आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 296
सावित्री और सत्यवान् का विवाह
अश्वपति अपने ब्राह्मणों के साथ पैदल चलकर अंधे राजा द्युमत्सेन के वन-आश्रम में पहुँचते हैं और उनसे सावित्री को पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं। द्युमत्सेन संकोच करते हैं कि वह वन-जीवन का कष्ट कैसे सहेगी, पर अश्वपति उनकी शंका दूर कर देते हैं और विवाह सम्पन्न होता है। सावित्री आभूषण त्यागकर वल्कल और गेरुआ वस्त्र धारण करती है और अपनी सेवा से पति तथा सास-ससुर का मन जीत लेती है, फिर भी नारद के वचन उसके मन से कभी नहीं हटते।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.296.1)
अथ कन्याप्रदाने स तमेवार्थं विचिन्तयन् । समानिन्ये च तत्सर्वं भाण्डं वैवाहिकं नृपः ॥
atha kanyāpradāne sa tamevārthaṃ vicintayan | samāninye ca tatsarvaṃ bhāṇḍaṃ vaivāhikaṃ nṛpaḥ
तब राजा ने कन्यादान के उसी विषय का चिन्तन करते हुए विवाह की सारी सामग्री एकत्र करवाई।
श्लोक 2 (3.296.2)
ततो वृद्धान्द्विजान्सर्वानृत्विक्सभ्यपुरोहितान् । समाहूय दिने पुण्ये प्रययौ सह कन्यया ॥
tato vṛddhāndvijānsarvānṛtviksabhyapurohitān | samāhūya dine puṇye prayayau saha kanyayā
फिर सब वृद्ध ब्राह्मणों, ऋत्विजों, सभासदों और पुरोहितों को बुलाकर वे शुभ दिन अपनी पुत्री के साथ चल पड़े।
श्लोक 3 (3.296.3)
मेध्यारण्यं स गत्वा च द्युमत्सेनाश्रमं नृपः । पद्भ्यामेव द्विजैः सार्धं राजर्षिं तमुपागमत् ॥
medhyāraṇyaṃ sa gatvā ca dyumatsenāśramaṃ nṛpaḥ | padbhyāmeva dvijaiḥ sārdhaṃ rājarṣiṃ tamupāgamat
पवित्र वन में द्युमत्सेन के आश्रम पहुँचकर राजा ब्राह्मणों के साथ पैदल ही उन राजर्षि के पास गए।
श्लोक 4 (3.296.4)
तत्रापश्यन्महाभागं सालवृक्षमुपाश्रितम् । कौश्यां बृस्यां समासीनं चक्षुर्हीनं नृपं तदा ॥
tatrāpaśyanmahābhāgaṃ sālavṛkṣamupāśritam | kauśyāṃ bṛsyāṃ samāsīnaṃ cakṣurhīnaṃ nṛpaṃ tadā
वहाँ उन्होंने उन महाभाग, नेत्रहीन राजा को एक साल वृक्ष के सहारे कुश की चटाई पर बैठे देखा।
श्लोक 5 (3.296.5)
स राजा तस्य राजर्षेः कृत्वा पूजां यथाऽर्हतः । वाचा सुनियतो भूत्वा चकारात्मनिवेदनम् ॥
sa rājā tasya rājarṣeḥ kṛtvā pūjāṃ yathā'rhataḥ | vācā suniyato bhūtvā cakārātmanivedanam
राजा अश्वपति ने उन राजर्षि का यथोचित सत्कार किया और संयत वाणी में अपना परिचय दिया।
श्लोक 6 (3.296.6)
तस्यार्घ्यमासनं चैव गां चावेद्य स धर्मवित् । किमागमनमित्येवं राजा राजानमब्रवीत् ॥
tasyārghyamāsanaṃ caiva gāṃ cāvedya sa dharmavit | kimāgamanamityevaṃ rājā rājānamabravīt
धर्म के ज्ञाता द्युमत्सेन ने उन्हें अर्घ्य, आसन और गौ अर्पित की, और फिर एक राजा ने दूसरे राजा से पूछा, "आपका आगमन किस प्रयोजन से हुआ है?"
