आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 292
सीता की शुद्धि और राम का अयोध्या-आगमन
मार्कण्डेय राम की कथा आगे सुनाते हैं। रावण के वध के बाद वृद्ध मंत्री अविन्ध्य सीता को राम के पास लाता है; राम उन्हें पराए घर में रही होने के कारण अस्वीकार कर देते हैं। सीता पंचतत्त्वों को साक्षी बनाकर कहती हैं कि यदि उन्होंने पाप किया हो तो वे उनके प्राण हर लें; तब वायु, अग्नि, वरुण, यम और ब्रह्मा उन्हें निष्पाप घोषित करते हैं और दशरथ पुत्र को लौटकर राज्य करने को कहते हैं। राम सीता को स्वीकार करते हैं, ब्रह्मा के वर से मरे हुए वानर जी उठते हैं, और सब पुष्पक विमान से किष्किन्धा होते हुए नन्दिग्राम पहुँचते हैं, जहाँ भरत राज्य लौटा देते हैं। राज्याभिषेक के बाद राम सुग्रीव और विभीषण को विदा करते हैं, पुष्पक कुबेर को लौटाते हैं और गोमती के तट पर सौ अश्वमेध यज्ञ करते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.292.1)
स हत्वा रावणं क्षुद्रं राक्षसेन्द्रं सुरद्विषम् । बभूव हृष्टः ससुहृद्रामः सौमित्रिणा सह ॥
sa hatvā rāvaṇaṃ kṣudraṃ rākṣasendraṃ suradviṣam | babhūva hṛṣṭaḥ sasuhṛdrāmaḥ saumitriṇā saha
देवताओं के शत्रु, राक्षसों के स्वामी नीच रावण का वध करके राम अपने मित्रों और सुमित्रानन्दन लक्ष्मण के साथ हर्षित हुए।
श्लोक 2 (3.292.2)
ततो हते दशग्रीवे देवाः सर्षिपुरोगमाः । आशीर्भिर्जययुक्ताभिरानर्चुस्तं महाभुजम् ॥
tato hate daśagrīve devāḥ sarṣipurogamāḥ | āśīrbhirjayayuktābhirānarcustaṃ mahābhujam
दशग्रीव के मारे जाने पर ऋषियों को आगे करके देवताओं ने विजय-कामना से भरे आशीर्वादों द्वारा उस महाबाहु का सम्मान किया।
श्लोक 3 (3.292.3)
रामं कमलपत्राक्षं तुष्टुवुः सर्वदेवताः । गन्धर्वाः पुष्पवर्षैश्च वाग्भिश्च त्रिदशालयाः ॥
rāmaṃ kamalapatrākṣaṃ tuṣṭuvuḥ sarvadevatāḥ | gandharvāḥ puṣpavarṣaiśca vāgbhiśca tridaśālayāḥ
सभी देवताओं ने कमलनयन राम की स्तुति की; गन्धर्वों और स्वर्गवासियों ने पुष्पवर्षा और स्तुति-वचनों से उनका सम्मान किया।
श्लोक 4 (3.292.4)
पूजयित्वा रणे रामं प्रतिजग्मुर्यथागतम् । तन्महोत्सवसंकाशमासीदाकाशमच्युत ॥
pūjayitvā raṇe rāmaṃ pratijagmuryathāgatam | tanmahotsavasaṃkāśamāsīdākāśamacyuta
रणभूमि में राम का पूजन करके वे जैसे आए थे वैसे ही लौट गए। हे अच्युत, उस समय आकाश किसी महान उत्सव के समान दिखाई देता था।
श्लोक 5 (3.292.5)
ततो हत्वा दशग्रीवं लङ्कां रामो महायशाः । विभीषणाय प्रददौ प्रभुः परपुरंजयः ॥
tato hatvā daśagrīvaṃ laṅkāṃ rāmo mahāyaśāḥ | vibhīṣaṇāya pradadau prabhuḥ parapuraṃjayaḥ
तब दशग्रीव का वध करके शत्रुओं के नगर जीतने वाले महायशस्वी प्रभु राम ने लंका विभीषण को दे दी।
श्लोक 6 (3.292.6)
ततः सीतां पुरस्कृत्य विभीषणपुरस्कृताम् । अविन्ध्यो नाम सुप्रज्ञो वृद्धामात्यो विनिर्ययौ ॥
tataḥ sītāṃ puraskṛtya vibhīṣaṇapuraskṛtām | avindhyo nāma suprajño vṛddhāmātyo viniryayau
तब अविन्ध्य नाम का एक बुद्धिमान वृद्ध मंत्री, विभीषण के संरक्षण में चल रही सीता को आगे करके, बाहर निकला।
श्लोक 7 (3.292.7)
उवाच च महात्मानं काकुत्स्थं दैन्यमास्थितम् । प्रतीच्छ देवीं सद्वृत्तां महात्मञ्जानकीमिति ॥
uvāca ca mahātmānaṃ kākutsthaṃ dainyamāsthitam | pratīccha devīṃ sadvṛttāṃ mahātmañjānakīmiti
उसने उदास बैठे महात्मा काकुत्स्थ से कहा — "हे महात्मन्, सदाचारिणी देवी जानकी को स्वीकार कीजिए।"
