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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 299

सावित्री का लौटना और ऋषियों को वृत्तान्त सुनाना

द्युमत्सेन को अचानक नेत्र मिल जाते हैं, पर पुत्र के न लौटने पर वे और शैब्या रात भर व्याकुल होकर वन में भटकते हैं, जब तक तपस्वी उन्हें वापस नहीं ले आते। एक-एक करके ऋषि अलग-अलग लक्षणों के आधार पर उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि सत्यवान् जीवित है। देर रात सावित्री और सत्यवान् लौटते हैं; गौतम के पूछने पर सावित्री बताती है कि यम उसके पति को ले गए थे और सत्य वचनों से स्तुति करने पर उन्होंने उसे पाँच वर दिए। ऋषि राजकुल को विपत्तियों से उबारने के लिए उसकी प्रशंसा करके अपने आश्रमों को लौट जाते हैं।

अध्याय 298अध्याय-सूचीअध्याय 300

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.299.1)

एतस्मिन्नेव काले तु द्युमत्सेनो महाबलः । लब्धचक्षुः प्रसन्नायां दृष्ट्यां सर्वं ददर्श ह ॥

etasminneva kāle tu dyumatseno mahābalaḥ | labdhacakṣuḥ prasannāyāṃ dṛṣṭyāṃ sarvaṃ dadarśa ha

उसी समय महाबली द्युमत्सेन को नेत्र मिल गए; दृष्टि निर्मल हो जाने पर वे सब कुछ देखने लगे।

श्लोक 2 (3.299.2)

स सर्वानाश्रमान्गत्वा शैब्यया सह भार्यया । पुत्रहेतोः परामार्तिं जगाम भरतर्षभ ॥

sa sarvānāśramāngatvā śaibyayā saha bhāryayā | putrahetoḥ parāmārtiṃ jagāma bharatarṣabha

हे भरतश्रेष्ठ! अपनी पत्नी शैब्या के साथ सब आश्रमों में जाकर वे पुत्र के कारण अत्यन्त व्याकुल हो उठे।

श्लोक 3 (3.299.3)

तावाश्रमान्नदीश्चैववनानि च सरांसि च । तस्यां निशि विचिन्वन्तौ दम्पती परिजग्मतुः ॥

tāvāśramānnadīścaivavanāni ca sarāṃsi ca | tasyāṃ niśi vicinvantau dampatī parijagmatuḥ

उस रात वे दोनों पति-पत्नी आश्रमों, नदियों, वनों और सरोवरों में उसे खोजते हुए भटकते रहे।

श्लोक 4 (3.299.4)

श्रुत्वा शब्दं तु यं कंचिदुन्मुखौ सुतशङ्कया । सावित्रीसहितोऽभ्येति सत्यवानित्यभाषताम् ॥

śrutvā śabdaṃ tu yaṃ kaṃcidunmukhau sutaśaṅkayā | sāvitrīsahito'bhyeti satyavānityabhāṣatām

जब भी कोई आहट सुनाई देती, वे पुत्र के आने की आशा में ऊपर देखने लगते और कहते — "सावित्री के साथ सत्यवान् आ रहा है!"

श्लोक 5 (3.299.5)

भिन्नैश्च परुषैः पादैः सव्रणैः शोणितोक्षितैः । कुशकण्टकविद्धाङ्गावुन्मत्ताविव धावतः ॥

bhinnaiśca paruṣaiḥ pādaiḥ savraṇaiḥ śoṇitokṣitaiḥ | kuśakaṇṭakaviddhāṅgāvunmattāviva dhāvataḥ

उनके पैर फट गए थे, खुरदरे और घावों से भरे थे, रक्त से सने थे; कुश और काँटों से उनके अंग बिंध गए थे, और वे उन्मत्तों की भाँति दौड़ रहे थे।

श्लोक 6 (3.299.6)

