आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 306
ब्राह्मण द्वारा पृथा को मन्त्र-दान
पूरे एक वर्ष तक पृथा उस कठोर ब्राह्मण की निर्दोष सेवा करती है, यद्यपि वे बेसमय आते-जाते हैं, दुर्लभ भोजन माँगते हैं और कड़वी बातें कहते हैं। प्रसन्न होकर वे उसे वर देना चाहते हैं; जब वह यह कहकर मना करती है कि उनकी और पिता की प्रसन्नता ही पर्याप्त है, तो वे उसे अथर्वशिरस् में वर्णित एक मन्त्र देते हैं, जिससे वह जिस भी देवता का आवाहन करेगी, वह चाहे-अनचाहे उसके वश में आ जाएगा। शाप के भय से वह दूसरी बार मना नहीं कर पाती, और ब्राह्मण कुन्तिभोज से विदा लेकर विस्मित राजा के सामने ही अन्तर्धान हो जाते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.306.1)
सा तु कन्या महाराज ब्राह्मणं संशितव्रतम् । तोषयामास शुद्धेन मनसा संशितव्रता ॥
sā tu kanyā mahārāja brāhmaṇaṃ saṃśitavratam | toṣayāmāsa śuddhena manasā saṃśitavratā
हे महाराज, कठोर व्रत का पालन करने वाली उस कन्या ने शुद्ध मन से उन कठोर व्रतधारी ब्राह्मण को संतुष्ट किया।
श्लोक 2 (3.306.2)
प्रातरेष्याम्यथेत्युक्त्वा कदाचिद्द्विजसत्तमः । तत आयाति राजेन्द्र सायं रात्रावथो पुनः ॥
prātareṣyāmyathetyuktvā kadāciddvijasattamaḥ | tata āyāti rājendra sāyaṃ rātrāvatho punaḥ
हे राजेन्द्र, कभी वे श्रेष्ठ ब्राह्मण "मैं प्रातः आऊँगा" कहकर फिर सन्ध्या को या रात में आते थे।
श्लोक 3 (3.306.3)
तं च सर्वासु वेलासु भक्ष्यभोज्यप्रतिश्रयैः । पूजयामास सा कन्या वर्धमानैस्तु सर्वदा ॥
taṃ ca sarvāsu velāsu bhakṣyabhojyapratiśrayaiḥ | pūjayāmāsa sā kanyā vardhamānaistu sarvadā
वह कन्या हर समय भाँति-भाँति के भोजन और विश्राम की व्यवस्था से उनका सत्कार करती रही, और वह सत्कार सदा बढ़ता ही गया।
श्लोक 4 (3.306.4)
अन्नादिसमुदाचारः शय्यासनकृतस्तथा । दिवसेदिवसे तस्य वर्धते न तु हीयते ॥
annādisamudācāraḥ śayyāsanakṛtastathā | divasedivase tasya vardhate na tu hīyate
भोजन आदि तथा शय्या और आसन की उनकी सेवा दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही गई, कभी घटी नहीं।
श्लोक 5 (3.306.5)
निर्भर्त्सनापवादैश्च तथैवाप्रियया गिरा । ब्राह्मणस्य पृथा राजन्न चकाराप्रियं तदा ॥
nirbhartsanāpavādaiśca tathaivāpriyayā girā | brāhmaṇasya pṛthā rājanna cakārāpriyaṃ tadā
हे राजन्, ब्राह्मण की डाँट-फटकार, निन्दा और कटु वचनों के बावजूद पृथा ने उस समय उनका कोई अप्रिय नहीं किया।
श्लोक 6 (3.306.6)
स्वप्नकाले पुनश्चैति न चैति बहुशो द्विजः । सुदुर्लभमपि ह्यन्नं दीयतामिति सोऽब्रवीत् ॥
svapnakāle punaścaiti na caiti bahuśo dvijaḥ | sudurlabhamapi hyannaṃ dīyatāmiti so'bravīt
वे ब्राह्मण कभी सोने के समय लौट आते, और प्रायः आते ही नहीं थे; और अत्यन्त दुर्लभ भोजन के लिए भी कहते — "भोजन दिया जाए।"
श्लोक 7 (3.306.7)
कृतमेव च तत्सर्वं यथा तस्मै न्यवेदयत् । शिष्यवत्पुत्रवच्चैव स्वसृवच्च सुसंयता ॥
kṛtameva ca tatsarvaṃ yathā tasmai nyavedayat | śiṣyavatputravaccaiva svasṛvacca susaṃyatā
