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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 289

इन्द्रजित् का अदृश्य युद्ध और राम-लक्ष्मण का पतन

कुम्भकर्ण, प्रहस्त और धूम्राक्ष के मारे जाने पर रावण इन्द्र-विजेता अपने पुत्र इन्द्रजित् को राम, लक्ष्मण और सुग्रीव का वध करने भेजता है। इन्द्रजित् लक्ष्मण को ललकारता है और दोनों में बराबरी का युद्ध होता है, तभी अंगद एक वृक्ष से इन्द्रजित् का रथ चूर कर देते हैं। तब इन्द्रजित् माया से अदृश्य हो जाता है और छिपकर वरदान में मिले बाणों से राम, लक्ष्मण और वानरों को बेधता है, यहाँ तक कि दोनों भाई सूर्य और चन्द्रमा की भाँति भूमि पर गिर पड़ते हैं।

अध्याय 288अध्याय-सूचीअध्याय 290

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.289.1)

ततः श्रुत्वा हतं सङ्ख्ये कुम्भकर्णं सहानुगम् । प्रहस्तं च महेष्वासं धूम्राक्षं चातितेजसम् ॥

tataḥ śrutvā hataṃ saṅkhye kumbhakarṇaṃ sahānugam | prahastaṃ ca maheṣvāsaṃ dhūmrākṣaṃ cātitejasam

तब युद्ध में अनुयायियों सहित कुम्भकर्ण के, महाधनुर्धर प्रहस्त के और अत्यन्त तेजस्वी धूम्राक्ष के मारे जाने का समाचार सुनकर

श्लोक 2 (3.289.2)

पुत्रमिन्द्रजितं वीरं रावणः प्रत्यभाषत । जहि रामममित्रघ्न सुग्रीवं च सलक्ष्मणम् ॥

putramindrajitaṃ vīraṃ rāvaṇaḥ pratyabhāṣata | jahi rāmamamitraghna sugrīvaṃ ca salakṣmaṇam

रावण ने अपने वीर पुत्र इन्द्रजित् से कहा — "हे शत्रुनाशक, राम को मार डालो, और लक्ष्मण सहित सुग्रीव को भी।

रावण उवाच

श्लोक 3 (3.289.3)

त्वया हि मम सत्पुत्र यशो दीप्तमुपार्जितम् । जित्वा वज्रधरं सङ्ख्ये सहस्राक्षं शचीपतिम् ॥

tvayā hi mama satputra yaśo dīptamupārjitam | jitvā vajradharaṃ saṅkhye sahasrākṣaṃ śacīpatim

हे सुपुत्र, तुमने युद्ध में वज्रधारी, सहस्र नेत्रों वाले शचीपति इन्द्र को जीतकर मेरे लिए उज्ज्वल यश अर्जित किया है।

श्लोक 4 (3.289.4)

अन्तर्हितः प्रकाशो वा दिव्यैर्दत्तवरैः शरैः । जहि शत्रूनमित्रघ्न मम शस्त्रभृतां वर ॥

antarhitaḥ prakāśo vā divyairdattavaraiḥ śaraiḥ | jahi śatrūnamitraghna mama śastrabhṛtāṃ vara

हे शत्रुनाशक, हे शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, अदृश्य रहकर या प्रकट होकर, वरदान में मिले अपने दिव्य बाणों से शत्रुओं का संहार करो।

श्लोक 5 (3.289.5)

रामलक्ष्मणसुग्रीवाः शरस्पर्शं न तेऽनघ । समर्थाः प्रतिसोढुं च कुतस्तदनुयायिनः ॥

rāmalakṣmaṇasugrīvāḥ śarasparśaṃ na te'nagha | samarthāḥ pratisoḍhuṃ ca kutastadanuyāyinaḥ

हे निष्पाप, राम, लक्ष्मण और सुग्रीव भी तुम्हारे बाणों का स्पर्श सहने में समर्थ नहीं हैं; फिर उनके अनुयायियों की तो बात ही क्या!

