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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 308

सूर्यदेव के आगे कुन्ती की स्वीकृति

सूर्य को लौटा न पाने पर और यह सोचकर कि उनका शाप उसके पिता और ब्राह्मण पर पड़ेगा, कुन्ती विनती करती है कि बन्धु-बान्धवों के जीते जी वह उनकी स्वीकृति के बिना स्वयं को अर्पित नहीं कर सकती। सूर्य कहते हैं कि कन्या स्वतन्त्र होती है, और वचन देते हैं कि वह फिर से कन्या हो जाएगी। कुन्ती इस शर्त पर मान जाती है कि उसका पुत्र अमृतमय कुण्डल और कवच के साथ जन्म ले, और सूर्य अदिति के दिए कुण्डल देने का वचन देते हैं। वे योगबल से नाभि का स्पर्श करके उसमें प्रवेश करते हैं; वह मूर्च्छित हो जाती है, और सूर्य उसे कन्या ही रहने देते हैं।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.308.1)

सा तु कन्या बहुविधं ब्रुवन्ती मधुरं वचः । अनुनेतुं सहस्रांशुं न शशाक मनस्विनी ॥

sā tu kanyā bahuvidhaṃ bruvantī madhuraṃ vacaḥ | anunetuṃ sahasrāṃśuṃ na śaśāka manasvinī

वह मनस्विनी कन्या अनेक प्रकार के मधुर वचन कहती रही, फिर भी सहस्र किरणों वाले सूर्य को मना न सकी।

श्लोक 2 (3.308.2)

न शशाक यदा बाला प्रत्याख्यातुं तमोनुदम् । भीता शापात्ततो राजन्दध्यौ दीर्घमथान्तरम् ॥

na śaśāka yadā bālā pratyākhyātuṃ tamonudam | bhītā śāpāttato rājandadhyau dīrghamathāntaram

जब वह बाला अन्धकार का नाश करने वाले सूर्य को लौटा न सकी, तब हे राजन्, शाप के भय से वह बहुत देर तक सोचती रही।

श्लोक 3 (3.308.3)

अनागसः पितुः शापो ब्राह्मणस्य तथैव च । मन्निमित्तः कथं न स्यात्क्रुद्धादस्माद्विभावसोः ॥

anāgasaḥ pituḥ śāpo brāhmaṇasya tathaiva ca | mannimittaḥ kathaṃ na syātkruddhādasmādvibhāvasoḥ

"मेरे कारण इस क्रुद्ध विभावसु का शाप मेरे निरपराध पिता पर, और उस ब्राह्मण पर भी, क्यों न पड़ेगा?

श्लोक 4 (3.308.4)

बालेनापि सता मोहाद्भृशं सापह्नवान्यपि । नाऽभ्यासादयितव्यानि तेजांसि च तपांसि च ॥

bālenāpi satā mohādbhṛśaṃ sāpahnavānyapi | nā'bhyāsādayitavyāni tejāṃsi ca tapāṃsi ca

कोई भले ही कम आयु का और सज्जन हो, उसे भी नासमझी में तेजस्वी शक्तियों और तपस्या के बल के अधिक निकट नहीं जाना चाहिए, चाहे वे छिपे रूप में ही क्यों न हों।

श्लोक 5 (3.308.5)

साहमद्य भृशं भीता गृहीत्वा च करे भृशम् । कथं त्वकार्यं कुर्यां वै प्रदानं ह्यात्मनः स्वयम् ॥

sāhamadya bhṛśaṃ bhītā gṛhītvā ca kare bhṛśam | kathaṃ tvakāryaṃ kuryāṃ vai pradānaṃ hyātmanaḥ svayam

अब मैं बहुत डरी हुई हूँ, और मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया गया है। फिर भी मैं यह अनुचित कार्य कैसे करूँ — स्वयं ही अपने को दान कर दूँ?"

