आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 303
सूर्य का कर्ण को इन्द्र से शक्ति माँगने का परामर्श
कर्ण भक्तिपूर्वक सूर्य को उत्तर देता है पर अपने व्रत पर अडिग रहता है: उसे मृत्यु से अधिक असत्य का भय है, और इन्द्र यदि याचना करें तो वह उन्हें अपने प्राण तक दे देगा। तब सूर्य उसे सलाह देते हैं कि कुण्डल और कवच केवल इन्द्र की अमोघ शक्ति के बदले ही दे, जो शत्रुओं को मारे बिना स्वामी के हाथ में नहीं लौटती। कर्ण जागकर ऐसा ही करने का निश्चय करता है, प्रातःकालीन जप के बाद सूर्य को अपना स्वप्न सुनाता है, देवता की मुस्कराती स्वीकृति पाता है और इन्द्र की प्रतीक्षा करने लगता है।
कर्ण उवाच
श्लोक 1 (3.303.1)
भगवन्तमहं भक्तो यथा मां वेत्थ गोपते । तथा परमतिग्मांशो नास्त्यदेयं कथंचन ॥
bhagavantamahaṃ bhakto yathā māṃ vettha gopate | tathā paramatigmāṃśo nāstyadeyaṃ kathaṃcana
"हे किरणों के स्वामी, जैसे आप मुझे अपना भक्त जानते हैं, वैसे ही, हे परम तीक्ष्ण किरणों वाले, ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे मैं देने से रोक रखूँ।"
श्लोक 2 (3.303.2)
न मे दारा न मे पुत्रा न चात्मा सुहृदो न च । तथेष्टा वै सदा भक्त्या यथा त्वं गोपते मम ॥
na me dārā na me putrā na cātmā suhṛdo na ca | tatheṣṭā vai sadā bhaktyā yathā tvaṃ gopate mama
"हे गोपते, न मेरी पत्नियाँ, न मेरे पुत्र, न मेरा अपना शरीर और न मेरे मित्र मुझे उतने प्रिय हैं जितने आप मेरी निरन्तर भक्ति के कारण मुझे प्रिय हैं।"
श्लोक 3 (3.303.3)
इष्टानां च महात्मानो भक्तानां च न संशयः । कुर्वन्ति भक्तिमिष्टां च जानीषे त्वं च भास्कर ॥
iṣṭānāṃ ca mahātmāno bhaktānāṃ ca na saṃśayaḥ | kurvanti bhaktimiṣṭāṃ ca jānīṣe tvaṃ ca bhāskara
"इसमें संदेह नहीं कि महात्मा अपने प्रियजनों और भक्तों पर प्रेमपूर्ण कृपा करते हैं; हे भास्कर, यह आप जानते ही हैं।"
श्लोक 4 (3.303.4)
इष्टो भक्तश्च मे कर्णो न चान्यद्दैवतं दिवि । जानीत इति वै कृत्वा भगवानाह मद्धितम् ॥
iṣṭo bhaktaśca me karṇo na cānyaddaivataṃ divi | jānīta iti vai kṛtvā bhagavānāha maddhitam
"'कर्ण मेरा प्रिय है, मेरा भक्त है, और वह स्वर्ग में किसी दूसरे देवता को नहीं जानता' — यही सोचकर भगवान ने मेरे हित की बात कही है।"
श्लोक 5 (3.303.5)
भूयश्च शिरसा याचे प्रसाद्य च पुनःपुनः । इति ब्रवीमि तिग्मांशो त्वं तु मे क्षन्तुमर्हसि ॥
bhūyaśca śirasā yāce prasādya ca punaḥpunaḥ | iti bravīmi tigmāṃśo tvaṃ tu me kṣantumarhasi