श्लोक 6 (3.289.6)

अगता या प्रहस्तेन कुम्भकर्णेन चानघ । खरस्यापचितिः सङ्ख्ये तां गच्छस्व महाभुज ॥

agatā yā prahastena kumbhakarṇena cānagha | kharasyāpacitiḥ saṅkhye tāṃ gacchasva mahābhuja

हे निष्पाप महाबाहु, खर के वध का जो प्रतिशोध प्रहस्त और कुम्भकर्ण युद्ध में नहीं ले सके, उसे तुम पूरा करो।

श्लोक 7 (3.289.7)

त्वमद्य निशितैर्बाणैर्हत्वा शत्रून्ससैनिकान् । प्रतिनन्दय मां पुत्र पुरा जित्वेव वासवम् ॥

tvamadya niśitairbāṇairhatvā śatrūnsasainikān | pratinandaya māṃ putra purā jitveva vāsavam

पुत्र, आज अपने तीखे बाणों से सेना सहित शत्रुओं को मारकर मुझे वैसे ही आनन्दित करो, जैसे पहले इन्द्र को जीतकर किया था।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 8 (3.289.8)

इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा रथमास्थाय दंशितः । प्रययाविन्द्रजिद्राजंस्तूर्णमायोधनं प्रति ॥

ityuktaḥ sa tathetyuktvā rathamāsthāya daṃśitaḥ | prayayāvindrajidrājaṃstūrṇamāyodhanaṃ prati

ऐसा कहे जाने पर इन्द्रजित् ने "ऐसा ही होगा" कहा और कवच धारण कर, रथ पर चढ़कर, हे राजन्, शीघ्र ही रणभूमि की ओर चल पड़ा।

श्लोक 9 (3.289.9)

ततो विश्राव्य विस्पष्टं नाम राक्षसपुङ्गवः । आह्वयामास समरे लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ॥

tato viśrāvya vispaṣṭaṃ nāma rākṣasapuṅgavaḥ | āhvayāmāsa samare lakṣmaṇaṃ śubhalakṣaṇam

तब उस राक्षसश्रेष्ठ ने ऊँचे और स्पष्ट स्वर में अपना नाम सुनाकर शुभ लक्षणों वाले लक्ष्मण को युद्ध के लिए ललकारा।

श्लोक 10 (3.289.10)

तं लक्ष्मणोऽभ्यधावच्च प्रगृह्य सशरं धनुः । त्रासयंस्तलघोषेण सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥

taṃ lakṣmaṇo'bhyadhāvacca pragṛhya saśaraṃ dhanuḥ | trāsayaṃstalaghoṣeṇa siṃhaḥ kṣudramṛgaṃ yathā

लक्ष्मण बाण चढ़ा धनुष लेकर उसकी ओर दौड़े और अपने तलत्राण की ध्वनि से उसे वैसे ही डराने लगे जैसे सिंह किसी छोटे मृग को डराता है।

श्लोक 11 (3.289.11)

तयोः समभवद्युद्धं सुमहज्जयगृद्धिनोः । दिव्यास्त्रविदुषोस्तीव्रमन्योन्यस्पर्धिनोस्तदा ॥

tayoḥ samabhavadyuddhaṃ sumahajjayagṛddhinoḥ | divyāstraviduṣostīvramanyonyaspardhinostadā

तब विजय के इच्छुक, दिव्यास्त्रों के ज्ञाता और एक-दूसरे से होड़ करने वाले उन दोनों के बीच बड़ा भयंकर युद्ध हुआ।

श्लोक 12 (3.289.12)

रावणिस्तु यदा नैनं विशेषयति सायकैः । ततो गुरुतरं यत्नमातिष्ठद्बलिनां वरः ॥

rāvaṇistu yadā nainaṃ viśeṣayati sāyakaiḥ | tato gurutaraṃ yatnamātiṣṭhadbalināṃ varaḥ

जब रावणपुत्र अपने बाणों से लक्ष्मण पर भारी न पड़ सका, तब बलवानों में श्रेष्ठ उस राक्षस ने और भी बड़ा प्रयत्न किया।

श्लोक 13 (3.289.13)

तत एवं महावेगैरर्दयामास तोमरैः । तानागतान्स चिच्छेद सौमित्रिर्निशितैः शरैः ॥

tata evaṃ mahāvegairardayāmāsa tomaraiḥ | tānāgatānsa ciccheda saumitrirniśitaiḥ śaraiḥ