ततोऽभिसृत्य तैर्विप्रैः सर्वैराश्रमवासिभिः । परिवार्य समाश्वास्य तावानीतौ स्वमाश्रमम् ॥

tato'bhisṛtya tairvipraiḥ sarvairāśramavāsibhiḥ | parivārya samāśvāsya tāvānītau svamāśramam

तब आश्रमों में रहने वाले सब ब्राह्मण उनके पास आए, उन्हें घेरकर सांत्वना दी और उन्हें उनके अपने आश्रम में ले आए।

श्लोक 7 (3.299.7)

तत्रभार्यासहायः स वृतो वृद्धैस्तपोधनैः । आश्वासितोऽपि चित्रार्थैः पूर्वराजकथाश्रयैः ॥

tatrabhāryāsahāyaḥ sa vṛto vṛddhaistapodhanaiḥ | āśvāsito'pi citrārthaiḥ pūrvarājakathāśrayaiḥ

वहाँ पत्नी के साथ, वृद्ध तपस्वियों से घिरे हुए राजा को प्राचीन राजाओं की कथाओं पर आधारित विचित्र प्रसंगों से सांत्वना दी गई।

श्लोक 8 (3.299.8)

ततस्तौ पुनराश्वस्तौ वृद्धौ पुत्रदिदृक्षया । बाल्यवृत्तानि पुत्रस्य सावित्र्या दर्शनानि च । शोकं जग्मतुरन्योन्यं स्मरन्तौ भृशदुःखितौ ॥

tatastau punarāśvastau vṛddhau putradidṛkṣayā | bālyavṛttāni putrasya sāvitryā darśanāni ca | śokaṃ jagmaturanyonyaṃ smarantau bhṛśaduḥkhitau

फिर भी, सांत्वना पाकर भी, पुत्र को देखने के लिए आतुर वे दोनों वृद्ध उसके बचपन की बातें और सावित्री का रूप याद करते हुए अत्यन्त दुःखी होकर साथ-साथ शोक में डूब गए।

श्लोक 9 (3.299.9)

हापुत्र हासाध्वि वधु क्वासिक्वासीत्यरोदताम् । ब्राह्मणः सत्यवाक्तेषामुवाचेदं तयोर्वचः ॥

hāputra hāsādhvi vadhu kvāsikvāsītyarodatām | brāhmaṇaḥ satyavākteṣāmuvācedaṃ tayorvacaḥ

"हा पुत्र! हा साध्वी बहू! तुम कहाँ हो, कहाँ हो?" — कहकर वे रोने लगे। तब उनमें से एक सत्यवादी ब्राह्मण ने उन दोनों से यह वचन कहा।

सुवर्चा उवाच

श्लोक 10 (3.299.10)

यथास्य भार्या सावित्री तपसा च दमेन च । आचारेण च संयुक्ता तथा जीवति सत्यवान् ॥

yathāsya bhāryā sāvitrī tapasā ca damena ca | ācāreṇa ca saṃyuktā tathā jīvati satyavān

"जिस प्रकार उसकी पत्नी सावित्री तप, संयम और सदाचार से युक्त है, उसी प्रकार सत्यवान् निश्चय ही जीवित है।"

गौतम उवाच

श्लोक 11 (3.299.11)

वेदाः साङ्गा मयाऽधीतास्तपो मे संचितं महत् । कौमारब्रह्मचर्यं च गुरवोऽग्निश्च तोषिताः ॥

vedāḥ sāṅgā mayā'dhītāstapo me saṃcitaṃ mahat | kaumārabrahmacaryaṃ ca guravo'gniśca toṣitāḥ

"मैंने अंगों सहित वेदों का अध्ययन किया है, महान तप संचित किया है, बाल्यकाल से ब्रह्मचर्य का पालन किया है और गुरुजनों तथा अग्नि को संतुष्ट किया है।

श्लोक 12 (3.299.12)

समाहितेन चीर्णानि सर्वाण्येव व्रतानि मे । वायुभक्षोपवासश्च कृतोमे विधिवत्सदा ॥

samāhitena cīrṇāni sarvāṇyeva vratāni me | vāyubhakṣopavāsaśca kṛtome vidhivatsadā

