आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 295
सावित्री द्वारा सत्यवान् का वरण
यात्रा से लौटकर सावित्री अपने पिता अश्वपति को नारद के साथ बैठे पाती है और बताती है कि उसने शाल्वराज द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान् का वरण किया है, जो अंधे होकर राज्य से वंचित हो वन में रहते हैं। नारद सत्यवान् के गुणों की प्रशंसा करते हैं, पर उसका एक दोष बताते हैं — वह एक वर्ष के भीतर मर जाएगा। अश्वपति पुत्री से दूसरा वर चुनने को कहते हैं, पर सावित्री कहती है कि वह एक बार वरण कर चुकी है और दूसरा वर नहीं चुनेगी। नारद इस सम्बन्ध का अनुमोदन करते हैं और राजा विवाह की तैयारी करवाते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.295.1)
अथ मद्राधिपो राजा नारदेन समागतः । उपविष्टः सभामध्ये कथायोगेन भारत ॥
atha madrādhipo rājā nāradena samāgataḥ | upaviṣṭaḥ sabhāmadhye kathāyogena bhārata
हे भारत, एक समय मद्रदेश के राजा नारद के साथ सभा के बीच बैठे हुए बातचीत कर रहे थे।
श्लोक 2 (3.295.2)
ततोऽभिगम्य तीर्थानि सर्वाण्येवाश्रमांस्तथा । आजगाम पितुर्वेश्म सावित्री सह मन्त्रिभिः ॥
tato'bhigamya tīrthāni sarvāṇyevāśramāṃstathā | ājagāma piturveśma sāvitrī saha mantribhiḥ
उसी समय सावित्री सब तीर्थों और आश्रमों में घूमकर मन्त्रियों के साथ अपने पिता के भवन में लौट आई।
श्लोक 3 (3.295.3)
नारदेन सहासीनं सा दृष्ट्वा पितरं शुभा । उभयोरेव शिरसा चक्रे पादाभिवादनम् ॥
nāradena sahāsīnaṃ sā dṛṣṭvā pitaraṃ śubhā | ubhayoreva śirasā cakre pādābhivādanam
पिता को नारद के साथ बैठे देखकर उस सुन्दरी ने सिर झुकाकर दोनों के चरणों में प्रणाम किया।
नारद उवाच
श्लोक 4 (3.295.4)
क्व गताऽभूत्सुतेयं ते कुतश्चैवागता नृप । किमर्थं युवतीं भद्र न चैनां संप्रयच्छसि ॥
kva gatā'bhūtsuteyaṃ te kutaścaivāgatā nṛpa | kimarthaṃ yuvatīṃ bhadra na caināṃ saṃprayacchasi
"हे राजन्, आपकी यह पुत्री कहाँ गई थी और कहाँ से आ रही है? हे भद्र, यह युवती हो गई है, फिर आप इसका विवाह क्यों नहीं कर देते?"