श्लोक 6 (3.308.6)

सा वै शापपरित्रस्ता बहु चिन्तयती हृदा । मोहेनाभिपरीताङ्गी स्मयमाना पुनःपुनः ॥

sā vai śāpaparitrastā bahu cintayatī hṛdā | mohenābhiparītāṅgī smayamānā punaḥpunaḥ

शाप से भयभीत वह मन ही मन बहुत सोचती रही; मोह ने उसके सारे अंगों को घेर लिया और वह बार-बार मुस्कुराती रही।

श्लोक 7 (3.308.7)

तं देवमब्रवीद्भीता बन्धूनां राजसत्तम । व्रीडाविह्वलया वाचा शापत्रस्ता विशांपते ॥

taṃ devamabravīdbhītā bandhūnāṃ rājasattama | vrīḍāvihvalayā vācā śāpatrastā viśāṃpate

तब हे राजश्रेष्ठ, हे प्रजापालक, भयभीत और शाप से त्रस्त वह लज्जा से लड़खड़ाती वाणी में अपने बन्धु-बान्धवों के विषय में उस देवता से बोली।

कुन्त्युवाच

श्लोक 8 (3.308.8)

पिता मे ध्रियते देव माता चान्ये च बान्धवाः । न तेषु ध्रियमाणेषु विधिलोपो भवेदयम् ॥

pitā me dhriyate deva mātā cānye ca bāndhavāḥ | na teṣu dhriyamāṇeṣu vidhilopo bhavedayam

"हे देव, मेरे पिता जीवित हैं, माता और अन्य बन्धु-बान्धव भी जीवित हैं। उनके जीते जी यह विधि का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

श्लोक 9 (3.308.9)

त्वया तु संगमो देव यदि स्याद्विधिवर्जितः । मन्निमित्तं कुलस्यास्य लोकेऽकीर्तिर्न संशयः ॥

tvayā tu saṃgamo deva yadi syādvidhivarjitaḥ | mannimittaṃ kulasyāsya loke'kīrtirna saṃśayaḥ

हे देव, यदि आपके साथ विधि से रहित समागम हो, तो निःसन्देह मेरे कारण इस कुल की संसार में अपकीर्ति होगी।

श्लोक 10 (3.308.10)

अथवा धर्ममेतं त्वं मन्यसे तपतांवर । ऋते प्रदानाद्बन्धुभ्यस्तव कामं करोम्यहम् ॥

athavā dharmametaṃ tvaṃ manyase tapatāṃvara | ṛte pradānādbandhubhyastava kāmaṃ karomyaham

अथवा हे तपने वालों में श्रेष्ठ, यदि आप इसे धर्म मानते हैं, तो बन्धुओं द्वारा दान किए बिना ही मैं आपकी इच्छा पूरी करूँगी।

श्लोक 11 (3.308.11)

आत्मप्रदानं दुर्धर्ष तव कृत्वासती त्वहम् । त्वयि धर्मो यशश्चैव कीर्तिरायुश्च देहिनाम् ॥

ātmapradānaṃ durdharṣa tava kṛtvāsatī tvaham | tvayi dharmo yaśaścaiva kīrtirāyuśca dehinām

हे दुर्धर्ष, आपको आत्मसमर्पण करके भी मैं सती बनी रहूँगी; क्योंकि देहधारियों का धर्म, यश, कीर्ति और आयु — सब आप ही में स्थित हैं।"

सूर्य उवाच

श्लोक 12 (3.308.12)

न ते पिता न ते माता गुरवो वा शुचिस्मिते । प्रभवन्ति प्रदाने ते भद्रं ते शृणु मे वचः ॥

na te pitā na te mātā guravo vā śucismite | prabhavanti pradāne te bhadraṃ te śṛṇu me vacaḥ

"हे पवित्र मुस्कान वाली, तुम्हें दान करने का अधिकार न तुम्हारे पिता को है, न माता को, न किसी गुरुजन को। तुम्हारा कल्याण हो, मेरी बात सुनो।

श्लोक 13 (3.308.13)

सर्वान्कामयते यस्मात्कनेर्धातोश्च भामिनि । तस्मात्कन्येह सुश्रोणी स्वतन्त्रा वरवर्णिनि ॥

sarvānkāmayate yasmātkanerdhātośca bhāmini | tasmātkanyeha suśroṇī svatantrā varavarṇini

हे भामिनि, क्योंकि वह सबकी कामना करती है — 'कन्' धातु से — इसलिए वह कन्या कहलाती है; अतः हे वरवर्णिनि, सुन्दर नितम्बों वाली कन्या यहाँ स्वतन्त्र है।

श्लोक 14 (3.308.14)

नाधर्मश्चरितः कश्चित्त्वया भवति भामिनि । अधर्मं कुत एवाहं चरेयं लोककाम्यया ॥

nādharmaścaritaḥ kaścittvayā bhavati bhāmini | adharmaṃ kuta evāhaṃ careyaṃ lokakāmyayā

हे भामिनि, इसमें तुमसे कोई अधर्म नहीं होता; और लोकों का हित चाहने वाला मैं स्वयं अधर्म का आचरण कैसे करूँगा?

