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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 300

द्युमत्सेन को राज्य की पुनःप्राप्ति

अगली सुबह, जब ऋषि सावित्री की महिमा का बखान कर ही रहे थे, शाल्व देश की प्रजा आकर द्युमत्सेन को बताती है कि उनके राज्य पर अधिकार करने वाले शत्रु को उसी के मन्त्री ने मार डाला है और प्रजा उन्हें, चाहे वे देख सकें या नहीं, फिर से राजा बनाना चाहती है। द्युमत्सेन अपने नगर लौटकर अभिषिक्त होते हैं और सत्यवान् युवराज बनते हैं; समय पाकर सावित्री के सौ पुत्र होते हैं और उसके पिता के भी सौ पुत्र। मार्कण्डेय युधिष्ठिर को विश्वास दिलाते हैं कि जैसे सावित्री ने अपने कुल को उबारा, वैसे ही द्रौपदी पाण्डवों का उद्धार करेगी, और वैशम्पायन इस कथा के श्रवण के फल के साथ प्रसंग समाप्त करते हैं।

अध्याय 299अध्याय-सूचीअध्याय 301

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 1 (3.300.1)

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामुदिते सूर्यमण्डले । कृतपौर्वाह्णिकाः सर्वे समेयुस्ते तपोधनाः ॥

tasyāṃ rātryāṃ vyatītāyāmudite sūryamaṇḍale | kṛtapaurvāhṇikāḥ sarve sameyuste tapodhanāḥ

वह रात बीतने और सूर्यमण्डल के उदय होने पर वे सब तपस्वी अपने प्रातःकालीन कर्म करके एकत्र हुए।

श्लोक 2 (3.300.2)

तदेव सर्वं सावित्र्या महाभाग्यं महर्षयः । द्युमत्सेनाय नातृप्यन्कथयन्तः पुनः पुनः ॥

tadeva sarvaṃ sāvitryā mahābhāgyaṃ maharṣayaḥ | dyumatsenāya nātṛpyankathayantaḥ punaḥ punaḥ

वे महर्षि द्युमत्सेन को सावित्री के उसी महान सौभाग्य की कथा बार-बार सुनाते हुए तृप्त नहीं होते थे।

श्लोक 3 (3.300.3)

ततः प्रकृतयः सर्वाः साल्वेभ्योऽभ्यागता नृपम् । आचख्युर्निहतं चैव स्वेनामात्येन तं द्विषम् ॥

tataḥ prakṛtayaḥ sarvāḥ sālvebhyo'bhyāgatā nṛpam | ācakhyurnihataṃ caiva svenāmātyena taṃ dviṣam

तब शाल्व देश से सारी प्रजा राजा के पास आई और बताया कि उनका शत्रु अपने ही मन्त्री के हाथों मारा गया।

श्लोक 4 (3.300.4)

तं मन्त्रिणा हतं प्रोच्य ससहायं सबान्धवम् । न्यवेदयन्यथावृत्तं विद्रुतं च द्विषद्बलम् ॥

taṃ mantriṇā hataṃ procya sasahāyaṃ sabāndhavam | nyavedayanyathāvṛttaṃ vidrutaṃ ca dviṣadbalam

उन्होंने बताया कि मन्त्री ने उस शत्रु को उसके सहायकों और बन्धु-बान्धवों सहित मार डाला है, और सारा वृत्तान्त सुनाया कि शत्रु की सेना भाग खड़ी हुई है।

श्लोक 5 (3.300.5)

ऐकमत्यं च सर्वस्य जनस्य स्वं नृपं प्रति । सचक्षुर्वाऽप्यचक्षुर्वा स नो राजा भवत्विति ॥

aikamatyaṃ ca sarvasya janasya svaṃ nṛpaṃ prati | sacakṣurvā'pyacakṣurvā sa no rājā bhavatviti

उन्होंने यह भी बताया कि अपने राजा के विषय में सब लोगों का एक ही मत है — "चाहे वे देख सकें या नहीं, वही हमारे राजा हों।"

प्रकृतय ऊचुः

श्लोक 6 (3.300.6)

अनेन निश्चयेनेह वयं प्रस्थापिता नृप । प्राप्तानीमानि यानानि चतुरङ्गं च ते बलम् ॥

anena niścayeneha vayaṃ prasthāpitā nṛpa | prāptānīmāni yānāni caturaṅgaṃ ca te balam

"हे राजन्! इसी निश्चय के साथ हमें यहाँ भेजा गया है। ये वाहन और आपकी चतुरंगिणी सेना आपके लिए आ पहुँची है।

श्लोक 7 (3.300.7)

प्रयाहि राजन्भद्रं ते घुष्टस्ते नगरे जयः । अध्यास्स्व चिररात्राय पितृपैतामहं पदम् ॥

prayāhi rājanbhadraṃ te ghuṣṭaste nagare jayaḥ | adhyāssva cirarātrāya pitṛpaitāmahaṃ padam

हे राजन्! आपका कल्याण हो, प्रस्थान कीजिए। नगर में आपकी विजय की घोषणा हो चुकी है। अपने पिता-पितामहों के पद पर चिरकाल तक विराजिए।"

मार्कण्डेय उवाच

श्लोक 8 (3.300.8)

चक्षुष्मन्तं च तं दृष्ट्वा राजानं वपुषाऽन्वितम् । मूर्ध्ना निपतिताः सर्वेविस्मयोत्फुल्ललोचनाः ॥

cakṣuṣmantaṃ ca taṃ dṛṣṭvā rājānaṃ vapuṣā'nvitam | mūrdhnā nipatitāḥ sarvevismayotphullalocanāḥ

