आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 298
सावित्री द्वारा यम से सत्यवान् को लौटा लाना
वन में लकड़ी चीरते समय सत्यवान् को पीड़ा होती है और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट जाता है। स्वयं यम आकर सत्यवान् के शरीर से अँगूठे भर का पुरुष खींच लेते हैं और दक्षिण की ओर चल पड़ते हैं; सावित्री उनके पीछे जाती है। धर्म और सज्जनों पर उसके वचनों से प्रसन्न होकर यम एक के बाद एक वर देते हैं — ससुर को नेत्र और राज्य, पिता को सौ पुत्र, स्वयं उसे सौ पुत्र, और अन्त में सत्यवान् का जीवन। सत्यवान् मानो नींद से जागता है, अपने चिन्तित अन्धे पिता और माता के लिए शोक करता है, और दोनों रात में ही आश्रम की ओर चल पड़ते हैं।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 1 (3.298.1)
अथ भार्यासहायः स फलान्यादाय वीर्यवान् । कठिनं पूरयामास ततः काष्ठान्यपाटयत् ॥
atha bhāryāsahāyaḥ sa phalānyādāya vīryavān | kaṭhinaṃ pūrayāmāsa tataḥ kāṣṭhānyapāṭayat
तब पराक्रमी सत्यवान् ने पत्नी के साथ फल चुनकर अपनी टोकरी भर ली, और फिर वह लकड़ियाँ चीरने लगा।
श्लोक 2 (3.298.2)
तस्य पाटयतः काष्ठं स्वेदो वै समजायत । व्यायामेन च तेनास्य जज्ञे शिरसि वेदना ॥
tasya pāṭayataḥ kāṣṭhaṃ svedo vai samajāyata | vyāyāmena ca tenāsya jajñe śirasi vedanā
लकड़ी चीरते-चीरते उसे पसीना आ गया, और उस परिश्रम से उसके सिर में पीड़ा उठी।
श्लोक 3 (3.298.3)
सोऽभिगम्य प्रियां भार्यामुवाच श्रमपीडितः । व्यायामेन ममानेन जाता शिरसि वेदना ॥
so'bhigamya priyāṃ bhāryāmuvāca śramapīḍitaḥ | vyāyāmena mamānena jātā śirasi vedanā
थकान से पीड़ित होकर वह अपनी प्रिय पत्नी के पास गया और बोला — "इस परिश्रम से मेरे सिर में पीड़ा होने लगी है।"
सत्यवानुवाच
श्लोक 4 (3.298.4)
अङ्गानि चैव सावित्रि हृदयं दूयतीव च । अस्वस्थमिव चात्मानं लक्षये मितभाषिणि ॥
aṅgāni caiva sāvitri hṛdayaṃ dūyatīva ca | asvasthamiva cātmānaṃ lakṣaye mitabhāṣiṇi
सावित्री, मेरे अंग भी दुख रहे हैं और हृदय मानो जल रहा है; हे मितभाषिणी, मुझे लगता है कि मैं स्वस्थ नहीं हूँ।
श्लोक 5 (3.298.5)
शूलैरिव शिरो विद्धमिदं संलक्षयाम्यहम् । भ्रमन्तीव दिशः सर्वाश्चक्रारूढं मनो मम । तत्स्वप्तुमिच्छे कल्याणि न स्थातुं शक्तिरस्ति मे ॥
śūlairiva śiro viddhamidaṃ saṃlakṣayāmyaham | bhramantīva diśaḥ sarvāścakrārūḍhaṃ mano mama | tatsvaptumicche kalyāṇi na sthātuṃ śaktirasti me
मुझे लगता है जैसे मेरा सिर शूलों से बींधा जा रहा हो। सारी दिशाएँ घूमती-सी लगती हैं और मेरा मन मानो चक्र पर चढ़ा हुआ है। इसलिए, कल्याणी, मैं सोना चाहता हूँ; मुझमें खड़े रहने की शक्ति नहीं है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 6 (3.298.6)
सा समासाद्य सावित्री भर्तारमुपगम्य च । उत्सङ्गेऽस्य शिरः कृत्वा निषसाद महीतले ॥
sā samāsādya sāvitrī bhartāramupagamya ca | utsaṅge'sya śiraḥ kṛtvā niṣasāda mahītale
सावित्री अपने पति के पास आई, उसके निकट जाकर उसका सिर अपनी गोद में रखा और भूमि पर बैठ गई।
श्लोक 7 (3.298.7)
ततः सा नारदवचो विमृशन्ती तपस्विनी । तं मुहूर्तं क्षणं वेलां दिवसं च युयोज ह ॥
tataḥ sā nāradavaco vimṛśantī tapasvinī | taṃ muhūrtaṃ kṣaṇaṃ velāṃ divasaṃ ca yuyoja ha
तब वह तपस्विनी नारद के वचनों पर विचार करती हुई उस मुहूर्त, क्षण, घड़ी और दिन का हिसाब मिलाने लगी।
श्लोक 8 (3.298.8)
हन्त प्राप्तः स कालोऽयमिति चिन्तापरा सती । मुहूर्तादेव चापश्यत्पुरुषं रक्तवाससम् । बद्धमौलिं वपुष्मन्तमादित्यसमतेजसम् ॥
hanta prāptaḥ sa kālo'yamiti cintāparā satī | muhūrtādeva cāpaśyatpuruṣaṃ raktavāsasam | baddhamauliṃ vapuṣmantamādityasamatejasam
"हाय, वह समय आ पहुँचा" — इसी चिन्ता में डूबी वह सती थी कि एक मुहूर्त में ही उसने लाल वस्त्र पहने, सिर पर मुकुट बाँधे, सुन्दर देह वाले और सूर्य के समान तेजस्वी एक पुरुष को देखा —
श्लोक 9 (3.298.9)
श्यामावदातं रक्ताक्षं पाशहस्तं भयावहम् । स्थितं सत्यवतः पार्श्वे निरीक्षन्तं तमेव च ॥
śyāmāvadātaṃ raktākṣaṃ pāśahastaṃ bhayāvaham | sthitaṃ satyavataḥ pārśve nirīkṣantaṃ tameva ca
श्याम किन्तु उज्ज्वल वर्ण वाला, लाल आँखों वाला, हाथ में पाश लिए, भयानक, जो सत्यवान् के पास खड़ा होकर उसी को निहार रहा था।
श्लोक 10 (3.298.10)
तं दृष्ट्वासहसोत्थाय भर्तुर्न्यस्य शनैः शिरः । कृताञ्जलिरुवाचार्ता हृदयेन प्रवेपती ॥
taṃ dṛṣṭvāsahasotthāya bharturnyasya śanaiḥ śiraḥ | kṛtāñjaliruvācārtā hṛdayena pravepatī
उसे देखकर उसने धीरे से पति का सिर नीचे रखा और सहसा उठ खड़ी हुई; फिर हाथ जोड़कर, व्यथित और काँपते हृदय से वह बोली —
सावित्र्युवाच
श्लोक 11 (3.298.11)
दैवतंत्वाभिजानामि वपुरेतद्ध्यमानुषम् । कामया ब्रूहि देवेश कस्त्वं किंच चिकीर्षसि ॥
daivataṃtvābhijānāmi vapuretaddhyamānuṣam | kāmayā brūhi deveśa kastvaṃ kiṃca cikīrṣasi
मैं जानती हूँ कि आप कोई देवता हैं, क्योंकि आपका यह शरीर मनुष्य का नहीं है। हे देवेश, कृपा करके बताइए — आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं?
यम उवाच
श्लोक 12 (3.298.12)
पतिव्रताऽसि सावित्रि तथैव च तपोन्विता । अतस्त्वामभिभाषामि विद्धि मां त्वं शुभे यमम् ॥
pativratā'si sāvitri tathaiva ca taponvitā | atastvāmabhibhāṣāmi viddhi māṃ tvaṃ śubhe yamam
सावित्री, तुम पतिव्रता हो और तपस्या से भी सम्पन्न हो; इसीलिए मैं तुमसे बात कर रहा हूँ। शुभे, मुझे यम जानो।
श्लोक 13 (3.298.13)
अयं ते सत्यवान्भर्ता क्षीणायुः पार्थिवात्मजः । नेष्यामि तमहं बद्ध्वा विद्ध्येतन्मे चिकीर्षितं ॥
ayaṃ te satyavānbhartā kṣīṇāyuḥ pārthivātmajaḥ | neṣyāmi tamahaṃ baddhvā viddhyetanme cikīrṣitaṃ
यह तुम्हारा पति, राजकुमार सत्यवान्, क्षीण आयु वाला है। मैं इसे बाँधकर ले जाऊँगा; जान लो, यही मेरा अभिप्राय है।
सावित्र्युवाच
श्लोक 14 (3.298.14)
श्रूयते भगवन्दूतास्तवागच्छन्ति मानवान् । नेतुं किल भवान्कस्मादागतोसि स्वयं प्रभो ॥
śrūyate bhagavandūtāstavāgacchanti mānavān | netuṃ kila bhavānkasmādāgatosi svayaṃ prabho
भगवन्, सुना जाता है कि मनुष्यों को ले जाने के लिए आपके दूत आते हैं। फिर, प्रभो, आप स्वयं क्यों आए हैं?