श्लोक 8 (3.292.8)
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्मादवतीर्य रथोत्तमात् । बाष्पेणापिहितां सीतां ददर्शेक्ष्वाकुनन्दनः ॥
etacchrutvā vacastasmādavatīrya rathottamāt | bāṣpeṇāpihitāṃ sītāṃ dadarśekṣvākunandanaḥ
उसकी यह बात सुनकर इक्ष्वाकुनन्दन राम अपने उत्तम रथ से उतरे और आँसुओं से ढकी हुई सीता को देखा।
श्लोक 9 (3.292.9)
तां दृष्ट्वा चारुसर्वाङ्गीं यानस्थां शोककर्शिताम् । मलोपचितसर्वाङ्गीं जटिलां कृष्णवाससम् ॥
tāṃ dṛṣṭvā cārusarvāṅgīṃ yānasthāṃ śokakarśitām | malopacitasarvāṅgīṃ jaṭilāṃ kṛṣṇavāsasam
उन्होंने देखा कि सर्वांगसुन्दरी सीता वाहन में बैठी हैं, शोक से दुर्बल हो गई हैं, उनका सारा शरीर मैल से भरा है, बाल जटा बन गए हैं और वे काला वस्त्र पहने हैं।
श्लोक 10 (3.292.10)
उवाच रामो वैदेहीं परामर्शविशङ्कितः । लक्षयित्वेङ्गितं सर्वं प्रियं तस्यै निवेद्य सः ॥
uvāca rāmo vaidehīṃ parāmarśaviśaṅkitaḥ | lakṣayitveṅgitaṃ sarvaṃ priyaṃ tasyai nivedya saḥ
पराए स्पर्श की आशंका से व्याकुल राम ने, उसकी सारी चेष्टाएँ देखकर और पहले उसे प्रिय समाचार सुनाकर, वैदेही से कहा —
राम उवाच
श्लोक 11 (3.292.11)
गच्छ वैदेहि मुक्ता त्वं यत्कार्यं तन्मया कृतम् । मामासाद्यपतिं भद्रे न त्वं राक्षसवेश्मनि । जरां व्रजेथा इतिमे निहतोसौ निशाचरः ॥
gaccha vaidehi muktā tvaṃ yatkāryaṃ tanmayā kṛtam | māmāsādyapatiṃ bhadre na tvaṃ rākṣasaveśmani | jarāṃ vrajethā itime nihatosau niśācaraḥ
"वैदेही, जाओ, तुम मुक्त हो। जो करना था वह मैंने कर दिया। हे भद्रे, मुझे पति के रूप में पाकर तुम राक्षस के घर में बूढ़ी न हो जाओ — इसी लिए इस निशाचर का वध हुआ है।"
श्लोक 12 (3.292.12)
कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन्धर्मविनिश्चयम् । परहस्तगतां नारीं मुहूर्तमपि धारयेत् ॥
kathaṃ hyasmadvidho jātu jānandharmaviniścayam | parahastagatāṃ nārīṃ muhūrtamapi dhārayet
"धर्म के निर्णय को जानने वाला मेरे जैसा पुरुष पराए हाथ में जा चुकी स्त्री को एक क्षण के लिए भी कैसे रख सकता है?"
श्लोक 13 (3.292.13)
सुवृत्तामसुवृत्तां वाऽप्यहं त्वामद्य मैथिलि । नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा ॥
suvṛttāmasuvṛttāṃ vā'pyahaṃ tvāmadya maithili | notsahe paribhogāya śvāvalīḍhaṃ haviryathā
"मैथिली, तुम्हारा आचरण अच्छा रहा हो या न रहा हो, मैं अब तुम्हें अपने उपभोग के लिए स्वीकार नहीं कर सकता — जैसे कुत्ते की चाटी हुई हवि स्वीकार नहीं की जाती।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 14 (3.292.14)
ततः सा सहसा बाला तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः । पपात देवी व्यथिता निकृत्ता कदली यथा ॥
tataḥ sā sahasā bālā tacchrutvā dāruṇaṃ vacaḥ | papāta devī vyathitā nikṛttā kadalī yathā
यह कठोर वचन सुनकर वह युवा देवी व्यथित होकर सहसा कटे हुए केले के पेड़ की भाँति गिर पड़ी।
श्लोक 15 (3.292.15)
योप्यस्या हर्षसंभूतो मुखरागः पुराऽभवत् । क्षणेन सपुनर्नष्टो निःश्वासादिव दर्पणे ॥
yopyasyā harṣasaṃbhūto mukharāgaḥ purā'bhavat | kṣaṇena sapunarnaṣṭo niḥśvāsādiva darpaṇe
उसके मुख पर पहले जो हर्ष की लाली आई थी, वह क्षण भर में फिर वैसे ही मिट गई जैसे साँस पड़ने से दर्पण की चमक मिट जाती है।
श्लोक 16 (3.292.16)
