आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 307
कुन्ती द्वारा सूर्य का आवाहन
मन्त्र की शक्ति जानने की उत्सुकता में, अभी-अभी ऋतुमती हुई युवा पृथा महल की छत से उगते सूर्य को देखती है, दिव्य दृष्टि से कवच-कुण्डल धारी देवता को देखती है और उनका आवाहन कर बैठती है। सूर्य योगबल से अपने को दो भागों में बाँटकर आते हैं और स्वयं को उसके वश में बताते हैं; जब वह उनसे लौट जाने की विनती करती है, तो वे व्यर्थ लौटने से मना कर देते हैं, उसे याद दिलाते हैं कि उसकी इच्छा उनके जैसे पुत्र की थी, और धमकी देते हैं कि यदि वह उनसे संगम न करे तो वे उसे, उसके पिता और ब्राह्मण को शाप देंगे। आकाश से देखते देवताओं को दिखाए जाने पर कुन्ती कहती है कि उसके शरीर का दान उसके गुरुजनों के अधिकार में है और बालबुद्धि की भूल के लिए क्षमा माँगती है, पर सूर्य कहते हैं कि वे उपहास का पात्र बनकर नहीं लौट सकते, और उसे अपने जैसा पुत्र देने का वचन देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.307.1)
गते तस्मिन्द्विजश्रेष्ठे कस्मिंश्चित्कालपर्यये । चिन्तयामास सा कन्या मन्त्रग्रामबलाबलम् ॥
gate tasmindvijaśreṣṭhe kasmiṃścitkālaparyaye | cintayāmāsa sā kanyā mantragrāmabalābalam
उन श्रेष्ठ ब्राह्मण के चले जाने पर, कुछ समय बीतने के बाद, वह कन्या उस मन्त्र-समूह की शक्ति और अशक्ति के विषय में सोचने लगी —
श्लोक 2 (3.307.2)
अयं वै कीदृशस्तेन मम दत्तो महात्मना । मन्त्रग्रामो बलं तस्य ज्ञास्ये नातिचिरादिति ॥
ayaṃ vai kīdṛśastena mama datto mahātmanā | mantragrāmo balaṃ tasya jñāsye nāticirāditi
"उन महात्मा ने मुझे यह कैसा मन्त्र-समूह दिया है? उसकी शक्ति मैं शीघ्र ही जान लूँगी।"
श्लोक 3 (3.307.3)
एवं संचिन्तयन्ती सा ददर्शर्तुं यदृच्छया । व्रीडिता साऽभवद्बाला कन्याभावे रजस्वला ॥
evaṃ saṃcintayantī sā dadarśartuṃ yadṛcchayā | vrīḍitā sā'bhavadbālā kanyābhāve rajasvalā
इस प्रकार सोचते हुए उसने संयोग से अपना ऋतुकाल आया देखा; कुमारी अवस्था में रजस्वला होने से वह बालिका लज्जित हो गई।
श्लोक 4 (3.307.4)
ततो हर्म्यतलस्था सा महार्हशयनोचिता । प्राच्यां दिशि समुद्यन्तं ददर्शादित्यमण्डलम् ॥
tato harmyatalasthā sā mahārhaśayanocitā | prācyāṃ diśi samudyantaṃ dadarśādityamaṇḍalam
तब बहुमूल्य शय्याओं की अभ्यस्त वह कन्या महल की छत पर खड़ी थी, और उसने पूर्व दिशा में उदित होते सूर्यमण्डल को देखा।
श्लोक 5 (3.307.5)
तत्र बद्धमनोदृष्टिरभवत्सा सुमध्यमा । न चातप्यत रूपेण भानोः सन्ध्यागतस्य सा ॥
tatra baddhamanodṛṣṭirabhavatsā sumadhyamā | na cātapyata rūpeṇa bhānoḥ sandhyāgatasya sā
उस सुन्दर कटि वाली कन्या का मन और दृष्टि उसी पर टिक गए, और सन्ध्याकाल के सूर्य के रूप से उसे ताप नहीं लगा।
श्लोक 6 (3.307.6)
तस्या दृष्टिरभूद्दिव्या साऽपश्यद्दिव्यदर्शनम् । आमुक्तकवचं देवं कुण्डलाभ्यां विभूषितम् ॥
tasyā dṛṣṭirabhūddivyā sā'paśyaddivyadarśanam | āmuktakavacaṃ devaṃ kuṇḍalābhyāṃ vibhūṣitam
उसकी दृष्टि दिव्य हो गई, और उसने दिव्य रूप वाले उस देवता को देखा, जो कवच पहने और कुण्डलों से विभूषित थे।