राजा को नेत्रयुक्त और सुन्दर शरीर वाला देखकर उन सबने विस्मय से आँखें फैलाए हुए सिर झुकाकर प्रणाम किया।

श्लोक 9 (3.300.9)

ततोऽभिवाद्य तान्वृद्धान्द्विजानाश्रमवासिनः । तैश्चाभिपूजितः सर्वैः प्रययौ नगरं प्रति ॥

tato'bhivādya tānvṛddhāndvijānāśramavāsinaḥ | taiścābhipūjitaḥ sarvaiḥ prayayau nagaraṃ prati

तब आश्रम में रहने वाले वृद्ध ब्राह्मणों को प्रणाम करके और उन सबसे सम्मानित होकर वे नगर की ओर चल पड़े।

श्लोक 10 (3.300.10)

शैव्या च सह सावित्र्या स्वास्तीर्णेन सुवर्चसा । नरयुक्तेन यानेन प्रययौ सेनया वृता ॥

śaivyā ca saha sāvitryā svāstīrṇena suvarcasā | narayuktena yānena prayayau senayā vṛtā

शैब्या सावित्री के साथ सुन्दर बिछावन वाले, तेजस्वी और मनुष्यों द्वारा ढोए जाने वाले वाहन में सेना से घिरी हुई चलीं।

श्लोक 11 (3.300.11)

ततोऽभिषिषिचुः प्रीत्या द्युमत्सेनं पुरोहिताः । पुत्रं चास्य महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयन् ॥

tato'bhiṣiṣicuḥ prītyā dyumatsenaṃ purohitāḥ | putraṃ cāsya mahātmānaṃ yauvarājye'bhyaṣecayan

तब पुरोहितों ने प्रसन्नतापूर्वक द्युमत्सेन का राज्याभिषेक किया और उनके महात्मा पुत्र को युवराज पद पर अभिषिक्त किया।

श्लोक 12 (3.300.12)

ततः कालेन महता सावित्र्याः कीर्तिवर्धनम् । तद्वै पुत्रशतं जज्ञे शूराणामनिवर्तिनाम् ॥

tataḥ kālena mahatā sāvitryāḥ kīrtivardhanam | tadvai putraśataṃ jajñe śūrāṇāmanivartinām

बहुत समय बीतने पर सावित्री के सौ पुत्र हुए, जो शूरवीर थे, युद्ध से कभी पीछे न हटने वाले थे और उसकी कीर्ति बढ़ाने वाले थे।

श्लोक 13 (3.300.13)

भ्रातृणां सोदराणां च तथैवास्याभवच्छतम् । मद्राधिपस्याश्वपतेर्मालव्यां सुमहाबलम् ॥

bhrātṛṇāṃ sodarāṇāṃ ca tathaivāsyābhavacchatam | madrādhipasyāśvapatermālavyāṃ sumahābalam

इसी प्रकार मद्रराज अश्वपति के मालवी से उसके सौ महाबली सगे भाई भी उत्पन्न हुए।

श्लोक 14 (3.300.14)

एवमात्मा पिता माता श्वश्रूः श्वशुर एव च । भर्तुः कुलं च सावित्र्या सर्वं कृच्छ्रात्समुद्धृतं ॥

evamātmā pitā mātā śvaśrūḥ śvaśura eva ca | bhartuḥ kulaṃ ca sāvitryā sarvaṃ kṛcchrātsamuddhṛtaṃ

इस प्रकार सावित्री ने स्वयं को, अपने पिता-माता को, सास-ससुर को और पति के पूरे कुल को संकट से उबार लिया।

श्लोक 15 (3.300.15)

तथैवैषा हि कल्याणी द्रौपदी शीलसंमता । तारयिष्यति वः सर्वान्सावित्रीव कुलाङ्गना ॥

tathaivaiṣā hi kalyāṇī draupadī śīlasaṃmatā | tārayiṣyati vaḥ sarvānsāvitrīva kulāṅganā

इसी प्रकार यह कल्याणी, शील के लिए सम्मानित द्रौपदी भी कुलीन सावित्री की भाँति तुम सबको पार लगाएगी।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (3.300.16)

एवं स पाण्डवस्तेन अनुनीतो महात्मना । विशोको विज्वरो राजन्काम्यके न्यवसत्तदा ॥

evaṃ sa pāṇḍavastena anunīto mahātmanā | viśoko vijvaro rājankāmyake nyavasattadā

हे राजन्! उन महात्मा द्वारा इस प्रकार समझाए जाने पर पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर शोक और चिन्ता से मुक्त होकर काम्यक वन में रहने लगे।

श्लोक 17 (3.300.17)

यश्चेदं शृणुयाद्भक्त्या सावित्र्याख्यानमुत्तमम् । स सुखी सर्वसिद्धार्थो न दुःखं प्राप्नुयान्नरः ॥

yaścedaṃ śṛṇuyādbhaktyā sāvitryākhyānamuttamam | sa sukhī sarvasiddhārtho na duḥkhaṃ prāpnuyānnaraḥ

जो मनुष्य सावित्री के इस उत्तम आख्यान को भक्तिपूर्वक सुनता है, वह सुखी और सब मनोरथों में सफल होता है, और उसे दुःख प्राप्त नहीं होता।

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