और वह संयमशील कन्या शिष्य की भाँति, पुत्र की भाँति और बहन की भाँति, उनके कहे अनुसार सब कुछ तैयार करके उन्हें निवेदन कर देती थी।
श्लोक 8 (3.306.8)
यथोपजोषं राजेन्द्र द्विजातिप्रवरस्य सा । प्रीतिमुत्पादयामास कन्यारत्नमनिन्दिता ॥
yathopajoṣaṃ rājendra dvijātipravarasya sā | prītimutpādayāmāsa kanyāratnamaninditā
हे राजेन्द्र, उस अनिन्दित कन्या-रत्न ने उन द्विजश्रेष्ठ की रुचि के अनुसार ही उन्हें प्रसन्न रखा।
श्लोक 9 (3.306.9)
तस्यास्तु शीलवृत्तेन तुतोष द्विजसत्तमः । अवधानेन भूयोऽस्याः परं यत्नमथाकरोत् ॥
tasyāstu śīlavṛttena tutoṣa dvijasattamaḥ | avadhānena bhūyo'syāḥ paraṃ yatnamathākarot
उसके शील और आचरण से वे द्विजश्रेष्ठ संतुष्ट हुए, और फिर उन्होंने ध्यान में उसके कल्याण के लिए और भी अधिक प्रयत्न किया।
श्लोक 10 (3.306.10)
तां प्रभाते च सायं च पिता पप्रच्छ भारत । अपि तुष्यति ते पुत्रि ब्राह्मणः परिचर्यया ॥
tāṃ prabhāte ca sāyaṃ ca pitā papraccha bhārata | api tuṣyati te putri brāhmaṇaḥ paricaryayā
हे भारत, पिता प्रातः और सायं उससे पूछते — "पुत्री, क्या ब्राह्मण तुम्हारी सेवा से संतुष्ट हैं?"
श्लोक 11 (3.306.11)
तं सा परममित्येव प्रत्युवाच यशस्विनी । ततः प्रीतिमवापाग्र्यां कुन्तिभोजो महामनाः ॥
taṃ sā paramamityeva pratyuvāca yaśasvinī | tataḥ prītimavāpāgryāṃ kuntibhojo mahāmanāḥ
वह यशस्विनी उत्तर देती — "बहुत अधिक।" इससे महामना कुन्तिभोज को परम प्रसन्नता होती।
श्लोक 12 (3.306.12)
ततः संवत्सरे पूर्णे यदाऽसौ जपतां वरः । नापश्यद्दुष्कृतं किंचित्पृथायाः सौहृदे रतः ॥
tataḥ saṃvatsare pūrṇe yadā'sau japatāṃ varaḥ | nāpaśyadduṣkṛtaṃ kiṃcitpṛthāyāḥ sauhṛde rataḥ
तब पूरा एक वर्ष बीत जाने पर, जब जप करने वालों में श्रेष्ठ उन ब्राह्मण ने, जो पृथा के हित में लगे थे, उसमें कोई भी दोष नहीं देखा,
श्लोक 13 (3.306.13)
ततः प्रीतमना भूत्वा स एनां ब्राह्मणोऽब्रवीत् । प्रीतोस्मि परमं भद्रे परिचारेण ते शुभे ॥
tataḥ prītamanā bhūtvā sa enāṃ brāhmaṇo'bravīt | prītosmi paramaṃ bhadre paricāreṇa te śubhe
तो प्रसन्नचित्त होकर उन ब्राह्मण ने उससे कहा — "हे भद्रे, हे शुभे, मैं तुम्हारी सेवा से अत्यन्त प्रसन्न हूँ।"
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 14 (3.306.14)
वरान्वृणीष्व कल्याणि दूरापान्मानुषैरिह । यैस्त्वं सीमन्तिनीः सर्वा यशसाऽभिभविष्यसि ॥
varānvṛṇīṣva kalyāṇi dūrāpānmānuṣairiha | yaistvaṃ sīmantinīḥ sarvā yaśasā'bhibhaviṣyasi
"हे कल्याणी, ऐसे वर माँगो जो इस संसार में मनुष्यों के लिए दुर्लभ हैं, जिनसे तुम यश में सब स्त्रियों से बढ़कर हो जाओगी।"
कुन्त्युवाच
श्लोक 15 (3.306.15)
कृतानि मम सर्वाणि यस्या मे वेदवित्तम । त्वं प्रसन्नः पिता चैव कृतं विप्र वरैर्मम ॥
kṛtāni mama sarvāṇi yasyā me vedavittama | tvaṃ prasannaḥ pitā caiva kṛtaṃ vipra varairmama
"हे वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ, जब आप और मेरे पिता मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मेरे सब कार्य पूरे हो गए। हे विप्र, मुझे वरों की आवश्यकता नहीं।"