अश्वपतिरुवाच
श्लोक 5 (3.295.5)
कार्येण खल्वनेनैव प्रेषिताद्यैव चागता । एतस्याः शृणु देवर्षे भर्तारं योऽनया वृतः ॥
kāryeṇa khalvanenaiva preṣitādyaiva cāgatā | etasyāḥ śṛṇu devarṣe bhartāraṃ yo'nayā vṛtaḥ
"इसी काम के लिए मैंने इसे भेजा था, और यह आज ही लौटी है। हे देवर्षि, इसने जिस पति का वरण किया है, उसके विषय में सुनिए।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 6 (3.295.6)
सा ब्रूहि विस्तरेणेति पित्रा संयोदिता शुभा । तदैव तस्य वचनं प्रतिगृह्येदमब्रवीत् ॥
sā brūhi vistareṇeti pitrā saṃyoditā śubhā | tadaiva tasya vacanaṃ pratigṛhyedamabravīt
जब पिता ने कहा, "विस्तार से बताओ", तब उस सुन्दरी ने उनकी आज्ञा मानकर तुरन्त यह कहा —
सावित्र्युवाच
श्लोक 7 (3.295.7)
आसीत्साल्वेषु धर्मात्मा क्षत्रियः पृथिवीपतिः । द्युमत्सेन इति ख्यातः पश्चाच्चान्धो बभूव ह ॥
āsītsālveṣu dharmātmā kṣatriyaḥ pṛthivīpatiḥ | dyumatsena iti khyātaḥ paścāccāndho babhūva ha
"शाल्व देश में द्युमत्सेन नाम से विख्यात एक धर्मात्मा क्षत्रिय राजा थे; आगे चलकर वे अंधे हो गए।
श्लोक 8 (3.295.8)
विनष्टचक्षुषस्तस्य बालपुत्रस्य धीमतः । सामीप्येन हृतं राज्यं छिद्रेऽस्मिन्पूर्ववैरिणा ॥
vinaṣṭacakṣuṣastasya bālaputrasya dhīmataḥ | sāmīpyena hṛtaṃ rājyaṃ chidre'sminpūrvavairiṇā
जब उस बुद्धिमान राजा की आँखें जाती रहीं और उनका पुत्र अभी बालक ही था, तब पड़ोस में रहने वाले एक पुराने शत्रु ने इसी विपत्ति का अवसर पाकर उनका राज्य छीन लिया।
श्लोक 9 (3.295.9)
स बालवत्सया सार्धं भार्यया प्रस्थितो वनम् । महारण्यं गतश्चापि तपस्तेपे महाव्रतः ॥
sa bālavatsayā sārdhaṃ bhāryayā prasthito vanam | mahāraṇyaṃ gataścāpi tapastepe mahāvrataḥ
वे अपनी पत्नी और उसके छोटे बालक के साथ वन को चल पड़े, और उस महान् वन में जाकर उन महाव्रती ने तपस्या की।
श्लोक 10 (3.295.10)
तस्य पुत्रः पुरे जातः संवृद्धश्च तपोवने । सत्यवाननुरूपो मे भर्तेति मनसा वृतः ॥
tasya putraḥ pure jātaḥ saṃvṛddhaśca tapovane | satyavānanurūpo me bharteti manasā vṛtaḥ
उनका पुत्र, जो नगर में जन्मा और तपोवन में पला-बढ़ा, सत्यवान् है। वह मेरे योग्य है, और मैंने मन ही मन उसे अपना पति चुन लिया है।"
नारद उवाच
श्लोक 11 (3.295.11)
अहो वत महत्पापं सावित्र्या नृपते कृतम् । अजानन्त्या यदनया गुणवान्सत्यवान्वृतः ॥
aho vata mahatpāpaṃ sāvitryā nṛpate kṛtam | ajānantyā yadanayā guṇavānsatyavānvṛtaḥ
"हाय, हे राजन्! सावित्री ने अनजाने में बड़ा अनर्थ कर डाला कि उसने गुणवान् सत्यवान् को वर लिया।
श्लोक 12 (3.295.12)
सत्यं वदत्यस्य पिता सत्यं माता प्रभाषते । तथाऽस्य ब्राह्मणाश्चक्रुर्नामैतत्सत्यवानिति ॥
satyaṃ vadatyasya pitā satyaṃ mātā prabhāṣate | tathā'sya brāhmaṇāścakrurnāmaitatsatyavāniti
उसके पिता सत्य बोलते हैं और माता भी सत्य ही कहती हैं; इसी से ब्राह्मणों ने उसका नाम सत्यवान् रखा।
श्लोक 13 (3.295.13)
बालस्याश्वाः प्रियाश्चास्य करोत्यश्वांश्च मृन्मयान् । चित्रेऽपि विलिखत्यश्वांश्चित्राश्व इति चोच्यते ॥
bālasyāśvāḥ priyāścāsya karotyaśvāṃśca mṛnmayān | citre'pi vilikhatyaśvāṃścitrāśva iti cocyate
बचपन में उसे घोड़े बहुत प्रिय थे; वह मिट्टी के घोड़े बनाता था और चित्रों में भी घोड़े ही बनाता था, इसलिए उसे चित्राश्व भी कहा जाता है।"
राजोवाच
श्लोक 14 (3.295.14)
अपीदानीं स तेजस्वी बुद्धिमान्वा नृपात्मजः । क्षमावानपि वा शूरः सत्यवान्पितृवत्सलः ॥
apīdānīṃ sa tejasvī buddhimānvā nṛpātmajaḥ | kṣamāvānapi vā śūraḥ satyavānpitṛvatsalaḥ
"क्या पिता से प्रेम करने वाला वह राजकुमार सत्यवान् आज तेजस्वी है? क्या वह बुद्धिमान, क्षमाशील और शूरवीर है?"
