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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 305

पृथा का ब्राह्मण-सेवा का वचन

पृथा कुन्तिभोज को आश्वस्त करती है कि ब्राह्मणों का सम्मान करना उसका स्वभाव है और वह किसी भी समय अतिथि की ऐसी सेवा करेगी कि उन्हें क्रोध का कोई कारण न मिले, क्योंकि ब्राह्मण तार भी सकते हैं और नष्ट भी कर सकते हैं, जैसा च्यवन ने सुकन्या के अपराध पर किया था। राजा उसे गले लगाकर सब समझाते हैं, फिर उसे ब्राह्मण को सौंपकर उनसे एक बालिका की भूलें क्षमा करने को कहते हैं। ब्राह्मण स्वीकार करते हैं, उन्हें अग्निशाला में आसन सहित एक उज्ज्वल भवन दिया जाता है, और पृथा आलस्य तथा अभिमान छोड़कर देवता के समान उनकी सेवा करती है।

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कुन्त्युवाच

श्लोक 1 (3.305.1)

ब्राह्मणं यन्त्रिता राजन्नुपस्थास्यामि पूजया । यथाप्रतिज्ञं राजेन्द्र न च मिथ्या ब्रवीम्यहम् ॥

brāhmaṇaṃ yantritā rājannupasthāsyāmi pūjayā | yathāpratijñaṃ rājendra na ca mithyā bravīmyaham

"हे राजन्, मैं संयम के साथ आदरपूर्वक ब्राह्मण की सेवा करूँगी, जैसा आपने वचन दिया है, हे राजेन्द्र; मैं झूठ नहीं बोलती।"

श्लोक 2 (3.305.2)

एष चैव स्वभावो मे पूजयेयं द्विजानिति । तव चैव प्रियं कार्यं श्रेयश्च परमं मम ॥

eṣa caiva svabhāvo me pūjayeyaṃ dvijāniti | tava caiva priyaṃ kāryaṃ śreyaśca paramaṃ mama

"द्विजों का सम्मान करना तो मेरा स्वभाव ही है; और आपका प्रिय करना मेरे लिए परम कल्याण है।"

श्लोक 3 (3.305.3)

यद्येवैष्यति सायाह्ने यदि प्रातरथो निशि । यद्यर्धरात्रे भगवान्न मे कोपं करिष्यति ॥

yadyevaiṣyati sāyāhne yadi prātaratho niśi | yadyardharātre bhagavānna me kopaṃ kariṣyati

"वे भगवान चाहे सन्ध्या को आएँ, चाहे प्रातः, चाहे रात में, चाहे आधी रात को — मुझ पर उन्हें क्रोध करने का कोई कारण नहीं मिलेगा।"

श्लोक 4 (3.305.4)

लाभो ममैष राजेन्द्र यद्वै पूजयितुं द्विजान् । आदेशे तव तिष्ठन्ती हितं कुर्यां नरोत्तम ॥

lābho mamaiṣa rājendra yadvai pūjayituṃ dvijān | ādeśe tava tiṣṭhantī hitaṃ kuryāṃ narottama

"हे राजेन्द्र, ब्राह्मणों की पूजा करना ही मेरा लाभ है; हे नरश्रेष्ठ, आपकी आज्ञा में रहकर मैं हितकर कार्य ही करूँगी।"

श्लोक 5 (3.305.5)

विस्रब्धो भव राजेन्द्र न व्यलीकं द्विजोत्तमः । वसन्प्राप्स्यति ते गेहे सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

visrabdho bhava rājendra na vyalīkaṃ dvijottamaḥ | vasanprāpsyati te gehe satyametadbravīmi te

"हे राजेन्द्र, आप निश्चिन्त रहें; आपके घर में रहते हुए उन श्रेष्ठ ब्राह्मण को कुछ भी अप्रिय नहीं मिलेगा। यह मैं आपसे सच कहती हूँ।"

श्लोक 6 (3.305.6)

यत्प्रियं च द्विजस्यास्य हितं चैव तवानघ । यतिष्यामि तथा राजन्व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥

yatpriyaṃ ca dvijasyāsya hitaṃ caiva tavānagha | yatiṣyāmi tathā rājanvyetu te mānaso jvaraḥ