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 15 (3.298.15)
इत्युक्तः पितृराजस्तां भगवान्स्वचिकीर्षितम् । यथावत्सर्वमाख्यातुं तत्प्रियार्थं प्रचक्रमे ॥
ityuktaḥ pitṛrājastāṃ bhagavānsvacikīrṣitam | yathāvatsarvamākhyātuṃ tatpriyārthaṃ pracakrame
ऐसा कहे जाने पर पितरों के राजा भगवान् यम ने उसे प्रसन्न करने के लिए अपना पूरा अभिप्राय यथावत् बताना आरम्भ किया —
यम उवाच
श्लोक 16 (3.298.16)
अयं च धर्मसंयुक्तो रूपवान्गुणसागरः । नार्हो मत्पुरुषैर्नेतुमतोस्मि स्वयमागतः ॥
ayaṃ ca dharmasaṃyukto rūpavānguṇasāgaraḥ | nārho matpuruṣairnetumatosmi svayamāgataḥ
यह धर्मपरायण है, रूपवान् है और गुणों का सागर है; मेरे दूत इसे ले जाएँ, यह उचित नहीं। इसीलिए मैं स्वयं आया हूँ।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 17 (3.298.17)
ततः सत्यवतः कायात्पाशबद्धं वशंगतम् । अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात् ॥
tataḥ satyavataḥ kāyātpāśabaddhaṃ vaśaṃgatam | aṅguṣṭhamātraṃ puruṣaṃ niścakarṣa yamo balāt
तब यम ने सत्यवान् के शरीर से पाश में बँधे, विवश, अँगूठे भर के पुरुष को बलपूर्वक खींच निकाला।
श्लोक 18 (3.298.18)
ततः समुद्धृतप्राणं गतश्वासं हतप्रभम् । निर्विचेष्टंशरीरं तद्बभूवाप्रियदर्शनम् ॥
tataḥ samuddhṛtaprāṇaṃ gataśvāsaṃ hataprabham | nirviceṣṭaṃśarīraṃ tadbabhūvāpriyadarśanam
प्राण निकल जाने, श्वास रुक जाने और कान्ति नष्ट हो जाने पर वह शरीर निश्चेष्ट और देखने में अप्रिय हो गया।
श्लोक 19 (3.298.19)
यमस्तु तं ततो बद्ध्वा प्रयातो दक्षिणामुखः । सावित्री चैव दुःखार्ता यममेवान्वगच्छत ॥
yamastu taṃ tato baddhvā prayāto dakṣiṇāmukhaḥ | sāvitrī caiva duḥkhārtā yamamevānvagacchata
उसे बाँधकर यम दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े, और दुःख से व्याकुल सावित्री भी यम के पीछे-पीछे चली।
श्लोक 20 (3.298.20)
भर्तुः शरीररक्षां च विधाय हि तपस्विनी । भर्तारमनुगच्छन्ती तथावस्थं सुमध्यमा । नियमव्रतसंसिद्धा महाभागा पतिव्रता ॥
bhartuḥ śarīrarakṣāṃ ca vidhāya hi tapasvinī | bhartāramanugacchantī tathāvasthaṃ sumadhyamā | niyamavratasaṃsiddhā mahābhāgā pativratā
पति के शरीर की रक्षा का प्रबन्ध करके वह पतली कमर वाली तपस्विनी, नियम और व्रत से सिद्ध, महाभाग्यशालिनी पतिव्रता, उस दशा में पड़े अपने पति के पीछे चली।
यम उवाच
श्लोक 21 (3.298.21)
निवर्त गच्छ सावित्रि कुरुष्वास्यौर्ध्वदैहिकम् । कृतंभर्तुस्त्वयाऽऽनृण्यं यावद्गम्यं गतं त्वया ॥
nivarta gaccha sāvitri kuruṣvāsyaurdhvadaihikam | kṛtaṃbhartustvayā''nṛṇyaṃ yāvadgamyaṃ gataṃ tvayā
लौट जाओ, सावित्री, जाकर इसका अन्त्येष्टि-कर्म करो। तुमने पति का ऋण चुका दिया; जहाँ तक आया जा सकता है, वहाँ तक तुम आ चुकी हो।
सावित्र्युवाच
श्लोक 22 (3.298.22)
यत्र मे नीयते भर्ता स्वयं वा यत्र गच्छति । मया च तत्र गन्तव्यमेष धर्मः सनातनः ॥
yatra me nīyate bhartā svayaṃ vā yatra gacchati | mayā ca tatra gantavyameṣa dharmaḥ sanātanaḥ
जहाँ मेरे पति ले जाए जाते हैं, या जहाँ वे स्वयं जाते हैं, वहाँ मुझे भी जाना ही चाहिए; यही सनातन धर्म है।
श्लोक 23 (3.298.23)
तपसा गुरुभक्त्या च भर्तुः स्नेहाद्व्रतेन च । तव चैव प्रसादेन न मे प्रतिहता गतिः ॥
tapasā gurubhaktyā ca bhartuḥ snehādvratena ca | tava caiva prasādena na me pratihatā gatiḥ
मेरी तपस्या, गुरुजनों के प्रति भक्ति, पति के प्रति स्नेह और व्रत के बल से, तथा आपकी कृपा से भी, मेरी गति रुक नहीं सकती।
श्लोक 24 (3.298.24)
प्राहुः साप्तपदं मैत्रं बुधास्तत्त्वार्थदर्शिनः । मित्रतां च पुरस्कृत्य किंचिद्वक्ष्यामि तच्छृणु ॥
prāhuḥ sāptapadaṃ maitraṃ budhāstattvārthadarśinaḥ | mitratāṃ ca puraskṛtya kiṃcidvakṣyāmi tacchṛṇu
तत्त्व को देखने वाले ज्ञानी कहते हैं कि सात पग साथ चलने से मित्रता हो जाती है। उसी मित्रता को आगे रखकर मैं कुछ कहूँगी; उसे सुनिए।
श्लोक 25 (3.298.25)
नानात्मवन्तस्तु वने चरन्ति । धर्मं च वासं च परिश्रमं च । विज्ञानतो धर्ममुदाहरन्ति । तस्मात्सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥
nānātmavantastu vane caranti | dharmaṃ ca vāsaṃ ca pariśramaṃ ca | vijñānato dharmamudāharanti | tasmātsanto dharmamāhuḥ pradhānam
जिन्होंने अपने आप को वश में नहीं किया, वे वन में रहकर यज्ञ आदि धर्म, गुरुकुल-वास और संन्यास का आचरण नहीं करते। धर्म का उपदेश ज्ञान के लिए ही किया जाता है; इसलिए सज्जन धर्म को ही प्रधान कहते हैं।
श्लोक 26 (3.298.26)
एकस्य धर्मेण सतां मतेन । सर्वेस्म तं मार्गमनुप्रपन्नाः । मा वै द्वितीयं मा तृतीयं च वाञ्छे । तस्मात्सन्तो धर्ममाहुः प्रधानम् ॥
ekasya dharmeṇa satāṃ matena | sarvesma taṃ mārgamanuprapannāḥ | mā vai dvitīyaṃ mā tṛtīyaṃ ca vāñche | tasmātsanto dharmamāhuḥ pradhānam
सज्जनों द्वारा मान्य एक ही आश्रम के धर्म से सब लोग उस मार्ग तक पहुँचे हैं। मैं न दूसरा चाहती हूँ, न तीसरा; इसलिए सज्जन धर्म को ही प्रधान कहते हैं।
यम उवाच
श्लोक 27 (3.298.27)
निवर्त तुष्टोस्मि तवानया गिरा । स्वराक्षरव्यञ्जनहेतुयुक्तया । वरं वृणीष्वेहविनाऽस्य जीवितं । ददानि ते सर्वमनिन्दिते वरम् ॥
nivarta tuṣṭosmi tavānayā girā | svarākṣaravyañjanahetuyuktayā | varaṃ vṛṇīṣvehavinā'sya jīvitaṃ | dadāni te sarvamanindite varam
लौट जाओ। स्वर, अक्षर, व्यंजन और युक्ति से युक्त तुम्हारी इस वाणी से मैं प्रसन्न हूँ। इसके जीवन को छोड़कर कोई भी वर माँग लो; हे अनिन्दिते, मैं तुम्हें कोई भी वर दूँगा।
सावित्र्युवाच
श्लोक 28 (3.298.28)
च्युतः स्वराज्याद्वनवासमाश्रितो । विनष्टचक्षुः श्वशुरो ममाश्रमे । स लब्धचक्षुर्बलवान्भवेन्नृप- । स्तव प्रसादाज्ज्वलनार्कसंनिभः ॥
cyutaḥ svarājyādvanavāsamāśrito | vinaṣṭacakṣuḥ śvaśuro mamāśrame | sa labdhacakṣurbalavānbhavennṛpa- | stava prasādājjvalanārkasaṃnibhaḥ
