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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 309

कुन्ती द्वारा नवजात पुत्र का नदी में विसर्जन

पृथा गर्भ धारण करती है और बन्धु-बान्धवों के भय से उसे छिपाए रखती है; केवल उसकी धाय यह बात जानती है। सूर्य की कृपा से कन्या रहते हुए ही वह अपने पिता के समान जन्मजात कवच और स्वर्ण-कुण्डलों वाले पुत्र को जन्म देती है। धाय के साथ वह उसे मोम से बन्द, बिछौने वाली मंजूषा में रखकर रात में अश्वनदी में बहा देती है, और विलाप करती हुई देवताओं से उसकी रक्षा की प्रार्थना करती है। मंजूषा चर्मण्वती, यमुना और गंगा से होती हुई सूतों के प्रदेश में चम्पा नगरी तक पहुँचती है।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.309.1)

ततो गर्भः समभवत्पृथायाः पृथिवीपते । शुक्ले दशोत्तरे पक्षे तारापतिरिवाम्बरे ॥

tato garbhaḥ samabhavatpṛthāyāḥ pṛthivīpate | śukle daśottare pakṣe tārāpatirivāmbare

हे पृथ्वीपति, तब पृथा ने गर्भ धारण किया — ग्यारहवें मास के शुक्ल पक्ष में आकाश में उदित चन्द्रमा के समान।

श्लोक 2 (3.309.2)

सा बान्धवभयाद्बाला गर्भं तं विनिगूहती । धारयामास सुश्रोणी न चैनां बुबुधे जनः ॥

sā bāndhavabhayādbālā garbhaṃ taṃ vinigūhatī | dhārayāmāsa suśroṇī na caināṃ bubudhe janaḥ

बन्धु-बान्धवों के भय से वह सुन्दरी बाला उस गर्भ को छिपाकर धारण करती रही, और किसी को उसका पता न चला।

श्लोक 3 (3.309.3)

न हि तां वेद नार्यन्या काचिद्धात्रेयिकामृते । कन्यापुरगतां बालां निपुणां परिरक्षणे ॥

na hi tāṃ veda nāryanyā kāciddhātreyikāmṛte | kanyāpuragatāṃ bālāṃ nipuṇāṃ parirakṣaṇe

कन्याओं के अन्तःपुर में रहने वाली उस बाला के विषय में उसकी धाय के सिवा, जो उसकी रक्षा में निपुण थी, और कोई स्त्री नहीं जानती थी।

श्लोक 4 (3.309.4)

ततः कालेन सा गर्भं सुषुवे वरवर्णिनी । कन्यैव तस्य देवस्य प्रसादादमरप्रभम् ॥

tataḥ kālena sā garbhaṃ suṣuve varavarṇinī | kanyaiva tasya devasya prasādādamaraprabham

फिर समय आने पर उस सुन्दरी ने, उस देवता की कृपा से कन्या रहते हुए ही, देवताओं जैसी कान्ति वाले पुत्र को जन्म दिया,

श्लोक 5 (3.309.5)

तथैवाबद्धकवचं कनकोज्ज्वलकुण्डलम् । हर्यक्षं वृषभस्कन्धं यथास्य पितरं तथा ॥

tathaivābaddhakavacaṃ kanakojjvalakuṇḍalam | haryakṣaṃ vṛṣabhaskandhaṃ yathāsya pitaraṃ tathā

जो जन्म से ही कवच पहने था, सोने के चमकते कुण्डलों से युक्त था, सिंह जैसे नेत्रों और बैल जैसे कन्धों वाला — ठीक अपने पिता जैसा।

श्लोक 6 (3.309.6)

जातमात्रं च तं गर्भं धात्र्या संमन्त्र्य भामिनी । उत्स्रष्टुकामा तं गर्भं कारयामास भारत ॥

jātamātraṃ ca taṃ garbhaṃ dhātryā saṃmantrya bhāminī | utsraṣṭukāmā taṃ garbhaṃ kārayāmāsa bhārata

बालक के जन्म लेते ही उस भामिनी ने धाय से परामर्श किया और, हे भारत, उसे त्याग देने की इच्छा से बनवाई

श्लोक 7 (3.309.7)

मञ्जूषां शिल्पिभिस्तूर्णं सुनद्धां सुप्रतिष्ठिताम् । प्लवैर्बहुविधैर्बद्धां प्लवनार्थं जले नृप । अजिनैर्मृदुभिश्चैवं संस्तीर्णशयनां तथा ॥

mañjūṣāṃ śilpibhistūrṇaṃ sunaddhāṃ supratiṣṭhitām | plavairbahuvidhairbaddhāṃ plavanārthaṃ jale nṛpa | ajinairmṛdubhiścaivaṃ saṃstīrṇaśayanāṃ tathā

कारीगरों से शीघ्रता से एक मंजूषा (पिटारी), जो भली-भाँति कसी हुई और स्थिर थी, हे राजन्, जल पर तैरने के लिए अनेक प्रकार के तैरने वाले साधनों से बँधी थी, और जिसके भीतर कोमल मृगचर्मों का बिछौना बिछा था।

