आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 291
राम द्वारा ब्रह्मास्त्र से रावण का वध
इन्द्रजित् की मृत्यु से क्रुद्ध रावण राम से लड़ने निकलता है। जब वानर उसकी सेना नष्ट कर देते हैं, तो वह माया फैलाता है — पहले उसके शरीर से निकलते राक्षस, फिर राम और लक्ष्मण के प्रतिरूप, जिन्हें दोनों भाई मार डालते हैं। इन्द्र का सारथि मातलि इन्द्र का रथ राम के पास लाता है, और विभीषण के यह विश्वास दिलाने पर कि यह माया नहीं है, राम उस पर आरूढ़ होते हैं। अनुपम द्वन्द्व के बाद राम एक बाण को ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित कर छोड़ते हैं; रावण अपने रथ, घोड़ों और सारथि सहित जलकर ऐसा नष्ट होता है कि उसकी राख तक नहीं बचती, और देवता हर्षित होते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.291.1)
ततः क्रुद्धो दशग्रीवः प्रिये पुत्रे निपातिते । निर्ययौ रथमास्थाय हेमरत्नविभूषितम् ॥
tataḥ kruddho daśagrīvaḥ priye putre nipātite | niryayau rathamāsthāya hemaratnavibhūṣitam
तब अपने प्रिय पुत्र के मारे जाने पर क्रोध से भरा दशग्रीव सोने और रत्नों से सजे रथ पर सवार होकर निकला,
श्लोक 2 (3.291.2)
संवृतो राक्षसैर्घोरैर्विविधायुधपाणिभिः । अभिदुद्राव रामं स पोथयन्हरियूथपान् ॥
saṃvṛto rākṣasairghorairvividhāyudhapāṇibhiḥ | abhidudrāva rāmaṃ sa pothayanhariyūthapān
और भाँति-भाँति के अस्त्र-शस्त्र हाथों में लिए भयंकर राक्षसों से घिरा वह वानर-यूथपतियों को कुचलता हुआ राम की ओर दौड़ा।
श्लोक 3 (3.291.3)
तमाद्रवन्तं संक्रुद्धं मैन्दनीलनलाङ्गदाः । हनुमाञ्जाम्बवांश्चैव ससैन्याः पर्यवारयन् ॥
tamādravantaṃ saṃkruddhaṃ maindanīlanalāṅgadāḥ | hanumāñjāmbavāṃścaiva sasainyāḥ paryavārayan
क्रोध में भरकर दौड़ते हुए उस रावण को मैन्द, नील, नल और अंगद, हनुमान और जाम्बवान् ने अपनी सेनाओं सहित घेर लिया।
श्लोक 4 (3.291.4)
ते दशग्रीवसैन्यं तदृक्षवानरपुङ्गवाः । द्रुमैर्विध्वंसयांचक्रुर्दशग्रीवस्य पश्यतः ॥
te daśagrīvasainyaṃ tadṛkṣavānarapuṅgavāḥ | drumairvidhvaṃsayāṃcakrurdaśagrīvasya paśyataḥ
उन श्रेष्ठ रीछों और वानरों ने दशग्रीव के देखते-देखते वृक्षों से उसकी उस सेना को नष्ट कर दिया।
श्लोक 5 (3.291.5)
ततः स्वसैन्यमालोक्य वध्यमानमरातिभिः । मायावी चासृजन्मायां रावणो राक्षसाधिपः ॥
tataḥ svasainyamālokya vadhyamānamarātibhiḥ | māyāvī cāsṛjanmāyāṃ rāvaṇo rākṣasādhipaḥ
तब अपनी सेना को शत्रुओं द्वारा मारी जाती देखकर मायावी राक्षसराज रावण ने माया रची।
श्लोक 6 (3.291.6)