मैंने एकाग्र मन से सभी व्रतों का पालन किया है और सदा विधिपूर्वक केवल वायु पीकर उपवास किए हैं।

श्लोक 13 (3.299.13)

अनेन तपसा वेद्मि सर्वं परचिकीर्षितम् । सत्यमेतन्निबोधध्वं ध्रियते सत्यवानिति ॥

anena tapasā vedmi sarvaṃ paracikīrṣitam | satyametannibodhadhvaṃ dhriyate satyavāniti

इसी तप के बल से मैं दूसरों के सब मनोभाव जान लेता हूँ। इसे सत्य समझो — सत्यवान् जीवित है।"

शिष्य उवाच

श्लोक 14 (3.299.14)

उपाध्यायस्य मे वक्त्राद्यथा वाक्यं विनिःसृतम् । नैव जातु भवेन्मिथ्या तथा जीवति सत्यवान् ॥

upādhyāyasya me vaktrādyathā vākyaṃ viniḥsṛtam | naiva jātu bhavenmithyā tathā jīvati satyavān

"जैसे मेरे गुरु के मुख से निकला कोई वचन कभी मिथ्या नहीं होता, वैसे ही सत्यवान् निश्चय ही जीवित है।"

ऋषय ऊचुः

श्लोक 15 (3.299.15)

यथाऽस्य भार्या सावित्री सर्वैरेव सुलक्षणैः । अवैधव्यकरैर्युक्ता तथा जीवति सत्यवान् ॥

yathā'sya bhāryā sāvitrī sarvaireva sulakṣaṇaiḥ | avaidhavyakarairyuktā tathā jīvati satyavān

"जिस प्रकार उसकी पत्नी सावित्री वैधव्य से बचाने वाले सभी शुभ लक्षणों से युक्त है, उसी प्रकार सत्यवान् निश्चय ही जीवित है।"

भारद्वाज उवाच

श्लोक 16 (3.299.16)

यथाऽस्य भार्या सावित्री तपसा च दमेन च । आचारेण च संयुक्ता तथा जीवति सत्यवान् ॥

yathā'sya bhāryā sāvitrī tapasā ca damena ca | ācāreṇa ca saṃyuktā tathā jīvati satyavān

"जिस प्रकार उसकी पत्नी सावित्री तप, संयम और सदाचार से युक्त है, उसी प्रकार सत्यवान् निश्चय ही जीवित है।"

दाल्भ्य उवाच

श्लोक 17 (3.299.17)

यथा दृष्टिः प्रवृत्ता ते सावित्र्याश्च यथा व्रतम् । गताऽऽहारमकृत्वैव तथा जीवति सत्यवान् ॥

yathā dṛṣṭiḥ pravṛttā te sāvitryāśca yathā vratam | gatā''hāramakṛtvaiva tathā jīvati satyavān

"जिस प्रकार तुम्हारी दृष्टि लौट आई है और जिस प्रकार सावित्री अपना व्रत निभाते हुए बिना भोजन किए उसके साथ गई है, उसी प्रकार सत्यवान् निश्चय ही जीवित है।"

आपस्तम्ब उवाच

श्लोक 18 (3.299.18)

यथा वदन्ति शान्तायां दिशि वै मृगपक्षिणः । पार्थिवीं चैववृद्धिं ते तथा जीवति सत्यवान् ॥

yathā vadanti śāntāyāṃ diśi vai mṛgapakṣiṇaḥ | pārthivīṃ caivavṛddhiṃ te tathā jīvati satyavān

"जिस प्रकार मृग और पक्षी शान्त दिशा में बोलकर तुम्हारे राजोचित अभ्युदय की सूचना दे रहे हैं, उसी प्रकार सत्यवान् निश्चय ही जीवित है।"

धौम्य उवाच

श्लोक 19 (3.299.19)

