आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 294
सावित्री का जन्म
युधिष्ठिर पूछते हैं कि क्या कभी कोई स्त्री द्रौपदी के समान पतिव्रता हुई है, और मार्कण्डेय सावित्री की कथा आरम्भ करते हैं। मद्र देश के निःसंतान राजा अश्वपति अठारह वर्ष तक देवी सावित्री की उपासना करते हैं; प्रसन्न होकर देवी उन्हें एक तेजस्विनी कन्या का वर देती हैं, जो जन्म लेकर सावित्री कहलाती है। जब उस तेजस्विनी कन्या को माँगने का साहस कोई वर नहीं करता, तो पिता उसे स्वयं पति चुनने को कहते हैं, और वह वृद्ध मंत्रियों के साथ सोने के रथ में निकलकर राजर्षियों के आश्रमों में जाती है और तीर्थों में दान करती है।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 1 (3.294.1)
नात्मानमनुशोचामि नेमान्भ्रातॄन्महामुने । हरणं चापि राज्यस्य यथेमां द्रुपदात्मजाम् ॥
nātmānamanuśocāmi nemānbhrātṝnmahāmune | haraṇaṃ cāpi rājyasya yathemāṃ drupadātmajām
हे महामुने, मैं न अपने लिए शोक करता हूँ, न इन भाइयों के लिए, न राज्य छिन जाने के लिए — जितना इस द्रुपदकुमारी के लिए करता हूँ।
श्लोक 2 (3.294.2)
द्यूते दुरात्मभिः क्लिष्टाः कृष्णया तारिता वयम् । जयद्रथेन चपुनर्वनाच्चापि हृता बलात् ॥
dyūte durātmabhiḥ kliṣṭāḥ kṛṣṇayā tāritā vayam | jayadrathena capunarvanāccāpi hṛtā balāt
जुए में दुष्टों द्वारा सताए गए हम लोगों को कृष्णा ने ही उबारा था; और फिर जयद्रथ ने उसे वन से बलपूर्वक हर लिया।
श्लोक 3 (3.294.3)
अस्ति सीमन्तिनी काचिद्दृष्टपूर्वाऽपिवा श्रुता । पतिव्रता महाभागा यथेयं द्रुपदात्मजा ॥
asti sīmantinī kāciddṛṣṭapūrvā'pivā śrutā | pativratā mahābhāgā yatheyaṃ drupadātmajā
क्या पहले कोई ऐसी स्त्री देखी या सुनी गई है जो इस द्रुपदकुमारी के समान पतिव्रता और महाभाग्यशालिनी हो?
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 4 (3.294.4)
शृणु राजन्कुलस्त्रीणां महाभाग्यं युधिष्ठिर । सर्वमेतद्यथाप्राप्तं सावित्र्या राजकन्यया ॥
śṛṇu rājankulastrīṇāṃ mahābhāgyaṃ yudhiṣṭhira | sarvametadyathāprāptaṃ sāvitryā rājakanyayā
हे राजा युधिष्ठिर, कुलीन स्त्रियों का महान सौभाग्य सुनो — वह सब, जैसे राजकुमारी सावित्री ने उसे प्राप्त किया था।
श्लोक 5 (3.294.5)
आसीन्मद्रेषु धर्मात्मा राजा परमधार्मिकः । ब्रह्मण्यश्चमहात्मा च सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥
āsīnmadreṣu dharmātmā rājā paramadhārmikaḥ | brahmaṇyaścamahātmā ca satyasandho jitendriyaḥ
मद्र देश में एक धर्मात्मा, परम धार्मिक राजा था — ब्राह्मणों का भक्त, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय।
श्लोक 6 (3.294.6)
यज्वा दानपतिर्दक्षः पौरजानपदप्रियः । पार्थिवोऽश्वपतिर्नाम सर्वभूतहिते रतः ॥
