आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 302
सूर्य का कर्ण से कुण्डल न देने का आग्रह
सूर्य कर्ण के निश्चय का उत्तर देते हैं: प्राण देकर पाई गई कीर्ति मृत व्यक्ति के किसी काम की नहीं, और कर्ण के परिवार तथा सुहृदों को उसकी जीवित रहते ही आवश्यकता है। कर्ण उनका भक्त है, और एक ऐसे दैवी रहस्य के कारण भी जिसे वे अभी प्रकट नहीं करेंगे, सूर्य उससे आग्रह करते हैं कि वह युक्तिपूर्ण वचनों से इन्द्र को लौटा दे। वे कहते हैं कि जब तक कर्ण के पास कुण्डल हैं, अर्जुन उसे कभी नहीं जीत सकता, चाहे स्वयं इन्द्र अर्जुन का बाण बन जाएँ।
सूर्य उवाच
श्लोक 1 (3.302.1)
माऽहितं कर्ण कार्षीस्त्वमात्मनः सुहृदां तथा । पुत्राणामथ भार्याणामथो मातुरथो पितुः ॥
mā'hitaṃ karṇa kārṣīstvamātmanaḥ suhṛdāṃ tathā | putrāṇāmatha bhāryāṇāmatho māturatho pituḥ
"हे कर्ण! अपना, अपने सुहृदों का, पुत्रों और पत्नियों का, माता और पिता का अहित मत करो।
श्लोक 2 (3.302.2)
शरीरस्याविरोधेन प्राणिनां प्राणभृद्वर । इष्यते यशसः प्राप्तिः कीर्तिश्च त्रिदिवे स्थिरा ॥
śarīrasyāvirodhena prāṇināṃ prāṇabhṛdvara | iṣyate yaśasaḥ prāptiḥ kīrtiśca tridive sthirā
हे प्राणधारियों में श्रेष्ठ! प्राणी शरीर को हानि पहुँचाए बिना ही यश की प्राप्ति और स्वर्ग में स्थिर रहने वाली कीर्ति चाहते हैं।
श्लोक 3 (3.302.3)
यस्त्वं प्राणविरोधेन कीर्तिमिच्छसि शाश्वतीम् । सा ते प्राणान्समादाय गमिष्यति न संशयः ॥
yastvaṃ prāṇavirodhena kīrtimicchasi śāśvatīm | sā te prāṇānsamādāya gamiṣyati na saṃśayaḥ
पर तुम प्राणों की बलि देकर शाश्वत कीर्ति चाहते हो; वह कीर्ति निश्चय ही तुम्हारे प्राण लेकर चली जाएगी, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 4 (3.302.4)
जीवतां कुरुते कार्यं पिता माता सुतास्तथा । ये चान्ये बान्धवाः केचिल्लोकेऽस्मिन्पुरुषर्षभ ॥
jīvatāṃ kurute kāryaṃ pitā mātā sutāstathā | ye cānye bāndhavāḥ kecilloke'sminpuruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ! पिता, माता, पुत्र और इस संसार में जो अन्य बन्धु-बान्धव हैं, वे जीवितों से ही अपना प्रयोजन सिद्ध करते हैं,
श्लोक 5 (3.302.5)
राजानश्च नरव्याघ्र पौरुषेण निबोध तत् । कीर्तिश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्य महाद्युते ॥
rājānaśca naravyāghra pauruṣeṇa nibodha tat | kīrtiśca jīvataḥ sādhvī puruṣasya mahādyute
और हे नरव्याघ्र, राजा भी; इसे अपने पौरुष से समझो। हे महातेजस्वी! कीर्ति मनुष्य के लिए तभी अच्छी है जब वह जीवित हो।
श्लोक 6 (3.302.6)