तस्य देहविनिष्क्रान्ताः शतशोऽथ सहस्रशः । राक्षसाः प्रत्यदृश्यन्त शरशक्त्यृष्टिपाणयः ॥
tasya dehaviniṣkrāntāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ | rākṣasāḥ pratyadṛśyanta śaraśaktyṛṣṭipāṇayaḥ
उसके शरीर से निकलकर सैकड़ों और हजारों राक्षस हाथों में बाण, शक्ति और ऋष्टि लिए दिखाई देने लगे।
श्लोक 7 (3.291.7)
तान्रामो जघ्निवान्सर्वान्दिव्येनास्त्रेण राक्षसान् । अथ भूयोऽपि मायां स व्यदधाद्राक्षसाधिपः ॥
tānrāmo jaghnivānsarvāndivyenāstreṇa rākṣasān | atha bhūyo'pi māyāṃ sa vyadadhādrākṣasādhipaḥ
राम ने दिव्य अस्त्र से उन सब राक्षसों को मार डाला। तब राक्षसराज ने फिर से माया रची।
श्लोक 8 (3.291.8)
कृत्वा रामस्य रूपाणि लक्ष्मणस्य च भारत । अभिदुद्राव रामं च लक्ष्मणं च दशाननः ॥
kṛtvā rāmasya rūpāṇi lakṣmaṇasya ca bhārata | abhidudrāva rāmaṃ ca lakṣmaṇaṃ ca daśānanaḥ
हे भारत, दशानन ने राम और लक्ष्मण के अनेक रूप बनाकर राम और लक्ष्मण पर धावा बोल दिया।
श्लोक 9 (3.291.9)
ततस्ते राममर्च्छन्तो लक्ष्मणं च क्षपाचराः । अभिपेतुस्तदा रामं प्रगृहीतशरासनाः ॥
tataste rāmamarcchanto lakṣmaṇaṃ ca kṣapācarāḥ | abhipetustadā rāmaṃ pragṛhītaśarāsanāḥ
तब वे निशाचर राम और लक्ष्मण पर आक्रमण करते हुए धनुष उठाए राम पर टूट पड़े।
श्लोक 10 (3.291.10)
तां दृष्ट्वा राक्षसेन्द्रस्य मायामिक्ष्वाकुनन्दनः । उवाच रामः सौमित्रिमसंभ्रान्तो बृहद्वचः ॥
tāṃ dṛṣṭvā rākṣasendrasya māyāmikṣvākunandanaḥ | uvāca rāmaḥ saumitrimasaṃbhrānto bṛhadvacaḥ
राक्षसराज की उस माया को देखकर इक्ष्वाकुनन्दन राम ने बिना घबराए सुमित्रानन्दन से यह गम्भीर वचन कहा —
श्लोक 11 (3.291.11)
जहीमान्राक्षसान्पापानात्मनः प्रतिरूपकान् । इत्युक्त्वाऽभ्यहनद्रामो लक्ष्मणश्चात्मरूपकान् ॥
jahīmānrākṣasānpāpānātmanaḥ pratirūpakān | ityuktvā'bhyahanadrāmo lakṣmaṇaścātmarūpakān
"हमारे ही समान रूप वाले इन पापी राक्षसों को मार डालो।" ऐसा कहकर राम ने उन्हें मार गिराया, और लक्ष्मण ने भी अपने जैसे रूप वाले राक्षसों को मार डाला।
श्लोक 12 (3.291.12)
ततो हर्यश्वयुक्तेन रथेनादित्यवर्चसा । उपतस्थे रणे रामं मातलिः शक्रसारथिः ॥
tato haryaśvayuktena rathenādityavarcasā | upatasthe raṇe rāmaṃ mātaliḥ śakrasārathiḥ
तब इन्द्र के सारथि मातलि पिङ्गल वर्ण के घोड़ों से जुते, सूर्य के समान तेजस्वी रथ के साथ रणभूमि में राम के पास उपस्थित हुए।
मातलिरुवाच
श्लोक 13 (3.291.13)
अयं हर्यश्वयुग्जैत्रो मघोनः स्यन्दनोत्तमः । त्वदर्थमिह संप्राप्तः संदेशाद्वै शतक्रतोः ॥