श्लोक 7 (3.307.7)
तस्याः कौतूहलं त्वासीन्मन्त्रं प्रति नराधिप । आह्वानमकरोत्साऽथ तस्य देवस्य भामिनी ॥
tasyāḥ kautūhalaṃ tvāsīnmantraṃ prati narādhipa | āhvānamakarotsā'tha tasya devasya bhāminī
हे नराधिप, उसे मन्त्र के विषय में कौतूहल हुआ, और तब उस भामिनी ने उस देवता का आवाहन किया।
श्लोक 8 (3.307.8)
प्राणानुपस्पृश्य तदा ह्याजुहाव दिवाकरम् । आजगाम ततो राजंस्त्वरमाणो दिवाकरः ॥
prāṇānupaspṛśya tadā hyājuhāva divākaram | ājagāma tato rājaṃstvaramāṇo divākaraḥ
इन्द्रियों का जल से स्पर्श करके (आचमन करके) उसने दिवाकर का आवाहन किया; और हे राजन्, तब दिवाकर शीघ्रता से आ पहुँचे —
श्लोक 9 (3.307.9)
मधुपिङ्गो महाबाहुः कम्बुग्रीवो हसन्निव । अङ्गदी बद्धमुकुटो दिशः प्रज्वालयन्निव ॥
madhupiṅgo mahābāhuḥ kambugrīvo hasanniva | aṅgadī baddhamukuṭo diśaḥ prajvālayanniva
मधु जैसे पिंगल वर्ण वाले, महाबाहु, शंख जैसी ग्रीवा वाले, मानो मुस्कराते हुए, बाजूबन्द और मुकुट धारण किए, मानो दिशाओं को प्रज्वलित करते हुए।
श्लोक 10 (3.307.10)
योगात्कृत्वा द्विधाऽऽत्मानमाजगाम तताप च । आबभाषे ततः कुन्तीं साम्ना परमवल्गुना ॥
yogātkṛtvā dvidhā''tmānamājagāma tatāpa ca | ābabhāṣe tataḥ kuntīṃ sāmnā paramavalgunā
योगबल से उन्होंने अपने को दो रूपों में बाँट लिया — वे वहाँ आए भी और आकाश में तपते भी रहे। फिर उन्होंने अत्यन्त मधुर और कोमल वाणी में कुन्ती से कहा —
सूर्य उवाच
श्लोक 11 (3.307.11)
आगतोस्मि वशं भद्रे तव मन्त्रबलात्कृतः । किं करोमि वशो राज्ञि ब्रूहि कर्ता तदस्मि ते ॥
āgatosmi vaśaṃ bhadre tava mantrabalātkṛtaḥ | kiṃ karomi vaśo rājñi brūhi kartā tadasmi te
"हे भद्रे, तुम्हारे मन्त्र के बल से विवश होकर मैं तुम्हारे वश में आ गया हूँ। हे राजकुमारी, तुम्हारे वश में रहकर मैं क्या करूँ? बताओ, मैं वही करूँगा।"
कुन्त्युवाच
श्लोक 12 (3.307.12)
गम्यतां भगवंस्तत्र यत एवागतो ह्यसि । कौतूहलात्समाहूतः प्रसीद भगवन्निति ॥
gamyatāṃ bhagavaṃstatra yata evāgato hyasi | kautūhalātsamāhūtaḥ prasīda bhagavanniti
"भगवन्, आप जहाँ से आए हैं वहीं लौट जाइए। मैंने केवल कौतूहलवश आपको बुलाया था; भगवन्, प्रसन्न होइए।"
सूर्य उवाच
श्लोक 13 (3.307.13)
गमिष्येऽहं यथा मा त्वं ब्रवीषि तनुमध्यमे । न तु देवं समाहूय न्याय्यं प्रेषयितुं वृथा ॥
gamiṣye'haṃ yathā mā tvaṃ bravīṣi tanumadhyame | na tu devaṃ samāhūya nyāyyaṃ preṣayituṃ vṛthā
"हे पतली कमर वाली, जैसा तुम कहती हो, मैं चला जाऊँगा। पर किसी देवता को बुलाकर उसे व्यर्थ लौटा देना उचित नहीं है।"
श्लोक 14 (3.307.14)
तवाभिसन्धिः सुभगे सूर्यात्पुत्रो भवेदिति । वीर्येणाप्रतिमो लोके कवची कुण्डलीति च ॥
tavābhisandhiḥ subhage sūryātputro bhavediti | vīryeṇāpratimo loke kavacī kuṇḍalīti ca
"हे सौभाग्यवती, तुम्हारा मनोरथ यह था कि सूर्य से तुम्हें ऐसा पुत्र हो जो संसार में पराक्रम में अद्वितीय हो, और कवच तथा कुण्डल धारण किए हो।"
श्लोक 15 (3.307.15)