yajvā dānapatirdakṣaḥ paurajānapadapriyaḥ | pārthivo'śvapatirnāma sarvabhūtahite rataḥ
वह यज्ञ करने वाला, दानवीर, कुशल, नगर और जनपद के लोगों का प्रिय और सब प्राणियों के हित में लगा रहने वाला अश्वपति नाम का राजा था।
श्लोक 7 (3.294.7)
क्षमावाननपत्यश्च सत्यवाग्विजितेन्द्रियः । अतिक्रान्तेन वयसा संतापमुपजग्मिवान् ॥
kṣamāvānanapatyaśca satyavāgvijitendriyaḥ | atikrāntena vayasā saṃtāpamupajagmivān
वह क्षमाशील, सत्यवादी और जितेन्द्रिय था, पर उसकी कोई संतान नहीं थी; ढलती आयु के साथ वह दुःखी रहने लगा।
श्लोक 8 (3.294.8)
अपत्योत्पादनार्थं च तीव्रं नियममास्थितः । काले परिमिताहारो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥
apatyotpādanārthaṃ ca tīvraṃ niyamamāsthitaḥ | kāle parimitāhāro brahmacārī jitendriyaḥ
संतान पाने के लिए उसने कठोर व्रत धारण किया — नियत समय पर परिमित भोजन करता, ब्रह्मचर्य का पालन करता और इन्द्रियों को वश में रखता।
श्लोक 9 (3.294.9)
हुत्वा शतसहस्रं स सावित्र्या राजसत्तम । षष्ठेषष्ठे तदाकाले बभूव मितभोजनः ॥
hutvā śatasahasraṃ sa sāvitryā rājasattama | ṣaṣṭheṣaṣṭhe tadākāle babhūva mitabhojanaḥ
हे राजश्रेष्ठ, सावित्री मन्त्र से एक लाख आहुतियाँ देते हुए वह दिन के छठे भाग में ही थोड़ा-सा भोजन करता था।
श्लोक 10 (3.294.10)
एतेन नियमेनासीद्वर्षाण्यष्टादशैव तु । पूर्णे त्वष्टादशे वर्षे सावित्री तुष्टिमभ्यगात् ॥
etena niyamenāsīdvarṣāṇyaṣṭādaśaiva tu | pūrṇe tvaṣṭādaśe varṣe sāvitrī tuṣṭimabhyagāt
इस नियम का पालन करते हुए अठारह वर्ष बीत गए। अठारहवाँ वर्ष पूरा होने पर देवी सावित्री प्रसन्न हुईं।
श्लोक 11 (3.294.11)
रूपिणी तु तदा राजन्दर्शयामास तं नृपम् । अग्निहोत्रात्समुत्थाय हर्षेण महताऽन्विता ॥
rūpiṇī tu tadā rājandarśayāmāsa taṃ nṛpam | agnihotrātsamutthāya harṣeṇa mahatā'nvitā
तब, हे राजन्, वे साकार रूप धारण करके अग्निहोत्र की अग्नि से प्रकट हुईं और बड़े हर्ष के साथ उन्होंने राजा को दर्शन दिए।
श्लोक 12 (3.294.12)
उवाच चैनं वरदा वचनं पार्थिवं तदा । सा तमश्वपतिं राजन्सावित्री नियमे स्थितम् ॥
uvāca cainaṃ varadā vacanaṃ pārthivaṃ tadā | sā tamaśvapatiṃ rājansāvitrī niyame sthitam
और वर देने वाली सावित्री ने तब उस राजा से — हे राजन्, व्रत में दृढ़ अश्वपति से — यह वचन कहा —
सावित्र्युवाच
श्लोक 13 (3.294.13)
ब्रह्मचर्येण शुद्धेन दमेन नियमेन च । सर्वात्मना च भक्त्या च तुष्टाऽस्मि तव पार्थिव ॥
brahmacaryeṇa śuddhena damena niyamena ca | sarvātmanā ca bhaktyā ca tuṣṭā'smi tava pārthiva
"हे राजन्, तुम्हारे शुद्ध ब्रह्मचर्य, इन्द्रिय-संयम, नियम और सम्पूर्ण हृदय से की गई भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ।"