मृतस्य कीर्त्या किं कार्यं भस्मीभूतस्य देहिनः । मृतः कीर्तिं न जानीते जीवन्कीर्तिं समश्नुते ॥
mṛtasya kīrtyā kiṃ kāryaṃ bhasmībhūtasya dehinaḥ | mṛtaḥ kīrtiṃ na jānīte jīvankīrtiṃ samaśnute
मरकर भस्म हो चुके देहधारी के लिए कीर्ति किस काम की? मरा हुआ कीर्ति को नहीं जानता; जीवित ही कीर्ति का सुख भोगता है।
श्लोक 7 (3.302.7)
मृतस्य कीर्तिर्मर्त्यस्य यथा माला गतायुषः । अहं तु त्वां ब्रवीम्येतद्भक्तोऽसीति हितेप्सया ॥
mṛtasya kīrtirmartyasya yathā mālā gatāyuṣaḥ | ahaṃ tu tvāṃ bravīmyetadbhakto'sīti hitepsayā
मरे हुए मनुष्य की कीर्ति वैसी ही है जैसे गतायु व्यक्ति के गले की माला। मैं तुमसे यह इसलिए कह रहा हूँ कि तुम मेरे भक्त हो और मैं तुम्हारा हित चाहता हूँ।
श्लोक 8 (3.302.8)
भक्तिमन्तो हि मे रक्ष्या इत्येतेनापि हेतुना । भक्तोऽयं परया भक्त्या मामित्येव महाभुज ॥
bhaktimanto hi me rakṣyā ityetenāpi hetunā | bhakto'yaṃ parayā bhaktyā māmityeva mahābhuja
मेरे भक्तों की रक्षा होनी चाहिए — इस कारण से भी। हे महाबाहो! यह जानकर कि यह परम भक्ति से मेरा भक्त है,
श्लोक 9 (3.302.9)
ममापि भक्तिरुत्पन्ना स त्वं कुरु वचो मम । अस्ति चात्र परं किंचिदध्यात्मं देवनिर्मितम् । अतश्च त्वां ब्रवीम्येतत्क्रियतामविशङ्कया ॥
mamāpi bhaktirutpannā sa tvaṃ kuru vaco mama | asti cātra paraṃ kiṃcidadhyātmaṃ devanirmitam | ataśca tvāṃ bravīmyetatkriyatāmaviśaṅkayā
मेरे मन में भी तुम्हारे प्रति स्नेह उत्पन्न हुआ है; इसलिए मेरी बात मानो। इसमें देवताओं द्वारा रचा हुआ कोई गूढ़ रहस्य भी है; इसीलिए मैं तुमसे यह कह रहा हूँ। निःशंक होकर ऐसा करो।
श्लोक 10 (3.302.10)
देवगुह्यं त्वया ज्ञातुं न शक्यं पुरुषर्षभ । तस्मान्नाख्यामि ते गुह्यं काले वेत्स्यति तद्भवान् ॥
devaguhyaṃ tvayā jñātuṃ na śakyaṃ puruṣarṣabha | tasmānnākhyāmi te guhyaṃ kāle vetsyati tadbhavān
हे पुरुषश्रेष्ठ! देवताओं का रहस्य तुम नहीं जान सकते; इसलिए मैं वह रहस्य तुम्हें नहीं बताता। समय आने पर तुम उसे जान लोगे।
श्लोक 11 (3.302.11)
पुनरुक्तं च वक्ष्यामि त्वं राधेय निबोध तत् । माऽस्मै ते कुण्डले दद्या भिक्षिते वज्रपाणिना ॥
punaruktaṃ ca vakṣyāmi tvaṃ rādheya nibodha tat | mā'smai te kuṇḍale dadyā bhikṣite vajrapāṇinā
हे राधेय! मैं फिर से कहता हूँ, ध्यान से सुनो — वज्रधारी इन्द्र के माँगने पर उन्हें अपने कुण्डल मत देना।
श्लोक 12 (3.302.12)
शोभसे कुण्डलाभ्यां च रुचिराभ्यां महाद्युते । विशाखयोर्मध्यगतः शशीव विमले दिवि ॥