ततस्ते हरयः सर्वे तच्छ्रुत्वा रामभाषितम् । गतासुकल्पा निश्चेष्टा बभूवुः सहलक्ष्मणाः ॥
tataste harayaḥ sarve tacchrutvā rāmabhāṣitam | gatāsukalpā niśceṣṭā babhūvuḥ sahalakṣmaṇāḥ
तब राम की यह बात सुनकर लक्ष्मण सहित सभी वानर निश्चेष्ट हो गए, मानो उनके प्राण निकल गए हों।
श्लोक 17 (3.292.17)
ततो देवो विशुद्धात्मा विमानेन चतुर्मुखः । पद्मयोनिर्जगत्स्रष्टा दर्शयामास राघवम् ॥
tato devo viśuddhātmā vimānena caturmukhaḥ | padmayonirjagatsraṣṭā darśayāmāsa rāghavam
तब शुद्धात्मा, चतुर्मुख, कमलयोनि, जगत् के स्रष्टा देव (ब्रह्मा) ने विमान पर आकर राघव को दर्शन दिए।
श्लोक 18 (3.292.18)
शक्रश्चाग्निश्च वायुश्चयमो वरुण एव च । यक्षाधिपश्च भगवांस्तथा सप्तर्षयोऽमलाः ॥
śakraścāgniśca vāyuścayamo varuṇa eva ca | yakṣādhipaśca bhagavāṃstathā saptarṣayo'malāḥ
इसी प्रकार इन्द्र, अग्नि, वायु, यम और वरुण, यक्षों के स्वामी भगवान् कुबेर तथा निर्मल सप्तर्षि भी आए;
श्लोक 19 (3.292.19)
राजा दशरथश्चैव दिव्यभास्वरमूर्तिमान् । विमानेन महार्हेण हंसयुक्तेन भास्वता ॥
rājā daśarathaścaiva divyabhāsvaramūrtimān | vimānena mahārheṇa haṃsayuktena bhāsvatā
और दिव्य, तेजस्वी रूप धारण किए राजा दशरथ भी हंसों से जुते बहुमूल्य, चमकते विमान में आए।
श्लोक 20 (3.292.20)
ततोऽन्तरिक्षं तत्सर्वंदेवगन्धर्वसंकुलम् । शुशुभे तारकाचित्रं शरदीव नभस्तलम् ॥
tato'ntarikṣaṃ tatsarvaṃdevagandharvasaṃkulam | śuśubhe tārakācitraṃ śaradīva nabhastalam
तब देवताओं और गन्धर्वों से भरा हुआ सारा आकाश तारों से चित्रित शरद् ऋतु के आकाश की भाँति शोभित हुआ।
श्लोक 21 (3.292.21)
तत उत्थाय वैदेही तेषां मध्ये यशस्विनी । उवाच वाक्यं कल्याणी रामं पृथुलवक्षसम् ॥
tata utthāya vaidehī teṣāṃ madhye yaśasvinī | uvāca vākyaṃ kalyāṇī rāmaṃ pṛthulavakṣasam
तब उन सबके बीच यशस्विनी, कल्याणी वैदेही उठीं और चौड़ी छाती वाले राम से बोलीं —
सीतोवाच
श्लोक 22 (3.292.22)
राजपुत्र न ते कोपं करोमि विदिताहि मे । गतिः स्त्रीणां नराणां च शृणु चेदं वचो मम ॥
rājaputra na te kopaṃ karomi viditāhi me | gatiḥ strīṇāṃ narāṇāṃ ca śṛṇu cedaṃ vaco mama
"राजकुमार, मैं आप पर क्रोध नहीं करती, क्योंकि मैं स्त्रियों और पुरुषों की गति जानती हूँ। पर मेरी यह बात सुनिए।"
श्लोक 23 (3.292.23)
अन्तश्चरतिभूतानां मातरिश्वा सदागतिः । स मे विमुञ्चतु प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ॥
antaścaratibhūtānāṃ mātariśvā sadāgatiḥ | sa me vimuñcatu prāṇānyadi pāpaṃ carāmyaham
"सदा गतिशील वायु (मातरिश्वा) सभी प्राणियों के भीतर विचरता है। यदि मैंने पाप किया हो तो वह मेरे प्राण हर ले।"
श्लोक 24 (3.292.24)
अग्निरापस्तथाऽऽकाशं पृथिवी वायुरेव च । विमुञ्चन्तु मम प्राणान्यदि पापं चराम्यहम् ॥
agnirāpastathā''kāśaṃ pṛthivī vāyureva ca | vimuñcantu mama prāṇānyadi pāpaṃ carāmyaham
"अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी और वायु — यदि मैंने पाप किया हो तो ये मेरे प्राण हर लें।"
श्लोक 25 (3.292.25)
यथाऽहं त्वदृतेवीर नान्यंस्वप्नेऽप्यचिन्तयम् । तथा मे देव निर्दिष्टस्त्वमेव हि पतिर्भव ॥
yathā'haṃ tvadṛtevīra nānyaṃsvapne'pyacintayam | tathā me deva nirdiṣṭastvameva hi patirbhava