ayaṃ haryaśvayugjaitro maghonaḥ syandanottamaḥ | tvadarthamiha saṃprāptaḥ saṃdeśādvai śatakratoḥ
"यह इन्द्र का विजयी उत्तम रथ है, जिसमें पिङ्गल वर्ण के घोड़े जुते हैं; यह शतक्रतु के आदेश से आपके लिए यहाँ आया है।
श्लोक 14 (3.291.14)
अनेन शक्रः काकुत्स्थ समरे दैत्यदानवान् । शतशः पुरुषव्याघ्र रथोदारेण जघ्निवान् ॥
anena śakraḥ kākutstha samare daityadānavān | śataśaḥ puruṣavyāghra rathodāreṇa jaghnivān
हे काकुत्स्थ, हे पुरुषसिंह, इसी श्रेष्ठ रथ से इन्द्र ने युद्ध में सैकड़ों दैत्यों और दानवों का वध किया है।
श्लोक 15 (3.291.15)
तदनेन नरव्याघ्र मया यत्तेन संयुगे । स्यन्दनेन जहि क्षिप्रं रावणं मा चिरं कृथाः ॥
tadanena naravyāghra mayā yattena saṃyuge | syandanena jahi kṣipraṃ rāvaṇaṃ mā ciraṃ kṛthāḥ
इसलिए हे नरव्याघ्र, युद्ध में मेरे द्वारा सावधानी से चलाए जाने वाले इस रथ से शीघ्र ही रावण का वध कीजिए; विलम्ब न कीजिए।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 16 (3.291.16)
इत्युक्तो राघवस्तथ्यं वचोऽशङ्कत मातलेः । मायैषा राक्षसस्येति तमुवाच विभीषणः ॥
ityukto rāghavastathyaṃ vaco'śaṅkata mātaleḥ | māyaiṣā rākṣasasyeti tamuvāca vibhīṣaṇaḥ
ऐसा कहे जाने पर राघव ने मातलि के सत्य वचनों पर भी यह सोचकर सन्देह किया कि "यह राक्षस की माया है"। तब विभीषण ने उनसे कहा —
विभीषण उवाच
श्लोक 17 (3.291.17)
नेयं माया नरव्याघ्र रावणस्य दुरात्मनः । तदातिष्ठ रथं शीघ्रमिममैन्द्रं महाद्युते ॥
neyaṃ māyā naravyāghra rāvaṇasya durātmanaḥ | tadātiṣṭha rathaṃ śīghramimamaindraṃ mahādyute
"हे नरश्रेष्ठ, यह दुरात्मा रावण की माया नहीं है। हे महातेजस्वी, आप शीघ्र ही इन्द्र के इस रथ पर आरूढ़ हो जाइए।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 18 (3.291.18)
ततः प्रहृष्टः काकुत्स्थस्तथेत्युक्त्वा विभीषणम् । रथेनाभिपपाताथ दशग्रीवं रुषाऽन्वितः ॥
tataḥ prahṛṣṭaḥ kākutsthastathetyuktvā vibhīṣaṇam | rathenābhipapātātha daśagrīvaṃ ruṣā'nvitaḥ
तब प्रसन्न होकर काकुत्स्थ राम ने विभीषण से "ठीक है" कहा और क्रोध से भरकर उस रथ से दशग्रीव पर धावा बोल दिया।
श्लोक 19 (3.291.19)
हाहाकृतानि भूतानि रावणे समभिद्रुते । सिंहनादाः सपटहा दिवि दिव्यास्तथाऽनदन् ॥
hāhākṛtāni bhūtāni rāvaṇe samabhidrute | siṃhanādāḥ sapaṭahā divi divyāstathā'nadan
रावण पर आक्रमण होते ही सब प्राणी हाहाकार करने लगे, और आकाश में नगाड़ों के साथ दिव्य सिंहनाद गूँज उठे।
श्लोक 20 (3.291.20)