सर्वैर्गुणैरुपेतस्ते यथा पुत्रो जनप्रियः । दीर्घायुर्लक्षणोपेतस्तथा जीवति सत्यवान् ॥

sarvairguṇairupetaste yathā putro janapriyaḥ | dīrghāyurlakṣaṇopetastathā jīvati satyavān

"जिस प्रकार तुम्हारा पुत्र सब गुणों से सम्पन्न, प्रजा का प्रिय और दीर्घायु के लक्षणों से युक्त है, उसी प्रकार सत्यवान् निश्चय ही जीवित है।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 20 (3.299.20)

एवमाश्वासितस्तैस्तु सत्यवाग्भिस्तपस्विभिः । तांस्तान्विगणयन्सर्वांस्ततः स्थिर इवाभवत् ॥

evamāśvāsitastaistu satyavāgbhistapasvibhiḥ | tāṃstānvigaṇayansarvāṃstataḥ sthira ivābhavat

उन सत्यवादी तपस्वियों द्वारा इस प्रकार सांत्वना पाकर और उनकी एक-एक बात पर विचार करके राजा कुछ स्थिर हो गए।

श्लोक 21 (3.299.21)

ततो मुहूर्तात्सावित्री भर्त्रा सत्यवता सह । आजगामाश्रमं रात्रौ प्रहृष्टा प्रविवेश ह ॥

tato muhūrtātsāvitrī bhartrā satyavatā saha | ājagāmāśramaṃ rātrau prahṛṣṭā praviveśa ha

तब थोड़ी ही देर में सावित्री अपने पति सत्यवान् के साथ रात में आश्रम आ पहुँची और प्रसन्न होकर भीतर प्रवेश किया।

श्लोक 22 (3.299.22)

दृष्ट्वा चोत्पतिताः सर्वेहर्षं जग्मुश्च ते द्विजाः । कण्ठं माता पिता चास्य समालिङ्ग्याभ्यरोदतां ॥

dṛṣṭvā cotpatitāḥ sarveharṣaṃ jagmuśca te dvijāḥ | kaṇṭhaṃ mātā pitā cāsya samāliṅgyābhyarodatāṃ

उन्हें देखकर सब द्विज उठ खड़े हुए और हर्षित हुए, और सत्यवान् के माता-पिता उसके गले लगकर रोने लगे।

ब्राह्मणा ऊचुः

श्लोक 23 (3.299.23)

पुत्रेण संगतं त्वां तु चक्षुष्मन्तं निरीक्ष्य च । सर्वे वयं वै पृच्छामो वृद्धिं वै पृथिवीपते ॥

putreṇa saṃgataṃ tvāṃ tu cakṣuṣmantaṃ nirīkṣya ca | sarve vayaṃ vai pṛcchāmo vṛddhiṃ vai pṛthivīpate

"हे पृथ्वीपति! तुम्हें पुत्र से मिला हुआ और नेत्रयुक्त देखकर हम सब तुम्हारे अभ्युदय की मंगलकामना करते हैं।

श्लोक 24 (3.299.24)

समागमेन पुत्रस्य सावित्र्या दर्शनेन च । चक्षुषश्चात्मनो लाभात्त्रिभिर्दिष्ट्या विवर्धसे ॥

samāgamena putrasya sāvitryā darśanena ca | cakṣuṣaścātmano lābhāttribhirdiṣṭyā vivardhase

पुत्र से मिलन, सावित्री के दर्शन और अपने नेत्रों की प्राप्ति — सौभाग्य से इन तीनों से तुम्हारी वृद्धि हो रही है।

श्लोक 25 (3.299.25)

सर्वैरस्माभिरुक्तं यत्तथा तन्नात्रसंशयः । भूयोभूयः समृद्धिस्ते क्षिप्रमेव भविष्यति ॥

sarvairasmābhiruktaṃ yattathā tannātrasaṃśayaḥ | bhūyobhūyaḥ samṛddhiste kṣiprameva bhaviṣyati

हम सबने जो कहा था, वह वैसा ही हुआ; इसमें कोई संदेह नहीं। तुम्हारी समृद्धि शीघ्र ही बार-बार बढ़ेगी।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 26 (3.299.26)