"हे वीर, जैसे मैंने स्वप्न में भी आपके सिवा किसी दूसरे का चिन्तन नहीं किया, वैसे ही देवताओं द्वारा मेरे लिए नियत आप ही मेरे पति बनें।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 26 (3.292.26)
ततोऽन्तरिक्षे वागासीत्सुभगा लोकसाक्षिणी । पुण्यासंहर्षणी तेषां वानराणां महात्मनाम् ॥
tato'ntarikṣe vāgāsītsubhagā lokasākṣiṇī | puṇyāsaṃharṣaṇī teṣāṃ vānarāṇāṃ mahātmanām
तब आकाश में एक मधुर, लोकों की साक्षी, पवित्र वाणी गूँजी, जिसने उन महात्मा वानरों को हर्षित कर दिया।
वायुरुवाच
श्लोक 27 (3.292.27)
भो भो राघव सत्यं वै वायुरस्मि सदागतिः । अपापा मैथिली राजन्संगच्छसहभार्यया ॥
bho bho rāghava satyaṃ vai vāyurasmi sadāgatiḥ | apāpā maithilī rājansaṃgacchasahabhāryayā
"हे राघव! सच ही मैं सदा गतिशील वायु हूँ। हे राजन्, मैथिली निष्पाप है। अपनी पत्नी से मिलिए।"
अग्निरुवाच
श्लोक 28 (3.292.28)
अहमन्तःशरीरस्थो भूतानां रघुनन्दन । सुसूक्ष्ममपि काकुत्स्थ मैथिलीनापराध्यति ॥
ahamantaḥśarīrastho bhūtānāṃ raghunandana | susūkṣmamapi kākutstha maithilīnāparādhyati
"हे रघुनन्दन, मैं सभी प्राणियों के शरीर के भीतर रहता हूँ। हे काकुत्स्थ, मैथिली ने सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अपराध भी नहीं किया है।"
वरुण उवाच
श्लोक 29 (3.292.29)
रसावै मत्प्रसूता हि भूतदेहेषु राघव । अहंवै त्वां प्रब्रवीमि मैथिली प्रतिगृह्यताम् ॥
rasāvai matprasūtā hi bhūtadeheṣu rāghava | ahaṃvai tvāṃ prabravīmi maithilī pratigṛhyatām
"हे राघव, प्राणियों के शरीरों में जो रस हैं वे मुझसे ही उत्पन्न हैं। मैं आपसे कहता हूँ — मैथिली को स्वीकार कीजिए।"
यम उवाच
श्लोक 30 (3.292.30)
धर्मोऽहमस्मि काकुत्स्थ साक्षी लोकस्य कर्मणाम् । शुभाशुभानां सीतेयमपापा प्रतिगृह्यताम् ॥
dharmo'hamasmi kākutstha sākṣī lokasya karmaṇām | śubhāśubhānāṃ sīteyamapāpā pratigṛhyatām
"हे काकुत्स्थ, मैं धर्म हूँ, संसार के शुभ और अशुभ कर्मों का साक्षी। यह सीता निष्पाप है; इसे स्वीकार कीजिए।"
ब्रह्मोवाच
श्लोक 31 (3.292.31)
पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मणि । साधो सद्वृत्त काकुत्स्थ शृणु चेदं वचो मम ॥
putra naitadihāścaryaṃ tvayi rājarṣidharmaṇi | sādho sadvṛtta kākutstha śṛṇu cedaṃ vaco mama
"पुत्र, राजर्षियों के धर्म का पालन करने वाले तुममें यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हे साधु, सदाचारी काकुत्स्थ, मेरी यह बात सुनो।"
श्लोक 32 (3.292.32)
शत्रुरेष त्वया वीर देवगन्धर्वभोगिनाम् । यक्षाणां दानवानां च महर्षीणां च पातितः ॥
śatrureṣa tvayā vīra devagandharvabhoginām | yakṣāṇāṃ dānavānāṃ ca maharṣīṇāṃ ca pātitaḥ
"हे वीर, तुमने देवताओं, गन्धर्वों, नागों, यक्षों, दानवों और महर्षियों के इस शत्रु को मार गिराया है।"
श्लोक 33 (3.292.33)
अवध्यः सर्वभूतानां मत्प्रसादात्पुराऽभवत् । कस्माच्चित्कारणात्पापः कंचित्कालमुपेक्षितः ॥
avadhyaḥ sarvabhūtānāṃ matprasādātpurā'bhavat | kasmāccitkāraṇātpāpaḥ kaṃcitkālamupekṣitaḥ
"मेरी कृपा से वह पहले सब प्राणियों के लिए अवध्य हो गया था; किसी कारण से उस पापी की कुछ समय तक उपेक्षा की गई।"
श्लोक 34 (3.292.34)
वधार्थमात्मनस्तेन हृता सीता दुरात्मना । नलकूबरशापेन रक्षा चास्याः कृता मया ॥
vadhārthamātmanastena hṛtā sītā durātmanā | nalakūbaraśāpena rakṣā cāsyāḥ kṛtā mayā