दशकन्धरराजसून्वोस्तथा युद्धमभून्महत् । अलब्धोपममन्यत्र तयोरेव तथाऽभवत् ॥
daśakandhararājasūnvostathā yuddhamabhūnmahat | alabdhopamamanyatra tayoreva tathā'bhavat
तब दशकन्धर और राजकुमार राम के बीच ऐसा महान युद्ध हुआ, जिसकी उपमा कहीं और नहीं मिलती; वह युद्ध केवल अपने ही समान था।
श्लोक 21 (3.291.21)
स रामाय महाघोरं विससर्ज निशाचरः । शूलमिन्द्राशनिप्रख्यं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ॥
sa rāmāya mahāghoraṃ visasarja niśācaraḥ | śūlamindrāśaniprakhyaṃ brahmadaṇḍamivodyatam
उस निशाचर ने राम पर इन्द्र के वज्र के समान और उठे हुए ब्रह्मदण्ड जैसा अत्यन्त भयंकर शूल फेंका।
श्लोक 22 (3.291.22)
तच्छूलं सत्वरं रामश्चिच्छेद निशितैः शरैः । तद्दृष्ट्वा दुष्करं कर्म रावणं भयमाविशत् ॥
tacchūlaṃ satvaraṃ rāmaściccheda niśitaiḥ śaraiḥ | taddṛṣṭvā duṣkaraṃ karma rāvaṇaṃ bhayamāviśat
राम ने अपने तीखे बाणों से उस शूल को तुरन्त काट डाला; यह दुष्कर कर्म देखकर रावण भयभीत हो गया।
श्लोक 23 (3.291.23)
ततः क्रुद्धः ससर्जाशु दशग्रीवः शिताञ्छरान् । सहस्रायुतशो रामे शस्त्राणि विविधानि च ॥
tataḥ kruddhaḥ sasarjāśu daśagrīvaḥ śitāñcharān | sahasrāyutaśo rāme śastrāṇi vividhāni ca
तब क्रुद्ध होकर दशग्रीव ने राम पर तुरन्त हजारों और दसियों हजार तीखे बाण तथा भाँति-भाँति के शस्त्र छोड़े —
श्लोक 24 (3.291.24)
ततो भुशुण्डीः शूलानि मुसलानि परश्वथान् । शक्तीश्च विविधाकाराः शतघ्नीश्च शितान्क्षुरान् ॥
tato bhuśuṇḍīḥ śūlāni musalāni paraśvathān | śaktīśca vividhākārāḥ śataghnīśca śitānkṣurān
भुशुण्डियाँ, शूल, मूसल और फरसे, अनेक आकारों की शक्तियाँ, शतघ्नियाँ और तीखे क्षुर।
श्लोक 25 (3.291.25)
तां मायां विविधां दृष्ट्वा दशग्रीवस्य रक्षसः । भयात्प्रदुद्रुवुः सर्वे वानराः सर्वतोदिशम् ॥
tāṃ māyāṃ vividhāṃ dṛṣṭvā daśagrīvasya rakṣasaḥ | bhayātpradudruvuḥ sarve vānarāḥ sarvatodiśam
राक्षस दशग्रीव की वह नाना प्रकार की माया देखकर सारे वानर भय से सब दिशाओं में भाग खड़े हुए।
श्लोक 26 (3.291.26)
ततः सुपत्रं सुमुखं हेमपुङ्खं शरोत्तमम् । तूणादादाय काकुत्स्थो ब्रह्मास्त्रेण युयोज ह ॥
tataḥ supatraṃ sumukhaṃ hemapuṅkhaṃ śarottamam | tūṇādādāya kākutstho brahmāstreṇa yuyoja ha
तब काकुत्स्थ राम ने तरकश से सुन्दर पंखों, सुन्दर नोक और सुनहरे पुंख वाला एक श्रेष्ठ बाण निकाला और उसे ब्रह्मास्त्र से युक्त किया।
श्लोक 27 (3.291.27)
तं प्रेक्ष्य बाणं रामेण ब्रह्मास्त्रेणानुमन्त्रितम् । जहृषुर्देवगन्धर्वा दृष्ट्वा शक्रपुरोगमाः ॥