नारद उवाच
श्लोक 15 (3.295.15)
विवस्वानिव तेजस्वी बृहस्पतिसमो मतौ । महेन्द्र इव वीरश्च वसुधेव क्षमान्वितः ॥
vivasvāniva tejasvī bṛhaspatisamo matau | mahendra iva vīraśca vasudheva kṣamānvitaḥ
"वह सूर्य के समान तेजस्वी, बुद्धि में बृहस्पति के समान, महेन्द्र के समान वीर और पृथ्वी के समान क्षमाशील है।"
अश्वपतिरुवाच
श्लोक 16 (3.295.16)
अपि राजात्मजो दाता ब्रह्मण्यश्चापि सत्यवान् । रूपवानप्युदारो वाऽप्यथवा प्रियदर्शनः ॥
api rājātmajo dātā brahmaṇyaścāpi satyavān | rūpavānapyudāro vā'pyathavā priyadarśanaḥ
"क्या राजकुमार सत्यवान् दानी और ब्राह्मणों का भक्त है? क्या वह रूपवान्, उदार और देखने में प्रिय है?"
नारद उवाच
श्लोक 17 (3.295.17)
सांकृते रन्तिदेवस्य स्वशक्त्या दानतः समः । ब्रह्मण्यः सत्यवादी च शिबिरौशीनरो यथा ॥
sāṃkṛte rantidevasya svaśaktyā dānataḥ samaḥ | brahmaṇyaḥ satyavādī ca śibirauśīnaro yathā
"अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देने में वह संकृति के पुत्र रन्तिदेव के समान है; ब्राह्मणों की भक्ति और सत्यवादिता में वह उशीनर-पुत्र शिबि के समान है।
श्लोक 18 (3.295.18)
ययातिरिव चोदारः सोमवत्प्रियदर्शनः । रूपेणान्यतमोऽश्विभ्यां द्युमत्सेनसुतो बली ॥
yayātiriva codāraḥ somavatpriyadarśanaḥ | rūpeṇānyatamo'śvibhyāṃ dyumatsenasuto balī
वह ययाति के समान उदार और चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन है; रूप में द्युमत्सेन का वह बलवान् पुत्र दोनों अश्विनीकुमारों में से एक के समान है।
श्लोक 19 (3.295.19)
स वदान्यः स तेजस्वी धीमांश्चैव क्षमान्वितः । स दान्तः स मृदुः शूरः स सत्यः संयतेन्द्रियः । सन्मैत्रः सोऽनसूयश्च स ह्रीमान्द्युतिमांश्च सः ॥
sa vadānyaḥ sa tejasvī dhīmāṃścaiva kṣamānvitaḥ | sa dāntaḥ sa mṛduḥ śūraḥ sa satyaḥ saṃyatendriyaḥ | sanmaitraḥ so'nasūyaśca sa hrīmāndyutimāṃśca saḥ
वह दानशील है, तेजस्वी है, बुद्धिमान और क्षमाशील है। वह संयमी, कोमल और शूरवीर है, सत्यनिष्ठ और जितेन्द्रिय है; वह सच्चा मित्र, ईर्ष्या से रहित, लज्जाशील और कान्तिमान है।
श्लोक 20 (3.295.20)
नित्यशश्चार्जवं तस्मिन्धृतिस्तत्रैव च ध्रुवा । संक्षेपतस्तपोवृद्धैः शीलवृद्धैश्च कथ्यते ॥
nityaśaścārjavaṃ tasmindhṛtistatraiva ca dhruvā | saṃkṣepatastapovṛddhaiḥ śīlavṛddhaiśca kathyate
उसमें सदा सरलता रहती है और दृढ़ धैर्य भी उसी में स्थिर है। संक्षेप में, तप और शील में बढ़े-चढ़े वृद्धजन उसके विषय में यही कहते हैं।"