तब उसने बड़े वेग वाले तोमरों से लक्ष्मण को पीड़ित किया; पर सुमित्रानन्दन ने आते हुए उन तोमरों को अपने तीखे बाणों से काट डाला।

श्लोक 14 (3.289.14)

ते निकृत्ताः शरैस्तीक्ष्णैर्न्यपतन्धरणीतले । सायका रावणेराजौ शतशः शकलीकृताः ॥

te nikṛttāḥ śaraistīkṣṇairnyapatandharaṇītale | sāyakā rāvaṇerājau śataśaḥ śakalīkṛtāḥ

तीखे बाणों से कटकर वे भूमि पर गिर पड़े; उस युद्ध में रावणपुत्र के बाण सैकड़ों टुकड़ों में बिखर गए।

श्लोक 15 (3.289.15)

तमङ्गदो वालिसुतः श्रीमानुद्यम्य पादपम् । अभिद्रुत्य महावेगस्ताडयामास मूर्धनि ॥

tamaṅgado vālisutaḥ śrīmānudyamya pādapam | abhidrutya mahāvegastāḍayāmāsa mūrdhani

तब वाली के तेजस्वी पुत्र अंगद ने एक वृक्ष उठाया और बड़े वेग से झपटकर उसके सिर पर प्रहार किया।

श्लोक 16 (3.289.16)

तस्येन्द्रजिदसंभ्रान्तः प्रासेनोरसि वीर्यवान् । प्रहर्तुमैच्छत्तं चास्य प्रासं चिच्छेद लक्ष्मणः ॥

tasyendrajidasaṃbhrāntaḥ prāsenorasi vīryavān | prahartumaicchattaṃ cāsya prāsaṃ ciccheda lakṣmaṇaḥ

पराक्रमी इन्द्रजित् ने बिना घबराए अंगद की छाती पर प्रास से प्रहार करना चाहा, पर लक्ष्मण ने उसका वह प्रास काट डाला।

श्लोक 17 (3.289.17)

तमभ्याशगतं वीरमङ्गदं रावणात्मजः । गदयाऽताडयत्सव्ये पार्श्वे वानरपुङ्गवम् ॥

tamabhyāśagataṃ vīramaṅgadaṃ rāvaṇātmajaḥ | gadayā'tāḍayatsavye pārśve vānarapuṅgavam

पास आए हुए वानरश्रेष्ठ वीर अंगद की बाईं पसली पर रावणपुत्र ने गदा से प्रहार किया।

श्लोक 18 (3.289.18)

तमचिन्त्य प्रहारं स बलवान्वालिनः सुतः । ससर्जेन्द्रजितः क्रोधात्सालस्कन्धं तथाङ्गदः ॥

tamacintya prahāraṃ sa balavānvālinaḥ sutaḥ | sasarjendrajitaḥ krodhātsālaskandhaṃ tathāṅgadaḥ

उस प्रहार की कुछ भी परवाह न करते हुए वाली के बलवान पुत्र अंगद ने क्रोध में भरकर इन्द्रजित् पर साल वृक्ष का तना फेंका।

श्लोक 19 (3.289.19)

सोऽङ्गदेन रुषोत्सृष्टो वधायेन्द्रजितस्तरुः । जघानेन्द्रजितः पार्थ रथं साश्वं ससारथिम् ॥

so'ṅgadena ruṣotsṛṣṭo vadhāyendrajitastaruḥ | jaghānendrajitaḥ pārtha rathaṃ sāśvaṃ sasārathim

हे पार्थ, इन्द्रजित् के वध के लिए अंगद द्वारा क्रोध से फेंके गए उस वृक्ष ने घोड़ों और सारथि सहित इन्द्रजित् के रथ को चूर कर दिया।

श्लोक 20 (3.289.20)

ततो हताश्वात्प्रस्कन्द्य रथात्स हतसारथिः । तत्रैवान्तर्दधे राजन्मायया रावणात्मजः ॥

tato hatāśvātpraskandya rathātsa hatasārathiḥ | tatraivāntardadhe rājanmāyayā rāvaṇātmajaḥ

