आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 290
लक्ष्मण द्वारा इन्द्रजित् का वध
इन्द्रजित् गिरे हुए राम और लक्ष्मण को बाणों के जाल में बाँध देता है; विभीषण प्रज्ञास्त्र से उन्हें सचेत करते हैं और सुग्रीव विशल्या औषधि से उनके बाण निकाल देते हैं। फिर विभीषण उन्हें कुबेर का भेजा जल देते हैं, जिससे अदृश्य प्राणी भी दिखने लगते हैं। इन्द्रजित् के लौटने पर लक्ष्मण विभीषण की सलाह से उसके अनुष्ठान पूरा करने से पहले ही उस पर आक्रमण करते हैं और उसकी भुजाएँ तथा सिर काट डालते हैं। शोक से उन्मत्त रावण अशोकवाटिका में सीता को मारने के लिए तलवार लेकर दौड़ता है, पर मन्त्री अविन्ध्य उसे रोक लेता है, और रावण युद्ध के लिए अपना रथ तैयार करने की आज्ञा देता है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.290.1)
तावुभौ पतितौ दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ । बबन्ध रावणिर्भूयः शरैर्दत्तवरैस्तदा ॥
tāvubhau patitau dṛṣṭvā bhrātarau rāmalakṣmaṇau | babandha rāvaṇirbhūyaḥ śarairdattavaraistadā
दोनों भाई राम और लक्ष्मण को गिरा हुआ देखकर रावणपुत्र ने वरदान में मिले बाणों से उन्हें फिर से बाँध दिया।
श्लोक 2 (3.290.2)
तौ वीरौ शरजालेन बद्धाविन्द्रजिता रणे । रेजतुः पुरुषव्याघ्रौ शकुन्ताविव पञ्जरे ॥
tau vīrau śarajālena baddhāvindrajitā raṇe | rejatuḥ puruṣavyāghrau śakuntāviva pañjare
रण में इन्द्रजित् द्वारा बाणों के जाल से बँधे वे दोनों पुरुषसिंह वीर पिंजरे में बंद दो पक्षियों के समान दिखाई देते थे।
श्लोक 3 (3.290.3)
दृष्ट्वा निपतितौ भूमौ सर्वाङ्गेषु शराचितौ । सुग्रीवः कपिभिः सार्धं परिवार्योपतस्थिवान् ॥
dṛṣṭvā nipatitau bhūmau sarvāṅgeṣu śarācitau | sugrīvaḥ kapibhiḥ sārdhaṃ parivāryopatasthivān
उन्हें भूमि पर गिरा और सब अंगों में बाणों से भरा देखकर सुग्रीव वानरों के साथ उन्हें घेरकर पास खड़े हो गए —
श्लोक 4 (3.290.4)
सुषेणमैन्दद्विविदैः कुमुदेनाङ्गदेन च । हनुमन्नीलतारैश्च नलेन च कपीश्वरः ॥
suṣeṇamaindadvividaiḥ kumudenāṅgadena ca | hanumannīlatāraiśca nalena ca kapīśvaraḥ
वानरराज सुग्रीव के साथ सुषेण, मैन्द और द्विविद, कुमुद और अंगद, हनुमान, नील और तार, तथा नल भी थे।
श्लोक 5 (3.290.5)
ततस्तं देशमागम्य कृतकर्मा विभीषणः । बोधयामास तौ वीरौ प्रज्ञास्त्रेण प्रमोहितौ ॥
tatastaṃ deśamāgamya kṛtakarmā vibhīṣaṇaḥ | bodhayāmāsa tau vīrau prajñāstreṇa pramohitau
तब अपना कार्य पूरा कर चुके विभीषण उस स्थान पर आए और उन्होंने प्रज्ञास्त्र से मूर्च्छित पड़े उन दोनों वीरों को जगाया।
श्लोक 6 (3.290.6)