śobhase kuṇḍalābhyāṃ ca rucirābhyāṃ mahādyute | viśākhayormadhyagataḥ śaśīva vimale divi
हे महातेजस्वी! अपने सुन्दर कुण्डलों से तुम वैसे ही शोभा पाते हो जैसे निर्मल आकाश में विशाखा के दो तारों के बीच स्थित चन्द्रमा।
श्लोक 13 (3.302.13)
कीर्तिश्च जीवतः साध्वी पुरुषस्येति विद्धि तत् । प्रत्याख्येयस्त्वया तात कुण्डलार्थे सुरेश्वरः ॥
kīrtiśca jīvataḥ sādhvī puruṣasyeti viddhi tat | pratyākhyeyastvayā tāta kuṇḍalārthe sureśvaraḥ
यह जान लो कि कीर्ति मनुष्य के लिए जीवित रहते ही अच्छी है। हे तात! कुण्डल माँगने पर तुम्हें देवराज को मना कर देना चाहिए।
श्लोक 14 (3.302.14)
पाण्डवानां हिते युक्तो भिक्षन्ब्राह्मणवेषधृत् । शक्या बहुविधैर्वाक्यैः कुण्डलेप्सा त्वयाऽनघ । विहन्तुं देवराजस्य हेतुयुक्तैः पुनःपुनः ॥
pāṇḍavānāṃ hite yukto bhikṣanbrāhmaṇaveṣadhṛt | śakyā bahuvidhairvākyaiḥ kuṇḍalepsā tvayā'nagha | vihantuṃ devarājasya hetuyuktaiḥ punaḥpunaḥ
हे निष्पाप! जब वे पाण्डवों के हित में लगे हुए ब्राह्मण का वेश धरकर माँगने आएँ, तब तुम अनेक प्रकार के वचनों और युक्तियों से बार-बार देवराज की कुण्डल पाने की इच्छा को विफल कर सकते हो,
श्लोक 15 (3.302.15)
उपपत्त्युपपन्नार्थैर्माधुर्यकृतभूषणैः । पुरंदरस्य कर्ण त्वं बुद्धिमेतामपानुद ॥
upapattyupapannārthairmādhuryakṛtabhūṣaṇaiḥ | puraṃdarasya karṇa tvaṃ buddhimetāmapānuda
ऐसे वचनों से जिनका अर्थ युक्तिसंगत हो और जो मधुरता से सजे हों। हे कर्ण! पुरन्दर का यह विचार दूर कर दो।
श्लोक 16 (3.302.16)
त्वं हि नित्यं नरव्याघ्र स्पर्धसे सव्यसाचिना । सव्यसाची त्वया चेह युधि शूरः समेष्यति ॥
tvaṃ hi nityaṃ naravyāghra spardhase savyasācinā | savyasācī tvayā ceha yudhi śūraḥ sameṣyati
हे नरव्याघ्र! तुम सदा सव्यसाची अर्जुन से होड़ करते हो, और वह वीर सव्यसाची युद्ध में तुमसे भिड़ेगा।
श्लोक 17 (3.302.17)
न तु त्वामर्जुनः शक्तः कुण्डलाभ्यां समन्वितम् । विजेतुं युधि यद्यस्य स्वयमिन्द्रः शरो भवेत् ॥
na tu tvāmarjunaḥ śaktaḥ kuṇḍalābhyāṃ samanvitam | vijetuṃ yudhi yadyasya svayamindraḥ śaro bhavet
पर जब तक तुम कुण्डलों से युक्त हो, अर्जुन तुम्हें युद्ध में नहीं जीत सकता, चाहे स्वयं इन्द्र उसका बाण बन जाएँ।
श्लोक 18 (3.302.18)
तस्मान्न देये शक्राय त्वयैते कुण्डले शुभे । संग्रामे यदि निर्जेतुं कर्ण कामयसेऽर्जुनम् ॥
tasmānna deye śakrāya tvayaite kuṇḍale śubhe | saṃgrāme yadi nirjetuṃ karṇa kāmayase'rjunam
इसलिए हे कर्ण! यदि तुम युद्ध में अर्जुन को जीतना चाहते हो, तो ये सुन्दर कुण्डल इन्द्र को मत देना।"