"फिर भी मैं सिर झुकाकर बार-बार आपको प्रसन्न करते हुए याचना करता हूँ। हे तीक्ष्ण किरणों वाले, मैं यह कहता हूँ — आप मुझे क्षमा करें।"
श्लोक 6 (3.303.6)
बिभेमि न तथा मृत्योर्यथा बिभ्येऽनृतादहम् । विशेषेण द्विजातीनां सर्वेषां सर्वदा सताम् ॥
bibhemi na tathā mṛtyoryathā bibhye'nṛtādaham | viśeṣeṇa dvijātīnāṃ sarveṣāṃ sarvadā satām
"मुझे मृत्यु से उतना भय नहीं जितना असत्य से है — विशेषकर ब्राह्मणों के प्रति और सभी सज्जनों के प्रति, सदा ही।"
श्लोक 7 (3.303.7)
प्रदाने जीवितस्यापि न मेऽत्रास्ति विचारणा । यच्च मामात्थ देव त्वं पाण्डवं फल्गुनं प्रति ॥
pradāne jīvitasyāpi na me'trāsti vicāraṇā | yacca māmāttha deva tvaṃ pāṇḍavaṃ phalgunaṃ prati
"प्राण देने में भी इस विषय में मुझे कोई विचार नहीं करना है। और हे देव, आपने पाण्डुपुत्र फाल्गुन (अर्जुन) के विषय में जो कहा है —"
श्लोक 8 (3.303.8)
व्येतु संतापजं दुःखं तव भास्कर मानसम् । अर्जुनप्रतिमं चैव विजेष्यामि रणेऽर्जुनम् ॥
vyetu saṃtāpajaṃ duḥkhaṃ tava bhāskara mānasam | arjunapratimaṃ caiva vijeṣyāmi raṇe'rjunam
"हे भास्कर, आपके मन से संताप से उपजा दुःख दूर हो जाए; अर्जुन जैसा अनुपम है, उस अर्जुन को भी मैं युद्ध में जीत लूँगा।"
श्लोक 9 (3.303.9)
तवापि विदितं देव ममाप्यस्त्रबलं महत् । जामदग्न्यादुपात्तं यत्तथा द्रोणान्महात्मनः ॥
tavāpi viditaṃ deva mamāpyastrabalaṃ mahat | jāmadagnyādupāttaṃ yattathā droṇānmahātmanaḥ
"हे देव, आप भी मेरे अस्त्रों के महान बल को जानते हैं, जो मैंने जमदग्निपुत्र (परशुराम) से और उसी प्रकार महात्मा द्रोण से प्राप्त किया है।"
श्लोक 10 (3.303.10)
इदं त्वमनुजानीहि सुरश्रेष्ठ व्रतं मम । भिक्षते वज्रिणे दद्यामपि जीवितमात्मनः ॥
idaṃ tvamanujānīhi suraśreṣṭha vrataṃ mama | bhikṣate vajriṇe dadyāmapi jīvitamātmanaḥ
"हे देवश्रेष्ठ, मेरे इस व्रत की अनुमति दीजिए — वज्रधारी इन्द्र यदि मुझसे भिक्षा माँगें, तो मैं उन्हें अपने प्राण तक दे दूँ।"
सूर्य उवाच
श्लोक 11 (3.303.11)
यदि तात ददास्येते वज्रिणे कुण्डले शुभे । त्वमप्येनमथो ब्रूया विजयार्थं महाबल ॥
yadi tāta dadāsyete vajriṇe kuṇḍale śubhe | tvamapyenamatho brūyā vijayārthaṃ mahābala
"तात, यदि तुम ये सुन्दर कुण्डल वज्रधारी इन्द्र को दे ही रहे हो, तो हे महाबली, तुम भी अपनी विजय के लिए उनसे कुछ कहना।"
श्लोक 12 (3.303.12)
नियमेन प्रदद्यास्त्वं कुण्डले वै शतक्रतोः । अवध्यो ह्यसि भूतानां कुण्डलाभ्यां समन्वितः ॥