विशल्यौ चापि सुग्रीवः क्षणेनैतौ चकार ह । विशल्यया महौषध्या दिव्यमन्त्रप्रयुक्तया ॥
viśalyau cāpi sugrīvaḥ kṣaṇenaitau cakāra ha | viśalyayā mahauṣadhyā divyamantraprayuktayā
और सुग्रीव ने दिव्य मन्त्रों के साथ प्रयुक्त विशल्या नामक महौषधि से क्षण भर में उन दोनों के शरीर से बाण निकाल दिए।
श्लोक 7 (3.290.7)
तौ लब्धसंज्ञौ नृवरौ विशल्यावुदतिष्ठताम् । उभौ गतक्लमौ चास्तां क्षणेनैतौ महारथौ ॥
tau labdhasaṃjñau nṛvarau viśalyāvudatiṣṭhatām | ubhau gataklamau cāstāṃ kṣaṇenaitau mahārathau
चेतना लौट आने और बाणों से मुक्त हो जाने पर वे दोनों नरश्रेष्ठ उठ खड़े हुए; क्षण भर में ही वे दोनों महारथी थकान से मुक्त हो गए।
श्लोक 8 (3.290.8)
ततो विभीषणः पार्थ राममिक्ष्वाकुनन्दनम् । उवाच विज्वरं दृष्ट्वा कृताञ्जलिरिदं वचः ॥
tato vibhīṣaṇaḥ pārtha rāmamikṣvākunandanam | uvāca vijvaraṃ dṛṣṭvā kṛtāñjaliridaṃ vacaḥ
तब, हे पार्थ, इक्ष्वाकुनन्दन राम को पीड़ा से मुक्त देखकर विभीषण हाथ जोड़कर यह वचन बोले —
विभीषण उवाच
श्लोक 9 (3.290.9)
अयमम्भो गृहीत्वा तु राजराजस्य शासनात् । गुह्यकोऽभ्यागतः श्वेतात्त्वत्सकाशमरिंदम ॥
ayamambho gṛhītvā tu rājarājasya śāsanāt | guhyako'bhyāgataḥ śvetāttvatsakāśamariṃdama
"हे शत्रुदमन, राजराज कुबेर की आज्ञा से यह गुह्यक जल लेकर श्वेत पर्वत से आपके पास आया है।
श्लोक 10 (3.290.10)
इदमम्भः कुबेरस्ते महाराज प्रयच्छति । अन्तर्हितानां भूतानां दर्शनार्थं परंतप ॥
idamambhaḥ kuberaste mahārāja prayacchati | antarhitānāṃ bhūtānāṃ darśanārthaṃ paraṃtapa
हे महाराज, हे परंतप, यह जल कुबेर आपको दे रहे हैं, ताकि आप छिपे हुए प्राणियों को देख सकें।
श्लोक 11 (3.290.11)
अनेन मृष्टनयनो भूतान्यन्तर्हितान्युत । भवान्द्रक्ष्यति यस्मै च भवानेतत्प्रदास्यति ॥
anena mṛṣṭanayano bhūtānyantarhitānyuta | bhavāndrakṣyati yasmai ca bhavānetatpradāsyati
इससे आँखें धो लेने पर आप छिपे हुए प्राणियों को देख सकेंगे, और वह भी देख सकेगा जिसे आप यह जल देंगे।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 12 (3.290.12)
तथेति रामस्तद्वारि प्रतिगृह्याभिसंस्कृतम् । चकार नेत्रयोः शौचं लक्ष्मणश्च महामनाः ॥
tatheti rāmastadvāri pratigṛhyābhisaṃskṛtam | cakāra netrayoḥ śaucaṃ lakṣmaṇaśca mahāmanāḥ
राम ने "ऐसा ही हो" कहकर वह अभिमन्त्रित जल लिया और उससे अपनी आँखें धोईं; महामना लक्ष्मण ने भी ऐसा ही किया,
श्लोक 13 (3.290.13)
सुग्रीवजाम्बवन्तौ च हनुमानङ्गदस्तथा । मैन्दद्विविदनीलाश्च प्रायः प्लवगसत्तमाः ॥
sugrīvajāmbavantau ca hanumānaṅgadastathā | maindadvividanīlāśca prāyaḥ plavagasattamāḥ