श्लोक 8 (3.309.8)

मञ्जूषायां समाधाय स्वास्तीर्णायां समन्ततः । मधूच्चिष्टस्थितायां तं सुखायां रुदती तथा । श्लक्ष्णायां सुपिधानायामश्वनद्यामवासृजत् ॥

mañjūṣāyāṃ samādhāya svāstīrṇāyāṃ samantataḥ | madhūcciṣṭasthitāyāṃ taṃ sukhāyāṃ rudatī tathā | ślakṣṇāyāṃ supidhānāyāmaśvanadyāmavāsṛjat

चारों ओर अच्छे बिछौने वाली, मोम से लिपी, सुखद, चिकनी और कसे ढक्कन वाली उस मंजूषा में उसे रखकर उसने रोते हुए उसे अश्वनदी में छोड़ दिया।

श्लोक 9 (3.309.9)

जानती चाप्यकर्तव्यं कन्याया गर्भधारणम् । पुत्रस्नेहेन सा राजन्करुणं पर्यदेवयत् ॥

jānatī cāpyakartavyaṃ kanyāyā garbhadhāraṇam | putrasnehena sā rājankaruṇaṃ paryadevayat

यह जानते हुए भी कि कन्या के लिए गर्भ धारण करना अनुचित है, हे राजन्, पुत्र-स्नेह के कारण वह करुण विलाप करने लगी।

श्लोक 10 (3.309.10)

समुत्सृजन्ती मञ्जूषामश्वनद्यां तदा जले । उवाच रुदतीकुन्ती यानि वाक्यानि तच्छृणु ॥

samutsṛjantī mañjūṣāmaśvanadyāṃ tadā jale | uvāca rudatīkuntī yāni vākyāni tacchṛṇu

अश्वनदी के जल में मंजूषा छोड़ते हुए रोती हुई कुन्ती ने जो वचन कहे, उन्हें सुनो—

कुन्त्युवाच

श्लोक 11 (3.309.11)

स्वस्ति तेऽस्त्वान्तरिक्षेभ्यः पार्थिवेभ्यश्च पुत्रक । दिव्येभ्यश्चैव भूतेभ्यस्तथा तोयचराश्च ये ॥

svasti te'stvāntarikṣebhyaḥ pārthivebhyaśca putraka | divyebhyaścaiva bhūtebhyastathā toyacarāśca ye

"हे पुत्र, आकाश के प्राणियों से, पृथ्वी के प्राणियों से, दिव्य जीवों से और जल में विचरने वालों से भी तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 12 (3.309.12)

शिवास्ते सन्तु पन्थानो मा च ते परिपन्थिनः । आगताश्च तथा पुत्र भवन्त्यद्रोहचेतसः ॥

śivāste santu panthāno mā ca te paripanthinaḥ | āgatāśca tathā putra bhavantyadrohacetasaḥ

तुम्हारे मार्ग मंगलमय हों, कोई तुम्हारा मार्ग न रोके; और हे पुत्र, जो भी तुम्हारे पास आएँ, वे द्वेष से रहित हों।

श्लोक 13 (3.309.13)

पातु त्वां वरुणो राजा सलिले सलिलेश्वरः । अन्तरिक्षेऽन्तरिक्षस्थः पवनः सर्वगस्तथा ॥

pātu tvāṃ varuṇo rājā salile salileśvaraḥ | antarikṣe'ntarikṣasthaḥ pavanaḥ sarvagastathā

जल में जल के स्वामी राजा वरुण तुम्हारी रक्षा करें, और आकाश में आकाशवासी सर्वव्यापी पवन।

श्लोक 14 (3.309.14)

पिता त्वां पातु सर्वत्र तपनस्तपतांवरः । येन दत्तोसि मे पुत्र दिव्येन विधिना किल ॥

pitā tvāṃ pātu sarvatra tapanastapatāṃvaraḥ | yena dattosi me putra divyena vidhinā kila

तपने वालों में श्रेष्ठ तुम्हारे पिता सूर्य सर्वत्र तुम्हारी रक्षा करें, जिन्होंने हे पुत्र, दिव्य विधि से तुम्हें मुझे दिया है।

श्लोक 15 (3.309.15)

आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्वे च देवताः । मरुतश्च सहेन्द्रेण दिशश्च सदिगीश्वराः ॥

ādityā vasavo rudrāḥ sādhyā viśve ca devatāḥ | marutaśca sahendreṇa diśaśca sadigīśvarāḥ

आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, इन्द्र सहित मरुद्गण, और दिक्पालों सहित दिशाएँ —

श्लोक 16 (3.309.16)

रक्षन्तु त्वां सुराः सर्वे समेषु विषमेषु च । वेत्स्यामि त्वांविदेशेपि कवचेनाभिसूचितम् ॥

rakṣantu tvāṃ surāḥ sarve sameṣu viṣameṣu ca | vetsyāmi tvāṃvideśepi kavacenābhisūcitam