niyamena pradadyāstvaṃ kuṇḍale vai śatakratoḥ | avadhyo hyasi bhūtānāṃ kuṇḍalābhyāṃ samanvitaḥ
"तुम शतक्रतु इन्द्र को कुण्डल एक शर्त पर ही देना; क्योंकि इन कुण्डलों से युक्त रहते हुए तुम किसी भी प्राणी से मारे नहीं जा सकते।"
श्लोक 13 (3.303.13)
अर्जुनेन विनाशं हि तव दानवसूदनः । प्रार्थयानो रणे वत्स कुण्डले ते जिहीर्षति ॥
arjunena vināśaṃ hi tava dānavasūdanaḥ | prārthayāno raṇe vatsa kuṇḍale te jihīrṣati
"वत्स, दानवों का संहार करने वाले इन्द्र युद्ध में अर्जुन के हाथों तुम्हारा विनाश चाहते हैं, इसीलिए वे तुम्हारे कुण्डल हर लेना चाहते हैं।"
श्लोक 14 (3.303.14)
स त्वमप्येनमाराध्य सूनृताभिः पुनः पुनः । अभ्यर्थयेथा देवेशममोघार्थं पुरंदरम् ॥
sa tvamapyenamārādhya sūnṛtābhiḥ punaḥ punaḥ | abhyarthayethā deveśamamoghārthaṃ puraṃdaram
"इसलिए तुम भी मधुर वचनों से उन्हें बार-बार प्रसन्न करके देवताओं के स्वामी, अमोघ संकल्प वाले पुरंदर से यह माँगना —"
श्लोक 15 (3.303.15)
अमोघां देहि मे शक्तिममित्रविनिबर्हिणीम् । दास्यामि ते सहस्राक्ष कुण्डले वर्म चोत्तमम् ॥
amoghāṃ dehi me śaktimamitravinibarhiṇīm | dāsyāmi te sahasrākṣa kuṇḍale varma cottamam
"हे सहस्राक्ष, मुझे शत्रुओं का नाश करने वाली अपनी अमोघ शक्ति दीजिए; मैं आपको कुण्डल और अपना उत्तम कवच दूँगा।"
श्लोक 16 (3.303.16)
इत्येव नियमेन त्वं दद्याः शक्राय कुण्डले । तया त्वं कर्ण संग्रामे हनिष्यसि रणे रिपून् ॥
ityeva niyamena tvaṃ dadyāḥ śakrāya kuṇḍale | tayā tvaṃ karṇa saṃgrāme haniṣyasi raṇe ripūn
"इसी शर्त पर तुम शक्र को कुण्डल देना। कर्ण, उस शक्ति से तुम संग्राम में अपने शत्रुओं का वध करोगे।"
श्लोक 17 (3.303.17)
नाहत्वा हि महाबाहो शत्रूनेति करं पुनः । सा शक्तिर्देवराजस्य शतशोऽथ सहस्रशः ॥
nāhatvā hi mahābāho śatrūneti karaṃ punaḥ | sā śaktirdevarājasya śataśo'tha sahasraśaḥ
"क्योंकि हे महाबाहु, देवराज की वह शक्ति सैकड़ों-हज़ारों शत्रुओं को मारे बिना उनके हाथ में नहीं लौटती।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (3.303.18)
एवमुक्त्वा सहस्रांशुः सहसाऽन्तरधीयत । कर्णस्तु बुबुधे राजन्स्वप्नान्ते प्रव्यथन्निव ॥
evamuktvā sahasrāṃśuḥ sahasā'ntaradhīyata | karṇastu bubudhe rājansvapnānte pravyathanniva
ऐसा कहकर सहस्र किरणों वाले सूर्य सहसा अन्तर्धान हो गए। और हे राजन्, स्वप्न के अन्त में कर्ण मानो व्यथित-सा होकर जाग उठा।
श्लोक 19 (3.303.19)
प्रतिबुद्धस्तु राधेयः स्वप्नं संचिन्त्य भारत । चकार निश्चयं राजञ्शक्त्यर्थं वदतां वर ॥