ततोऽग्निं तत्र संज्वाल्य द्विजास्ते सर्व एव हि । उपासांचक्रिरे पार्थ द्युमत्सेनं महीपतिम् ॥

tato'gniṃ tatra saṃjvālya dvijāste sarva eva hi | upāsāṃcakrire pārtha dyumatsenaṃ mahīpatim

हे पार्थ! तब उन सब द्विजों ने वहाँ अग्नि प्रज्वलित की और राजा द्युमत्सेन के पास बैठ गए।

श्लोक 27 (3.299.27)

शैव्या च सत्यवांश्चैव सावित्री चैकतः स्थिताः । सर्वैस्तैरभ्यनुज्ञाता विशोकाः समुपाविशन् ॥

śaivyā ca satyavāṃścaiva sāvitrī caikataḥ sthitāḥ | sarvaistairabhyanujñātā viśokāḥ samupāviśan

शैब्या, सत्यवान् और सावित्री एक ओर खड़े रहे; फिर सबकी अनुमति पाकर वे शोकरहित होकर बैठ गए।

श्लोक 28 (3.299.28)

ततो राज्ञा सहासीनाः सर्वे ते वनवासिनः । जातकौतूहलाः पार्थ पप्रच्छुर्नृपतेः सुतम् ॥

tato rājñā sahāsīnāḥ sarve te vanavāsinaḥ | jātakautūhalāḥ pārtha papracchurnṛpateḥ sutam

हे पार्थ! तब राजा के साथ बैठे उन सब वनवासियों ने कौतूहलवश राजपुत्र से पूछा।

वनवासिन ऊचुः

श्लोक 29 (3.299.29)

प्रागेव नागतं कस्मात्सभार्येण त्वया विभो । विरात्रे चागतं कस्मात्कोनु बन्धस्तवाभवत् ॥

prāgeva nāgataṃ kasmātsabhāryeṇa tvayā vibho | virātre cāgataṃ kasmātkonu bandhastavābhavat

"हे प्रभो! तुम अपनी पत्नी के साथ पहले ही क्यों नहीं लौटे? इतनी रात बीते क्यों आए? तुम्हें किसने रोक लिया था?

श्लोक 30 (3.299.30)

संतापितः पिता माता वयं चैव नृपात्मज । कस्मादिति न जानीमस्तत्सर्वं वक्तुमर्हसि ॥

saṃtāpitaḥ pitā mātā vayaṃ caiva nṛpātmaja | kasmāditi na jānīmastatsarvaṃ vaktumarhasi

हे राजकुमार! तुम्हारे माता-पिता और हम सब भी संताप में पड़े रहे। हम नहीं जानते कि ऐसा क्यों हुआ; तुम हमें सब कुछ बताओ।"

सत्यवानुवाच

श्लोक 31 (3.299.31)

पित्राऽहमभ्यनुज्ञातः सावित्रीसहितो गतः । अथ मेऽभूच्छिरोदुःखं वने काष्ठानि भिन्दतः ॥

pitrā'hamabhyanujñātaḥ sāvitrīsahito gataḥ | atha me'bhūcchiroduḥkhaṃ vane kāṣṭhāni bhindataḥ

"पिता की अनुमति लेकर मैं सावित्री के साथ गया था। फिर वन में लकड़ियाँ चीरते समय मेरे सिर में पीड़ा होने लगी।

श्लोक 32 (3.299.32)

सुप्तश्चाहं वेदनया चिरमित्युपलक्षये । तावत्कालं न च मया सुप्तपूर्वं कदाचन ॥

suptaścāhaṃ vedanayā ciramityupalakṣaye | tāvatkālaṃ na ca mayā suptapūrvaṃ kadācana

उस पीड़ा के कारण मैं सो गया, और मुझे लगता है कि बहुत देर तक सोता रहा; इतनी देर तक मैं पहले कभी नहीं सोया।

श्लोक 33 (3.299.33)