"हे निष्पाप राजन्, जो इन ब्राह्मण को प्रिय हो और आपके लिए हितकर हो, उसी के लिए मैं यत्न करूँगी; आपके मन का संताप दूर हो जाए।"

श्लोक 7 (3.305.7)

ब्राह्मणा हि महाभागाः पूजिताः पृथिवीपते । तारणाय समर्थाः स्युर्विपरीते वधाय च ॥

brāhmaṇā hi mahābhāgāḥ pūjitāḥ pṛthivīpate | tāraṇāya samarthāḥ syurviparīte vadhāya ca

"क्योंकि हे पृथ्वीपति, महाभाग ब्राह्मण सम्मान पाने पर तारने में समर्थ होते हैं, और इसके विपरीत होने पर विनाश करने में।"

श्लोक 8 (3.305.8)

साऽहमेतद्विजानन्ती तोषयिष्ये द्विजोत्तमम् । न मत्कृते व्यथां राजन्प्राप्स्यसि द्विजसत्तमात् ॥

sā'hametadvijānantī toṣayiṣye dvijottamam | na matkṛte vyathāṃ rājanprāpsyasi dvijasattamāt

"यह जानते हुए मैं उन श्रेष्ठ ब्राह्मण को संतुष्ट रखूँगी; हे राजन्, मेरे कारण आपको उन द्विजश्रेष्ठ से कोई कष्ट नहीं पहुँचेगा।"

श्लोक 9 (3.305.9)

अपराधेऽपि राजेन्द्र राज्ञामश्रेयसे द्विजाः । भवन्ति च्यवनो यद्वत्सुकन्यायाः कृते पुरा ॥

aparādhe'pi rājendra rājñāmaśreyase dvijāḥ | bhavanti cyavano yadvatsukanyāyāḥ kṛte purā

"हे राजेन्द्र, अपराध होने पर ब्राह्मण राजाओं के अकल्याण का कारण बन जाते हैं, जैसे प्राचीन काल में सुकन्या के कारण च्यवन बने थे।"

श्लोक 10 (3.305.10)

नियमेन परेणाहमुपस्थास्ये द्विजोत्तमम् । यथा त्वया नरेन्द्रेदं भाषितं ब्राह्मणं प्रति ॥

niyamena pareṇāhamupasthāsye dvijottamam | yathā tvayā narendredaṃ bhāṣitaṃ brāhmaṇaṃ prati

"हे नरेन्द्र, आपने ब्राह्मण के विषय में जैसा कहा है, उसी के अनुसार मैं परम नियम के साथ उन द्विजश्रेष्ठ की सेवा करूँगी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (3.305.11)

एवं ब्रुवन्तीं बहुशः परिष्वज्य समर्थ्य च । इति चेति च कर्तव्यं राजा सर्वमथादिशत् ॥

evaṃ bruvantīṃ bahuśaḥ pariṣvajya samarthya ca | iti ceti ca kartavyaṃ rājā sarvamathādiśat

जब वह बार-बार ऐसा कहने लगी, तब राजा ने उसे गले लगाकर उसका उत्साह बढ़ाया और फिर "यह करना है, यह भी करना है" — इस प्रकार सब कुछ समझा दिया।

कुन्तिभोज उवाच

श्लोक 12 (3.305.12)

एवमेतत्त्वया भद्रे कर्तव्यमविशङ्कया । मद्धितार्थं तथाऽऽत्मार्थं कुलार्थं चाप्यनिन्दिते ॥

evametattvayā bhadre kartavyamaviśaṅkayā | maddhitārthaṃ tathā''tmārthaṃ kulārthaṃ cāpyanindite

"हे भद्रे, हे अनिन्दिते, तुम्हें यह बिना किसी शंका के करना है — मेरे हित के लिए, अपने लिए और कुल के लिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (3.305.13)

एवमुक्त्वा तु तां कन्यां कुन्तिभोजो महायशाः । पृथां परिददौ तस्मै द्विजाय द्विजवत्सलः ॥

evamuktvā tu tāṃ kanyāṃ kuntibhojo mahāyaśāḥ | pṛthāṃ paridadau tasmai dvijāya dvijavatsalaḥ