अश्वपतिरुवाच
श्लोक 21 (3.295.21)
गुणैरुपेतं सर्वैस्तं भगवन्प्रब्रवीषि मे । दोषानप्यस्य मे ब्रूहि यदि सन्तीह केचन ॥
guṇairupetaṃ sarvaistaṃ bhagavanprabravīṣi me | doṣānapyasya me brūhi yadi santīha kecana
"भगवन्, आप मुझे बता रहे हैं कि वह सब गुणों से सम्पन्न है। यदि उसमें कोई दोष हों, तो वे भी मुझे बताइए।"
नारद उवाच
श्लोक 22 (3.295.22)
एक एवास्य दोषो हि गुणानाक्रम्य तिष्ठति । स च दोषः प्रयत्नेन न शक्यमतिवर्तितुम् ॥
eka evāsya doṣo hi guṇānākramya tiṣṭhati | sa ca doṣaḥ prayatnena na śakyamativartitum
"उसमें एक ही दोष है, जो उसके सब गुणों को दबाकर खड़ा है; और उस दोष को किसी भी प्रयत्न से टाला नहीं जा सकता।
श्लोक 23 (3.295.23)
एको दोषोऽस्ति नान्योऽस्य सोऽद्यप्रभृति सत्यवान् । संवत्सरेण क्षीणायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥
eko doṣo'sti nānyo'sya so'dyaprabhṛti satyavān | saṃvatsareṇa kṣīṇāyurdehanyāsaṃ kariṣyati
उसमें यही एक दोष है, दूसरा नहीं: आज से एक वर्ष पूरा होते ही सत्यवान् की आयु क्षीण हो जाएगी और वह देह त्याग देगा।"
राजोवाच
श्लोक 24 (3.295.24)
एहि सावित्रि गच्छस्व अन्यं वरय शोभने । तस्य दोषो महानेको गुणानाक्रम्य च स्थितः ॥
ehi sāvitri gacchasva anyaṃ varaya śobhane | tasya doṣo mahāneko guṇānākramya ca sthitaḥ
"आओ सावित्री, जाओ और कोई दूसरा वर चुन लो, हे शोभने। उसमें एक बड़ा दोष है, जो उसके सब गुणों पर छाया हुआ है।
श्लोक 25 (3.295.25)
यथा मे भगवानाह नारदो देवसत्कृतः । संवत्सरेण सोऽल्पायुर्देहन्यासं करिष्यति ॥
yathā me bhagavānāha nārado devasatkṛtaḥ | saṃvatsareṇa so'lpāyurdehanyāsaṃ kariṣyati
देवताओं द्वारा सम्मानित भगवान् नारद ने मुझसे कहा है कि वह अल्पायु है और एक वर्ष में देह त्याग देगा।"
सावित्र्युवाच
श्लोक 26 (3.295.26)
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते । सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सकृत्सकृत् ॥
sakṛdaṃśo nipatati sakṛtkanyā pradīyate | sakṛdāha dadānīti trīṇyetāni sakṛtsakṛt
"हिस्सा एक ही बार बँटता है, कन्या एक ही बार दी जाती है, और 'मैं देता हूँ' यह वचन भी एक ही बार कहा जाता है; ये तीनों बातें एक-एक बार ही होती हैं।
श्लोक 27 (3.295.27)
दीर्घायुरथवाऽल्पायुः सगुणो निर्गुणोऽपि वा । सकृद्वृतो मया भर्ता न द्वितीयं वृणोम्यहम् ॥