taṃ prekṣya bāṇaṃ rāmeṇa brahmāstreṇānumantritam | jahṛṣurdevagandharvā dṛṣṭvā śakrapurogamāḥ
राम द्वारा ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित उस बाण को देखकर इन्द्र आदि देवता और गन्धर्व हर्षित हो उठे।
श्लोक 28 (3.291.28)
अल्पावशेषमायुश्च ततोऽमन्यन्त रक्षसः । ब्रह्मास्त्रोदीरणाच्छत्रोर्देवदानवकिंनराः ॥
alpāvaśeṣamāyuśca tato'manyanta rakṣasaḥ | brahmāstrodīraṇācchatrordevadānavakiṃnarāḥ
शत्रु द्वारा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग होते देखकर देवता, दानव और किन्नर समझ गए कि अब उस राक्षस की आयु थोड़ी ही शेष है।
श्लोक 29 (3.291.29)
ततः ससर्ज तं रामः शरमप्रतिमौजसम् । रावणान्तकरं घोरं ब्रह्मदण्डमिवोद्यतम् ॥
tataḥ sasarja taṃ rāmaḥ śaramapratimaujasam | rāvaṇāntakaraṃ ghoraṃ brahmadaṇḍamivodyatam
तब राम ने वह अतुलित ओजवाला, भयंकर, रावण का अन्त करने वाला बाण छोड़ा, जो उठे हुए ब्रह्मदण्ड के समान था।
श्लोक 30 (3.291.30)
मुक्तमात्रेण रामेण दूराकृष्टेन भारत । स तेन राक्षसश्रेष्ठः सरथः साश्वसारथिः । प्रजज्वाल महाज्वालेनाग्निनाभिपरिप्लुतः ॥
muktamātreṇa rāmeṇa dūrākṛṣṭena bhārata | sa tena rākṣasaśreṣṭhaḥ sarathaḥ sāśvasārathiḥ | prajajvāla mahājvālenāgninābhipariplutaḥ
हे भारत, राम द्वारा दूर तक खींचकर छोड़े जाते ही उस बाण से वह राक्षसश्रेष्ठ अपने रथ, घोड़ों और सारथि सहित बड़ी-बड़ी लपटों वाली अग्नि से घिरकर जल उठा।
श्लोक 31 (3.291.31)
ततः प्रहृष्टास्त्रिदशाः सहगन्धर्वचारणाः । निहतं रावणं दृष्ट्वा रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥
tataḥ prahṛṣṭāstridaśāḥ sahagandharvacāraṇāḥ | nihataṃ rāvaṇaṃ dṛṣṭvā rāmeṇākliṣṭakarmaṇā
तब अनायास महान कर्म करने वाले राम द्वारा रावण को मारा गया देखकर गन्धर्वों और चारणों सहित देवता हर्षित हुए।
श्लोक 32 (3.291.32)
तत्यजुस्तं महाभागं पञ्चभूतानि रावणम् । भ्रंशितः सर्वलोकेषु स हि ब्रह्मास्त्रतेजसा ॥
tatyajustaṃ mahābhāgaṃ pañcabhūtāni rāvaṇam | bhraṃśitaḥ sarvalokeṣu sa hi brahmāstratejasā
पाँचों महाभूतों ने उस महाबली रावण को त्याग दिया; ब्रह्मास्त्र के तेज से वह सब लोकों से च्युत हो गया।
श्लोक 33 (3.291.33)
शरीरधातवो ह्यस्य मांसं रुधिरमेव च । नेशुर्ब्रह्मास्त्रनिर्दग्धा न च भस्माप्यदृश्यत ॥
śarīradhātavo hyasya māṃsaṃ rudhirameva ca | neśurbrahmāstranirdagdhā na ca bhasmāpyadṛśyata
ब्रह्मास्त्र से जलकर उसके शरीर की धातुएँ, मांस और रक्त भी नष्ट हो गए; उसकी राख तक दिखाई न दी।