तब घोड़े और सारथि के मारे जाने पर रावणपुत्र रथ से कूद पड़ा और, हे राजन्, वहीं माया से अदृश्य हो गया।

श्लोक 21 (3.289.21)

अन्तर्हितं विदित्वा तं बहुमायं च राक्षसम् । रामस्तं देशमागम्य तत्सैन्यं पर्यरक्षत ॥

antarhitaṃ viditvā taṃ bahumāyaṃ ca rākṣasam | rāmastaṃ deśamāgamya tatsainyaṃ paryarakṣata

बहुत-सी मायाएँ जानने वाले उस राक्षस को अदृश्य हुआ जानकर राम उस स्थान पर आए और सेना की रक्षा करने लगे।

श्लोक 22 (3.289.22)

स राममुद्दिश्य शरैस्ततो दत्तवरैस्तदा । विव्याध सर्वगात्रेषु लक्ष्मणं च महाबलम् ॥

sa rāmamuddiśya śaraistato dattavaraistadā | vivyādha sarvagātreṣu lakṣmaṇaṃ ca mahābalam

तब इन्द्रजित् ने राम को लक्ष्य करके वरदान में मिले बाणों से उनके सब अंगों को बेध डाला, और महाबली लक्ष्मण को भी।

श्लोक 23 (3.289.23)

तमदृश्यं शरैः शूरौ माययाऽन्तर्हितं तदा । योधयामासतुरुभौ रावणिं रामलक्ष्मणौ ॥

tamadṛśyaṃ śaraiḥ śūrau māyayā'ntarhitaṃ tadā | yodhayāmāsaturubhau rāvaṇiṃ rāmalakṣmaṇau

माया से छिपे हुए उस अदृश्य रावणपुत्र से दोनों वीर राम और लक्ष्मण बाणों द्वारा युद्ध करने लगे।

श्लोक 24 (3.289.24)

स रुषा सर्वगात्रेषु तयोः पुरुषसिंहयोः । व्यसृजत्सायकान्भूयः शतशोऽथ सहस्रशः ॥

sa ruṣā sarvagātreṣu tayoḥ puruṣasiṃhayoḥ | vyasṛjatsāyakānbhūyaḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

क्रोध में भरकर उसने उन दोनों पुरुषसिंहों के सब अंगों पर सैकड़ों और हजारों बाण बार-बार छोड़े।

श्लोक 25 (3.289.25)

तमदृश्यं विचिन्वन्तः सृजन्तमनिशं शरान् । हरयो विविशुर्व्योम प्रगृह्य महतीः शिलाः ॥

tamadṛśyaṃ vicinvantaḥ sṛjantamaniśaṃ śarān | harayo viviśurvyoma pragṛhya mahatīḥ śilāḥ

निरन्तर बाण बरसाते उस अदृश्य राक्षस को खोजते हुए वानर बड़ी-बड़ी शिलाएँ लेकर आकाश में जा पहुँचे।

श्लोक 26 (3.289.26)

तांश्च तौ चाप्यदृश्यः स शरैर्विव्याध राक्षसः । स भृशं ताडयामास रावणिर्मायया वृतः ॥

tāṃśca tau cāpyadṛśyaḥ sa śarairvivyādha rākṣasaḥ | sa bhṛśaṃ tāḍayāmāsa rāvaṇirmāyayā vṛtaḥ

उस अदृश्य राक्षस ने वानरों को और उन दोनों भाइयों को भी बाणों से बेध डाला; माया से ढका रावणपुत्र उन पर भारी प्रहार करता रहा।

श्लोक 27 (3.289.27)

तौ शरैरर्दितौ वीरौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । पेततुर्गगनाद्भूमिं सूर्याचन्द्रमसाविव ॥

tau śarairarditau vīrau bhrātarau rāmalakṣmaṇau | petaturgaganādbhūmiṃ sūryācandramasāviva

उसके बाणों से पीड़ित वे दोनों वीर भाई राम और लक्ष्मण आकाश से गिरते सूर्य और चन्द्रमा की भाँति भूमि पर गिर पड़े।

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