मेरे ससुर अपने राज्य से च्युत होकर वनवास कर रहे हैं और आश्रम में नेत्रहीन होकर रहते हैं। आपकी कृपा से वे राजा फिर से नेत्र पाएँ, बलवान् हों और अग्नि तथा सूर्य के समान तेजस्वी हों।
यम उवाच
श्लोक 29 (3.298.29)
ददानि तेऽहं तमनिन्दिते वरं । यथा त्वयोक्तं भविता च तत्तथा । तवाध्वना ग्लानिमिवोपलक्षये । निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ॥
dadāni te'haṃ tamanindite varaṃ | yathā tvayoktaṃ bhavitā ca tattathā | tavādhvanā glānimivopalakṣaye | nivarta gacchasva na te śramo bhavet
हे अनिन्दिते, मैं तुम्हें वह वर देता हूँ; जैसा तुमने कहा है, वैसा ही होगा। मुझे लगता है कि मार्ग चलते-चलते तुम थक-सी गई हो। लौट जाओ, जिससे तुम्हें श्रम न हो।
सावित्र्युवाच
श्लोक 30 (3.298.30)
श्रमः कुतो भर्तृसमीपतो हिमे । यतो हि भर्ता मम सा गतिर्ध्रुवा । यतः पतिं नेष्यसि तत्र मे गतिः । सुरेश भूयश्च वचो निबोध मे ॥
śramaḥ kuto bhartṛsamīpato hime | yato hi bhartā mama sā gatirdhruvā | yataḥ patiṃ neṣyasi tatra me gatiḥ | sureśa bhūyaśca vaco nibodha me
पति के समीप रहते मुझे थकान कैसी? क्योंकि जहाँ मेरे पति हैं, वहीं मेरी निश्चित गति है। आप जहाँ मेरे पति को ले जाएँगे, वहीं मेरी गति है। हे सुरेश, मेरी कुछ और बात सुनिए।
श्लोक 31 (3.298.31)
सतां सकृत्संगतमीप्सितं परं । ततः परं मित्रमिति प्रचक्षते । न चाफलं सत्पुरुषेण संगतं । ततः सतां संनिवसेत्समागमे ॥
satāṃ sakṛtsaṃgatamīpsitaṃ paraṃ | tataḥ paraṃ mitramiti pracakṣate | na cāphalaṃ satpuruṣeṇa saṃgataṃ | tataḥ satāṃ saṃnivasetsamāgame
सज्जनों का एक बार का संग भी परम वांछनीय है, और उनकी मित्रता को उससे भी बढ़कर कहा गया है। सत्पुरुष का संग कभी निष्फल नहीं होता; इसलिए सज्जनों की संगति में ही रहना चाहिए।
यम उवाच
श्लोक 32 (3.298.32)
मनोनुकूलं बुधबुद्धिवर्धनं । त्वया यदुक्तं वचनं हिताश्रयम् । विना पुनः सत्यवतोस्य जीवितं । वरं द्वितीयं वरयस्व भामिनि ॥
manonukūlaṃ budhabuddhivardhanaṃ | tvayā yaduktaṃ vacanaṃ hitāśrayam | vinā punaḥ satyavatosya jīvitaṃ | varaṃ dvitīyaṃ varayasva bhāmini
तुमने जो वचन कहे हैं वे मन को भाने वाले, हितकारी और ज्ञानियों की बुद्धि को भी बढ़ाने वाले हैं। हे भामिनी, सत्यवान् के जीवन को छोड़कर दूसरा वर माँग लो।
सावित्र्युवाच
श्लोक 33 (3.298.33)
हृतंपुरा मे श्वशुरस्य धीमतः । स्वमेव राज्यंलभतां स पार्थिवः । जह्यात्स्वधर्मान्न च मे गुरुर्यथा । द्वितीयमेतद्वरयामि ते वरम् ॥
hṛtaṃpurā me śvaśurasya dhīmataḥ | svameva rājyaṃlabhatāṃ sa pārthivaḥ | jahyātsvadharmānna ca me gururyathā | dvitīyametadvarayāmi te varam
मेरे बुद्धिमान् ससुर का अपना राज्य पहले छीन लिया गया था; वे राजा उसे फिर प्राप्त करें। और मेरे गुरुजन (ससुर) कभी अपने धर्म का त्याग न करें — यही दूसरा वर मैं आपसे माँगती हूँ।
यम उवाच
श्लोक 34 (3.298.34)
स्वमेव राज्यं प्रतिपत्स्यतेऽचिरा- । न्न च स्वधर्मात्परिहीयते नृपः । कृतेन कामेन मया नृपात्मजे । निवर्त गच्छस्व न ते श्रमो भवेत् ॥
svameva rājyaṃ pratipatsyate'cirā- | nna ca svadharmātparihīyate nṛpaḥ | kṛtena kāmena mayā nṛpātmaje | nivarta gacchasva na te śramo bhavet
राजा शीघ्र ही अपना राज्य फिर पा लेंगे और अपने धर्म से भी च्युत नहीं होंगे। हे राजकुमारी, मैंने तुम्हारी कामना पूरी कर दी। लौट जाओ, जिससे तुम्हें श्रम न हो।
सावित्र्युवाच
श्लोक 35 (3.298.35)
प्रजास्त्वयैता नियमेन संयता । नियम्य चैता नयसे न कामया । ततो यमत्वं तव देव विश्रुतं । निबोध चेमां गिरमीरितां मया ॥
prajāstvayaitā niyamena saṃyatā | niyamya caitā nayase na kāmayā | tato yamatvaṃ tava deva viśrutaṃ | nibodha cemāṃ giramīritāṃ mayā
आप इन प्रजाओं को नियम से संयम में रखते हैं, और उन्हें नियन्त्रित करके ले जाते हैं, अपनी इच्छा से नहीं। इसीलिए, हे देव, आप "यम" नाम से विख्यात हैं। मेरी कही हुई यह बात भी सुनिए।
श्लोक 36 (3.298.36)
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा । अनुग्रहश्च दानं च सतां धर्मः सनातनः ॥
adrohaḥ sarvabhūteṣu karmaṇā manasā girā | anugrahaśca dānaṃ ca satāṃ dharmaḥ sanātanaḥ
कर्म, मन और वाणी से किसी भी प्राणी से द्रोह न करना, अनुग्रह करना और दान देना — यही सज्जनों का सनातन धर्म है।
श्लोक 37 (3.298.37)
एवंप्रायश्च लोकोऽयं मनुष्याः शक्तिपेशलाः । सन्तस्त्वेवाप्यमित्रेषु दयां प्राप्तेषु कुर्वते ॥
evaṃprāyaśca loko'yaṃ manuṣyāḥ śaktipeśalāḥ | santastvevāpyamitreṣu dayāṃ prāpteṣu kurvate
यह संसार प्रायः ऐसा ही है; मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार ही कोमल होते हैं। किन्तु सज्जन तो अपने पास आए शत्रुओं पर भी दया करते हैं।
यम उवाच
श्लोक 38 (3.298.38)
पिपासितस्येव भवेद्यथा पय- । स्तथा त्वया वाक्यमिदं समीरितम् । विना पुनः सत्यवतोऽस्य जीवितं । वरं वृणीष्वेह शुभे यदिच्छसि ॥
pipāsitasyeva bhavedyathā paya- | stathā tvayā vākyamidaṃ samīritam | vinā punaḥ satyavato'sya jīvitaṃ | varaṃ vṛṇīṣveha śubhe yadicchasi
जैसे प्यासे के लिए जल होता है, वैसे ही तुम्हारे ये वचन हैं। हे शुभे, इस सत्यवान् के जीवन को छोड़कर जो चाहो वह वर माँग लो।
सावित्र्युवाच
श्लोक 39 (3.298.39)
ममानपत्यः पृथिवीपतिः पिता । भवेत्पितुः पुत्रशतं तथौरसम् । कुलस्य संतानकरं च यद्भवे- । त्तृतीयमेतद्वरयामि ते वरम् ॥
mamānapatyaḥ pṛthivīpatiḥ pitā | bhavetpituḥ putraśataṃ tathaurasam | kulasya saṃtānakaraṃ ca yadbhave- | ttṛtīyametadvarayāmi te varam
मेरे पिता, पृथ्वीपति, पुत्रहीन हैं। मेरे पिता के अपने औरस सौ पुत्र हों, जो उनके कुल को आगे बढ़ाएँ — यही तीसरा वर मैं आपसे माँगती हूँ।
यम उवाच
श्लोक 40 (3.298.40)
कुलस्य संतानकरं सुवर्चसं । शतं सुतानां पितुरस्तु ते शुभे । कृतेन कामेन नराधिपात्मजे । निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥
kulasya saṃtānakaraṃ suvarcasaṃ | śataṃ sutānāṃ piturastu te śubhe | kṛtena kāmena narādhipātmaje | nivarta dūraṃ hi pathastvamāgatā