"उस दुरात्मा ने अपनी ही मृत्यु के लिए सीता का हरण किया। और नलकूबर के शाप के द्वारा मैंने उसकी रक्षा की व्यवस्था कर दी थी।"
श्लोक 35 (3.292.35)
यदि ह्यकामामासेवेत्स्त्रियमन्यामपि ध्रुवम् । शतधाऽस्य फलेन्मूर्धा इत्युक्तः सोभवत्पुरा ॥
yadi hyakāmāmāsevetstriyamanyāmapi dhruvam | śatadhā'sya phalenmūrdhā ityuktaḥ sobhavatpurā
"क्योंकि उससे पहले ही कह दिया गया था — 'यदि तुम किसी भी अनिच्छुक पराई स्त्री का बलपूर्वक उपभोग करोगे, तो निश्चय ही तुम्हारा सिर सौ टुकड़े हो जाएगा।'"
श्लोक 36 (3.292.36)
नात्रशङ्का त्वया कार्या प्रतीच्छेमां महामते । कृतं त्वया महत्कार्यं देवानाममितप्रभ ॥
nātraśaṅkā tvayā kāryā pratīcchemāṃ mahāmate | kṛtaṃ tvayā mahatkāryaṃ devānāmamitaprabha
"इस विषय में तुम्हें कोई शंका नहीं करनी चाहिए; हे महामति, इसे स्वीकार करो। हे अपार तेज वाले, तुमने देवताओं का बड़ा कार्य सिद्ध किया है।"
दशरथ उवाच
श्लोक 37 (3.292.37)
प्रीतोस्मि वत्स भद्रं ते पिता दशरथोस्मि ते । अनुजानामि राज्यं च प्रशाधि पुरुषोत्तम ॥
prītosmi vatsa bhadraṃ te pitā daśarathosmi te | anujānāmi rājyaṃ ca praśādhi puruṣottama
"वत्स, मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारा पिता दशरथ हूँ। मैं तुम्हें अनुमति देता हूँ — हे पुरुषोत्तम, राज्य का शासन करो।"
राम उवाच
श्लोक 38 (3.292.38)
अभिवादयेत्वां राजेन्द्र यदि त्वं जनको मम । गमिष्यामि पुरीं रम्यामयोध्यां शासनात्तव ॥
abhivādayetvāṃ rājendra yadi tvaṃ janako mama | gamiṣyāmi purīṃ ramyāmayodhyāṃ śāsanāttava
"हे राजेन्द्र, यदि आप मेरे पिता हैं तो मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आपकी आज्ञा से मैं रमणीय अयोध्या नगरी जाऊँगा।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 39 (3.292.39)
तमुवाच पिता भूयः प्रहृष्टो भरतर्षभ । गच्छायोध्यां प्रशाधि त्वंराम रक्तान्तलोचन । संपूर्णानीहवर्षाणि चतुर्दश महाद्युते ॥
tamuvāca pitā bhūyaḥ prahṛṣṭo bharatarṣabha | gacchāyodhyāṃ praśādhi tvaṃrāma raktāntalocana | saṃpūrṇānīhavarṣāṇi caturdaśa mahādyute
हे भरतश्रेष्ठ, तब अत्यन्त प्रसन्न होकर पिता ने उनसे फिर कहा — "लाल कोरों वाले नेत्रों वाले राम, अयोध्या जाओ और शासन करो। हे महातेजस्वी, यहाँ तुम्हारे चौदह वर्ष पूरे हो गए हैं।"
श्लोक 40 (3.292.40)
ततो देवान्नमस्कृत्य सुहृद्भिरभिनन्दितः । महेन्द्रइव पौलोम्या भार्यया स समेयिवान् ॥
tato devānnamaskṛtya suhṛdbhirabhinanditaḥ | mahendraiva paulomyā bhāryayā sa sameyivān
तब देवताओं को नमस्कार करके और मित्रों से अभिनन्दित होकर वे अपनी पत्नी से वैसे ही मिले जैसे महेन्द्र पौलोमी (शची) से।
श्लोक 41 (3.292.41)
ततो वरं ददौ तस्मै ह्यविन्ध्याय परंतपः । त्रिजटां चार्थमानाभ्यां योजयामास राक्षसीम् ॥
tato varaṃ dadau tasmai hyavindhyāya paraṃtapaḥ | trijaṭāṃ cārthamānābhyāṃ yojayāmāsa rākṣasīm
तब शत्रुओं को तपाने वाले राम ने अविन्ध्य को वर दिया, और राक्षसी त्रिजटा को धन और सम्मान से सम्पन्न किया।
श्लोक 42 (3.292.42)
तमुवाच ततो ब्रह्मा देवैः शक्रपुरोगमैः । कौसल्यामातरिष्टांस्ते वरानद्य ददानि कान् ॥
tamuvāca tato brahmā devaiḥ śakrapurogamaiḥ | kausalyāmātariṣṭāṃste varānadya dadāni kān
तब इन्द्र आदि देवताओं के साथ ब्रह्मा ने उनसे कहा — "हे कौसल्यानन्दन, आज मैं तुम्हें कौन-से मनचाहे वर दूँ?"