श्लोक 7 (3.296.7)
तस्य सर्वमभिप्रायमितिकर्तव्यतां च ताम् । सत्यवन्तं समुद्दिश्य सर्वमेव न्यवेदयत् ॥
tasya sarvamabhiprāyamitikartavyatāṃ ca tām | satyavantaṃ samuddiśya sarvameva nyavedayat
अश्वपति ने सत्यवान् के विषय में अपना पूरा अभिप्राय और जो करना था, वह सब उन्हें बता दिया।
अश्वपतिरुवाच
श्लोक 8 (3.296.8)
सावित्री नाम राजर्षे कन्येयं मम शोभना । तां स्वधर्मेण धर्मज्ञ स्नुषार्थे त्वं गृहाण मे ॥
sāvitrī nāma rājarṣe kanyeyaṃ mama śobhanā | tāṃ svadharmeṇa dharmajña snuṣārthe tvaṃ gṛhāṇa me
"हे राजर्षि, यह मेरी सुन्दर कन्या है, जिसका नाम सावित्री है। हे धर्मज्ञ, अपने धर्म के अनुसार इसे मुझसे अपनी पुत्रवधू के रूप में ग्रहण कीजिए।"
द्युमत्सेन उवाच
श्लोक 9 (3.296.9)
च्युताः स्म राज्याद्वनवासमाश्रिता- । श्चराम धर्मं नियतास्तपस्विनः । कथं त्वनर्हा वनवासमाश्रमे । सहिष्यति क्लेशमिमं सुता तव ॥
cyutāḥ sma rājyādvanavāsamāśritā- | ścarāma dharmaṃ niyatāstapasvinaḥ | kathaṃ tvanarhā vanavāsamāśrame | sahiṣyati kleśamimaṃ sutā tava
"हम राज्य से च्युत होकर वनवास का आश्रय ले चुके हैं और नियमपूर्वक तपस्वियों की भाँति धर्म का आचरण करते हैं। आपकी पुत्री, जो इस योग्य नहीं है, आश्रम में वनवास का यह कष्ट कैसे सहेगी?"
अश्वपतिरुवाच
श्लोक 10 (3.296.10)
सुखं च दुःखं च भवाभवात्मकं । यदा विजानाति सुताऽहमेव च । न मद्विधे युज्यते वाक्यमीदृशं । विनिश्चयेनाभिगतोऽस्मि ते नृप ॥
sukhaṃ ca duḥkhaṃ ca bhavābhavātmakaṃ | yadā vijānāti sutā'hameva ca | na madvidhe yujyate vākyamīdṛśaṃ | viniścayenābhigato'smi te nṛpa
"जब मेरी पुत्री भी मेरी ही भाँति जानती है कि सुख और दुःख आते-जाते रहते हैं, तब मुझ जैसे व्यक्ति से ऐसी बात कहना उचित नहीं। हे राजन्, मैं पूरा निश्चय करके आपके पास आया हूँ।
श्लोक 11 (3.296.11)
आशां नार्हसि मे हन्तुं सौहृदात्प्रणतस्य च । अभितश्चागतं प्रेम्णा प्रत्याख्यातुं न माऽर्हसि ॥
āśāṃ nārhasi me hantuṃ sauhṛdātpraṇatasya ca | abhitaścāgataṃ premṇā pratyākhyātuṃ na mā'rhasi
आपको मेरी आशा नहीं तोड़नी चाहिए; मैं सौहार्द से आपके आगे नत हूँ और प्रेमपूर्वक आपके पास आया हूँ, मुझे लौटाइए नहीं।
श्लोक 12 (3.296.12)
अनुरूपो हि युक्तश्च त्वं ममाहं तवापि च । स्नुषां प्रतीच्छ मे कन्यां भार्यां सत्यवतस्ततः ॥
anurūpo hi yuktaśca tvaṃ mamāhaṃ tavāpi ca | snuṣāṃ pratīccha me kanyāṃ bhāryāṃ satyavatastataḥ
आप मेरे योग्य सम्बन्धी हैं और मैं आपके। मेरी कन्या को अपनी पुत्रवधू, अर्थात् सत्यवान् की पत्नी के रूप में स्वीकार कीजिए।"
द्युमत्सेन उवाच
श्लोक 13 (3.296.13)
पूर्वमेवाभिलषितः संबन्धो मे त्वया सह । भ्रष्टराज्यस्त्वहमिति तत एतद्विचारितम् ॥
pūrvamevābhilaṣitaḥ saṃbandho me tvayā saha | bhraṣṭarājyastvahamiti tata etadvicāritam
"आपसे सम्बन्ध की इच्छा तो मुझे पहले से ही थी, पर यह सोचकर कि मैं राज्य से भ्रष्ट हूँ, मैं इस पर विचार करके रुक गया था।
श्लोक 14 (3.296.14)
अभिप्रायस्त्वयं यो मे पूर्वमेवाभिकाङ्क्षितः । स निर्वर्ततु मेऽद्यैव काङ्क्षितो ह्यसि मेऽतिथिः ॥
abhiprāyastvayaṃ yo me pūrvamevābhikāṅkṣitaḥ | sa nirvartatu me'dyaiva kāṅkṣito hyasi me'tithiḥ