dīrghāyurathavā'lpāyuḥ saguṇo nirguṇo'pi vā | sakṛdvṛto mayā bhartā na dvitīyaṃ vṛṇomyaham
वह दीर्घायु हो या अल्पायु, गुणवान् हो या गुणहीन, मैंने एक बार पति का वरण कर लिया है; अब मैं दूसरा पति नहीं चुनूँगी।
श्लोक 28 (3.295.28)
मनसा निश्चयं कृत्वा ततो वाचाऽभिधीयते । क्रियते कर्मणा पश्चात्प्रमाणं मे मनस्ततः ॥
manasā niścayaṃ kṛtvā tato vācā'bhidhīyate | kriyate karmaṇā paścātpramāṇaṃ me manastataḥ
पहले मन में निश्चय किया जाता है, फिर वाणी से कहा जाता है, और उसके बाद कर्म से किया जाता है। इसलिए मेरे लिए मेरा मन ही प्रमाण है।"
नारद उवाच
श्लोक 29 (3.295.29)
स्थिरा बुद्धिर्नरश्रेष्ठ सावित्र्या दुहितुस्तव । नैषा वारयितुं शक्या धर्मादस्मात्कथंचन ॥
sthirā buddhirnaraśreṣṭha sāvitryā duhitustava | naiṣā vārayituṃ śakyā dharmādasmātkathaṃcana
"हे नरश्रेष्ठ, आपकी पुत्री सावित्री की बुद्धि दृढ़ है। उसे इस धर्म-मार्ग से किसी भी प्रकार हटाया नहीं जा सकता।
श्लोक 30 (3.295.30)
नान्यस्मिन्पुरुषे सन्ति ये सत्यवति वै गुणाः । प्रदानमेव तस्मान्मे रोचते दुहितुस्तव ॥
nānyasminpuruṣe santi ye satyavati vai guṇāḥ | pradānameva tasmānme rocate duhitustava
जो गुण सत्यवान् में हैं, वे किसी दूसरे पुरुष में नहीं हैं। इसलिए मुझे यही उचित लगता है कि आप अपनी पुत्री उसी को दें।"
राजोवाच
श्लोक 31 (3.295.31)
अविचाल्यमेतदुक्तं तथ्यं च भवता वचः । करिष्याम्येतदेवं च गुरुर्हि भगवान्मम ॥
avicālyametaduktaṃ tathyaṃ ca bhavatā vacaḥ | kariṣyāmyetadevaṃ ca gururhi bhagavānmama
"उसका यह वचन अटल है और आपने जो कहा, वह सत्य है। मैं ऐसा ही करूँगा, क्योंकि भगवन्, आप मेरे गुरु हैं।"
नारद उवाच
श्लोक 32 (3.295.32)
अविघ्नमस्तु सावित्र्याः प्रदाने दुहितुस्तव । साधयिष्याम्यहं तावत्सर्वेषां भद्रमस्तु वः ॥
avighnamastu sāvitryāḥ pradāne duhitustava | sādhayiṣyāmyahaṃ tāvatsarveṣāṃ bhadramastu vaḥ
"आपकी पुत्री सावित्री का कन्यादान निर्विघ्न सम्पन्न हो। अब मैं चलता हूँ। आप सबका कल्याण हो!"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 33 (3.295.33)
एवमुक्त्वा खमुत्पत्य नारदस्त्रिदिवं गतः । राजाऽपि दुहितुः सज्जं वैवाहिकमकारयत् ॥
evamuktvā khamutpatya nāradastridivaṃ gataḥ | rājā'pi duhituḥ sajjaṃ vaivāhikamakārayat
यह कहकर नारद आकाश में उड़कर स्वर्ग को चले गए, और राजा ने भी अपनी पुत्री के विवाह की सारी तैयारी करवाई।