श्लोक 14 (3.294.14)
वरं वृणीष्वाश्वपते मद्रराज यदीप्सितम् । न प्रमादश्च धर्मेषु कर्तव्यस्ते कथंचन ॥
varaṃ vṛṇīṣvāśvapate madrarāja yadīpsitam | na pramādaśca dharmeṣu kartavyaste kathaṃcana
"हे मद्रराज अश्वपति, जो चाहो वह वर माँग लो। और धर्म के विषय में तुम्हें कभी भी प्रमाद नहीं करना चाहिए।"
अश्वपतिरुवाच
श्लोक 15 (3.294.15)
अपत्यार्थः समारम्भः कृतो धर्मेप्सया मया । पुत्रा मे बहवो देवि भवेयुः कुलभावनाः ॥
apatyārthaḥ samārambhaḥ kṛto dharmepsayā mayā | putrā me bahavo devi bhaveyuḥ kulabhāvanāḥ
"मैंने धर्म-पालन की इच्छा से संतान के लिए यह अनुष्ठान आरम्भ किया था। हे देवी, मेरे बहुत-से पुत्र हों जो मेरे कुल को बढ़ाएँ।"
श्लोक 16 (3.294.16)
तुष्टाऽसि यदि मे देवि वरमेतं वृणोम्यहम् । संतानं परमो धर्म इत्याहुर्मां द्विजातयः ॥
tuṣṭā'si yadi me devi varametaṃ vṛṇomyaham | saṃtānaṃ paramo dharma ityāhurmāṃ dvijātayaḥ
"हे देवी, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो मैं यही वर माँगता हूँ; क्योंकि द्विज मुझसे कहते हैं कि संतान ही परम धर्म है।"
सावित्र्युवाच
श्लोक 17 (3.294.17)
पूर्वमेव मया राजन्नभिप्रायमिमं तव । ज्ञात्वा पुत्रार्थमुक्तो वै भगवांस्ते पितामहः ॥
pūrvameva mayā rājannabhiprāyamimaṃ tava | jñātvā putrārthamukto vai bhagavāṃste pitāmahaḥ
"हे राजन्, तुम्हारे इस अभिप्राय को पहले ही जानकर मैंने पुत्र के विषय में भगवान् पितामह (ब्रह्मा) से तुम्हारे लिए बात कर ली थी।"
श्लोक 18 (3.294.18)
प्रसादाच्चैव तस्मात्ते स्वयं विहितवत्यहम् । कन्या तेजस्विनी सौम्य क्षिप्रमेव भविष्यति ॥
prasādāccaiva tasmātte svayaṃ vihitavatyaham | kanyā tejasvinī saumya kṣiprameva bhaviṣyati
"उन्हीं की कृपा से मैंने स्वयं यह विधान किया है — हे सौम्य, तुम्हें शीघ्र ही एक तेजस्विनी कन्या प्राप्त होगी।"
श्लोक 19 (3.294.19)
उत्तरं च न ते किंचिद्व्याहर्तव्यं कथंचन । पितामहनियोगेन तुष्टा ह्येतद्ब्रवीमि ते ॥
uttaraṃ ca na te kiṃcidvyāhartavyaṃ kathaṃcana | pitāmahaniyogena tuṣṭā hyetadbravīmi te
"इसके उत्तर में तुम्हें कुछ भी नहीं कहना चाहिए। पितामह की आज्ञा से, प्रसन्न होकर मैं तुमसे यह कह रही हूँ।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 20 (3.294.20)
स तथेति प्रतिज्ञाय सावित्र्या वचनं नृपः । प्रसादयामास पुनः क्षिप्रमेतद्भविष्यति ॥
sa tatheti pratijñāya sāvitryā vacanaṃ nṛpaḥ | prasādayāmāsa punaḥ kṣiprametadbhaviṣyati
राजा ने सावित्री के वचन को "ऐसा ही हो" कहकर स्वीकार किया और फिर उन्हें प्रसन्न करते हुए कहा — "यह शीघ्र ही हो।"
श्लोक 21 (3.294.21)