pratibuddhastu rādheyaḥ svapnaṃ saṃcintya bhārata | cakāra niścayaṃ rājañśaktyarthaṃ vadatāṃ vara
हे भारत, जागने पर राधापुत्र कर्ण ने उस स्वप्न पर विचार किया, और हे वक्ताओं में श्रेष्ठ राजन्, शक्ति के विषय में यह निश्चय किया —
श्लोक 20 (3.303.20)
यदि मामिन्द्र आयाति कुण्डलार्थं परन्तप । शक्त्या तस्मै प्रदास्यामि कुण्डले वर्म चैव ह ॥
yadi māmindra āyāti kuṇḍalārthaṃ parantapa | śaktyā tasmai pradāsyāmi kuṇḍale varma caiva ha
"हे परंतप, यदि इन्द्र कुण्डलों के लिए मेरे पास आएँगे, तो मैं शक्ति के बदले उन्हें कुण्डल और कवच भी दे दूँगा।"
श्लोक 21 (3.303.21)
स कृत्वा प्रातरुत्थाय कार्याणि भरतर्षभ । ब्राह्मणान्वाचयित्वा च यथाकार्यमुपाक्रमत् ॥
sa kṛtvā prātarutthāya kāryāṇi bharatarṣabha | brāhmaṇānvācayitvā ca yathākāryamupākramat
हे भरतश्रेष्ठ, प्रातःकाल उठकर उसने अपने कर्तव्य-कर्म किए, ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया और यथोचित कार्य आरम्भ किया।
श्लोक 22 (3.303.22)
विधिना राजशार्दूल मुहूर्तमजपत्तदा । ततः सूर्याय जप्यान्ते कर्णः स्वप्नं न्यवेदयत् ॥
vidhinā rājaśārdūla muhūrtamajapattadā | tataḥ sūryāya japyānte karṇaḥ svapnaṃ nyavedayat
हे राजसिंह, तब उसने कुछ समय तक विधिपूर्वक जप किया। फिर जप के अन्त में कर्ण ने सूर्य को अपना स्वप्न बताया।
श्लोक 23 (3.303.23)
यथा दृष्टं यथातत्त्वं यथोक्तमुभयोर्निशि । तत्सर्वमानुपूर्व्येण शशंसास्मै वृषस्तदा ॥
yathā dṛṣṭaṃ yathātattvaṃ yathoktamubhayorniśi | tatsarvamānupūrvyeṇa śaśaṃsāsmai vṛṣastadā
जैसा उसने देखा था, जैसा वह ठीक-ठीक था और रात में दोनों ने जैसा कहा था — वह सब वृष (कर्ण) ने तब क्रम से उन्हें कह सुनाया।
श्लोक 24 (3.303.24)
तच्छ्रुत्वा भगवान्देवो भानुः स्वर्भानुसूदनः । उवाच तं तथेत्येव कर्णं सूर्यः स्मयन्निव ॥
tacchrutvā bhagavāndevo bhānuḥ svarbhānusūdanaḥ | uvāca taṃ tathetyeva karṇaṃ sūryaḥ smayanniva
यह सुनकर स्वर्भानु (राहु) का दमन करने वाले भगवान भानु, सूर्यदेव, मानो मुस्कराते हुए कर्ण से बोले — "ऐसा ही है।"
श्लोक 25 (3.303.25)
ततस्तत्त्वमिति ज्ञात्वा राधेयः परवीरहा । शक्तिमेवाभिकाङ्क्षन्वै वासवं प्रत्यपालयत् ॥
tatastattvamiti jñātvā rādheyaḥ paravīrahā | śaktimevābhikāṅkṣanvai vāsavaṃ pratyapālayat
तब इसे सत्य जानकर शत्रुवीरों का संहार करने वाला राधापुत्र कर्ण केवल शक्ति की ही आकांक्षा रखते हुए इन्द्र की प्रतीक्षा करने लगा।