आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 297
सावित्री का व्रत और नियत दिन
सत्यवान् की मृत्यु का दिन निकट आने पर सावित्री तीन रातों का व्रत लेती है और दिन-रात खड़ी रहती है; उसके ससुर द्युमत्सेन दुःखी होकर भी उसे नहीं रोकते। नियत दिन की सुबह वह अपने कर्म पूरे करती है, तपस्वियों से अखण्ड सौभाग्य का आशीर्वाद पाती है और सूर्यास्त तक भोजन करने से मना कर देती है। जब सत्यवान् कुल्हाड़ी लेकर वन को चलता है, तो वह साथ जाने का आग्रह करती है और सास-ससुर से अनुमति ले लेती है; फूलों से भरे वन में पति के साथ चलती हुई वह व्याकुल हृदय से उस घड़ी की प्रतीक्षा करती है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.297.1)
ततः काले बहुतिथे व्यतिक्रान्ते कदाचन । प्राप्तः स कालो मर्तव्यं यत्र सत्यवता नृप ॥
tataḥ kāle bahutithe vyatikrānte kadācana | prāptaḥ sa kālo martavyaṃ yatra satyavatā nṛpa
फिर बहुत समय बीत जाने पर, हे राजन्, आखिर वह समय आ पहुँचा जब सत्यवान् को मरना था।
श्लोक 2 (3.297.2)
गणयन्त्याश्च सावित्र्या दिवसे दिवसे गते । यद्वाक्यं नारदेनोक्तं वर्तते हृदि नित्यशः ॥
gaṇayantyāśca sāvitryā divase divase gate | yadvākyaṃ nāradenoktaṃ vartate hṛdi nityaśaḥ
सावित्री एक-एक दिन बीतने पर दिन गिनती रहती थी, और नारद ने जो बात कही थी, वह सदा उसके हृदय में बनी रहती थी।
श्लोक 3 (3.297.3)
चतुर्थेऽहनि मर्तव्यमिति संचिन्त्य भामिनी । व्रतं त्रिरात्रमुद्दिश्य दिवारात्रं स्थिताऽभवत् ॥
caturthe'hani martavyamiti saṃcintya bhāminī | vrataṃ trirātramuddiśya divārātraṃ sthitā'bhavat
यह सोचकर कि चौथे दिन उसकी मृत्यु होनी है, उस भामिनी ने तीन रातों का व्रत लिया और दिन-रात खड़ी रही।
श्लोक 4 (3.297.4)
त्रयोदश्यां चोपवासं प्रतिपत्सु च पारणम् । आयुष्यं वर्धते भर्तुर्व्रतेनानेन भारत ॥
trayodaśyāṃ copavāsaṃ pratipatsu ca pāraṇam | āyuṣyaṃ vardhate bharturvratenānena bhārata
त्रयोदशी को उपवास और प्रतिपदा को पारण — हे भारत, इस व्रत से पति की आयु बढ़ती है।
श्लोक 5 (3.297.5)
तं श्रुत्वा नियमं तस्या भृशं दुःखान्वितो नृपः । उत्थाय वाक्यं सावित्रीमब्रवीत्परिसान्त्वयन् ॥
taṃ śrutvā niyamaṃ tasyā bhṛśaṃ duḥkhānvito nṛpaḥ | utthāya vākyaṃ sāvitrīmabravītparisāntvayan
उसके उस नियम के बारे में सुनकर राजा द्युमत्सेन बहुत दुःखी हुए; वे उठे और सावित्री को सान्त्वना देते हुए बोले।
द्युमत्सेन उवाच
श्लोक 6 (3.297.6)
अतितीव्रोऽयमारम्भस्त्वयाऽऽरब्धो नृपात्मजे । तिसृणां वसतीनां हि स्थानं परमदुश्चरम् ॥
atitīvro'yamārambhastvayā''rabdho nṛpātmaje | tisṛṇāṃ vasatīnāṃ hi sthānaṃ paramaduścaram
"हे राजकुमारी, तुमने यह अत्यन्त कठोर व्रत आरम्भ किया है। तीन रातों तक निराहार रहना बहुत ही कठिन है।"
सावित्र्युवाच
श्लोक 7 (3.297.7)