अन्तर्हितायां सावित्र्यां जगाम स्वपुरं नृपः । स्वराज्ये चावसद्वीरः प्रजा धर्मेण पालयन् ॥
antarhitāyāṃ sāvitryāṃ jagāma svapuraṃ nṛpaḥ | svarājye cāvasadvīraḥ prajā dharmeṇa pālayan
सावित्री के अन्तर्धान हो जाने पर राजा अपने नगर लौट गया, और वह वीर धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए अपने राज्य में रहने लगा।
श्लोक 22 (3.294.22)
कस्मिंश्चित्तु गते काले स राजा नियतव्रतः । ज्येष्ठायां धर्मचारिण्यां महिष्यां गर्भमादधे ॥
kasmiṃścittu gate kāle sa rājā niyatavrataḥ | jyeṣṭhāyāṃ dharmacāriṇyāṃ mahiṣyāṃ garbhamādadhe
कुछ समय बीतने पर उस व्रतनिष्ठ राजा ने अपनी धर्मपरायण बड़ी रानी में गर्भ स्थापित किया।
श्लोक 23 (3.294.23)
राजपुत्र्यास्तु गर्भः स मानव्या भरतर्षभ । व्यवर्धत तदा शुक्ले तारापतिरिवाम्बरे ॥
rājaputryāstu garbhaḥ sa mānavyā bharatarṣabha | vyavardhata tadā śukle tārāpatirivāmbare
हे भरतश्रेष्ठ, उस मनुवंशी राजकुमारी का वह गर्भ तब वैसे ही बढ़ने लगा जैसे शुक्ल पक्ष में आकाश में चन्द्रमा बढ़ता है।
श्लोक 24 (3.294.24)
प्राप्ते काले तु सुषुवे कन्यां राजीवलोचनाम् । क्रियाश्च तस्या मुदितश्चक्रे च नृपसत्तमः ॥
prāpte kāle tu suṣuve kanyāṃ rājīvalocanām | kriyāśca tasyā muditaścakre ca nṛpasattamaḥ
समय आने पर उसने कमलनयनी कन्या को जन्म दिया, और उस श्रेष्ठ राजा ने प्रसन्न होकर उसके जन्म-संस्कार किए।
श्लोक 25 (3.294.25)
सावित्र्या प्रीतया दत्ता सावित्र्या हुतया ह्यपि । सावित्रीत्येव नामास्याश्चक्रुर्विप्रास्तथा पिता ॥
sāvitryā prītayā dattā sāvitryā hutayā hyapi | sāvitrītyeva nāmāsyāścakrurviprāstathā pitā
वह प्रसन्न हुई सावित्री की दी हुई थी और सावित्री-मन्त्र से दी गई आहुतियों से प्राप्त हुई थी, इसलिए ब्राह्मणों और पिता ने उसका नाम सावित्री ही रखा।
श्लोक 26 (3.294.26)
सा विग्रहवतीव श्रीर्व्यवर्धत नृपात्मजा । कालेन चापि सा कन्या यौवनस्था बभूव ह ॥
sā vigrahavatīva śrīrvyavardhata nṛpātmajā | kālena cāpi sā kanyā yauvanasthā babhūva ha
वह राजकुमारी मानो देहधारिणी लक्ष्मी की तरह बढ़ने लगी, और समय के साथ वह कन्या युवावस्था को प्राप्त हुई।
श्लोक 27 (3.294.27)
तां सुमध्यां पृथुश्रोणीं प्रतिमां काञ्चनीमिव । प्राप्तेयं देवकन्येति दृष्ट्वा संमेनिरे जनाः ॥
tāṃ sumadhyāṃ pṛthuśroṇīṃ pratimāṃ kāñcanīmiva | prāpteyaṃ devakanyeti dṛṣṭvā saṃmenire janāḥ
पतली कमर और चौड़े नितम्बों वाली, सोने की प्रतिमा-सी उस कन्या को देखकर लोग मानते थे कि "कोई देवकन्या आ गई है।"
श्लोक 28 (3.294.28)
तां तु पद्मपलाशाक्षीं ज्वलन्तीमिव तेजसा । न कश्चिद्वरयामास तेजसा प्रतिवारितः ॥