श्लोक 43 (3.292.43)
वव्रेरामः स्थितिं धर्मे शत्रुभिश्चापराजयम् । राक्षसैर्निहतानां च वानराणां समुद्भवम् ॥
vavrerāmaḥ sthitiṃ dharme śatrubhiścāparājayam | rākṣasairnihatānāṃ ca vānarāṇāṃ samudbhavam
राम ने धर्म में स्थिरता, शत्रुओं से कभी पराजित न होना, और राक्षसों द्वारा मारे गए वानरों का पुनर्जीवन माँगा।
श्लोक 44 (3.292.44)
ततस्ते ब्रह्मणा प्रोक्ते तथेतिवचने तदा । समुत्तस्थुर्महाराज वानरा लब्धचेतसः ॥
tataste brahmaṇā prokte tathetivacane tadā | samuttasthurmahārāja vānarā labdhacetasaḥ
जब ब्रह्मा ने "तथास्तु" कहा, तब हे महाराज, वानर चेतना पाकर उठ खड़े हुए।
श्लोक 45 (3.292.45)
सीता चापि महाभागा वरं हनुमते ददौ । रामकीर्त्या समं पुत्र जीवितं ते भविष्यति ॥
sītā cāpi mahābhāgā varaṃ hanumate dadau | rāmakīrtyā samaṃ putra jīvitaṃ te bhaviṣyati
महाभागा सीता ने भी हनुमान को वर दिया — "पुत्र, जब तक राम की कीर्ति रहेगी तब तक तुम्हारा जीवन रहेगा।"
श्लोक 46 (3.292.46)
दिव्यास्त्वामुपभोगाश्च मत्प्रसादकृताः सदा । उपस्थास्यन्ति हनुमन्निति स्म हरिलोचन ॥
divyāstvāmupabhogāśca matprasādakṛtāḥ sadā | upasthāsyanti hanumanniti sma harilocana
"हे पिंगल नेत्रों वाले हनुमान, मेरी कृपा से दिव्य भोग सदा तुम्हारे पास उपस्थित रहेंगे" — ऐसा उन्होंने कहा।
श्लोक 47 (3.292.47)
ततस्ते प्रेक्षमाणानां तेषामक्लिष्टकर्मणाम् । अन्तर्धानं ययुर्देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ॥
tataste prekṣamāṇānāṃ teṣāmakliṣṭakarmaṇām | antardhānaṃ yayurdevāḥ sarve śakrapurogamāḥ
तब अनथक पराक्रम करने वाले उन वीरों के देखते-देखते इन्द्र आदि सभी देवता अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 48 (3.292.48)
दृष्ट्वा रामं तु जानक्या संगतं शक्रसारथिः । उवाच परमप्रीतसुहृन्मध्य इदं वचः ॥
dṛṣṭvā rāmaṃ tu jānakyā saṃgataṃ śakrasārathiḥ | uvāca paramaprītasuhṛnmadhya idaṃ vacaḥ
राम को जानकी से मिला हुआ देखकर इन्द्र के सारथि (मातलि) ने अत्यन्त प्रसन्न मित्रों के बीच यह वचन कहा —
मातलिरुवाच
श्लोक 49 (3.292.49)
देवगन्धर्वयक्षाणां मानुषासुरभोगिनाम् । अपनीतं त्वया दुःखमिदं सत्यपराक्रम ॥
devagandharvayakṣāṇāṃ mānuṣāsurabhoginām | apanītaṃ tvayā duḥkhamidaṃ satyaparākrama
"हे सत्यपराक्रमी, आपने देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, मनुष्यों, असुरों और नागों का यह दुःख दूर कर दिया है।"
श्लोक 50 (3.292.50)
सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः । कथयिष्यन्ति लोकास्त्वां यावद्भूमिर्धरिष्यति ॥
sadevāsuragandharvā yakṣarākṣasapannagāḥ | kathayiṣyanti lokāstvāṃ yāvadbhūmirdhariṣyati
"देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग — सभी लोक तब तक आपकी कथा कहते रहेंगे जब तक पृथ्वी टिकी रहेगी।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 51 (3.292.51)
इत्येवमुक्त्वाऽनुज्ञाप्यरामं शस्त्रभृतांवरम् । संपूज्यापाक्रमत्तेन रथेनादित्यवर्चसा ॥
ityevamuktvā'nujñāpyarāmaṃ śastrabhṛtāṃvaram | saṃpūjyāpākramattena rathenādityavarcasā
ऐसा कहकर, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राम से विदा लेकर और उनका सम्मान करके वह सूर्य के समान तेजस्वी उस रथ से चला गया।
श्लोक 52 (3.292.52)
ततःसीतां पुरस्कृत्य रामः सौमित्रिणा सह । सुग्रीवप्रमुखैश्चैव सहितः सर्ववानरैः ॥
tataḥsītāṃ puraskṛtya rāmaḥ saumitriṇā saha | sugrīvapramukhaiścaiva sahitaḥ sarvavānaraiḥ
