Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 304

कुन्तिभोज का पृथा को ब्राह्मण की सेवा सौंपना

जनमेजय सूर्य के रहस्य और कर्ण के कुण्डल-कवच की उत्पत्ति के बारे में पूछते हैं, और वैशम्पायन कथा आरम्भ करते हैं। बहुत पहले एक तेजस्वी, ऊँचे कद के ब्राह्मण राजा कुन्तिभोज के पास आए और इस शर्त पर उनके घर में रहना चाहा कि उन्हें कभी कुछ अप्रिय न किया जाए; राजा ने स्वीकार कर लिया। फिर कुन्तिभोज अपनी दत्तक पुत्री पृथा को — जो वृष्णिकुल में जन्मी और वसुदेव की बहन थी — उस ब्राह्मण की सेवा सौंपते हैं, उसे ब्राह्मणों की शक्ति का स्मरण कराते हैं और चेतावनी देते हैं कि ब्राह्मण के क्रोधित होने पर उनका सारा कुल जल जाएगा।

अध्याय 303अध्याय-सूचीअध्याय 305

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (3.304.1)

किं तद्गुह्यं न चाख्यातं कर्णायेहोष्णरश्मिना । कीदृशे कुण्डले ते च कवचं चैव कीदृशम् ॥

kiṃ tadguhyaṃ na cākhyātaṃ karṇāyehoṣṇaraśminā | kīdṛśe kuṇḍale te ca kavacaṃ caiva kīdṛśam

"उष्ण किरणों वाले सूर्य ने कर्ण को यहाँ वह कौन-सा रहस्य नहीं बताया? वे कुण्डल कैसे थे और वह कवच कैसा था?"

श्लोक 2 (3.304.2)

कुतश्च कवचं तस्य कुण्डले चैव सत्तम । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥

kutaśca kavacaṃ tasya kuṇḍale caiva sattama | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tanme brūhi tapodhana

"हे साधुश्रेष्ठ, उसका कवच और उसके कुण्डल कहाँ से आए? यह मैं सुनना चाहता हूँ; हे तपोधन, मुझे बताइए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 3 (3.304.3)

अहं राजन्ब्रवीम्येतत्तस्य गुह्यं विभावसोः । यादृशे कुण्डले ते च कवचं चैव यादृशम् ॥

ahaṃ rājanbravīmyetattasya guhyaṃ vibhāvasoḥ | yādṛśe kuṇḍale te ca kavacaṃ caiva yādṛśam

हे राजन्, मैं तुम्हें सूर्य का वह रहस्य बताता हूँ, और यह भी कि वे कुण्डल कैसे थे और वह कवच कैसा था।

श्लोक 4 (3.304.4)

कुन्तिभोजं पुरा राजन्ब्राह्मणः पर्युपस्थितः । तिग्मतेजा महान्प्रांशुः श्मश्रुदण्डजटाधरः ॥

kuntibhojaṃ purā rājanbrāhmaṇaḥ paryupasthitaḥ | tigmatejā mahānprāṃśuḥ śmaśrudaṇḍajaṭādharaḥ

हे राजन्, बहुत पहले एक ब्राह्मण कुन्तिभोज के पास आए — प्रचण्ड तेज वाले, विशालकाय और ऊँचे, दाढ़ी, दण्ड और जटा धारण किए हुए,

श्लोक 5 (3.304.5)

दर्शनीयोऽनवद्याङ्गस्तेजसा प्रज्वलन्निव । मधुपिङ्गो मधुरवाक्तपःस्वाध्यायभूषणः ॥

darśanīyo'navadyāṅgastejasā prajvalanniva | madhupiṅgo madhuravāktapaḥsvādhyāyabhūṣaṇaḥ

देखने में सुन्दर, निर्दोष अंगों वाले, मानो अपने तेज से प्रज्वलित, मधु जैसे पिंगल वर्ण वाले, मधुरभाषी, और तप तथा स्वाध्याय से विभूषित।

श्लोक 6 (3.304.6)

स राजानं कुन्तिभोजमब्रवीत्सुमहातपाः । भिक्षामिच्छामि वै भोक्तुं तव गेहे विमत्सर ॥

sa rājānaṃ kuntibhojamabravītsumahātapāḥ | bhikṣāmicchāmi vai bhoktuṃ tava gehe vimatsara

उन महातपस्वी ने राजा कुन्तिभोज से कहा — "हे मत्सरहीन राजन्, मैं तुम्हारे घर में भिक्षा ग्रहण करना चाहता हूँ।"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 7 (3.304.7)