हे शुभे, तुम्हारे पिता के सौ तेजस्वी पुत्र होंगे, जो उनके कुल की परम्परा चलाएँगे। हे राजपुत्री, मैंने तुम्हारी कामना पूरी कर दी। अब लौट जाओ; तुम मार्ग में बहुत दूर आ गई हो।
सावित्र्युवाच
श्लोक 41 (3.298.41)
न दूरमेतन्मम भर्तृसन्निधौ । मनो हि मे दूरतरं प्रधावति । अथ व्रजन्नेव गिरं समुद्यतां । मयोच्यमानां शृणु भूय एव च ॥
na dūrametanmama bhartṛsannidhau | mano hi me dūrataraṃ pradhāvati | atha vrajanneva giraṃ samudyatāṃ | mayocyamānāṃ śṛṇu bhūya eva ca
पति के समीप रहते यह मेरे लिए दूर नहीं है; मेरा मन तो इससे भी बहुत आगे दौड़ता है। अब चलते-चलते ही मेरी यह कही जाने वाली बात फिर सुनिए।
श्लोक 42 (3.298.42)
विवस्वतस्त्वं तनयः प्रतापवां- । स्ततो हि वैवस्वत उच्यसे बुधैः । समेन धर्मेण चरन्ति ताः प्रजा- । स्ततस्तवेहेश्वर धर्मराजता ॥
vivasvatastvaṃ tanayaḥ pratāpavāṃ- | stato hi vaivasvata ucyase budhaiḥ | samena dharmeṇa caranti tāḥ prajā- | statastaveheśvara dharmarājatā
आप विवस्वान् (सूर्य) के प्रतापी पुत्र हैं, इसीलिए ज्ञानी आपको वैवस्वत कहते हैं। आपकी प्रजाएँ आपके समभाव वाले धर्म के अनुसार चलती हैं; इसीलिए, हे ईश्वर, आप यहाँ धर्मराज कहलाते हैं।
श्लोक 43 (3.298.43)
आत्मन्यपि न विश्वासस्तथा भवति सत्सु यः । तस्मात्सत्सु विशेषेण सर्वः प्रणयमिच्छति ॥
ātmanyapi na viśvāsastathā bhavati satsu yaḥ | tasmātsatsu viśeṣeṇa sarvaḥ praṇayamicchati
मनुष्य को अपने आप पर भी उतना विश्वास नहीं होता जितना सज्जनों पर होता है; इसलिए सब लोग विशेष रूप से सज्जनों का स्नेह चाहते हैं।
श्लोक 44 (3.298.44)
सौहृदात्सर्वभूतानां विश्वासो नाम जायते । तस्मात्सत्सु विशेषेण विश्वासं कुरुते जनः ॥
sauhṛdātsarvabhūtānāṃ viśvāso nāma jāyate | tasmātsatsu viśeṣeṇa viśvāsaṃ kurute janaḥ
सब प्राणियों के प्रति सौहार्द से ही विश्वास उत्पन्न होता है; इसलिए लोग विशेष रूप से सज्जनों पर विश्वास करते हैं।
यम उवाच
श्लोक 45 (3.298.45)
उदाहृतंते वचनं यदङ्गने । शुभे न तादृक् त्वदृते श्रुतं मया । अनेन तुष्टोस्मि विनाऽस्य जीवितं । वरं चतुर्थं वरयस्व गच्छ च ॥
udāhṛtaṃte vacanaṃ yadaṅgane | śubhe na tādṛk tvadṛte śrutaṃ mayā | anena tuṣṭosmi vinā'sya jīvitaṃ | varaṃ caturthaṃ varayasva gaccha ca
हे सुन्दरी, तुमने जो वचन कहे हैं, वैसे मैंने तुम्हारे सिवा किसी से नहीं सुने। इनसे मैं प्रसन्न हूँ। इसके जीवन को छोड़कर चौथा वर माँग लो और चली जाओ।
सावित्र्युवाच
श्लोक 46 (3.298.46)
ममात्मजं सत्यवतस्तथौरसं । भवेदुभाभ्यामिह यत्कुलोद्वहम् । शतं सुतानां बलवीर्यशालिना- । मिदंचतुर्थं वरयामि ते वरम् ॥
mamātmajaṃ satyavatastathaurasaṃ | bhavedubhābhyāmiha yatkulodvaham | śataṃ sutānāṃ balavīryaśālinā- | midaṃcaturthaṃ varayāmi te varam
सत्यवान् और मुझ दोनों से हमारे औरस पुत्र उत्पन्न हों, जो कुल को धारण करें — बल और पराक्रम से युक्त सौ पुत्र। यही चौथा वर मैं आपसे माँगती हूँ।
यम उवाच
श्लोक 47 (3.298.47)
शतं सुतानां बलवीर्यशालिनां । भविष्यति प्रीतिकरं तवाबले । परिश्रमस्ते न भवेन्नृपात्मजे । निवर्त दूरं हि पथस्त्वमागता ॥
śataṃ sutānāṃ balavīryaśālināṃ | bhaviṣyati prītikaraṃ tavābale | pariśramaste na bhavennṛpātmaje | nivarta dūraṃ hi pathastvamāgatā
हे अबला, तुम्हारे बल और पराक्रम से युक्त सौ पुत्र होंगे, जो तुम्हें आनन्द देंगे। हे राजकुमारी, तुम्हें थकान न हो; लौट जाओ, तुम मार्ग में बहुत दूर आ गई हो।
सावित्र्युवाच
श्लोक 48 (3.298.48)
सतां सदा शाश्वतधर्मवृत्तिः । सन्तो न सीदन्ति न च व्यथन्ति । सतां सद्भिर्नाफलः संगमोस्ति । सद्भ्यो भयंनानुवर्तन्ति सन्तः ॥
satāṃ sadā śāśvatadharmavṛttiḥ | santo na sīdanti na ca vyathanti | satāṃ sadbhirnāphalaḥ saṃgamosti | sadbhyo bhayaṃnānuvartanti santaḥ
सज्जनों का आचरण सदा शाश्वत धर्म ही होता है। सज्जन न तो दुःख में डूबते हैं, न विचलित होते हैं। सज्जनों का सज्जनों से मिलन कभी निष्फल नहीं होता, और सज्जनों को सज्जनों से कोई भय नहीं होता।
श्लोक 49 (3.298.49)
सन्तो हि सत्येन नयन्ति सूर्यं । सन्तो भूमिं तपसा धारयन्ति । सन्तो गतिर्भूतभव्यस्य राज- । न्सतां मध्ये नावसीदन्ति सन्तः ॥
santo hi satyena nayanti sūryaṃ | santo bhūmiṃ tapasā dhārayanti | santo gatirbhūtabhavyasya rāja- | nsatāṃ madhye nāvasīdanti santaḥ
सज्जन ही अपने सत्य से सूर्य को चलाते हैं; सज्जन ही तप से पृथ्वी को धारण करते हैं। हे राजन्, सज्जन ही भूत और भविष्य के आश्रय हैं; सज्जनों के बीच सज्जन कभी दुःखी नहीं होते।
श्लोक 50 (3.298.50)
आर्यजुष्टमिदं वृत्तमिति विज्ञाय शाश्वतम् । सन्तः परार्थं कुर्वाणा नावेक्षन्ति प्रतिक्रियाः ॥
āryajuṣṭamidaṃ vṛttamiti vijñāya śāśvatam | santaḥ parārthaṃ kurvāṇā nāvekṣanti pratikriyāḥ
यह जानकर कि यह श्रेष्ठ जनों द्वारा अपनाया गया सनातन आचरण है, सज्जन दूसरों के हित के लिए काम करते हैं और बदले की अपेक्षा नहीं रखते।
श्लोक 51 (3.298.51)
न च प्रसादः सत्पुरुषेषु मोघो । न चाप्यर्थो नश्यति नापि मानः । यस्मादेतन्नियतं सत्सु नित्यं । तस्मात्सन्तो रक्षितारो भवन्ति ॥
na ca prasādaḥ satpuruṣeṣu mogho | na cāpyartho naśyati nāpi mānaḥ | yasmādetanniyataṃ satsu nityaṃ | tasmātsanto rakṣitāro bhavanti
सत्पुरुषों की कृपा कभी व्यर्थ नहीं जाती, न उनके यहाँ धन नष्ट होता है, न मान। क्योंकि सज्जनों में यह सदा निश्चित रूप से होता है, इसलिए सज्जन रक्षक होते हैं।
यम उवाच
श्लोक 52 (3.298.52)
यथायथा भाषसि धर्मसंहितं । मनोनुकूलं सुपदं महार्थवत् । तथातथा मे त्वयि भक्तिरुत्तमा । वरं वृणीष्वाप्रतिमं पतिव्रते ॥
yathāyathā bhāṣasi dharmasaṃhitaṃ | manonukūlaṃ supadaṃ mahārthavat | tathātathā me tvayi bhaktiruttamā | varaṃ vṛṇīṣvāpratimaṃ pativrate
तुम जैसे-जैसे धर्म से युक्त, मन को भाने वाले, सुन्दर पदों वाले और गहरे अर्थ वाले वचन कहती हो, वैसे-वैसे तुम्हारे प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ती जाती है। हे पतिव्रता, कोई अनुपम वर माँग लो।