सर्वेषामेव भवतां संतापो मा भवेदिति । अतो विरात्रागमनं नान्यदस्तीह कारणम् ॥

sarveṣāmeva bhavatāṃ saṃtāpo mā bhavediti | ato virātrāgamanaṃ nānyadastīha kāraṇam

मैं नहीं चाहता कि आप में से किसी को भी संताप हो; मेरे इतनी रात गए लौटने का यही कारण है, कोई दूसरा नहीं।"

गौतम उवाच

श्लोक 34 (3.299.34)

अकस्माच्चक्षुः प्राप्तिर्द्युमत्सेनस्य ते पितुः । नास्य त्वं कारणं वेत्सि सावित्री वक्तुमर्हति ॥

akasmāccakṣuḥ prāptirdyumatsenasya te pituḥ | nāsya tvaṃ kāraṇaṃ vetsi sāvitrī vaktumarhati

"तुम्हारे पिता द्युमत्सेन को अचानक नेत्र मिल गए हैं। इसका कारण तुम नहीं जानते; सावित्री ही इसे बता सकती है।

श्लोक 35 (3.299.35)

श्रोतुमिच्छामि सावित्रि त्वं हि वेत्थ परावरम् । त्वां हि जानामि सावित्रि सावित्रीमिव तेजसा ॥

śrotumicchāmi sāvitri tvaṃ hi vettha parāvaram | tvāṃ hi jānāmi sāvitri sāvitrīmiva tejasā

हे सावित्री! मैं इसे सुनना चाहता हूँ, क्योंकि तुम पर और अपर सब जानती हो। हे सावित्री! मैं तुम्हें तेज में देवी सावित्री के समान मानता हूँ।

श्लोक 36 (3.299.36)

त्वमत्र हेतुं जानीषे तस्मात्सत्यं निरुच्यताम् । रहस्यं यदि ते नास्ति किंचिदत्र वदस्व नः ॥

tvamatra hetuṃ jānīṣe tasmātsatyaṃ nirucyatām | rahasyaṃ yadi te nāsti kiṃcidatra vadasva naḥ

तुम इसका कारण जानती हो, इसलिए सच-सच कहो। यदि इसमें कोई रहस्य की बात न हो, तो हमें बताओ।"

सावित्र्युवाच

श्लोक 37 (3.299.37)

एवमेतद्यथा वेत्थ संकल्पो नान्यथा हि वः । न हि किंचिद्रहस्यं मे श्रूयतां तथ्यमेव यत् ॥

evametadyathā vettha saṃkalpo nānyathā hi vaḥ | na hi kiṃcidrahasyaṃ me śrūyatāṃ tathyameva yat

"जैसा आप समझते हैं, बात वैसी ही है; आपका अनुमान गलत नहीं है। मेरे पास कोई रहस्य नहीं है; जो सच है, वह सुनिए।

श्लोक 38 (3.299.38)

मृत्युर्मे पत्युराख्यातो नारदेन महात्मना । स चाद्य दिवसः प्राप्तस्ततो नैनं जहाम्यहम् ॥

mṛtyurme patyurākhyāto nāradena mahātmanā | sa cādya divasaḥ prāptastato nainaṃ jahāmyaham

महात्मा नारद ने मेरे पति की मृत्यु बता दी थी, और वह दिन आज ही आ पहुँचा था; इसीलिए मैं उन्हें छोड़कर नहीं गई।

श्लोक 39 (3.299.39)

सुप्तं चैनं यमः साक्षादुपागच्छत्सकिंकरः । स एनमनयद्बद्ध्वा दिशं पितृनिषेविताम् ॥

suptaṃ cainaṃ yamaḥ sākṣādupāgacchatsakiṃkaraḥ | sa enamanayadbaddhvā diśaṃ pitṛniṣevitām

जब वे सो रहे थे, तब स्वयं यम अपने सेवकों के साथ आए और उन्हें बाँधकर पितरों के निवास वाली दिशा की ओर ले चले।