tāṃ tu padmapalāśākṣīṃ jvalantīmiva tejasā | na kaścidvarayāmāsa tejasā prativāritaḥ
किन्तु कमल की पंखुड़ी जैसे नेत्रों वाली, तेज से मानो जलती हुई उस कन्या का वरण किसी ने नहीं किया; उसके तेज से सब पीछे हट जाते थे।
श्लोक 29 (3.294.29)
अथोपोष्य शिरःस्नाता देवतामभिगम्य सा । हुत्वाग्निं विधिवद्विप्रान्वाचयामास पर्वणि ॥
athopoṣya śiraḥsnātā devatāmabhigamya sā | hutvāgniṃ vidhivadviprānvācayāmāsa parvaṇi
तब उसने उपवास करके सिर से स्नान किया, देवता के पास गई, विधिपूर्वक अग्नि में आहुति दी और पर्व के दिन ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाया।
श्लोक 30 (3.294.30)
ततः सुमनसः शेषाः प्रतिगृह्य महात्मनः । पितुः समीपमगमद्देवी श्रीरिव रूपिणी ॥
tataḥ sumanasaḥ śeṣāḥ pratigṛhya mahātmanaḥ | pituḥ samīpamagamaddevī śrīriva rūpiṇī
फिर उन महात्मा ब्राह्मणों से पूजा के बचे हुए प्रसाद-पुष्प लेकर वह देहधारिणी लक्ष्मी-सी देवी अपने पिता के पास गई।
श्लोक 31 (3.294.31)
साऽभिवाद्य पितुः पादौ शेषाः पूर्वं निवेद्य च । कृताञ्जलिर्वरारोहा नृपतेः पार्श्वमास्थिता ॥
sā'bhivādya pituḥ pādau śeṣāḥ pūrvaṃ nivedya ca | kṛtāñjalirvarārohā nṛpateḥ pārśvamāsthitā
उसने पिता के चरणों में प्रणाम किया, पहले प्रसाद के फूल उन्हें अर्पित किए, और फिर वह सुन्दरी हाथ जोड़कर राजा के पास खड़ी हो गई।
श्लोक 32 (3.294.32)
यौवनस्थां तु तां दृष्ट्वा स्वां सुतां देवरूपिणीम् । अयाच्यमानां च वरैर्नृपतिर्दुःखितोऽभवत् ॥
yauvanasthāṃ tu tāṃ dṛṣṭvā svāṃ sutāṃ devarūpiṇīm | ayācyamānāṃ ca varairnṛpatirduḥkhito'bhavat
अपनी देवरूपिणी पुत्री को युवावस्था में पहुँची हुई और फिर भी किसी वर द्वारा न माँगी गई देखकर राजा दुःखी हुआ।
राजोवाच
श्लोक 33 (3.294.33)
पुत्रि प्रदानकालस्ते न च कश्चिद्वृणोति माम् । स्वयमन्विच्छ भर्तारं गुणैः सदृशमात्मनः ॥
putri pradānakālaste na ca kaścidvṛṇoti mām | svayamanviccha bhartāraṃ guṇaiḥ sadṛśamātmanaḥ
"पुत्री, तुम्हारे विवाह का समय आ गया है, पर कोई भी मुझसे तुम्हें माँगता नहीं। तुम स्वयं ही अपने गुणों के अनुरूप पति खोज लो।"
श्लोक 34 (3.294.34)
प्रार्थितः पुरुषो यश्च स निवेद्यस्त्वया मम । विमृश्याहं प्रदास्यामि वरय त्वं यथेप्सितम् ॥
prārthitaḥ puruṣo yaśca sa nivedyastvayā mama | vimṛśyāhaṃ pradāsyāmi varaya tvaṃ yathepsitam
"जिस पुरुष को तुम चाहो, उसके बारे में मुझे बताना। मैं विचार करके तुम्हें उसे सौंप दूँगा; तुम अपनी इच्छा के अनुसार वरण करो।"
श्लोक 35 (3.294.35)
श्रुतं हि धर्मशास्त्रेषु पठ्यमानं द्विजातिभिः । तथा त्वमपिकल्याणि गदतो मे वचः शृणु ॥
śrutaṃ hi dharmaśāstreṣu paṭhyamānaṃ dvijātibhiḥ | tathā tvamapikalyāṇi gadato me vacaḥ śṛṇu