सा त्वमात्मप्रदानं वै कुरुष्व गजगामिनि । उत्पत्स्यति हि पुत्रस्ते यथासंकल्पमङ्गने । अथ गच्छाम्यहं भद्रे त्वया संगम्य सुस्मिते ॥
sā tvamātmapradānaṃ vai kuruṣva gajagāmini | utpatsyati hi putraste yathāsaṃkalpamaṅgane | atha gacchāmyahaṃ bhadre tvayā saṃgamya susmite
"इसलिए हे गजगामिनी, तुम अपने को मुझे समर्पित करो; हे सुन्दरी, तुम्हारे संकल्प के अनुसार तुम्हें पुत्र होगा। फिर हे भद्रे, हे सुस्मिते, तुमसे संगम करके मैं चला जाऊँगा।"
श्लोक 16 (3.307.16)
यदि त्वं वचनं नाद्य करिष्यसि मम प्रियम् । शप्स्ये कन्येऽन्यथा क्रुद्धो ब्राह्मणं पितरं च ते ॥
yadi tvaṃ vacanaṃ nādya kariṣyasi mama priyam | śapsye kanye'nyathā kruddho brāhmaṇaṃ pitaraṃ ca te
"हे कन्ये, यदि तुम आज मेरा प्रिय वचन नहीं मानोगी, तो मैं क्रुद्ध होकर तुम्हें, उस ब्राह्मण को और तुम्हारे पिता को भी शाप दे दूँगा।"
श्लोक 17 (3.307.17)
त्वत्कृते तान्प्रधक्ष्यामि सर्वानपि न संशयः । पितरं चैव ते मूढं यो न वेत्ति तवानयम् ॥
tvatkṛte tānpradhakṣyāmi sarvānapi na saṃśayaḥ | pitaraṃ caiva te mūḍhaṃ yo na vetti tavānayam
"तुम्हारे कारण मैं निःसंदेह उन सबको भस्म कर दूँगा — तुम्हारे मूर्ख पिता को भी, जो तुम्हारे इस अनुचित आचरण को नहीं जानते;"
श्लोक 18 (3.307.18)
तस्य च ब्राह्मणस्याद्य योसौ मन्त्रमदात्तव । शीलवृत्तमविज्ञाय धास्यामि विनयं परम् ॥
tasya ca brāhmaṇasyādya yosau mantramadāttava | śīlavṛttamavijñāya dhāsyāmi vinayaṃ param
"और जिस ब्राह्मण ने तुम्हारे शील और आचरण को जाने बिना तुम्हें मन्त्र दिया, उसे भी आज मैं कठोर दण्ड दूँगा।"
श्लोक 19 (3.307.19)
एते हि विबुधाः सर्वे पुरंदरमुखा दिवि । त्वया प्रलब्धं पश्यन्ति स्मयन्त इव मां शुभे ॥
ete hi vibudhāḥ sarve puraṃdaramukhā divi | tvayā pralabdhaṃ paśyanti smayanta iva māṃ śubhe
"क्योंकि हे शुभे, पुरंदर (इन्द्र) आदि ये सब देवता स्वर्ग से मुझे तुम्हारे द्वारा ठगा गया देख रहे हैं और मानो हँस रहे हैं।"
श्लोक 20 (3.307.20)
पश्य चैनान्सुरगणान्दिव्यं चक्षुरिदं हि ते । पूर्वमेव मया दत्तं दृष्टवत्यसि येन माम् ॥
paśya cainānsuragaṇāndivyaṃ cakṣuridaṃ hi te | pūrvameva mayā dattaṃ dṛṣṭavatyasi yena mām
"इन देवगणों को देखो — क्योंकि यह दिव्य दृष्टि, जिससे तुमने मुझे देखा है, मैंने तुम्हें पहले ही दे दी थी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (3.307.21)
ततोऽपश्यत्त्रिदशान्राजपुत्री । सर्वानेव स्वेषु धिष्ण्येषु खस्थान् । प्रभावन्तं भानुमन्तं महान्तं । यथाऽऽदित्यं रोचमानांस्तथैव ॥
tato'paśyattridaśānrājaputrī | sarvāneva sveṣu dhiṣṇyeṣu khasthān | prabhāvantaṃ bhānumantaṃ mahāntaṃ | yathā''dityaṃ rocamānāṃstathaiva
तब राजकुमारी ने आकाश में अपने-अपने स्थानों पर स्थित सभी देवताओं को देखा; उसने महान, प्रभावशाली, किरणों वाले सूर्य को और उन्हीं की भाँति दमकते देवताओं को भी देखा।
श्लोक 22 (3.307.22)
सा तान्दृष्ट्वा त्रिदशानेव बाला । सूर्यं देवी वचनं प्राह भीता । गच्छ त्वं वै गोपते स्वं विमानं । कन्याभावाद्दुःख एवापचारः ॥