ब्राह्मण उवाच
श्लोक 16 (3.306.16)
यदि नेच्छसि मत्तस्त्वं वरं भद्रे शुचिस्मिते । इमं मन्त्रं गृहाण त्वमाह्वानाय दिवौकसाम् ॥
yadi necchasi mattastvaṃ varaṃ bhadre śucismite | imaṃ mantraṃ gṛhāṇa tvamāhvānāya divaukasām
"हे पवित्र मुस्कान वाली भद्रे, यदि तुम मुझसे कोई वर नहीं चाहतीं, तो देवताओं के आवाहन के लिए यह मन्त्र ग्रहण करो।"
श्लोक 17 (3.306.17)
यंयं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि । तेनतेन वशे भद्रे स्थातव्यं ते भविष्यति ॥
yaṃyaṃ devaṃ tvametena mantreṇāvāhayiṣyasi | tenatena vaśe bhadre sthātavyaṃ te bhaviṣyati
"हे भद्रे, इस मन्त्र से तुम जिस-जिस देवता का आवाहन करोगी, उसे तुम्हारे वश में रहना होगा।"
श्लोक 18 (3.306.18)
अकामो वा सकामो वा स समेष्यति ते वशे । विबुधो मन्त्रसंभ्रान्तो वाक्यैर्भृत्य इवानतः ॥
akāmo vā sakāmo vā sa sameṣyati te vaśe | vibudho mantrasaṃbhrānto vākyairbhṛtya ivānataḥ
"वह चाहे अनिच्छुक हो या इच्छुक, मन्त्र से विवश होकर वह देवता सेवक की भाँति विनीत होकर तुम्हारे वचनों के वश में आ जाएगा।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (3.306.19)
न शशाक द्वितीयं सा प्रत्याख्यातुमनिन्दिता । तं वै द्विजातिप्रवरं तदा शापभयान्नृप ॥
na śaśāka dvitīyaṃ sā pratyākhyātumaninditā | taṃ vai dvijātipravaraṃ tadā śāpabhayānnṛpa
हे नृप, वह अनिन्दित कन्या शाप के भय से उन श्रेष्ठ ब्राह्मण को दूसरी बार मना न कर सकी।
श्लोक 20 (3.306.20)
ततस्तामनवद्याङ्गीं ग्राहयामास स द्विजः । मन्त्रग्रामं तदा राजन्नथर्वशिरसि श्रुतम् ॥
tatastāmanavadyāṅgīṃ grāhayāmāsa sa dvijaḥ | mantragrāmaṃ tadā rājannatharvaśirasi śrutam
हे राजन्, तब उन ब्राह्मण ने उस निर्दोष अंगों वाली कन्या को अथर्वशिरस् में वर्णित वह मन्त्र-समूह ग्रहण करा दिया।
श्लोक 21 (3.306.21)
तं प्रदाय तु राजेन्द्र कुन्तिभोजमुवाच ह । उषितोस्मि सुखं राजन्कन्यया परितोषितः ॥
taṃ pradāya tu rājendra kuntibhojamuvāca ha | uṣitosmi sukhaṃ rājankanyayā paritoṣitaḥ
हे राजेन्द्र, उसे वह मन्त्र देकर उन्होंने कुन्तिभोज से कहा — "हे राजन्, तुम्हारी कन्या से संतुष्ट होकर मैं सुखपूर्वक रहा हूँ,"
श्लोक 22 (3.306.22)
तव गेहे सुविहितः सदा सुप्रतिपूजितः । साधयिष्यामहे तावदित्युक्त्वाऽन्तरधीयत ॥
tava gehe suvihitaḥ sadā supratipūjitaḥ | sādhayiṣyāmahe tāvadityuktvā'ntaradhīyata
"तुम्हारे घर में मेरी भली प्रकार देखभाल हुई और सदा मेरा सम्मान हुआ। अब हम अपनी राह जाते हैं।" यह कहकर वे अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 23 (3.306.23)
स तु राजा द्विजं दृष्ट्वा तत्रैवान्तर्हितं तदा । बभूव विस्मयाविष्टः पृथां च समपूजयत् ॥
sa tu rājā dvijaṃ dṛṣṭvā tatraivāntarhitaṃ tadā | babhūva vismayāviṣṭaḥ pṛthāṃ ca samapūjayat
ब्राह्मण को वहीं अन्तर्धान होते देखकर राजा विस्मय से भर गए और उन्होंने पृथा का सम्मान किया।