अपनी कन्या से ऐसा कहकर महायशस्वी, द्विजों पर स्नेह रखने वाले कुन्तिभोज ने पृथा को उन ब्राह्मण को सौंप दिया और कहा —

कुन्तिभोज उवाच

श्लोक 14 (3.305.14)

इयं ब्रह्मन्मम सुता बाला सुखविवर्धिता । अपराध्येत यत्किंचिन्न कार्यं हृदि तत्त्वया ॥

iyaṃ brahmanmama sutā bālā sukhavivardhitā | aparādhyeta yatkiṃcinna kāryaṃ hṛdi tattvayā

"हे ब्रह्मन्, यह मेरी पुत्री है — अभी बालिका है और सुख में पली है; यदि इससे कोई अपराध हो जाए, तो उसे आप मन में न रखें।"

श्लोक 15 (3.305.15)

द्विजातयो महाभागा वृद्धबालतपस्विषु । भवन्त्यक्रोधनाः प्रायो ह्यपराद्धेषु नित्यदा ॥

dvijātayo mahābhāgā vṛddhabālatapasviṣu | bhavantyakrodhanāḥ prāyo hyaparāddheṣu nityadā

"महाभाग द्विज वृद्धों, बालकों और तपस्वियों के प्रति, उनके अपराध करने पर भी, प्रायः सदा क्रोधरहित रहते हैं।"

श्लोक 16 (3.305.16)

सुमहत्यपराधेऽपि क्षान्तिः कार्या द्विजातिभिः । यथाशक्ति यथोत्साहं पूजा ग्राह्या द्विजोत्तम ॥

sumahatyaparādhe'pi kṣāntiḥ kāryā dvijātibhiḥ | yathāśakti yathotsāhaṃ pūjā grāhyā dvijottama

"बहुत बड़े अपराध पर भी द्विजों को क्षमा करनी चाहिए; और हे द्विजश्रेष्ठ, अपनी शक्ति और उत्साह के अनुसार जो पूजा की जाए, वही स्वीकार करनी चाहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 17 (3.305.17)

तथेति ब्राह्मणेनोक्ते स राजा प्रीतमानसः । हंसचन्द्रांशुसंकाशं गृहमस्मै न्यवेदयत् ॥

tatheti brāhmaṇenokte sa rājā prītamānasaḥ | haṃsacandrāṃśusaṃkāśaṃ gṛhamasmai nyavedayat

ब्राह्मण के "तथास्तु" कहने पर प्रसन्नचित्त राजा ने उन्हें हंस और चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल एक भवन दे दिया।

श्लोक 18 (3.305.18)

तत्राग्निशरणे क्लृप्तमासनं तस्य भानुमत् । आहारादि च सर्वं तत्तथैव प्रत्यवेदयत् ॥

tatrāgniśaraṇe klṛptamāsanaṃ tasya bhānumat | āhārādi ca sarvaṃ tattathaiva pratyavedayat

वहाँ अग्निशाला में उनके लिए एक चमकता हुआ आसन तैयार किया गया था, और भोजन आदि सब कुछ भी उसी प्रकार उन्हें सौंप दिया गया।

श्लोक 19 (3.305.19)

निक्षिप्य राजपुत्री तु तन्द्रीं मानं तथैव च । आतस्थे परमं यत्नं ब्राह्मणस्याभिराधने ॥

nikṣipya rājaputrī tu tandrīṃ mānaṃ tathaiva ca | ātasthe paramaṃ yatnaṃ brāhmaṇasyābhirādhane

राजकुमारी ने आलस्य और अभिमान दोनों को त्यागकर ब्राह्मण को प्रसन्न करने में पूरा प्रयत्न लगा दिया।

श्लोक 20 (3.305.20)

तत्र सा ब्राह्मणं गत्वा पृथा शौचपरा सती । विधिवत्परिचारार्हं देववत्पर्यतोषयत् ॥

tatra sā brāhmaṇaṃ gatvā pṛthā śaucaparā satī | vidhivatparicārārhaṃ devavatparyatoṣayat

वहाँ उन ब्राह्मण के पास जाकर पवित्रता में तत्पर साध्वी पृथा ने उन सेवायोग्य द्विज को विधिपूर्वक देवता के समान संतुष्ट किया।

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