सावित्र्युवाच
श्लोक 53 (3.298.53)
न तेऽपवर्गः सुकृताद्विना कृत- । स्तथा यथाऽन्येषु वरेषु मानद । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं । यथा मृता ह्येवमहं पतिं विना ॥
na te'pavargaḥ sukṛtādvinā kṛta- | stathā yathā'nyeṣu vareṣu mānada | varaṃ vṛṇe jīvatu satyavānayaṃ | yathā mṛtā hyevamahaṃ patiṃ vinā
हे मानद, आपने जो (पुत्रों का) वर दिया है, वह अन्य वरों की भाँति धर्मसम्मत दाम्पत्य के बिना पूरा नहीं हो सकता। इसलिए मैं यह वर माँगती हूँ — यह सत्यवान् जीवित हो, क्योंकि पति के बिना मैं मरी हुई के समान हूँ।
श्लोक 54 (3.298.54)
न कामये भर्तृविनाकृता सुखं । न कामये भर्तृविनाकृता दिवम् । नकामये भर्तृविनाकृता श्रियं । न भर्तृहीना व्यवसामि जीवितुम् ॥
na kāmaye bhartṛvinākṛtā sukhaṃ | na kāmaye bhartṛvinākṛtā divam | nakāmaye bhartṛvinākṛtā śriyaṃ | na bhartṛhīnā vyavasāmi jīvitum
पति के बिना मुझे सुख की कामना नहीं; पति के बिना मुझे स्वर्ग की कामना नहीं; पति के बिना मुझे लक्ष्मी की कामना नहीं; पति से रहित होकर मैं जीवित रहने का साहस नहीं कर सकती।
श्लोक 55 (3.298.55)
वरातिसर्गः शतपुत्रता मम । त्वयैव दत्तो ह्रियते च मे पतिः । वरं वृणे जीवतु सत्यवानयं । तवैव सत्यं वचनं भविष्यति ॥
varātisargaḥ śataputratā mama | tvayaiva datto hriyate ca me patiḥ | varaṃ vṛṇe jīvatu satyavānayaṃ | tavaiva satyaṃ vacanaṃ bhaviṣyati
आपने ही मुझे सौ पुत्रों का वर दिया है, और फिर भी मेरे पति मुझसे छीने जा रहे हैं। मैं यह वर माँगती हूँ कि यह सत्यवान् जीवित हो; तभी आपका ही वचन सत्य होगा।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 56 (3.298.56)
तथेत्युक्त्वा तु तं पाशं मुक्त्वा वैवस्वतो यमः । धर्मराजः प्रहृष्टात्मा सावित्रीमिदमब्रवीत् ॥
tathetyuktvā tu taṃ pāśaṃ muktvā vaivasvato yamaḥ | dharmarājaḥ prahṛṣṭātmā sāvitrīmidamabravīt
"तथास्तु" कहकर विवस्वान् के पुत्र धर्मराज यम ने वह पाश खोल दिया और प्रसन्न मन से सावित्री से यह कहा —
यम उवाच
श्लोक 57 (3.298.57)
एष भद्रे मया मुक्तो भर्ता ते कुलनन्दिनि । तोषितोऽहं त्वया साध्वि वाक्यैर्धर्मार्थसंहितैः ॥
eṣa bhadre mayā mukto bhartā te kulanandini | toṣito'haṃ tvayā sādhvi vākyairdharmārthasaṃhitaiḥ
हे भद्रे, हे कुलनन्दिनी, मैंने तुम्हारे पति को मुक्त कर दिया। हे साध्वी, धर्म और अर्थ से भरे तुम्हारे वचनों से मैं सन्तुष्ट हूँ।
श्लोक 58 (3.298.58)
अरोगस्तव नेयश्च सिद्धार्थः स भविष्यति । चतुर्वर्षशतायुश्च त्वया सार्धमवाप्स्यति ॥
arogastava neyaśca siddhārthaḥ sa bhaviṣyati | caturvarṣaśatāyuśca tvayā sārdhamavāpsyati
वह नीरोग रहेगा, तुम उसे ले जा सकोगी, और वह सफल-मनोरथ होगा। तुम्हारे साथ वह चार सौ वर्ष की आयु पाएगा।
श्लोक 59 (3.298.59)
इष्ट्वा यज्ञैश्च धर्मेण ख्यातिं लोके गमिष्यति । त्वयि पुत्रशतं चैव सत्यवाञ्जनयिष्यति ॥
iṣṭvā yajñaiśca dharmeṇa khyātiṃ loke gamiṣyati | tvayi putraśataṃ caiva satyavāñjanayiṣyati
धर्मपूर्वक यज्ञ करके वह संसार में ख्याति पाएगा, और सत्यवान् तुमसे सौ पुत्र उत्पन्न करेगा।
श्लोक 60 (3.298.60)
ते चापि सर्वे राजानः क्षत्रियाः पुत्रपौत्रिणः । ख्यातास्त्वन्नामधेयाश्चभविष्यन्तीह शाश्वताः ॥
te cāpi sarve rājānaḥ kṣatriyāḥ putrapautriṇaḥ | khyātāstvannāmadheyāścabhaviṣyantīha śāśvatāḥ
वे सब भी पुत्र-पौत्रों वाले क्षत्रिय राजा होंगे, तुम्हारे नाम से विख्यात होंगे और यहाँ सदा बने रहेंगे।
श्लोक 61 (3.298.61)
पितुश्च ते पुत्रशतं भविता तव मातरि । मालव्यां मालवा नाम शाश्वताः पुत्रपौत्रिणः । भ्रातरस्ते भविष्यन्ति क्षत्रियास्त्रिदशोपमाः ॥
pituśca te putraśataṃ bhavitā tava mātari | mālavyāṃ mālavā nāma śāśvatāḥ putrapautriṇaḥ | bhrātaraste bhaviṣyanti kṣatriyāstridaśopamāḥ
तुम्हारे पिता के भी तुम्हारी माता मालवी से सौ पुत्र होंगे। वे "मालव" नाम से विख्यात, चिरस्थायी और पुत्र-पौत्रों वाले होंगे; तुम्हारे वे भाई देवताओं के समान क्षत्रिय होंगे।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 62 (3.298.62)
एवं तस्यै वरं दत्त्वा धर्मराजः प्रतापवान् । निवर्तयित्वा सावित्रीं स्वमेव भवनं ययौ ॥
evaṃ tasyai varaṃ dattvā dharmarājaḥ pratāpavān | nivartayitvā sāvitrīṃ svameva bhavanaṃ yayau
इस प्रकार उसे वर देकर और सावित्री को लौटाकर प्रतापी धर्मराज अपने भवन को चले गए।
श्लोक 63 (3.298.63)
सावित्र्यपि यमे याते भर्तारं प्रतिलभ्य च । जगाम तत्र यत्रास्या भर्तुः शावं कलेवरम् ॥
sāvitryapi yame yāte bhartāraṃ pratilabhya ca | jagāma tatra yatrāsyā bhartuḥ śāvaṃ kalevaram
यम के चले जाने पर सावित्री भी पति को फिर से पाकर वहाँ गई जहाँ उसके पति का निर्जीव शरीर पड़ा था।
श्लोक 64 (3.298.64)
सा भूमौ प्रेक्ष्यभर्तारमुपसृत्योपगृह्य च । उत्सङ्गे शिर आरोप्य भूमावुपविवेश ह ॥
sā bhūmau prekṣyabhartāramupasṛtyopagṛhya ca | utsaṅge śira āropya bhūmāvupaviveśa ha
पति को भूमि पर पड़ा देख वह उसके पास गई, उसे गले लगाया, उसका सिर अपनी गोद में रखा और भूमि पर बैठ गई।
श्लोक 65 (3.298.65)
संज्ञां च स पुनर्लब्ध्वा सावित्रीमभ्यभाषत । प्रोष्यागत इव प्रेम्णा पुनःपुनरुदीक्ष्यवै ॥
saṃjñāṃ ca sa punarlabdhvā sāvitrīmabhyabhāṣata | proṣyāgata iva premṇā punaḥpunarudīkṣyavai
और उसने चेतना लौटने पर, परदेश से लौटे हुए व्यक्ति की तरह प्रेम से बार-बार उसे निहारते हुए सावित्री से कहा —
सत्यवानुवाच
श्लोक 66 (3.298.66)
सुचिरं बत सुप्तोस्मि किमर्थं नावबोधितः । क्व चासौ पुरुषः श्यामो योसौ मां संचकर्षह ॥
suciraṃ bata suptosmi kimarthaṃ nāvabodhitaḥ | kva cāsau puruṣaḥ śyāmo yosau māṃ saṃcakarṣaha
अरे, मैं बहुत देर तक सोता रहा! तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं? और वह श्याम पुरुष कहाँ है जो मुझे खींचे लिए जा रहा था?