मेरी यह पुरानी अभिलाषा आज ही पूरी हो। आप मेरे मनचाहे अतिथि हैं।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 15 (3.296.15)
ततः सर्वान्समानाय्य द्विजानाश्रमवासिनः । यथाविधि समुद्वाहं कारयामासतुर्नृपौ ॥
tataḥ sarvānsamānāyya dvijānāśramavāsinaḥ | yathāvidhi samudvāhaṃ kārayāmāsaturnṛpau
तब दोनों राजाओं ने आश्रम में रहने वाले सब ब्राह्मणों को बुलाकर विधिपूर्वक विवाह सम्पन्न कराया।
श्लोक 16 (3.296.16)
दत्त्वा सोऽश्वपतिः कन्यां यथार्हं सपरिच्छदम् । ययौ स्वमेव भवनं युक्तः परमया मुदा ॥
dattvā so'śvapatiḥ kanyāṃ yathārhaṃ saparicchadam | yayau svameva bhavanaṃ yuktaḥ paramayā mudā
अश्वपति अपनी कन्या को यथोचित दहेज-सामग्री के साथ देकर अत्यन्त प्रसन्नता से अपने भवन लौट गए।
श्लोक 17 (3.296.17)
सत्यवानपि तां भार्यां लब्ध्वा सर्वगुणान्विताम् । मुमुदे सा च तं लब्ध्वा भर्तारं मनसेप्सितम् ॥
satyavānapi tāṃ bhāryāṃ labdhvā sarvaguṇānvitām | mumude sā ca taṃ labdhvā bhartāraṃ manasepsitam
सत्यवान् सब गुणों से युक्त पत्नी पाकर प्रसन्न हुआ, और सावित्री भी मनचाहा पति पाकर आनन्दित हुई।
श्लोक 18 (3.296.18)
गते पितरि सर्वाणि संन्यस्याभरणानि सा । जगृहे वल्कलान्येव वस्त्रं काषायमेव च ॥
gate pitari sarvāṇi saṃnyasyābharaṇāni sā | jagṛhe valkalānyeva vastraṃ kāṣāyameva ca
पिता के चले जाने पर उसने अपने सारे आभूषण उतार दिए और केवल वल्कल तथा गेरुआ वस्त्र धारण कर लिए।
श्लोक 19 (3.296.19)
परिचारैर्गुणैश्चैव प्रश्रयेण दमेन च । सर्वकामक्रियाभिश्च सर्वेषां तुष्टिमादधे ॥
paricārairguṇaiścaiva praśrayeṇa damena ca | sarvakāmakriyābhiśca sarveṣāṃ tuṣṭimādadhe
अपनी सेवा, अपने गुणों, विनय और संयम से, तथा सबकी इच्छा पूरी करके उसने सबको सन्तुष्ट कर दिया।
श्लोक 20 (3.296.20)
श्वश्रूं शरीरसत्कारैः सर्वैराच्छादनादिभिः । श्वशुरं देवसत्कारैर्वाचः संयमनेन च ॥
śvaśrūṃ śarīrasatkāraiḥ sarvairācchādanādibhiḥ | śvaśuraṃ devasatkārairvācaḥ saṃyamanena ca
सास को वह वस्त्र आदि देकर और शरीर की सेवा करके प्रसन्न रखती थी, और ससुर को देवता के समान आदर देकर तथा वाणी के संयम से।
श्लोक 21 (3.296.21)
तथैव प्रियवादेन नैपुणेन शमेन च । रहश्चैवोपचारेण भर्तारं पर्यतोषयत् ॥
tathaiva priyavādena naipuṇena śamena ca | rahaścaivopacāreṇa bhartāraṃ paryatoṣayat
इसी प्रकार मधुर वचनों, कुशलता और शान्त स्वभाव से तथा एकान्त में प्रेमपूर्ण सेवा से उसने पति को प्रसन्न रखा।
श्लोक 22 (3.296.22)
एवं तत्राश्रमे तेषां तदा निवसतां सताम् । कालस्तपस्यतां कश्चिदपाक्रामत भारत ॥
evaṃ tatrāśrame teṣāṃ tadā nivasatāṃ satām | kālastapasyatāṃ kaścidapākrāmata bhārata
हे भारत, इस प्रकार उस आश्रम में तप करते हुए उन सज्जनों के रहते कुछ समय बीत गया।
श्लोक 23 (3.296.23)
सावित्र्या ग्लायमानायास्तिष्ठन्त्यास्तु दिवानिशम् । नारदेन यदुक्तं तद्वाक्यं मनसि वर्तते ॥
sāvitryā glāyamānāyāstiṣṭhantyāstu divāniśam | nāradena yaduktaṃ tadvākyaṃ manasi vartate
फिर भी दिन-रात घुलती हुई सावित्री के मन में नारद की कही वह बात बसी रहती थी।