न मे व्यलीकं कर्तव्यं त्वया वा तव चानुगैः । एवं वत्स्यामि ते गेहे यदि ते रोचतेऽनघ ॥

na me vyalīkaṃ kartavyaṃ tvayā vā tava cānugaiḥ | evaṃ vatsyāmi te gehe yadi te rocate'nagha

"न तुम्हें और न तुम्हारे सेवकों को मेरे प्रति कोई अप्रिय व्यवहार करना होगा। हे निष्पाप, यदि तुम्हें स्वीकार हो, तो मैं इसी प्रकार तुम्हारे घर में रहूँगा।"

श्लोक 8 (3.304.8)

यथाकामं च गच्छेयमागच्छेयं तथैव च । शय्यासने च मे राजन्नापराध्येत कश्चन ॥

yathākāmaṃ ca gaccheyamāgaccheyaṃ tathaiva ca | śayyāsane ca me rājannāparādhyeta kaścana

"मैं जब चाहूँ जाऊँगा और जब चाहूँ आऊँगा, और हे राजन्, मेरी शय्या और आसन के विषय में कोई भी अपराध न करे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (3.304.9)

तमब्रवीत्कुन्तिभोजः प्रीतियुक्तमिदं वचः । एवमस्तु परं चेति पुनश्चैवमथाब्रवीत् ॥

tamabravītkuntibhojaḥ prītiyuktamidaṃ vacaḥ | evamastu paraṃ ceti punaścaivamathābravīt

कुन्तिभोज ने उनसे ये प्रेमभरे वचन कहे — "ऐसा ही हो, और सहर्ष।" फिर वे आगे बोले —

कुन्तिभोज उवाच

श्लोक 10 (3.304.10)

मम कन्या महाप्राज्ञ पृथा नाम यशस्विनी । शीलवृत्तान्विता साध्वी नियताऽनवमानिनी ॥

mama kanyā mahāprājña pṛthā nāma yaśasvinī | śīlavṛttānvitā sādhvī niyatā'navamāninī

"हे महाप्राज्ञ, मेरी पृथा नाम की एक यशस्विनी कन्या है — शील और सदाचार से युक्त, साध्वी, संयमी और किसी का अनादर न करने वाली।"

श्लोक 11 (3.304.11)

उपस्थास्यति सा त्वां वै पूजयाऽनवमत्य च । तस्याश्च शीलवृत्तेन तुष्टिं समुपयास्यसि ॥

upasthāsyati sā tvāṃ vai pūjayā'navamatya ca | tasyāśca śīlavṛttena tuṣṭiṃ samupayāsyasi

"वह आदरपूर्वक, बिना किसी अवहेलना के, आपकी सेवा करेगी, और उसके शील तथा आचरण से आप संतुष्ट होंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (3.304.12)

एवमुक्त्वा तु तं विप्रमभिपूज्य यथाविधि । उवाच कन्यामभ्येत्य पृथां पृथुललोचनाम् ॥

evamuktvā tu taṃ vipramabhipūjya yathāvidhi | uvāca kanyāmabhyetya pṛthāṃ pṛthulalocanām

यह कहकर और ब्राह्मण का विधिपूर्वक सत्कार करके वे अपनी विशाल नेत्रों वाली पुत्री पृथा के पास गए और बोले —

कुन्तिभोज उवाच

श्लोक 13 (3.304.13)

अयं वत्से महाभागो ब्राह्मणो वस्तुमिच्छति । मम गेहे मया चास्य तथेत्येवं प्रतिश्रुतम् ॥

ayaṃ vatse mahābhāgo brāhmaṇo vastumicchati | mama gehe mayā cāsya tathetyevaṃ pratiśrutam

"वत्से, ये महाभाग ब्राह्मण मेरे घर में रहना चाहते हैं, और मैंने उनसे 'ऐसा ही हो' कहकर वचन दे दिया है।"

श्लोक 14 (3.304.14)

त्वयि वत्से परायत्तं ब्राह्मणस्याभिराधनम् । तन्मे वाक्यममिथ्या त्वं कर्तुमर्हसि कर्हिचित् ॥

tvayi vatse parāyattaṃ brāhmaṇasyābhirādhanam | tanme vākyamamithyā tvaṃ kartumarhasi karhicit

"वत्से, इन ब्राह्मण को प्रसन्न रखना तुम्हारे ही अधीन है; तुम मेरी बात को कभी झूठा न होने देना।"

श्लोक 15 (3.304.15)