न कार्यस्तात संतापः पारयिष्याम्यहं व्रतम् । व्यवसायकृतं हीदं व्यवसायश्च कारणम् ॥
na kāryastāta saṃtāpaḥ pārayiṣyāmyahaṃ vratam | vyavasāyakṛtaṃ hīdaṃ vyavasāyaśca kāraṇam
"पिताजी, दुःख मत कीजिए; मैं यह व्रत पूरा करूँगी। यह दृढ़ निश्चय से लिया गया है, और निश्चय ही इसे पूरा कराने वाला है।"
द्युमत्सेन उवाच
श्लोक 8 (3.297.8)
व्रतं भिन्धीति वक्तुं त्वां नास्मि शक्तः कथंचन । पारयस्वेति वचनं युक्तमस्मद्विधो वदेत् ॥
vrataṃ bhindhīti vaktuṃ tvāṃ nāsmi śaktaḥ kathaṃcana | pārayasveti vacanaṃ yuktamasmadvidho vadet
"मैं तुमसे किसी भी तरह यह नहीं कह सकता कि 'व्रत तोड़ दो'। मुझ जैसे व्यक्ति के लिए यही कहना उचित है कि 'इसे पूरा करो'।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 9 (3.297.9)
एवमुक्त्वा द्युमत्सेनो विरराम महामनाः । तिष्ठन्ती चैव सावित्री काष्ठभूतेव लक्ष्यते ॥
evamuktvā dyumatseno virarāma mahāmanāḥ | tiṣṭhantī caiva sāvitrī kāṣṭhabhūteva lakṣyate
यह कहकर महामना द्युमत्सेन चुप हो गए, और खड़ी हुई सावित्री काठ की मूर्ति-सी दिखाई देने लगी।
श्लोक 10 (3.297.10)
श्वोभूते भर्तृमरणे सावित्र्या भरतर्षभ । दुःखान्वितायास्तिष्ठन्त्याः सा रात्रिर्व्यत्यवर्तत ॥
śvobhūte bhartṛmaraṇe sāvitryā bharatarṣabha | duḥkhānvitāyāstiṣṭhantyāḥ sā rātrirvyatyavartata
हे भरतश्रेष्ठ, अगले दिन पति की मृत्यु होनी थी; दुःख में डूबी खड़ी सावित्री की वह रात बीत गई।
श्लोक 11 (3.297.11)
अद्य तद्दिवसं चेति हुत्वा दीप्तं हुताशनम् । युगमात्रोदिते सूर्ये कृत्वा पौर्वाह्णिकीः क्रियाः ॥
adya taddivasaṃ ceti hutvā dīptaṃ hutāśanam | yugamātrodite sūrye kṛtvā paurvāhṇikīḥ kriyāḥ
"आज वही दिन है", यह सोचकर उसने प्रज्वलित अग्नि में आहुति दी, और सूर्य के एक जुए भर ऊपर चढ़ आने पर प्रातःकाल के कर्म पूरे किए।
श्लोक 12 (3.297.12)
व्रतं समाप्य सावित्री स्नात्वा शुद्धा यशस्विनी । ततः सर्वान्द्विजान्वृद्धाञ्श्वश्रूं श्वशुरमेव च । अभिवाद्यानुपूर्व्येण प्राञ्जलिर्नियता स्थिता ॥
vrataṃ samāpya sāvitrī snātvā śuddhā yaśasvinī | tataḥ sarvāndvijānvṛddhāñśvaśrūṃ śvaśurameva ca | abhivādyānupūrvyeṇa prāñjalirniyatā sthitā
फिर व्रत पूरा करके यशस्विनी सावित्री ने स्नान किया और शुद्ध होकर क्रम से सब वृद्ध ब्राह्मणों तथा सास-ससुर को प्रणाम किया, और हाथ जोड़कर संयमपूर्वक खड़ी हो गई।
श्लोक 13 (3.297.13)
अवैधव्याशिषस्ते तु सावित्र्यर्थं हिताः शुभाः । ऊचुस्तपस्विनः सर्वे तपोवननिवासिनः ॥
avaidhavyāśiṣaste tu sāvitryarthaṃ hitāḥ śubhāḥ | ūcustapasvinaḥ sarve tapovananivāsinaḥ
तपोवन में रहने वाले सब तपस्वियों ने सावित्री के हित के लिए उसे अखण्ड सौभाग्य के शुभ आशीर्वाद दिए।
श्लोक 14 (3.297.14)
एवमस्त्विति सावित्री ध्यानयोगपरायणा । मनसा ता गिरः सर्वाः प्रत्यगृह्णात्तपस्विनी ॥