श्लोक 15 (3.308.15)

अनावृताः स्त्रियः सर्वा नराश्च वरवर्णिनि । स्वभाव एष लोकानां विकारोऽन्य इति स्मृतः ॥

anāvṛtāḥ striyaḥ sarvā narāśca varavarṇini | svabhāva eṣa lokānāṃ vikāro'nya iti smṛtaḥ

हे वरवर्णिनि, सभी स्त्रियाँ और पुरुष स्वभाव से बन्धनरहित हैं। यही प्राणियों का स्वभाव है; इसके अतिरिक्त जो कुछ है, वह विकार माना गया है।

श्लोक 16 (3.308.16)

सा मया सहसंगम्य पुनः कन्या भविष्यसि । पुत्रश्च ते महाबाहुर्भविष्यति न संशयः ॥

sā mayā sahasaṃgamya punaḥ kanyā bhaviṣyasi | putraśca te mahābāhurbhaviṣyati na saṃśayaḥ

मेरे साथ समागम करके तुम फिर से कन्या हो जाओगी, और तुम्हारा पुत्र निःसन्देह महाबाहु होगा।"

कुन्त्युवाच

श्लोक 17 (3.308.17)

यदि पुत्रो मम भवेत्त्वत्तः सर्वतमोनुद । कुण्डली कवची शूरो महाबाहुर्महाबलः । अस्तु मे सङ्गमो देव अनेन समयेन ते ॥

yadi putro mama bhavettvattaḥ sarvatamonuda | kuṇḍalī kavacī śūro mahābāhurmahābalaḥ | astu me saṅgamo deva anena samayena te

"हे समस्त अन्धकार को दूर करने वाले, यदि आपसे मुझे ऐसा पुत्र हो जो कुण्डल और कवच धारण किए हो, शूरवीर, महाबाहु और महाबली हो — तो हे देव, इसी शर्त पर मेरा आपसे समागम हो।"

सूर्य उवाच

श्लोक 18 (3.308.18)

भविष्यति महाबाहुः कुण्डली दिव्यवर्मभृत् । उभयं चामृतमयं तस्य भद्रे भविष्यति ॥

bhaviṣyati mahābāhuḥ kuṇḍalī divyavarmabhṛt | ubhayaṃ cāmṛtamayaṃ tasya bhadre bhaviṣyati

"वह महाबाहु होगा, कुण्डल और दिव्य कवच धारण करेगा; और हे भद्रे, ये दोनों ही अमृतमय होंगे।"

कुन्त्युवाच

श्लोक 19 (3.308.19)

यद्येतदमृतादस्ति कुण्डले वर्म चोत्तमम् । मम पुत्रस्य यं वै त्वं मत्त उत्पादयिष्यसि ॥

yadyetadamṛtādasti kuṇḍale varma cottamam | mama putrasya yaṃ vai tvaṃ matta utpādayiṣyasi

"आप मुझसे जो पुत्र उत्पन्न करेंगे, यदि उसके कुण्डल और उत्तम कवच सचमुच अमृत से बने होंगे,

श्लोक 20 (3.308.20)

अस्तु मे सङ्गमो देव यथोक्तं भगवंस्त्वया । त्वद्वीर्यरूपसत्वौजा धर्मयुक्तो भवेत्स च ॥

astu me saṅgamo deva yathoktaṃ bhagavaṃstvayā | tvadvīryarūpasatvaujā dharmayukto bhavetsa ca

तो हे भगवन्, जैसा आपने कहा है, वैसे ही मेरा आपसे समागम हो। और वह आपके समान पराक्रम, रूप, बल और ओज से युक्त तथा धर्मपरायण हो।"

सूर्य उवाच

श्लोक 21 (3.308.21)

अदित्या कुण्डले राज्ञि दत्ते मे मत्तकाशिनि । तस्मै दास्यामि वामोरु वर्म चैवेदमुत्तमम् ॥

adityā kuṇḍale rājñi datte me mattakāśini | tasmai dāsyāmi vāmoru varma caivedamuttamam

"हे रानी, हे मदमाती, ये कुण्डल मुझे अदिति ने दिए थे; हे सुन्दर जंघाओं वाली, ये मैं उसे दूँगा, और यह उत्तम कवच भी।"