अयं तपस्वी भगवान्स्वाध्यायनियतो द्विजः । यद्यद्ब्रूयान्महातेजास्तत्तद्देयममत्सरात् ॥

ayaṃ tapasvī bhagavānsvādhyāyaniyato dvijaḥ | yadyadbrūyānmahātejāstattaddeyamamatsarāt

"ये भगवान तपस्वी स्वाध्याय में निरत द्विज हैं; ये महातेजस्वी जो-जो माँगें, वह सब बिना ईर्ष्या के देना चाहिए।"

श्लोक 16 (3.304.16)

ब्राह्मणा हि परं तेजो ब्राह्मणा हि परं तपः । ब्राह्मणानां नमस्कारैः सूर्यो दिवि विराजते ॥

brāhmaṇā hi paraṃ tejo brāhmaṇā hi paraṃ tapaḥ | brāhmaṇānāṃ namaskāraiḥ sūryo divi virājate

"क्योंकि ब्राह्मण ही परम तेज हैं, ब्राह्मण ही परम तप हैं; ब्राह्मणों के नमस्कारों से ही सूर्य आकाश में प्रकाशित होते हैं।"

श्लोक 17 (3.304.17)

अमानयन्हि दाण्डक्यो वातापिश्च महासुरः । निहतो ब्रह्मदण्डेन तालजङ्घस्तथैव च । विन्ध्याद्रिश्च समुद्रश्च नहुषश्च विहिंसितः ॥

amānayanhi dāṇḍakyo vātāpiśca mahāsuraḥ | nihato brahmadaṇḍena tālajaṅghastathaiva ca | vindhyādriśca samudraśca nahuṣaśca vihiṃsitaḥ

"उनका सम्मान न करने के कारण दाण्डक्य ब्रह्मदण्ड से मारा गया, वैसे ही महान असुर वातापि और तालजंघ भी; और विन्ध्य पर्वत, समुद्र तथा नहुष भी नीचा दिखाए गए।"

श्लोक 18 (3.304.18)

सोयं वत्से महाभार आहितस्त्वयि सांप्रतम् । त्वं सदा नियता कुर्या ब्राह्मणस्याभिराधनम् ॥

soyaṃ vatse mahābhāra āhitastvayi sāṃpratam | tvaṃ sadā niyatā kuryā brāhmaṇasyābhirādhanam

"वत्से, यह भारी दायित्व अब तुम पर रखा गया है; तुम सदा संयम के साथ ब्राह्मण को प्रसन्न रखना।"

श्लोक 19 (3.304.19)

जानामि प्रणिधानं ते बाल्यात्प्रभृति नन्दिनि । ब्राह्मणेष्विह सर्वेषु गुरुबन्धुषु चैव ह ॥

jānāmi praṇidhānaṃ te bālyātprabhṛti nandini | brāhmaṇeṣviha sarveṣu gurubandhuṣu caiva ha

"पुत्री, मैं बचपन से ही यहाँ के सभी ब्राह्मणों तथा गुरुजनों और बन्धुओं के प्रति तुम्हारी निष्ठा को जानता हूँ,"

श्लोक 20 (3.304.20)

तथा प्रेष्येषु सर्वेषु मित्रसंबन्धिमातृषु । मयि चैव यथावत्त्वं सर्वमावृत्य वर्तसे ॥

tathā preṣyeṣu sarveṣu mitrasaṃbandhimātṛṣu | mayi caiva yathāvattvaṃ sarvamāvṛtya vartase

"और उसी प्रकार सब सेवकों, मित्रों, सम्बन्धियों और माताओं के प्रति, तथा मेरे प्रति भी — तुम सबका ध्यान रखते हुए यथोचित व्यवहार करती हो।"

श्लोक 21 (3.304.21)

न ह्यतुष्टो जनोऽस्तीह पुरे चान्तःपुरे च ते । सम्यग्वृत्त्याऽनवद्याङ्गि तव भृत्यजनेष्वपि ॥

na hyatuṣṭo jano'stīha pure cāntaḥpure ca te | samyagvṛttyā'navadyāṅgi tava bhṛtyajaneṣvapi

"हे निर्दोष अंगों वाली, नगर में या अन्तःपुर में, यहाँ तक कि तुम्हारे सेवकों में भी, कोई ऐसा नहीं जो तुम्हारे सद्व्यवहार से संतुष्ट न हो।"

श्लोक 22 (3.304.22)

संदेष्टव्यां तु मन्ये त्वां द्विजातिं कोपनं प्रति । पृथे बालेति कृत्वा वै सुता चासि ममेति च ॥

saṃdeṣṭavyāṃ tu manye tvāṃ dvijātiṃ kopanaṃ prati | pṛthe bāleti kṛtvā vai sutā cāsi mameti ca