evamastviti sāvitrī dhyānayogaparāyaṇā | manasā tā giraḥ sarvāḥ pratyagṛhṇāttapasvinī
"ऐसा ही हो" — ध्यान में लीन तपस्विनी सावित्री ने मन ही मन वे सब वचन ग्रहण कर लिए।
श्लोक 15 (3.297.15)
तं कालं तं मुहूर्तं च प्रतीक्षन्ती नृपात्मजा । यथोक्तं नारदवचश्चिन्तयन्ती सुदुःखिता ॥
taṃ kālaṃ taṃ muhūrtaṃ ca pratīkṣantī nṛpātmajā | yathoktaṃ nāradavacaścintayantī suduḥkhitā
वह राजकुमारी नारद के कहे वचनों पर अत्यन्त दुःख से विचार करती हुई उस समय और उस मुहूर्त की प्रतीक्षा करती रही।
श्लोक 16 (3.297.16)
ततस्तु श्वश्रूश्वशुरावूचतुस्तां नृपात्मजाम् । एकान्तमास्थितां वाक्यं प्रीत्या भरतसत्तम ॥
tatastu śvaśrūśvaśurāvūcatustāṃ nṛpātmajām | ekāntamāsthitāṃ vākyaṃ prītyā bharatasattama
हे भरतसत्तम, तब एकान्त में बैठी उस राजकुमारी से सास और ससुर ने प्रेम से यह कहा —
श्वश्रूश्वशुरावूचतुः
श्लोक 17 (3.297.17)
व्रतं यथोपदिष्टं तु तथा तत्पारितं त्वया । आहारकालः संप्राप्तः क्रियतां यदनन्तरम् ॥
vrataṃ yathopadiṣṭaṃ tu tathā tatpāritaṃ tvayā | āhārakālaḥ saṃprāptaḥ kriyatāṃ yadanantaram
"तुमने व्रत को जैसा बताया गया था, वैसे ही पूरा कर लिया है। भोजन का समय आ गया है; अब आगे जो करना है, वह करो।"
सावित्र्युवाच
श्लोक 18 (3.297.18)
अस्तं गते मयाऽऽदित्ये भोक्तव्यं कृतकामया । एष मे हृदि संकल्पः समयश्च कृतो मया ॥
astaṃ gate mayā''ditye bhoktavyaṃ kṛtakāmayā | eṣa me hṛdi saṃkalpaḥ samayaśca kṛto mayā
"सूर्यास्त होने पर, जब मेरी कामना पूरी हो जाएगी, तब मैं भोजन करूँगी। यही मेरे हृदय का संकल्प है और यही मैंने प्रण किया है।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 19 (3.297.19)
एवं संभाषमाणायाः सावित्र्या भोजनं प्रति । स्कन्धे परशुमादाय सत्यवान्प्रस्थितो वनम् ॥
evaṃ saṃbhāṣamāṇāyāḥ sāvitryā bhojanaṃ prati | skandhe paraśumādāya satyavānprasthito vanam
सावित्री भोजन के विषय में इस प्रकार कह ही रही थी कि सत्यवान् कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर वन को चल पड़ा।
श्लोक 20 (3.297.20)
सावित्री त्वाह भर्तारं नैकस्त्वं गन्तुमर्हसि । सह त्वया गमिष्यामि न हि त्वां हातुमुत्सहे ॥
sāvitrī tvāha bhartāraṃ naikastvaṃ gantumarhasi | saha tvayā gamiṣyāmi na hi tvāṃ hātumutsahe
पर सावित्री ने पति से कहा, "आपको अकेले नहीं जाना चाहिए। मैं आपके साथ चलूँगी; मैं आपको छोड़ नहीं सकती।"
सत्यवानुवाच
श्लोक 21 (3.297.21)
वनं न गतपूर्वं ते दुःखः पन्थाश्च भामिनि । व्रतोपवासक्षामा च कथं पद्भ्यां गमिष्यसि ॥
vanaṃ na gatapūrvaṃ te duḥkhaḥ panthāśca bhāmini | vratopavāsakṣāmā ca kathaṃ padbhyāṃ gamiṣyasi
"हे भामिनी, तुम पहले कभी वन में नहीं गई हो, और रास्ता भी कठिन है। व्रत और उपवास से दुर्बल होकर तुम पैदल कैसे चलोगी?"