और सुग्रीव और जाम्बवान्, हनुमान और अंगद, मैन्द, द्विविद और नील, तथा प्रायः सभी श्रेष्ठ वानरों ने भी।
श्लोक 14 (3.290.14)
तथा समभवच्चापि यदुवाच विभीषणः । क्षणेनातीन्द्रियाण्येषां चक्षूंष्यासन्युधिष्ठिर ॥
tathā samabhavaccāpi yaduvāca vibhīṣaṇaḥ | kṣaṇenātīndriyāṇyeṣāṃ cakṣūṃṣyāsanyudhiṣṭhira
और जैसा विभीषण ने कहा था, वैसा ही हुआ; हे युधिष्ठिर, क्षण भर में उनके नेत्र इन्द्रियों से परे की वस्तुएँ देखने लगे।
श्लोक 15 (3.290.15)
इन्द्रजित्कृतकर्मा तु पित्रे कर्म तदाऽऽत्मनः । निवेद्य पुनरागच्छत्त्वरयाऽऽजिशिरः प्रति ॥
indrajitkṛtakarmā tu pitre karma tadā''tmanaḥ | nivedya punarāgacchattvarayā''jiśiraḥ prati
इन्द्रजित् अपना कार्य करके और पिता को उसकी सूचना देकर फिर शीघ्रता से रणभूमि के अग्रभाग में लौट आया।
श्लोक 16 (3.290.16)
तमागतं तु संक्रुद्धं पुनरेव युयुत्सया । अभिदुद्राव सौमित्रिर्विभीषणमते स्थितः ॥
tamāgataṃ tu saṃkruddhaṃ punareva yuyutsayā | abhidudrāva saumitrirvibhīṣaṇamate sthitaḥ
क्रोध में भरकर फिर युद्ध की इच्छा से लौटे उस राक्षस पर विभीषण की सलाह मानकर सुमित्रानन्दन टूट पड़े।
श्लोक 17 (3.290.17)
अकृताह्निकमेवैनं जिघांसुर्जितकाशिनम् । शरैर्जघान संक्रुद्धः कृतसंज्ञोऽथ लक्ष्मणः ॥
akṛtāhnikamevainaṃ jighāṃsurjitakāśinam | śarairjaghāna saṃkruddhaḥ kṛtasaṃjño'tha lakṣmaṇaḥ
विभीषण का संकेत पाकर क्रुद्ध लक्ष्मण ने विजय के दर्प में भरे उस राक्षस को उसके दैनिक अनुष्ठान पूरा करने से पहले ही मार डालने की इच्छा से उस पर बाणों से प्रहार किया।
श्लोक 18 (3.290.18)
तयोः समभवद्युद्धं तदाऽन्योन्यं जिगीषतोः । अतीव चित्रमाश्चर्यं शक्रप्रह्लादयोरिव ॥
tayoḥ samabhavadyuddhaṃ tadā'nyonyaṃ jigīṣatoḥ | atīva citramāścaryaṃ śakraprahlādayoriva
तब एक-दूसरे को जीतने की इच्छा रखने वाले उन दोनों में इन्द्र और प्रह्लाद के युद्ध की भाँति अत्यन्त विचित्र और आश्चर्यजनक युद्ध हुआ।
श्लोक 19 (3.290.19)
अविध्यदिन्द्रजित्तीक्ष्णैः सौमित्रिं मर्मभेदिभिः । सौमित्रिश्चानलस्पर्शैरविध्यद्रावणिं शरैः ॥
avidhyadindrajittīkṣṇaiḥ saumitriṃ marmabhedibhiḥ | saumitriścānalasparśairavidhyadrāvaṇiṃ śaraiḥ
इन्द्रजित् ने मर्मस्थलों को भेदने वाले तीखे बाणों से लक्ष्मण को बेधा, और लक्ष्मण ने अग्नि के समान दाहक बाणों से रावणपुत्र को बेधा।
श्लोक 20 (3.290.20)
सौमित्रिशरसंस्पर्शाद्रावणिः क्रोधमूर्च्छितः । असृजल्लक्ष्मणायाष्टौ शरानाशीविषोपमान् ॥
saumitriśarasaṃsparśādrāvaṇiḥ krodhamūrcchitaḥ | asṛjallakṣmaṇāyāṣṭau śarānāśīviṣopamān