"फिर भी पृथा, तुम अभी बालिका हो और मेरी पुत्री हो, इसलिए मुझे लगता है कि इस क्रोधी ब्राह्मण के विषय में तुम्हें समझा देना चाहिए।"

श्लोक 23 (3.304.23)

वृष्णीनां च कुले जाता शूरस्य दयिता सुता । दत्ता प्रीतिमता मह्यं पित्रा बाला पुरा स्वयम् ॥

vṛṣṇīnāṃ ca kule jātā śūrasya dayitā sutā | dattā prītimatā mahyaṃ pitrā bālā purā svayam

"तुम वृष्णियों के कुल में जन्मी, शूर की प्यारी पुत्री हो, और बहुत पहले, जब तुम बालिका थीं, तुम्हारे पिता ने स्वयं प्रेमपूर्वक तुम्हें मुझे सौंप दिया था —"

श्लोक 24 (3.304.24)

वसुदेवस्य भगिनी सुतानां प्रवरा मम । अग्र्यमग्रे प्रतिज्ञाय तेनासि दुहिता मम ॥

vasudevasya bhaginī sutānāṃ pravarā mama | agryamagre pratijñāya tenāsi duhitā mama

"तुम वसुदेव की बहन हो और मेरी संतानों में सबसे श्रेष्ठ हो। उन्होंने पहले ही मुझे अपनी पहली संतान देने की प्रतिज्ञा की थी, इसी से तुम मेरी पुत्री हो।"

श्लोक 25 (3.304.25)

तादृशे हि कुले जाता कुले मम विवर्धिता । सुखात्सुखमनुप्राप्ता ह्रदाद्ध्रदमिवापगा ॥

tādṛśe hi kule jātā kule mama vivardhitā | sukhātsukhamanuprāptā hradāddhradamivāpagā

"ऐसे कुल में जन्म लेकर और मेरे कुल में पलकर तुम एक सुख से दूसरे सुख तक पहुँची हो, जैसे नदी एक सरोवर से दूसरे सरोवर में जाती है।"

श्लोक 26 (3.304.26)

दौष्कुलेया विशेषेण कथंचित्प्रग्रहं गताः । बालभावाद्विकुर्वन्ति प्रायशः प्रमदाः शुभे ॥

dauṣkuleyā viśeṣeṇa kathaṃcitpragrahaṃ gatāḥ | bālabhāvādvikurvanti prāyaśaḥ pramadāḥ śubhe

"हे शुभे, विशेषकर नीच कुल में जन्मी स्त्रियाँ किसी प्रकार अधिकार पा लेने पर प्रायः बचपने के कारण अनुचित आचरण करने लगती हैं।"

श्लोक 27 (3.304.27)

पृथे राजकुले जन्म रूपं चापि तवाद्भुतम् । तेन तेनासि संपन्ना समुपेता च भामिनि ॥

pṛthe rājakule janma rūpaṃ cāpi tavādbhutam | tena tenāsi saṃpannā samupetā ca bhāmini

"पृथा, तुम्हारा जन्म राजकुल में हुआ है और तुम्हारा रूप भी अद्भुत है; हे भामिनि, तुम इन सब गुणों से सम्पन्न और युक्त हो।"

श्लोक 28 (3.304.28)

सा त्वं दर्पं परित्यज्य दम्भं मानं च भामिनि । आराध्य वरदं विप्रं श्रेयसा योक्ष्यसे पृथे ॥

sā tvaṃ darpaṃ parityajya dambhaṃ mānaṃ ca bhāmini | ārādhya varadaṃ vipraṃ śreyasā yokṣyase pṛthe

"इसलिए हे भामिनि, दर्प, दम्भ और अभिमान को त्यागकर वर देने वाले ब्राह्मण को प्रसन्न करो; पृथा, इससे तुम्हें कल्याण प्राप्त होगा।"

श्लोक 29 (3.304.29)

एवं प्राप्स्यसि कल्याणि कल्याणमनघे ध्रुवम् । कोपिते च द्विजश्रेष्ठे कृत्स्नं दह्येत मे कुलम् ॥

evaṃ prāpsyasi kalyāṇi kalyāṇamanaghe dhruvam | kopite ca dvijaśreṣṭhe kṛtsnaṃ dahyeta me kulam

"हे कल्याणी, हे निष्पाप, इस प्रकार तुम निश्चय ही कल्याण पाओगी; पर यदि वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कुपित हो गया, तो मेरा सारा कुल भस्म हो सकता है।"

अध्याय 303अध्याय-सूचीअध्याय 305