कुन्त्युवाच

श्लोक 22 (3.308.22)

परमं भगवन्नेवं सङ्गमिष्ये त्वया सह । यदि पुत्रो भवेदेवं यथा वदसि गोपते ॥

paramaṃ bhagavannevaṃ saṅgamiṣye tvayā saha | yadi putro bhavedevaṃ yathā vadasi gopate

"बहुत अच्छा, भगवन्; हे किरणों के स्वामी, यदि पुत्र वैसा ही होगा जैसा आप कहते हैं, तो मैं आपसे समागम करूँगी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (3.308.23)

तथेत्युक्त्वा तु तां कुन्तीमाविवेश विहंगमः । स्वर्भानुशत्रुर्योगात्मा नाभ्यां पस्पर्श चैव ताम् ॥

tathetyuktvā tu tāṃ kuntīmāviveśa vihaṃgamaḥ | svarbhānuśatruryogātmā nābhyāṃ pasparśa caiva tām

"तथास्तु" कहकर आकाशचारी, स्वर्भानु (राहु) के शत्रु, योगस्वरूप सूर्य ने कुन्ती में प्रवेश किया और उसकी नाभि का स्पर्श किया।

श्लोक 24 (3.308.24)

ततः सा विह्वलेवासीत्कन्या सूर्यस्य तेजसा । पपात चाथ सा देवी शयने मूढचेतना ॥

tataḥ sā vihvalevāsītkanyā sūryasya tejasā | papāta cātha sā devī śayane mūḍhacetanā

तब वह कन्या सूर्य के तेज से मानो विह्वल हो गई, और वह देवी अचेत होकर शय्या पर गिर पड़ी।

सूर्य उवाच

श्लोक 25 (3.308.25)

साधयिष्यामि सुश्रोणि पुत्रं वै जनयिष्यसि । सर्वशस्त्रभृतांश्रेष्ठं कन्या चैव भविष्यसि ॥

sādhayiṣyāmi suśroṇi putraṃ vai janayiṣyasi | sarvaśastrabhṛtāṃśreṣṭhaṃ kanyā caiva bhaviṣyasi

"हे सुन्दरी, मैं इसे सिद्ध करूँगा; तुम सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ पुत्र को जन्म दोगी और कन्या भी बनी रहोगी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (3.308.26)

ततः सा व्रीडिता बाला तदा सूर्यमथाब्रवीत् । एवमस्त्विति राजेन्द्रप्रस्थितं भूरिवर्चसम् ॥

tataḥ sā vrīḍitā bālā tadā sūryamathābravīt | evamastviti rājendraprasthitaṃ bhūrivarcasam

हे राजेन्द्र, तब लज्जित उस बाला ने समागम के लिए उद्यत उस महातेजस्वी सूर्य से कहा — "ऐसा ही हो।"

श्लोक 27 (3.308.27)

इतिस्मोक्ता कुन्तिराजात्मजा सा । विवस्वन्तं याचमाना सलज्जा । तस्मिन्पुण्ये शयनीये पपात । मोहाविष्टा वेपमाना लतेव ॥

itismoktā kuntirājātmajā sā | vivasvantaṃ yācamānā salajjā | tasminpuṇye śayanīye papāta | mohāviṣṭā vepamānā lateva

ऐसा कहकर राजा कुन्तिभोज की वह पुत्री लज्जा के साथ विवस्वान् से याचना करती हुई, मोह से घिरी, लता की भाँति काँपती हुई उस पवित्र शय्या पर गिर पड़ी।

श्लोक 28 (3.308.28)

तिग्मांशुस्तां तेजसा मोहयित्वा । योगेनाविश्यात्मसंस्थां चकार । न चैवैनां दूषयामास भानुः । संज्ञां लेभे भूय एवाथ बाला ॥

tigmāṃśustāṃ tejasā mohayitvā | yogenāviśyātmasaṃsthāṃ cakāra | na caivaināṃ dūṣayāmāsa bhānuḥ | saṃjñāṃ lebhe bhūya evātha bālā

प्रखर किरणों वाले सूर्य ने अपने तेज से उसे मोहित करके योगबल से उसमें प्रवेश किया और उसे अपने वश में कर लिया; किन्तु भानु ने उसे दूषित नहीं किया, और वह बाला फिर से सचेत हो गई।

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