तब सीता को आगे करके, लक्ष्मण के साथ और सुग्रीव आदि सभी वानरों सहित राम ने,
श्लोक 53 (3.292.53)
विधाय रक्षां लङ्कायां विभीषणपुरस्कृतः । संततार पुनस्तेन सेतुना मकरालयम् ॥
vidhāya rakṣāṃ laṅkāyāṃ vibhīṣaṇapuraskṛtaḥ | saṃtatāra punastena setunā makarālayam
लंका की रक्षा का प्रबन्ध करके और विभीषण को आगे लेकर, उसी सेतु के मार्ग से फिर मकरों के निवास समुद्र को पार किया —
श्लोक 54 (3.292.54)
पुष्पकेण विमानेन खेचरेण विराजता । कामगेन यथामुख्यैरमात्यैः संवृतो वशी ॥
puṣpakeṇa vimānena khecareṇa virājatā | kāmagena yathāmukhyairamātyaiḥ saṃvṛto vaśī
आकाश में विचरने वाले, इच्छानुसार चलने वाले, दीप्तिमान पुष्पक विमान में, अपने प्रमुख मंत्रियों से यथाक्रम घिरे हुए उस जितेन्द्रिय राम ने।
श्लोक 55 (3.292.55)
ततस्तीरे समुद्रस्य यत्रशिश्ये स पार्थिवः । तत्रैवोवास धर्मात्मा सहितः सर्ववानरैः ॥
tatastīre samudrasya yatraśiśye sa pārthivaḥ | tatraivovāsa dharmātmā sahitaḥ sarvavānaraiḥ
तब वह धर्मात्मा राजा सभी वानरों के साथ समुद्र के उसी तट पर ठहरे जहाँ वे पहले (समुद्र से प्रार्थना करते हुए) लेटे थे।
श्लोक 56 (3.292.56)
अथैनान्राघवः काले समानीयाभिपूज्य च । विसर्जयामास तदा रत्नैः संतोष्य सर्वशः ॥
athainānrāghavaḥ kāle samānīyābhipūjya ca | visarjayāmāsa tadā ratnaiḥ saṃtoṣya sarvaśaḥ
फिर समय आने पर राघव ने उन सबको बुलाकर उनका सम्मान किया और रत्नों से पूरी तरह संतुष्ट करके उन्हें विदा किया।
श्लोक 57 (3.292.57)
गतेषु वानरेन्द्रेषु गोपुच्छर्क्षेषु तेषु च । सुग्रीवसहितो रामः किष्किन्धां पुनरागमत् ॥
gateṣu vānarendreṣu gopuccharkṣeṣu teṣu ca | sugrīvasahito rāmaḥ kiṣkindhāṃ punarāgamat
जब वे वानरराज, गोपुच्छ वानर और रीछ चले गए, तब राम सुग्रीव के साथ फिर किष्किन्धा आए —
श्लोक 58 (3.292.58)
विभीषणेनानुगतः सुग्रीवसहितस्तदा । पुष्पकेण विमानेन वैदेह्या दर्शयन्वनम् ॥
vibhīṣaṇenānugataḥ sugrīvasahitastadā | puṣpakeṇa vimānena vaidehyā darśayanvanam
विभीषण उनके पीछे-पीछे थे और सुग्रीव साथ थे; पुष्पक विमान से वे वैदेही को वन दिखाते जा रहे थे।
श्लोक 59 (3.292.59)
किष्किन्धां तु समासाद्यरामः प्रहरतांवरः । अङ्गदं कृतकर्माणं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ॥
kiṣkindhāṃ tu samāsādyarāmaḥ praharatāṃvaraḥ | aṅgadaṃ kṛtakarmāṇaṃ yauvarājye'bhyaṣecayat
किष्किन्धा पहुँचकर योद्धाओं में श्रेष्ठ राम ने अपना कर्तव्य निभा चुके अंगद का युवराज-पद पर अभिषेक किया।
श्लोक 60 (3.292.60)
ततस्तैरेव सहितो रामः सौमित्रिणा सह । यथागतेन मार्गेण प्रययौ स्वपुरं प्रति ॥
tatastaireva sahito rāmaḥ saumitriṇā saha | yathāgatena mārgeṇa prayayau svapuraṃ prati
फिर उन्हीं साथियों और लक्ष्मण के साथ राम जिस मार्ग से आए थे उसी मार्ग से अपने नगर की ओर चल पड़े।
श्लोक 61 (3.292.61)
अयोध्यां स समासाद्यपुरीं राष्ट्रपतिस्ततः । भरताय हनूमन्तं दूतं प्रास्थापयद्द्रुतम् ॥
ayodhyāṃ sa samāsādyapurīṃ rāṣṭrapatistataḥ | bharatāya hanūmantaṃ dūtaṃ prāsthāpayaddrutam
अयोध्या नगरी के निकट पहुँचकर राष्ट्र के स्वामी राम ने तब शीघ्र ही हनुमान को दूत बनाकर भरत के पास भेजा।
श्लोक 62 (3.292.62)
लक्षयित्वेङ्गितं सर्वंप्रियं तस्मै निवेद्य वै । वायुपुत्रे पुनः प्राप्ते नन्दिग्राममुपाविशत् ॥
lakṣayitveṅgitaṃ sarvaṃpriyaṃ tasmai nivedya vai | vāyuputre punaḥ prāpte nandigrāmamupāviśat