श्लोक 40 (3.299.40)

अस्तौषं तमहं देवं सत्येन वचसा विभुम् । पञ्च वै तेन मे दत्ता वराः शृणुत तान्मम ॥

astauṣaṃ tamahaṃ devaṃ satyena vacasā vibhum | pañca vai tena me dattā varāḥ śṛṇuta tānmama

मैंने सत्य वचनों से उन सर्वसमर्थ देव की स्तुति की, और उन्होंने मुझे पाँच वर दिए। उन्हें मुझसे सुनिए।

श्लोक 41 (3.299.41)

चक्षुषी च स्वराज्यंच द्वौ वरौ श्वशुरस्य मे । लब्धं पितुः पुत्रशतं पुत्राणां चात्मनः शतम् ॥

cakṣuṣī ca svarājyaṃca dvau varau śvaśurasya me | labdhaṃ pituḥ putraśataṃ putrāṇāṃ cātmanaḥ śatam

दो वर मेरे ससुर के लिए थे — नेत्र और अपना राज्य। अपने पिता के लिए मैंने सौ पुत्र पाए और अपने लिए भी सौ पुत्र।

श्लोक 42 (3.299.42)

चतुर्वर्षशतायुर्मे भर्ता लब्धश्च सत्यवान् । भर्तुर्हि जीवितार्थं तु मया चीर्णं त्विदं व्रतम् ॥

caturvarṣaśatāyurme bhartā labdhaśca satyavān | bharturhi jīvitārthaṃ tu mayā cīrṇaṃ tvidaṃ vratam

और मैंने चार सौ वर्ष की आयु वाले अपने पति सत्यवान् को पाया। पति के जीवन के लिए ही मैंने यह व्रत किया था।

श्लोक 43 (3.299.43)

एतत्सर्वं मयाऽऽख्यातं कारणं विस्तरेण वः । यथावृत्तं सुखोदर्कमिदं दुःखं महन्मम ॥

etatsarvaṃ mayā''khyātaṃ kāraṇaṃ vistareṇa vaḥ | yathāvṛttaṃ sukhodarkamidaṃ duḥkhaṃ mahanmama

मैंने आपको सारा कारण विस्तार से बता दिया — कैसे मेरा यह महान दुःख सुखद परिणाम में बदल गया।"

ऋषय ऊचुः

श्लोक 44 (3.299.44)

निमज्जमानं व्यसनैरभिद्रुतं । कुलं नरेन्द्रस्य तमोमये ह्रदे । त्वया सुशीलव्रतपुण्यया कुलं । समुद्धृतं साध्वि पुनः कुलीनया ॥

nimajjamānaṃ vyasanairabhidrutaṃ | kulaṃ narendrasya tamomaye hrade | tvayā suśīlavratapuṇyayā kulaṃ | samuddhṛtaṃ sādhvi punaḥ kulīnayā

"विपत्तियों से घिरा और अन्धकारमय सरोवर में डूबता हुआ राजा का कुल, हे साध्वी कुलीन नारी, तुमने अपने सुशील आचरण और व्रतों के पुण्य से फिर उबार लिया है।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 45 (3.299.45)

तथा प्रशस्य ह्यभिपूज्य चैव ते । वरस्त्रियं तामृषयः समागताः । नरेन्द्रमामन्त्र्य सपुत्रमञ्जसा । शिवेन जग्मुर्मुदिताः स्वमालयम् ॥

tathā praśasya hyabhipūjya caiva te | varastriyaṃ tāmṛṣayaḥ samāgatāḥ | narendramāmantrya saputramañjasā | śivena jagmurmuditāḥ svamālayam

इस प्रकार उस श्रेष्ठ नारी की प्रशंसा और पूजा करके वहाँ एकत्र ऋषि राजा और उसके पुत्र से विदा लेकर शीघ्र ही कुशलपूर्वक और प्रसन्न होकर अपने-अपने आश्रमों को चले गए।

अध्याय 298अध्याय-सूचीअध्याय 300