सावित्र्युवाच
श्लोक 67 (3.298.67)
सुचिरं त्वंप्रसुप्तोसि ममाङ्के पुरुषर्षभ । गतः स भगवान्देवः प्रजासंयमनो यमः ॥
suciraṃ tvaṃprasuptosi mamāṅke puruṣarṣabha | gataḥ sa bhagavāndevaḥ prajāsaṃyamano yamaḥ
हे पुरुषश्रेष्ठ, आप बहुत देर तक मेरी गोद में सोते रहे। प्रजा का नियमन करने वाले भगवान् यमदेव चले गए।
श्लोक 68 (3.298.68)
विश्रान्तोसि महाभाग विनिद्रश्च नृपात्मज । यदि शक्यं समुत्तिष्ठ विगाढां पश्य शर्वरीम् ॥
viśrāntosi mahābhāga vinidraśca nṛpātmaja | yadi śakyaṃ samuttiṣṭha vigāḍhāṃ paśya śarvarīm
हे महाभाग, आपने विश्राम कर लिया है और आपकी नींद भी टूट गई है, राजकुमार। यदि हो सके तो उठिए; देखिए, रात गहरी हो चली है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 69 (3.298.69)
उपलभ्यततः संज्ञां सुखसुप्त इवोत्थितः । दिशः सर्वा वनान्तांश्च निरीक्ष्योवाच सत्यवान् ॥
upalabhyatataḥ saṃjñāṃ sukhasupta ivotthitaḥ | diśaḥ sarvā vanāntāṃśca nirīkṣyovāca satyavān
तब पूरी तरह होश में आकर सत्यवान् सुख की नींद से जागे व्यक्ति की तरह उठा, उसने सब दिशाओं और वन के छोरों को देखा और कहा —
सत्यवानुवाच
श्लोक 70 (3.298.70)
फलाहारोस्मि निष्क्रान्तस्त्वया सह सुमध्यमे । ततः पाटयतः काष्ठं शिरसो मे रुजाऽभवत् ॥
phalāhārosmi niṣkrāntastvayā saha sumadhyame | tataḥ pāṭayataḥ kāṣṭhaṃ śiraso me rujā'bhavat
हे सुमध्यमे, मैं फल लाने के लिए तुम्हारे साथ निकला था। फिर लकड़ी चीरते समय मेरे सिर में पीड़ा होने लगी।
श्लोक 71 (3.298.71)
शिरोभितापसंतप्तः स्थातुं चिरमशक्नुवन् । तवोत्सङ्गे प्रसुप्तोस्मि इति सर्वं स्मरे शुभे ॥
śirobhitāpasaṃtaptaḥ sthātuṃ ciramaśaknuvan | tavotsaṅge prasuptosmi iti sarvaṃ smare śubhe
सिर की पीड़ा से संतप्त होकर, देर तक खड़े न रह सकने के कारण, मैं तुम्हारी गोद में सो गया। हे शुभे, यह सब मुझे याद है।
श्लोक 72 (3.298.72)
त्वयोपगूढस्य च मे निद्रयाऽपहृतं मनः । ततोऽपश्यं तमो घोरं पुरुषं च महौजसम् ॥
tvayopagūḍhasya ca me nidrayā'pahṛtaṃ manaḥ | tato'paśyaṃ tamo ghoraṃ puruṣaṃ ca mahaujasam
तुम्हारे आलिंगन में रहते हुए नींद ने मेरा मन हर लिया। फिर मैंने घोर अन्धकार और एक महातेजस्वी पुरुष को देखा।
श्लोक 73 (3.298.73)
तद्यदि त्वं विजानासि किं तद्ब्रूहि सुमध्यमे । स्वप्नो मे यदिवा दृष्टो यदि वा सत्यमेव तत् ॥
tadyadi tvaṃ vijānāsi kiṃ tadbrūhi sumadhyame | svapno me yadivā dṛṣṭo yadi vā satyameva tat
हे सुमध्यमे, यदि तुम जानती हो तो बताओ कि वह क्या था — मैंने स्वप्न देखा था, या वह सचमुच सत्य था?
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 74 (3.298.74)
तमुवाचाथ सावित्री रजनी व्यवगाहते । श्वस्ते सर्वंयथावृत्तमाख्यास्यामि नृपात्मज ॥
tamuvācātha sāvitrī rajanī vyavagāhate | śvaste sarvaṃyathāvṛttamākhyāsyāmi nṛpātmaja
तब सावित्री ने उससे कहा — "रात गहरी होती जा रही है। हे राजकुमार, कल मैं आपको सब कुछ जैसा हुआ वैसा बताऊँगी।"
सावित्र्युवाच
श्लोक 75 (3.298.75)
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते पितरौ पश्य सुव्रत । विगाढा रजनी चेयं निवृत्तश्च दिवाकरः ॥
uttiṣṭhottiṣṭha bhadraṃ te pitarau paśya suvrata | vigāḍhā rajanī ceyaṃ nivṛttaśca divākaraḥ
उठिए, उठिए, आपका कल्याण हो! हे सुव्रत, अपने माता-पिता की सुध लीजिए। रात गहरी हो गई है और सूर्य अस्त हो चुका है।
श्लोक 76 (3.298.76)
नक्तंचराश्चरन्त्येते हृष्टाः क्रूराभिभाषिणः । श्रूयन्ते पर्णशब्दाश्च मृगाणां चरतां वने ॥
naktaṃcarāścarantyete hṛṣṭāḥ krūrābhibhāṣiṇaḥ | śrūyante parṇaśabdāśca mṛgāṇāṃ caratāṃ vane
ये रात्रिचर प्राणी प्रसन्न होकर कठोर स्वर में बोलते हुए घूम रहे हैं, और वन में विचरते पशुओं से पत्तों की सरसराहट सुनाई दे रही है।
श्लोक 77 (3.298.77)
एता घोरं शिवा नादान्दिशं दक्षिणपश्चिमाम् । आस्थाय विरुवन्त्युग्राः कम्पयन्त्यो मनो मम ॥
etā ghoraṃ śivā nādāndiśaṃ dakṣiṇapaścimām | āsthāya viruvantyugrāḥ kampayantyo mano mama
ये सियारिनें दक्षिण-पश्चिम दिशा में बैठकर भयानक और उग्र स्वर में चिल्ला रही हैं, जिससे मेरा मन काँप रहा है।
सत्यवानुवाच
श्लोक 78 (3.298.78)
वनं प्रतिभयाकारं घनेन तमसा वृतम् । न विज्ञास्यसि पन्थानं गन्तुं चैव न शक्ष्यसि ॥
vanaṃ pratibhayākāraṃ ghanena tamasā vṛtam | na vijñāsyasi panthānaṃ gantuṃ caiva na śakṣyasi
यह वन घने अन्धकार से ढका हुआ भयावना लग रहा है। तुम मार्ग नहीं पहचान पाओगी और न ही चल सकोगी।
सावित्र्युवाच
श्लोक 79 (3.298.79)
अस्मिन्नद्य वने दग्धे शुष्कवृक्षः स्थितो ज्वलन् । वायुना धम्यमानोत्र दृश्यतेऽग्निः क्वचित्क्वचित् ॥
asminnadya vane dagdhe śuṣkavṛkṣaḥ sthito jvalan | vāyunā dhamyamānotra dṛśyate'gniḥ kvacitkvacit
आज इस वन में आग लगी थी; एक सूखा वृक्ष जलता हुआ खड़ा है, और हवा से भड़कती आग यहाँ-वहाँ दिखाई दे रही है।
श्लोक 80 (3.298.80)
ततोऽग्निमानयित्वेह ज्वालयिष्यामि सर्वतः । काष्ठानीमानि सन्तीह जहि संतापमात्मनः ॥
tato'gnimānayitveha jvālayiṣyāmi sarvataḥ | kāṣṭhānīmāni santīha jahi saṃtāpamātmanaḥ
मैं वहाँ से आग लाकर यहाँ चारों ओर जला दूँगी। यहाँ लकड़ियाँ हैं ही। आप अपना सन्ताप छोड़ दीजिए।
श्लोक 81 (3.298.81)
यदि नोत्सहसे गन्तुं सरुजं त्वां हि लक्षये । न च ज्ञास्यसि पन्थानं तमसा संवृते वने ॥
yadi notsahase gantuṃ sarujaṃ tvāṃ hi lakṣaye | na ca jñāsyasi panthānaṃ tamasā saṃvṛte vane
यदि आप चल नहीं पा रहे हैं, क्योंकि मैं देखती हूँ कि आप अस्वस्थ हैं, और अँधेरे से ढके इस वन में आप मार्ग भी नहीं पहचान पाएँगे,
श्लोक 82 (3.298.82)
श्वः प्रभाते वने दृश्ये यास्यावोऽनुमते तव । वसावेह क्षपामेकां रुचितं यदि तेऽनघ ॥
śvaḥ prabhāte vane dṛśye yāsyāvo'numate tava | vasāveha kṣapāmekāṃ rucitaṃ yadi te'nagha