सावित्र्युवाच
श्लोक 22 (3.297.22)
उपवासान्न मे ग्लानिर्नास्ति चापि परिश्रमः । गमने च कृतोत्साहां प्रतिषेद्धुं न माऽर्हसि ॥
upavāsānna me glānirnāsti cāpi pariśramaḥ | gamane ca kṛtotsāhāṃ pratiṣeddhuṃ na mā'rhasi
"उपवास से मुझे न कोई दुर्बलता है, न थकान। मैंने जाने का मन बना लिया है; आप मुझे न रोकें।"
सत्यवानुवाच
श्लोक 23 (3.297.23)
यदि ते गमनोत्साहः करिष्यामि तव प्रियम् । मम त्वामन्त्रय गुरून्न मां दोषः स्पृशेदयम् ॥
yadi te gamanotsāhaḥ kariṣyāmi tava priyam | mama tvāmantraya gurūnna māṃ doṣaḥ spṛśedayam
"यदि तुम्हें जाने का इतना उत्साह है, तो मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा। पर मेरे गुरुजनों से अनुमति ले लो, ताकि मुझ पर कोई दोष न आए।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 24 (3.297.24)
साऽभिवाद्याब्रवीच्छ्वश्रूं श्वशुरं च महाव्रता । अयं गच्छति मे भर्ता फलाहारो महावनम् ॥
sā'bhivādyābravīcchvaśrūṃ śvaśuraṃ ca mahāvratā | ayaṃ gacchati me bhartā phalāhāro mahāvanam
उस महाव्रता ने सास और ससुर को प्रणाम करके कहा, "मेरे पति फल लाने के लिए महावन जा रहे हैं।
सावित्र्युवाच
श्लोक 25 (3.297.25)
इच्छेयमभ्यनुज्ञाता आर्यया श्वशुरेण ह । अनेन सह निर्गन्तुं न मेऽद्य विरहः क्षमः ॥
iccheyamabhyanujñātā āryayā śvaśureṇa ha | anena saha nirgantuṃ na me'dya virahaḥ kṣamaḥ
मेरी इच्छा है कि आदरणीया सास और ससुरजी की अनुमति लेकर मैं उनके साथ जाऊँ। आज मैं उनका वियोग सह नहीं सकती।
श्लोक 26 (3.297.26)
गुर्वग्निहोत्रार्थकृते प्रस्थितश्च सुतस्तव । न निवार्यो निवार्यः स्यादन्यथा प्रस्थितो वनम् ॥
gurvagnihotrārthakṛte prasthitaśca sutastava | na nivāryo nivāryaḥ syādanyathā prasthito vanam
आपका पुत्र गुरुजनों और अग्निहोत्र के लिए वन जा रहा है, इसलिए उसे रोकना ठीक नहीं; किसी और काम से जाता, तो रोका भी जा सकता था।
श्लोक 27 (3.297.27)
संवत्सरः किंचिदूनो न निष्क्रान्ताऽहमाश्रमात् । वनं कुसुमितं द्रष्टुं परं कौतूहलं हि मे ॥
saṃvatsaraḥ kiṃcidūno na niṣkrāntā'hamāśramāt | vanaṃ kusumitaṃ draṣṭuṃ paraṃ kautūhalaṃ hi me
लगभग एक वर्ष से मैं आश्रम से बाहर नहीं निकली हूँ, और फूलों से भरा वन देखने की मुझे बड़ी उत्सुकता है।"
द्युमत्सेन उवाच
श्लोक 28 (3.297.28)
यदा प्रभृति सावित्री पित्रा दत्ता स्नुषा मम । नानयाऽभ्यर्थनायुक्तमुक्तपूर्वं स्मराम्यहम् ॥
