ तौ समवर्षताम् ॥
mahatā śaravarṣeṇa rākṣasau so'bhyavarṣata | taṃ cāpi vīrau saṃkruddhāvubhau tau samavarṣatām
लक्ष्मण ने उन दोनों राक्षसों पर बाणों की भारी वर्षा की, और वे दोनों वीर भी क्रोधित होकर उन पर बाण बरसाने लगे।
श्लोक 26 (3.288.26)
मुहूर्तमेवमभवद्वज्रवेगप्रमाथिनोः । सौमित्रेश्च महाबाहोः संप्रहारः सुदारुणः ॥
muhūrtamevamabhavadvajravegapramāthinoḥ | saumitreśca mahābāhoḥ saṃprahāraḥ sudāruṇaḥ
इस प्रकार कुछ समय तक वज्रवेग-प्रमाथी और महाबाहु सुमित्रानन्दन के बीच अत्यन्त भयंकर संग्राम चलता रहा।
श्लोक 27 (3.288.27)
अथाद्रिशृङ्गमादाय हनुमान्मारुतात्मजः । अभिद्रुत्याददे प्राणान्वज्रवेगस्य रक्षसः ॥
athādriśṛṅgamādāya hanumānmārutātmajaḥ | abhidrutyādade prāṇānvajravegasya rakṣasaḥ
तब पवनपुत्र हनुमान् ने एक पर्वत-शिखर उठाया और दौड़कर राक्षस वज्रवेग के प्राण हर लिए।
श्लोक 28 (3.288.28)
नीलश्च महता ग्राव्णा दूषणावरजं हरिः । प्रमाथिनमभिद्रुत्य प्रममाथ महाबलः ॥
nīlaśca mahatā grāvṇā dūṣaṇāvarajaṃ hariḥ | pramāthinamabhidrutya pramamātha mahābalaḥ
और महाबली वानर नील ने दूषण के छोटे भाई प्रमाथी पर झपटकर एक बड़ी चट्टान से उसे कुचल डाला।
श्लोक 29 (3.288.29)
ततः प्रावर्तत पुनः संग्रामः कटुकोदयः । रामरावणसैन्यानामन्योन्यमभिधावताम् ॥
tataḥ prāvartata punaḥ saṃgrāmaḥ kaṭukodayaḥ | rāmarāvaṇasainyānāmanyonyamabhidhāvatām
तब राम और रावण की सेनाओं के एक-दूसरे पर टूट पड़ने से कटु परिणाम वाला संग्राम फिर छिड़ गया।
श्लोक 30 (3.288.30)
शतशो नैर्ऋतान्वन्या जघ्नुर्वन्यांश्च नैर्ऋताः । नैर्ऋतास्तत्र वध्यन्ते प्रायेण न तु वानराः ॥
śataśo nairṛtānvanyā jaghnurvanyāṃśca nairṛtāḥ | nairṛtāstatra vadhyante prāyeṇa na tu vānarāḥ
वनवासी वानरों ने सैकड़ों राक्षसों को मारा और राक्षसों ने वानरों को; परन्तु वहाँ अधिकतर राक्षस ही मारे गए, वानर नहीं।