लक्ष्मण के बाणों के स्पर्श से क्रोध में अचेत-से हुए रावणपुत्र ने लक्ष्मण पर विषधर सर्पों के समान आठ बाण छोड़े।
श्लोक 21 (3.290.21)
तस्येषून्पावकस्पर्शैः सौमित्रिः पत्रिभिस्त्रिभिः । वारयामास नाराचैः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः ॥
tasyeṣūnpāvakasparśaiḥ saumitriḥ patribhistribhiḥ | vārayāmāsa nārācaiḥ saumitrirmitranandanaḥ
मित्रों को आनन्द देने वाले सुमित्रानन्दन ने अग्नि के समान दाहक तीन पंखदार नाराचों से उसके बाणों को रोक दिया,
श्लोक 22 (3.290.22)
असृजल्लक्ष्मणश्चाष्टौ राक्षसाय शरान्पुनः । तथा तं न्यहनद्वीरस्तन्मे निगदतः शृणु ॥
asṛjallakṣmaṇaścāṣṭau rākṣasāya śarānpunaḥ | tathā taṃ nyahanadvīrastanme nigadataḥ śṛṇu
फिर लक्ष्मण ने भी उस राक्षस पर आठ बाण छोड़े। उस वीर ने उसे किस प्रकार मार गिराया, वह मुझसे सुनो।
श्लोक 23 (3.290.23)
एकेनास्य धनुष्मन्तं बाहुं देहादपातयत् । द्वितीयेन तु बाणेन भुजमन्यमपातयत् ॥
ekenāsya dhanuṣmantaṃ bāhuṃ dehādapātayat | dvitīyena tu bāṇena bhujamanyamapātayat
एक बाण से उन्होंने उसकी धनुष वाली भुजा को शरीर से काट गिराया; दूसरे बाण से दूसरी भुजा भी गिरा दी।
श्लोक 24 (3.290.24)
तृतीयेन तु बाणेन शितधारेण भास्वता । जहार सुनसं चापि शिरो ज्वलितकुण्डलम् ॥
tṛtīyena tu bāṇena śitadhāreṇa bhāsvatā | jahāra sunasaṃ cāpi śiro jvalitakuṇḍalam
तीसरे, तीखी धार वाले चमकते बाण से उन्होंने सुन्दर नासिका और दमकते कुण्डलों वाला उसका सिर काट लिया।
श्लोक 25 (3.290.25)
विनिकृत्तभुजस्कन्धः कबन्धाकृतिदर्शनः । पपात वसुधायां तु छिन्नमूल इव द्रुमः ॥
vinikṛttabhujaskandhaḥ kabandhākṛtidarśanaḥ | papāta vasudhāyāṃ tu chinnamūla iva drumaḥ
भुजाओं और कंधों के कट जाने से कबन्ध-सा दिखने वाला वह राक्षस जड़ से कटे वृक्ष की भाँति धरती पर गिर पड़ा।
श्लोक 26 (3.290.26)
तं हत्वा सूतमप्यस्त्रैर्जघान बलिनां वरः । लङ्कां प्रवेशयामासुस्तं रथं वाजिनस्तदा ॥
taṃ hatvā sūtamapyastrairjaghāna balināṃ varaḥ | laṅkāṃ praveśayāmāsustaṃ rathaṃ vājinastadā
उसे मारकर बलवानों में श्रेष्ठ लक्ष्मण ने अपने अस्त्रों से उसके सारथि को भी मार डाला; तब घोड़े उस रथ को लङ्का में ले गए।
श्लोक 27 (3.290.27)
ददर्श रावणस्तं च रथं पुत्रविनाकृतम् । स पुत्रं निहतं श्रुत्वा त्रासात्संभ्रान्तमानसः ॥
dadarśa rāvaṇastaṃ ca rathaṃ putravinākṛtam | sa putraṃ nihataṃ śrutvā trāsātsaṃbhrāntamānasaḥ
रावण ने वह रथ अपने पुत्र के बिना देखा; और पुत्र के मारे जाने का समाचार सुनकर भय से व्याकुल-चित्त
श्लोक 28 (3.290.28)
रावणः शोकमोहार्तो वैदेहीं हन्तुमुद्यतः । अशोकवनिकास्थां तां रामदर्शनलालसाम् । खड्गमादाय दुष्टात्मा जवेनाभिपपात ह ॥