yadā prabhṛti sāvitrī pitrā dattā snuṣā mama | nānayā'bhyarthanāyuktamuktapūrvaṃ smarāmyaham
"जब से सावित्री के पिता ने उसे मेरी पुत्रवधू बनाकर दिया है, तब से मुझे याद नहीं कि उसने कभी कुछ माँगा हो।
श्लोक 29 (3.297.29)
तदेषा लभतां कामं यथाभिलषितं वधूः । अप्रमादश्च कर्तव्यः पुत्रि सत्यवतः पथि ॥
tadeṣā labhatāṃ kāmaṃ yathābhilaṣitaṃ vadhūḥ | apramādaśca kartavyaḥ putri satyavataḥ pathi
इसलिए हमारी बहू की जैसी इच्छा है, वैसा ही हो। पर बेटी, रास्ते में सत्यवान् का ध्यान रखना।"
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 30 (3.297.30)
उभाभ्यामभ्यनुज्ञाता सा जगाम यशस्विनी । सह भर्त्रा हसन्तीव हृदयेन विदूयता ॥
ubhābhyāmabhyanujñātā sā jagāma yaśasvinī | saha bhartrā hasantīva hṛdayena vidūyatā
दोनों की अनुमति पाकर वह यशस्विनी पति के साथ चल पड़ी; ऊपर से वह मुस्कराती-सी थी, पर उसका हृदय पीड़ा से जल रहा था।
श्लोक 31 (3.297.31)
सा वनानि विचित्राणि रमणीयानि सर्वशः । मयूरगणजुष्टानि ददर्श विपुलेक्षणा ॥
sā vanāni vicitrāṇi ramaṇīyāni sarvaśaḥ | mayūragaṇajuṣṭāni dadarśa vipulekṣaṇā
उस विशाल नेत्रों वाली ने चारों ओर मोरों के झुंडों से भरे तरह-तरह के रमणीय वन देखे।
श्लोक 32 (3.297.32)
नदीः पुण्यवहाश्चैव पुष्पितांश्च नगोत्तमान् । सत्यवानाह पश्येति सावित्रीं मधुरं वचः ॥
nadīḥ puṇyavahāścaiva puṣpitāṃśca nagottamān | satyavānāha paśyeti sāvitrīṃ madhuraṃ vacaḥ
पवित्र जल वाली नदियों और फूलों से लदे सुन्दर वृक्षों को दिखाते हुए सत्यवान् ने सावित्री से मीठे स्वर में कहा, "देखो!"
श्लोक 33 (3.297.33)
निरीक्षमाणा भर्तारं सर्वावस्थमनिन्दिता । मृतमेव हि तं मेने काले मुनिवचः स्मरन् ॥
nirīkṣamāṇā bhartāraṃ sarvāvasthamaninditā | mṛtameva hi taṃ mene kāle munivacaḥ smaran
वह अनिन्दिता पति की हर अवस्था को ध्यान से देखती रही, और समय के विषय में मुनि के वचन को याद करके उसे मरा हुआ-सा ही मानती रही।
श्लोक 34 (3.297.34)
अनुव्रजन्ती भर्तारं जगाम मृदुगामिनी । द्विधेव हृदयं कृत्वा तं च कालमवेक्षती ॥
anuvrajantī bhartāraṃ jagāma mṛdugāminī | dvidheva hṛdayaṃ kṛtvā taṃ ca kālamavekṣatī
पति के पीछे-पीछे वह धीमे कदमों से चलती रही; उसका हृदय मानो दो टुकड़ों में बँट गया था, और वह उस घड़ी की राह देख रही थी।