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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 293

मार्कण्डेय द्वारा युधिष्ठिर को सान्त्वना

मार्कण्डेय राम की कथा समाप्त करके उसे युधिष्ठिर की स्थिति पर घटाते हैं। राम ने भी वन में भयानक कष्ट सहे, फिर भी केवल वानरों और रीछों को मित्र बनाकर उन्होंने रावण को मारा और सीता को वापस पाया; अर्जुन, भीम और नकुल-सहदेव जैसे भाइयों वाले युधिष्ठिर, जो जयद्रथ से द्रौपदी को पहले ही छुड़ा चुके हैं, शोक क्यों करें। सान्त्वना पाकर युधिष्ठिर दुःख त्यागते हैं और ऋषि से फिर प्रश्न करते हैं।

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मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.293.1)

एवमेतन्महाबाहो रामेणामिततेजसा । प्राप्तं व्यसनमत्युग्रं वनवासकृतं पुरा ॥

evametanmahābāho rāmeṇāmitatejasā | prāptaṃ vyasanamatyugraṃ vanavāsakṛtaṃ purā

हे महाबाहो, इस प्रकार अपार तेजस्वी राम ने पूर्वकाल में वनवास के कारण अत्यन्त भयानक विपत्ति झेली थी।

श्लोक 2 (3.293.2)

मा शुचः पुरुषव्याघ्र क्षत्रियोसि परंतप । बाहुवीर्याश्रयेमार्गे वर्तसे दीप्तनिर्णये ॥

mā śucaḥ puruṣavyāghra kṣatriyosi paraṃtapa | bāhuvīryāśrayemārge vartase dīptanirṇaye

हे पुरुषसिंह, शोक मत करो; हे परंतप, तुम क्षत्रिय हो। तुम उस मार्ग पर चल रहे हो जो भुजाओं के बल पर टिका है और जिसका फल प्रत्यक्ष है।

श्लोक 3 (3.293.3)

न हि ते वृजिनं किंचिद्दृश्यते परमण्वपि । अस्मिन्मार्गे निषीदेयुः सेन्द्रा अपि सुरासुराः ॥

na hi te vṛjinaṃ kiṃciddṛśyate paramaṇvapi | asminmārge niṣīdeyuḥ sendrā api surāsurāḥ

तुममें अणु भर भी कोई दोष दिखाई नहीं देता। इस मार्ग पर तो इन्द्र सहित देवता और असुर भी बैठ जा सकते हैं।

श्लोक 4 (3.293.4)

संहत्य निहतोवृत्रो मरुद्भिर्वज्रपाणिना । नमुचिश्चैवदुर्धर्षो दीर्घजिह्वा चराक्षसी ॥

saṃhatya nihatovṛtro marudbhirvajrapāṇinā | namuciścaivadurdharṣo dīrghajihvā carākṣasī

वज्रधारी इन्द्र ने मरुद्गणों के साथ मिलकर वृत्र को मारा था; इसी प्रकार दुर्जेय नमुचि और राक्षसी दीर्घजिह्वा को भी।

श्लोक 5 (3.293.5)

सहायवति सर्वार्थाः संतिष्ठन्तीह सर्वशः । किंनु तस्याजितं सङ्ख्ये यस्य भ्राता धनंजयः ॥

sahāyavati sarvārthāḥ saṃtiṣṭhantīha sarvaśaḥ | kiṃnu tasyājitaṃ saṅkhye yasya bhrātā dhanaṃjayaḥ

जिसके सहायक हों उसके सब प्रयोजन यहाँ पूरी तरह सिद्ध होते हैं। जिसका भाई धनंजय (अर्जुन) हो, उसके लिए युद्ध में अजेय क्या है?

श्लोक 6 (3.293.6)

अयं च बलिनांश्रेष्ठो भीमो भीमपराक्रमः । युवानौ च महेष्वासौ वीरौ माद्रवतीसुतौ ॥

ayaṃ ca balināṃśreṣṭho bhīmo bhīmaparākramaḥ | yuvānau ca maheṣvāsau vīrau mādravatīsutau

और यह भयानक पराक्रम वाले, बलवानों में श्रेष्ठ भीम हैं, तथा माद्री के दोनों युवा वीर पुत्र, जो महान धनुर्धर हैं।

श्लोक 7 (3.293.7)