तो कल सवेरे, जब वन दिखाई देने लगेगा, आपकी अनुमति से हम चलेंगे। हे निष्पाप, यदि आपको अच्छा लगे तो एक रात हम यहीं रह जाएँ।
सत्यवानुवाच
श्लोक 83 (3.298.83)
शिरोरुजा निवृत्ता मे स्वस्थान्यङ्गानि लक्षये । मातापितृभ्यामिच्छामि संयोगं त्वत्प्रसादजम् ॥
śirorujā nivṛttā me svasthānyaṅgāni lakṣaye | mātāpitṛbhyāmicchāmi saṃyogaṃ tvatprasādajam
मेरे सिर की पीड़ा मिट गई है, और मुझे अपने अंग स्वस्थ लग रहे हैं। मैं तुम्हारी कृपा से फिर माता-पिता से मिलना चाहता हूँ।
श्लोक 84 (3.298.84)
न कदाचिद्विकाले हि गतपूर्वोहमाश्रमात् । अनागतायां सन्ध्यायां माता मे प्ररुणद्धि माम् ॥
na kadācidvikāle hi gatapūrvohamāśramāt | anāgatāyāṃ sandhyāyāṃ mātā me praruṇaddhi mām
मैं पहले कभी असमय आश्रम से बाहर नहीं रहा। सन्ध्या होने से पहले ही मेरी माता मुझे रोक लेती हैं।
श्लोक 85 (3.298.85)
दिवाऽपिमयि निष्क्रान्ते सन्तप्येते गुरू मम । विचिनोति हि मां तातः सहैवाश्रमवासिभिः ॥
divā'pimayi niṣkrānte santapyete gurū mama | vicinoti hi māṃ tātaḥ sahaivāśramavāsibhiḥ
दिन में भी मेरे बाहर जाने पर मेरे माता-पिता व्याकुल हो उठते हैं, और पिताजी आश्रमवासियों के साथ मुझे खोजने लगते हैं।
श्लोक 86 (3.298.86)
मात्रा पित्रा च सुभृशं दुःखिताभ्यामहं पुरा । उपालब्धश्च बहुशश्चिरेणागच्छसीति हि ॥
mātrā pitrā ca subhṛśaṃ duḥkhitābhyāmahaṃ purā | upālabdhaśca bahuśaścireṇāgacchasīti hi
पहले भी कई बार अत्यन्त दुःखी माता-पिता ने मुझे उलाहना दिया है कि "तुम बहुत देर से लौटते हो।"
श्लोक 87 (3.298.87)
कात्ववस्था तयोरद्य मदर्थमिति चिन्तये । तयोरदृश्ये मयि च महद्दुःखं भविष्यति ॥
kātvavasthā tayoradya madarthamiti cintaye | tayoradṛśye mayi ca mahadduḥkhaṃ bhaviṣyati
मैं सोचता हूँ कि आज मेरे कारण उनकी क्या दशा होगी। मुझे न देखकर उन्हें बड़ा दुःख होगा।
श्लोक 88 (3.298.88)
पुरा मामूचतुश्चैव रात्रावस्रायमाणकौ । भृशं सुदुःखितौ वृद्धौ बहुशः प्रीतिसंयुतौ ॥
purā māmūcatuścaiva rātrāvasrāyamāṇakau | bhṛśaṃ suduḥkhitau vṛddhau bahuśaḥ prītisaṃyutau
एक बार रात में रोते हुए, अत्यन्त दुःखी और स्नेह से भरे उन दोनों वृद्धों ने मुझसे बार-बार कहा था —
श्लोक 89 (3.298.89)
त्वया हीनौ न जीवाव मुहूर्तमपि पुत्रक । यावद्धरिष्यसे पुत्र तावन्नौ जीवितं ध्रुवम् ॥
tvayā hīnau na jīvāva muhūrtamapi putraka | yāvaddhariṣyase putra tāvannau jīvitaṃ dhruvam
"बेटा, तुम्हारे बिना हम एक मुहूर्त भी जीवित नहीं रह सकते। पुत्र, जब तक तुम जीवित हो, तभी तक हमारा जीवन निश्चित है।
श्लोक 90 (3.298.90)
वृद्धयोरन्धयोर्दृष्टिस्त्वयि वंशः प्रतिष्ठितः । त्वयि पिण्डश्च कीर्तिश्च सन्तानश्चावयोरिति ॥
vṛddhayorandhayordṛṣṭistvayi vaṃśaḥ pratiṣṭhitaḥ | tvayi piṇḍaśca kīrtiśca santānaścāvayoriti
तुम हम दोनों बूढ़े अन्धों की आँखें हो; तुम्हीं में हमारा वंश प्रतिष्ठित है; तुम्हीं में हमारा पिण्ड, हमारी कीर्ति और हमारी सन्तान-परम्परा है।"
श्लोक 91 (3.298.91)
माता वृद्धा पिता वृद्धस्तयोर्यष्टिरहं किल । तौ रात्रौ मामपश्यन्तौ कामवस्थां गमिष्यतः ॥
mātā vṛddhā pitā vṛddhastayoryaṣṭirahaṃ kila | tau rātrau māmapaśyantau kāmavasthāṃ gamiṣyataḥ
माता वृद्ध हैं, पिता वृद्ध हैं, और मैं ही उनकी लाठी हूँ। आज रात मुझे न देखकर वे किस दशा को पहुँचेंगे?
श्लोक 92 (3.298.92)
निद्रायाश्चाभ्यसूयामि यस्या हेतोः पिता मम । माता च संशयं प्राप्ता मत्कृतेऽनपकारिणी ॥
nidrāyāścābhyasūyāmi yasyā hetoḥ pitā mama | mātā ca saṃśayaṃ prāptā matkṛte'napakāriṇī
मुझे इस नींद पर क्रोध आता है, जिसके कारण मेरे पिता और मेरी निरपराध माता भी मेरे कारण संकट में पड़ गए हैं।
श्लोक 93 (3.298.93)
अहं च संशयं प्राप्तः कृच्छ्रामापदमास्थितः । मातापितृभ्यां हि विना नाहं जीवितुमुत्सहे ॥
ahaṃ ca saṃśayaṃ prāptaḥ kṛcchrāmāpadamāsthitaḥ | mātāpitṛbhyāṃ hi vinā nāhaṃ jīvitumutsahe
और मैं भी संकट में हूँ, कठिन विपत्ति में पड़ा हूँ, क्योंकि माता-पिता के बिना मैं जीवित नहीं रह सकता।
श्लोक 94 (3.298.94)
व्यक्तमाकुलया बुद्ध्या प्रज्ञाचक्षुः पिता मम । एकैकमस्यां वेलायां पृच्छत्याश्रमवासिनम् ॥
vyaktamākulayā buddhyā prajñācakṣuḥ pitā mama | ekaikamasyāṃ velāyāṃ pṛcchatyāśramavāsinam
निश्चय ही इस समय मेरे प्रज्ञाचक्षु (नेत्रहीन) पिता व्याकुल बुद्धि से एक-एक आश्रमवासी से मेरे बारे में पूछ रहे होंगे।
श्लोक 95 (3.298.95)
नात्मानमनुशोचामि यथाऽहंपितरं शुभे । भर्तारं चाप्यनुगतां मातरं भृशदुःखिताम् ॥
nātmānamanuśocāmi yathā'haṃpitaraṃ śubhe | bhartāraṃ cāpyanugatāṃ mātaraṃ bhṛśaduḥkhitām
हे शुभे, मुझे अपने लिए उतना शोक नहीं जितना अपने पिता के लिए है, और अपनी माता के लिए, जो पति का अनुसरण करती हैं और अत्यन्त दुःखी हैं।
श्लोक 96 (3.298.96)
मत्कृतेन हि तावद्य सन्तापं परमेष्यतः । जीवन्तावनुजीवामि भर्तव्यौ तौ मयेति ह ॥
matkṛtena hi tāvadya santāpaṃ parameṣyataḥ | jīvantāvanujīvāmi bhartavyau tau mayeti ha
मेरे कारण आज वे दोनों घोर सन्ताप को प्राप्त होंगे। उनके जीवित रहते ही मैं जीता हूँ; उनका भरण-पोषण मुझे ही करना है।
श्लोक 97 (3.298.97)
तयोः प्रियं मे कर्तव्यमिति जीवामि चाप्यहम् । परमं दैवतं तौ मे पूजनीयौ सदा मया । तयोस्तु मे सदाऽस्त्येवं व्रतमेतत्पुरातनम् ॥
tayoḥ priyaṃ me kartavyamiti jīvāmi cāpyaham | paramaṃ daivataṃ tau me pūjanīyau sadā mayā | tayostu me sadā'styevaṃ vratametatpurātanam
"मुझे उनका प्रिय करना है" — यही सोचकर मैं जीता हूँ। वे दोनों मेरे परम देवता हैं, सदा मेरे लिए पूजनीय हैं। उनके प्रति मेरा यही पुराना व्रत है।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 98 (3.298.98)
एवमुक्त्वा स धर्मात्मा गुरुभक्तो गुरुप्रियः । उच्छ्रित्य बाहू दुःखार्तः सुस्वरं प्ररुरोद ह ॥