sā tāndṛṣṭvā tridaśāneva bālā | sūryaṃ devī vacanaṃ prāha bhītā | gaccha tvaṃ vai gopate svaṃ vimānaṃ | kanyābhāvādduḥkha evāpacāraḥ
उन देवताओं को देखकर वह भयभीत बाला राजकुमारी सूर्य से बोली — "हे गोपते, आप अपने विमान में लौट जाइए। मैं कुमारी हूँ, इसलिए यह अपराध केवल दुःख ही देगा।"
कुन्त्युवाच
श्लोक 23 (3.307.23)
पिता माता गुरवश्चैव येऽन्ये । देहस्यास्य प्रभवन्ति प्रदाने । नाहं धर्मं लोपयिष्यामि लोके । स्त्रीणां वृत्तं पूज्यते देहरक्षा ॥
pitā mātā guravaścaiva ye'nye | dehasyāsya prabhavanti pradāne | nāhaṃ dharmaṃ lopayiṣyāmi loke | strīṇāṃ vṛttaṃ pūjyate deharakṣā
"पिता, माता और अन्य गुरुजन ही इस शरीर का दान करने के अधिकारी हैं। मैं संसार में धर्म का लोप नहीं करूँगी; स्त्रियों का आचार शरीर की रक्षा ही माना जाता है।"
श्लोक 24 (3.307.24)
मया मन्त्रबलं ज्ञातुमाहूतस्त्वं विभावसो । बाल्याद्बालेति तत्कृत्वा क्षन्तुमर्हसि मे विभो ॥
mayā mantrabalaṃ jñātumāhūtastvaṃ vibhāvaso | bālyādbāleti tatkṛtvā kṣantumarhasi me vibho
"हे विभावसु, मैंने केवल मन्त्र की शक्ति जानने के लिए आपको बुलाया था। हे प्रभो, 'यह बालिका है' ऐसा मानकर मेरी नादानी को क्षमा कीजिए।"
सूर्य उवाच
श्लोक 25 (3.307.25)
बालेति कृत्वाऽनुनयं तवाहं । ददानि नान्यानुनयं लभेत । आत्मप्रदानं कुरु कुन्तिकन्ये । शान्तिस्तवैवं हि भवेच्च भीरु ॥
bāleti kṛtvā'nunayaṃ tavāhaṃ | dadāni nānyānunayaṃ labheta | ātmapradānaṃ kuru kuntikanye | śāntistavaivaṃ hi bhavecca bhīru
"तुम बालिका हो, इसलिए मैं तुम्हें यह रियायत देता हूँ; किसी और को यह रियायत नहीं मिलती। हे कुन्तिकुमारी, अपने को मुझे समर्पित करो; हे भीरु, इसी से तुम्हें शान्ति मिलेगी।"
श्लोक 26 (3.307.26)
न चापि गन्तुं युक्तं हि मया मिथ्याकृतेन वै । असमेत्य त्वया भीरु मन्त्राहूतेन भामिनि ॥
na cāpi gantuṃ yuktaṃ hi mayā mithyākṛtena vai | asametya tvayā bhīru mantrāhūtena bhāmini
"हे भीरु, हे भामिनि, मन्त्र द्वारा बुलाए जाने पर तुमसे संगम किए बिना, इस प्रकार ठगा जाकर लौट जाना मेरे लिए उचित भी नहीं है।"
श्लोक 27 (3.307.27)
गमिष्याम्यनवद्याङ्गि लोके समवहास्यताम् । गच्छेयमेव सुश्रोणि गतोऽहं वै निराकृतः । सर्वेषां विबुधानां च वक्तव्यः स्यां तथा शुभे ॥
gamiṣyāmyanavadyāṅgi loke samavahāsyatām | gaccheyameva suśroṇi gato'haṃ vai nirākṛtaḥ | sarveṣāṃ vibudhānāṃ ca vaktavyaḥ syāṃ tathā śubhe
"हे निर्दोष अंगों वाली, मैं संसार में उपहास का पात्र बनकर जाऊँगा। हे सुश्रोणि, यदि मैं यूँ ही चला जाऊँ तो ठुकराया हुआ जाऊँगा, और हे शुभे, सब देवताओं में मेरी चर्चा होगी।"
श्लोक 28 (3.307.28)
सा त्वं मया समागच्छ पुत्रं लप्स्यसि मादृशम् । विशिष्टा सर्वलोकेषु भविष्यसि न संशयः ॥
sā tvaṃ mayā samāgaccha putraṃ lapsyasi mādṛśam | viśiṣṭā sarvalokeṣu bhaviṣyasi na saṃśayaḥ
"इसलिए मुझसे संगम करो; तुम्हें मेरे समान पुत्र प्राप्त होगा, और निःसंदेह तुम सब लोकों में विशिष्ट हो जाओगी।"