एभिः सहायैः कस्मात्त्वं विषीदसि परंतप । य इमे वज्रिणः सेनां जयेयुः समरुद्गणाम् ॥

ebhiḥ sahāyaiḥ kasmāttvaṃ viṣīdasi paraṃtapa | ya ime vajriṇaḥ senāṃ jayeyuḥ samarudgaṇām

हे परंतप, ऐसे सहायकों के रहते तुम क्यों विषाद करते हो? ये तो मरुद्गणों सहित वज्रधारी इन्द्र की सेना को भी जीत सकते हैं।

श्लोक 8 (3.293.8)

त्वमप्येभिर्महेष्वासैः सहायैर्देवरूपिभिः । विजेष्यसि रणे सर्वानमित्रान्भरतर्षभ ॥

tvamapyebhirmaheṣvāsaiḥ sahāyairdevarūpibhiḥ | vijeṣyasi raṇe sarvānamitrānbharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ, देवताओं के समान रूप वाले इन महान धनुर्धर सहायकों के साथ तुम भी युद्ध में अपने सभी शत्रुओं को जीत लोगे।

श्लोक 9 (3.293.9)

इतश्च त्वमिमां पश्यसैन्धवेन दुरात्मना । बलिना वीर्यमत्तेन हृतामेभिर्महात्मभिः ॥

itaśca tvamimāṃ paśyasaindhavena durātmanā | balinā vīryamattena hṛtāmebhirmahātmabhiḥ

और इधर इसे देखो — बलवान और पराक्रम से उन्मत्त दुरात्मा सिन्धुराज ने इसका हरण किया था, पर इन महात्माओं ने

श्लोक 10 (3.293.10)

आनीतां द्रौपदीं कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम् । जयद्रथं च राजानं विजितं वशमागतम् ॥

ānītāṃ draupadīṃ kṛṣṇāṃ kṛtvā karma suduṣkaram | jayadrathaṃ ca rājānaṃ vijitaṃ vaśamāgatam

अत्यन्त कठिन पराक्रम करके द्रौपदी कृष्णा को लौटा लिया, और राजा जयद्रथ पराजित होकर तुम्हारे वश में आ गया।

श्लोक 11 (3.293.11)

असहायेन रामेण वैदेही पुनराहृता । हत्वासङ्ख्ये दशग्रीवं राक्षसं भीमविक्रमम् ॥

asahāyena rāmeṇa vaidehī punarāhṛtā | hatvāsaṅkhye daśagrīvaṃ rākṣasaṃ bhīmavikramam

राम ने, जिनके पास अपनी जाति के सहायक नहीं थे, युद्ध में भयानक पराक्रम वाले दशमुख राक्षस को मारकर वैदेही को फिर प्राप्त किया।

श्लोक 12 (3.293.12)

यस्य शाखामृगामित्राण्यृक्षाः कालमुखास्तथा । जात्यन्तरगता राजन्नेतद्बुद्ध्याऽनुचिन्तय ॥

yasya śākhāmṛgāmitrāṇyṛkṣāḥ kālamukhāstathā | jātyantaragatā rājannetadbuddhyā'nucintaya

हे राजन्, उनके मित्र तो वानर और काले मुख वाले रीछ थे — सर्वथा दूसरी जाति के प्राणी। इस पर अपनी बुद्धि से विचार करो।

श्लोक 13 (3.293.13)

तस्मात्सर्वं कुरुश्रेष्ठ मा शुचो भरतर्षभ । त्वद्विधा हि महात्मानो न शोचन्ति परंतप ॥

tasmātsarvaṃ kuruśreṣṭha mā śuco bharatarṣabha | tvadvidhā hi mahātmāno na śocanti paraṃtapa

इसलिए हे कुरुश्रेष्ठ, हे भरतश्रेष्ठ, इन सब बातों के लिए शोक मत करो। हे परंतप, तुम्हारे जैसे महात्मा शोक नहीं करते।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (3.293.14)

एवमाश्वासितो राजामार्कण्डेयेन धीमता । त्यक्त्वा दुःखमदीनात्मा पुनरप्येनमब्रवीत् ॥

evamāśvāsito rājāmārkaṇḍeyena dhīmatā | tyaktvā duḥkhamadīnātmā punarapyenamabravīt

बुद्धिमान मार्कण्डेय द्वारा इस प्रकार सान्त्वना पाकर राजा ने दुःख त्याग दिया और दीनता छोड़कर उनसे फिर कहा —

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