rāvaṇaḥ śokamohārto vaidehīṃ hantumudyataḥ | aśokavanikāsthāṃ tāṃ rāmadarśanalālasām | khaḍgamādāya duṣṭātmā javenābhipapāta ha
शोक और मोह से पीड़ित रावण वैदेही को मारने को उद्यत हो गया; राम के दर्शन के लिए लालायित, अशोकवाटिका में बैठी सीता की ओर वह दुष्टात्मा तलवार लेकर वेग से झपटा।
श्लोक 29 (3.290.29)
तं दृष्ट्वा तस्य दुर्बुद्धेरविन्ध्यः पापनिश्चयम् । शमयामास संक्रुद्धं श्रूयतां येन हेतुना ॥
taṃ dṛṣṭvā tasya durbuddheravindhyaḥ pāpaniścayam | śamayāmāsa saṃkruddhaṃ śrūyatāṃ yena hetunā
उस दुर्बुद्धि का पापपूर्ण निश्चय देखकर अविन्ध्य ने उस क्रुद्ध राक्षस को शान्त किया; किस युक्ति से, वह सुनो।
अविन्ध्य उवाच
श्लोक 30 (3.290.30)
महाराज्ये स्थितो दीप्ते न स्त्रियं हन्तुमर्हसि । हतैवैषा यदा स्त्री च बन्धनस्था च ते वशे ॥
mahārājye sthito dīpte na striyaṃ hantumarhasi | hataivaiṣā yadā strī ca bandhanasthā ca te vaśe
"आप एक दीप्तिमान महान राज्य पर प्रतिष्ठित हैं; आपको स्त्री का वध नहीं करना चाहिए। यह स्त्री तो वैसे ही मरी हुई है, क्योंकि यह बंदिनी होकर आपके वश में है।
श्लोक 31 (3.290.31)
न चैषा देहभेदेन हता स्यादिति मे मतिः । जहि भर्तारमेवास्या हते तस्मिन्हता भवेत् ॥
na caiṣā dehabhedena hatā syāditi me matiḥ | jahi bhartāramevāsyā hate tasminhatā bhavet
मेरा मत है कि केवल शरीर नष्ट कर देने से यह वास्तव में नहीं मरेगी। इसके पति को ही मारिए; उसके मरते ही यह भी मर जाएगी।
श्लोक 32 (3.290.32)
न हि ते विक्रमे तुल्यः साक्षादपि शतक्रतुः । असकृद्धि त्वया सेन्द्रास्त्रासितास्त्रिदशा युधि ॥
na hi te vikrame tulyaḥ sākṣādapi śatakratuḥ | asakṛddhi tvayā sendrāstrāsitāstridaśā yudhi
पराक्रम में साक्षात् इन्द्र भी आपके समान नहीं हैं; आपने युद्ध में इन्द्र सहित देवताओं को बार-बार भयभीत किया है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 33 (3.290.33)
एवं बहुविधैर्वाक्यैरविन्ध्यो रावणं तदा । क्रुद्धं संशमयामास जगृहे च स तद्वचः ॥
evaṃ bahuvidhairvākyairavindhyo rāvaṇaṃ tadā | kruddhaṃ saṃśamayāmāsa jagṛhe ca sa tadvacaḥ
इस प्रकार अनेक तरह के वचनों से अविन्ध्य ने तब क्रुद्ध रावण को शान्त किया, और रावण ने उसकी बात मान ली।
श्लोक 34 (3.290.34)
निर्याणे स मतिं कृत्वा नियन्तारं क्षपाचरः । आज्ञापयामास तदा रथो मे कल्प्यतामिति ॥
niryāṇe sa matiṃ kṛtvā niyantāraṃ kṣapācaraḥ | ājñāpayāmāsa tadā ratho me kalpyatāmiti
युद्ध के लिए निकलने का निश्चय करके उस निशाचर ने तब अपने सारथि को आज्ञा दी — "मेरा रथ तैयार किया जाए।"