"क्योंकि मैंने धर्मशास्त्रों से द्विजों द्वारा पढ़ी जाती यह बात सुनी है। हे कल्याणी, तुम भी मेरी कही बात सुनो।"
श्लोक 36 (3.294.36)
अप्रदाता पिता वाच्यो वाच्यश्चानुपयन्पतिः । मृते पितरि पुत्रश्च वाच्यो मातुररक्षिता ॥
apradātā pitā vācyo vācyaścānupayanpatiḥ | mṛte pitari putraśca vācyo māturarakṣitā
"जो पिता कन्या का दान नहीं करता वह निन्दनीय है, जो पति (ऋतुकाल में) पत्नी के पास नहीं जाता वह निन्दनीय है, और पिता के मरने पर जो पुत्र माता की रक्षा नहीं करता वह भी निन्दनीय है।"
श्लोक 37 (3.294.37)
इदं मे वचनं श्रुत्वा भर्तुरन्वेषणे त्वर । देवतानां यथा याच्यो न भवेयं तथा कुरु ॥
idaṃ me vacanaṃ śrutvā bharturanveṣaṇe tvara | devatānāṃ yathā yācyo na bhaveyaṃ tathā kuru
"मेरी यह बात सुनकर पति की खोज में शीघ्रता करो। ऐसा करो जिससे मुझे देवताओं के सामने उत्तरदायी न ठहरना पड़े।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 38 (3.294.38)
एवमुक्त्वा दुहितरं तथा वृद्धांश्च मन्त्रिणः । व्यादिदेशानुयात्रं च गम्यतां चेत्यचोदयत् ॥
evamuktvā duhitaraṃ tathā vṛddhāṃśca mantriṇaḥ | vyādideśānuyātraṃ ca gamyatāṃ cetyacodayat
अपनी पुत्री और वृद्ध मंत्रियों से ऐसा कहकर राजा ने यात्रा के साधन जुटाने का आदेश दिया और कहा — "जाओ।"
श्लोक 39 (3.294.39)
साऽभिवाद्य पितुः पादौ व्रीडितेव मनस्विनी । पितुर्वचनमाज्ञाय निर्जगामाविचारितम् ॥
sā'bhivādya pituḥ pādau vrīḍiteva manasvinī | piturvacanamājñāya nirjagāmāvicāritam
उस मनस्विनी ने लजाती हुई-सी पिता के चरणों में प्रणाम किया और पिता की आज्ञा मानकर बिना हिचक चल पड़ी।
श्लोक 40 (3.294.40)
सा हैमं रथमास्थाय स्थविरैः सचिवैर्वृता । तपोवनानिरम्याणि राजर्षीणां जगाम ह ॥
sā haimaṃ rathamāsthāya sthaviraiḥ sacivairvṛtā | tapovanāniramyāṇi rājarṣīṇāṃ jagāma ha
सोने के रथ पर सवार होकर, वृद्ध सचिवों से घिरी हुई वह राजर्षियों के रमणीय तपोवनों में गई।
श्लोक 41 (3.294.41)
मान्यानां तत्र वृद्धानां कृत्वा पादाभिवादनम् । वनानि क्रमशस्तात सर्वाण्येवाभ्यगच्छत ॥
mānyānāṃ tatra vṛddhānāṃ kṛtvā pādābhivādanam | vanāni kramaśastāta sarvāṇyevābhyagacchata
वहाँ पूजनीय वृद्धों के चरणों में प्रणाम करके, हे तात, वह क्रम से सभी वनों में गई।
श्लोक 42 (3.294.42)
एवं तीर्थेषु सर्वेषु धनोत्सर्गं नृपात्मजा । कुर्वती द्विजमुख्यानां तंतं देशं जगाम ह ॥
evaṃ tīrtheṣu sarveṣu dhanotsargaṃ nṛpātmajā | kurvatī dvijamukhyānāṃ taṃtaṃ deśaṃ jagāma ha
इस प्रकार सभी तीर्थों में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को धन दान करती हुई वह राजकुमारी एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में गई।