वायुपुत्र हनुमान भरत की सारी चेष्टाएँ परखकर और उन्हें प्रिय समाचार सुनाकर जब लौट आए, तब राम नन्दिग्राम पहुँचे।
श्लोक 63 (3.292.63)
सतत्रमलदिग्धाङ्गं भरतं चीरवाससम् । नन्दिग्रामगतंरामः सशत्रुघ्नं सराघवः । अग्रतःपादुके कृत्वा ददर्शासीनमासने ॥
satatramaladigdhāṅgaṃ bharataṃ cīravāsasam | nandigrāmagataṃrāmaḥ saśatrughnaṃ sarāghavaḥ | agrataḥpāduke kṛtvā dadarśāsīnamāsane
वहाँ नन्दिग्राम पहुँचकर राघव ने शत्रुघ्न सहित भरत को देखा — उनका शरीर मैल से लिपटा था, वे चीर पहने थे और (राम की) पादुकाओं को आगे रखकर आसन पर बैठे थे।
श्लोक 64 (3.292.64)
समेत्यभरतेनाथ शत्रुघ्नेन च वीर्यवान् । राघवः सहसौमित्रिर्मुमुदे भरतर्षभ ॥
sametyabharatenātha śatrughnena ca vīryavān | rāghavaḥ sahasaumitrirmumude bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ, पराक्रमी राघव लक्ष्मण के साथ भरत और शत्रुघ्न से मिलकर आनन्दित हुए।
श्लोक 65 (3.292.65)
ततो भरतशत्रुघ्नौ समेतौ गुरुणा तदा । वैदेह्या दर्शनेनोभौ प्रहर्षं समवापतुः ॥
tato bharataśatrughnau sametau guruṇā tadā | vaidehyā darśanenobhau praharṣaṃ samavāpatuḥ
तब अपने बड़े भाई से मिले भरत और शत्रुघ्न दोनों वैदेही के दर्शन से अत्यन्त हर्षित हुए।
श्लोक 66 (3.292.66)
तस्मै तद्भरतो राज्यमागतायातिसत्कृतम् । न्यासं निर्यातयामास युक्तः परमया मुदा ॥
tasmai tadbharato rājyamāgatāyātisatkṛtam | nyāsaṃ niryātayāmāsa yuktaḥ paramayā mudā
परम आनन्द से भरे भरत ने लौटकर आए राम को वह राज्य, जिसे उन्होंने धरोहर के रूप में बड़े सम्मान से संभाल रखा था, सौंप दिया।
श्लोक 67 (3.292.67)
ततस्तं वैष्णवे शूरं नक्षत्रेऽभिजितेऽहनि । वसिष्ठो वामदेवश्च सहितावभ्यषिञ्चताम् ॥
tatastaṃ vaiṣṇave śūraṃ nakṣatre'bhijite'hani | vasiṣṭho vāmadevaśca sahitāvabhyaṣiñcatām
तब विष्णु के नक्षत्र (श्रवण) में, अभिजित् के योग वाले दिन वसिष्ठ और वामदेव ने मिलकर उस वीर का राज्याभिषेक किया।
श्लोक 68 (3.292.68)
सोभिषिक्तः कपिश्रेष्ठं सुग्रीवं ससुहृज्जनम् । विभीषणं च पौलस्त्यमन्वजानाद्गृहान्प्रति ॥
sobhiṣiktaḥ kapiśreṣṭhaṃ sugrīvaṃ sasuhṛjjanam | vibhīṣaṇaṃ ca paulastyamanvajānādgṛhānprati
अभिषेक हो जाने पर उन्होंने वानरश्रेष्ठ सुग्रीव को उनके मित्रों-सहित और पुलस्त्यवंशी विभीषण को अपने-अपने घर जाने की अनुमति दी।
श्लोक 69 (3.292.69)
अभ्यर्च्य विविधै रत्नैः प्रीतियुक्तौ मुदा युतौ । समाधायेतिकर्तव्यं दुःखेन विससर्ज ह ॥
abhyarcya vividhai ratnaiḥ prītiyuktau mudā yutau | samādhāyetikartavyaṃ duḥkhena visasarja ha
उन्होंने प्रेम और आनन्द से भरे उन दोनों का अनेक प्रकार के रत्नों से सत्कार किया, आगे के कर्तव्य निश्चित किए और दुःखी मन से उन्हें विदा किया।
श्लोक 70 (3.292.70)
पुष्पकं च विमानं तत्पूजयित्वा स राघवः । प्रादाद्वैश्रवणायैव प्रीत्या स रघुनन्दनः ॥
puṣpakaṃ ca vimānaṃ tatpūjayitvā sa rāghavaḥ | prādādvaiśravaṇāyaiva prītyā sa raghunandanaḥ
रघुनन्दन राघव ने पुष्पक विमान का पूजन करके उसे प्रेमपूर्वक वैश्रवण (कुबेर) को लौटा दिया।
श्लोक 71 (3.292.71)
ततो देवर्षिसहितः सरितं गोमतीमनु । शताश्वमेधानाजह्रे जारूथ्यान्स निरर्गलान् ॥
tato devarṣisahitaḥ saritaṃ gomatīmanu | śatāśvamedhānājahre jārūthyānsa nirargalān
फिर देवर्षियों के साथ उन्होंने गोमती नदी के तट पर सौ अश्वमेध यज्ञ किए, जो तिगुनी दक्षिणा वाले थे और निर्विघ्न सम्पन्न हुए।