evamuktvā sa dharmātmā gurubhakto gurupriyaḥ | ucchritya bāhū duḥkhārtaḥ susvaraṃ praruroda ha
ऐसा कहकर गुरुजनों के भक्त और उनके प्रिय, धर्मात्मा सत्यवान् दुःख से व्याकुल होकर भुजाएँ ऊपर उठाकर ऊँचे स्वर से रोने लगा।
श्लोक 99 (3.298.99)
ततोऽब्रवीत्तथा दृष्ट्वाभर्तारं शोककर्शितम् । प्रमृज्याश्रूणि पाणिभ्यां सावित्री धर्मचारिणी ॥
tato'bravīttathā dṛṣṭvābhartāraṃ śokakarśitam | pramṛjyāśrūṇi pāṇibhyāṃ sāvitrī dharmacāriṇī
पति को इस प्रकार शोक से दुर्बल देखकर धर्मचारिणी सावित्री ने अपने हाथों से उसके आँसू पोंछे और कहा —
सावित्र्युवाच
श्लोक 100 (3.298.100)
यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं यदि दत्तं हुतं यदि । श्वश्रूश्वशुरभर्तॄणां मम पुण्याऽस्तु शर्वरी ॥
yadi me'sti tapastaptaṃ yadi dattaṃ hutaṃ yadi | śvaśrūśvaśurabhartṝṇāṃ mama puṇyā'stu śarvarī
यदि मैंने तप किया है, यदि दान दिया है, यदि हवन किया है, तो यह रात्रि मेरी सास, ससुर और पति के लिए मंगलमयी हो।
श्लोक 101 (3.298.101)
न स्मराम्युक्तपूर्वं वै स्वैरेष्वप्यनृतां गिरम् । तेन सत्येन तावद्य ध्रियेतां श्वशुरौ मम ॥
na smarāmyuktapūrvaṃ vai svaireṣvapyanṛtāṃ giram | tena satyena tāvadya dhriyetāṃ śvaśurau mama
मुझे याद नहीं कि मैंने कभी हँसी-ठिठोली में भी झूठ बोला हो। उसी सत्य के बल से आज मेरे सास-ससुर जीवित रहें।
सत्यवानुवाच
श्लोक 102 (3.298.102)
कामये दर्शनं पित्रोर्याहि सावित्रि माचिरम् । अपिनाम गुरू तौ हि पश्येयं ध्रियमाणकौ ॥
kāmaye darśanaṃ pitroryāhi sāvitri māciram | apināma gurū tau hi paśyeyaṃ dhriyamāṇakau
मैं अपने माता-पिता के दर्शन करना चाहता हूँ। सावित्री, बिना देर किए चलो। काश मैं अपने गुरुजनों को जीवित पाऊँ!
श्लोक 103 (3.298.103)
पुरा मातुः पितुर्वाऽपियदि पश्यामि विप्रियम् । न जीविष्ये वरारोहे सत्येनात्मानमालभे ॥
purā mātuḥ piturvā'piyadi paśyāmi vipriyam | na jīviṣye varārohe satyenātmānamālabhe
हे वरारोहे, यदि मैं माता या पिता का कोई अनिष्ट देखूँ तो मैं जीवित नहीं रहूँगा; मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ।
श्लोक 104 (3.298.104)
यदि धर्मे च ते बुद्धिर्मां चेज्जीवन्तमिच्छसि । मम प्रियं वा कर्तव्यं गच्छावाश्रममन्तिकात् ॥
yadi dharme ca te buddhirmāṃ cejjīvantamicchasi | mama priyaṃ vā kartavyaṃ gacchāvāśramamantikāt
यदि तुम्हारी बुद्धि धर्म में लगी है, यदि तुम मुझे जीवित देखना चाहती हो, या मेरा प्रिय करना चाहती हो, तो पास के आश्रम में चलें।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 105 (3.298.105)
सावित्री तत उत्थाय केशान्संयम्य भामिनी । पतिमुत्थापयामास बाहुभ्यां परिगृह्य वै ॥
sāvitrī tata utthāya keśānsaṃyamya bhāminī | patimutthāpayāmāsa bāhubhyāṃ parigṛhya vai
तब सुन्दरी सावित्री ने उठकर अपने केश बाँधे और पति को भुजाओं में थामकर उठाया।
श्लोक 106 (3.298.106)
उत्थाय सत्यवांश्चापि प्रमृज्याङ्गानि पाणिना । सर्वा दिशः समालोक्य कठिने दृष्टिमादधे ॥
utthāya satyavāṃścāpi pramṛjyāṅgāni pāṇinā | sarvā diśaḥ samālokya kaṭhine dṛṣṭimādadhe
सत्यवान् भी उठा, हाथ से अपने अंग पोंछे, सब दिशाओं में देखा और फलों की टोकरी पर दृष्टि डाली।
श्लोक 107 (3.298.107)
तमुवाचाथसावित्री श्वः फलानि हरिष्यसि । योगक्षेमार्थमेतं ते नेष्यामि परशुं त्वहम् ॥
tamuvācāthasāvitrī śvaḥ phalāni hariṣyasi | yogakṣemārthametaṃ te neṣyāmi paraśuṃ tvaham
तब सावित्री ने उससे कहा — "फल आप कल ले जाइएगा। कुशल-क्षेम के लिए मैं आपकी यह कुल्हाड़ी ले चलूँगी।"
श्लोक 108 (3.298.108)
कृत्त्वा कठिनभारं सा वृक्षशाखावलम्बिनम् । गृहीत्वा परशुं भर्तुः सकाशे पुनरागमत् ॥
kṛttvā kaṭhinabhāraṃ sā vṛkṣaśākhāvalambinam | gṛhītvā paraśuṃ bhartuḥ sakāśe punarāgamat
उसने फलों से भरी टोकरी को वृक्ष की डाल पर टाँग दिया और कुल्हाड़ी लेकर फिर पति के पास आ गई।
श्लोक 109 (3.298.109)
वामे स्कन्धे तु वामोरूर्भर्तुर्बाहुं निवेश्य च । दक्षिणेन परिष्वज्य जगाम गजगामिनी ॥
vāme skandhe tu vāmorūrbharturbāhuṃ niveśya ca | dakṣiṇena pariṣvajya jagāma gajagāminī
सुन्दर जंघाओं वाली सावित्री ने पति की भुजा अपने बाएँ कंधे पर रखी और दाहिने हाथ से उसे थामकर गजगामिनी-सी चाल से चल पड़ी।
सत्यवानुवाच
श्लोक 110 (3.298.110)
अभ्यासगमनाद्भीरु पन्थानो विदिता मम । वृक्षान्तरालोकितया ज्योत्स्नया चापि लक्षये ॥
abhyāsagamanādbhīru panthāno viditā mama | vṛkṣāntarālokitayā jyotsnayā cāpi lakṣaye
हे भीरु, बार-बार आने-जाने से मुझे रास्ते मालूम हैं, और पेड़ों के बीच से छनकर आती चाँदनी में भी मैं उन्हें देख पा रहा हूँ।
श्लोक 111 (3.298.111)
आगतौ स्वः पथा येन फलान्यवचितानि च । यथागतं शुभे गच्छ पन्थानं मा विचारय ॥
āgatau svaḥ pathā yena phalānyavacitāni ca | yathāgataṃ śubhe gaccha panthānaṃ mā vicāraya
जिस मार्ग से हम आए थे और जिस पर फल तोड़े थे, उसी से चलो। हे शुभे, जैसे आए वैसे ही चलो; मार्ग के बारे में सोच-विचार मत करो।
श्लोक 112 (3.298.112)
पलाशखण्डे चैतस्मिन्पन्था व्यावर्तते द्विधा । तस्योत्तरेण यः पन्थास्तेन गच्छ त्वरस्व च ॥
palāśakhaṇḍe caitasminpanthā vyāvartate dvidhā | tasyottareṇa yaḥ panthāstena gaccha tvarasva ca
पलाश के इस झुरमुट के पास मार्ग दो ओर बँट जाता है। उसके उत्तर वाले मार्ग से चलो, और जल्दी करो।
श्लोक 113 (3.298.113)
स्वस्थोस्मि बलवानस्मि दिदृक्षुः पितरावुभौ ॥
svasthosmi balavānasmi didṛkṣuḥ pitarāvubhau
मैं स्वस्थ हूँ, बलवान् हूँ, और अपने माता-पिता दोनों को देखने के लिए उत्सुक हूँ।
मार्कण्डेय उवाच
श्लोक 114 (3.298.114)
ब्रुवन्नेव त्वरायुक्तः सम्प्रायादाश्रमं प्रति ॥
bruvanneva tvarāyuktaḥ samprāyādāśramaṃ prati
यह कहते-कहते ही वह शीघ्रता से आश्रम की ओर चल पड़ा।