ये सभी देवता सम और विषम परिस्थितियों में तुम्हारी रक्षा करें। परदेस में भी मैं तुम्हें तुम्हारे कवच से पहचान लूँगी।

श्लोक 17 (3.309.17)

धन्यस्ते पुत्र जनको देवो भानुर्विभावसुः । यस्त्वां द्रक्ष्यति दिव्येन चक्षुषा वाहिनीगतम् ॥

dhanyaste putra janako devo bhānurvibhāvasuḥ | yastvāṃ drakṣyati divyena cakṣuṣā vāhinīgatam

हे पुत्र, धन्य हैं तुम्हारे पिता भगवान् भानु विभावसु, जो अपनी दिव्य दृष्टि से तुम्हें नदी में बहते हुए देखेंगे।

श्लोक 18 (3.309.18)

धन्या सा प्रमदा या त्वां पुत्रत्वे कल्पयिष्यति । यस्यास्त्वं तृषितः पुत्र स्तनं पास्यसि देवज ॥

dhanyā sā pramadā yā tvāṃ putratve kalpayiṣyati | yasyāstvaṃ tṛṣitaḥ putra stanaṃ pāsyasi devaja

धन्य है वह स्त्री जो तुम्हें पुत्र रूप में अपनाएगी, हे देवपुत्र, जिसका स्तनपान तुम प्यास लगने पर करोगे।

श्लोक 19 (3.309.19)

कोनु स्वप्नस्तया दृष्टो या त्वामादित्यवर्चसम् । दिव्यवर्मसमायुक्तं दिव्यकुण्डलभूषितम् ॥

konu svapnastayā dṛṣṭo yā tvāmādityavarcasam | divyavarmasamāyuktaṃ divyakuṇḍalabhūṣitam

उसने कौन-सा स्वप्न देखा होगा, जो तुम्हें — सूर्य के समान तेजस्वी, दिव्य कवच से युक्त, दिव्य कुण्डलों से विभूषित,

श्लोक 20 (3.309.20)

पद्मायतविशालाक्षं पद्मताम्रदलोज्ज्वलम् । सुललाटं सुकेशान्तं पुत्रत्वे कल्पयिष्यति ॥

padmāyataviśālākṣaṃ padmatāmradalojjvalam | sulalāṭaṃ sukeśāntaṃ putratve kalpayiṣyati

कमल जैसे लम्बे-बड़े नेत्रों वाले, कमल की ताम्रवर्ण पंखुड़ियों जैसी आभा वाले, सुन्दर ललाट और सुन्दर केशों वाले को — पुत्र बनाएगी!

श्लोक 21 (3.309.21)

धन्या द्रक्ष्यन्ति पुत्र त्वां भूमौ संसर्पमाणकम् । अव्यक्तकलवाक्यानि वदन्तं रेणुगुण्ठितम् ॥

dhanyā drakṣyanti putra tvāṃ bhūmau saṃsarpamāṇakam | avyaktakalavākyāni vadantaṃ reṇuguṇṭhitam

धन्य हैं वे जो तुम्हें, हे पुत्र, धरती पर घुटनों के बल चलते, धूल से सने और अस्पष्ट मीठी तोतली बातें बोलते देखेंगे।

श्लोक 22 (3.309.22)

धन्या द्रक्ष्यन्ति पुत्र त्वां पुनर्यौवनगोचरम् । हिमवद्वनसंभूतं सिंहं केसरिणं यथा ॥

dhanyā drakṣyanti putra tvāṃ punaryauvanagocaram | himavadvanasaṃbhūtaṃ siṃhaṃ kesariṇaṃ yathā

धन्य हैं वे जो तुम्हें, हे पुत्र, यौवन में पहुँचा हुआ देखेंगे — हिमालय के वन में जन्मे अयालधारी सिंह के समान।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (3.309.23)

एवं बहुविधं राजन्विलप्य करुणं पृथा । अवासृजत मञ्जूषामश्वनद्यां तदा जले ॥

evaṃ bahuvidhaṃ rājanvilapya karuṇaṃ pṛthā | avāsṛjata mañjūṣāmaśvanadyāṃ tadā jale

हे राजन्, इस प्रकार अनेक तरह से करुण विलाप करके पृथा ने उस मंजूषा को अश्वनदी के जल में छोड़ दिया।

श्लोक 24 (3.309.24)

रुदती पुत्रशोकार्ता निशीथे कमलेक्षणा । धात्र्या सह पृथा राजन्पुत्रदर्शनलालसा ॥

rudatī putraśokārtā niśīthe kamalekṣaṇā | dhātryā saha pṛthā rājanputradarśanalālasā

हे राजन्, पुत्र-शोक से व्याकुल, रोती हुई और पुत्र को देखने के लिए लालायित वह कमलनयनी पृथा आधी रात को धाय के साथ

श्लोक 25 (3.309.25)

विसर्जयित्वा मञ्जूषां संबोधनभयात्पितुः । विवेश राजभवनं पुनः शोकातुरा ततः ॥

visarjayitvā mañjūṣāṃ saṃbodhanabhayātpituḥ | viveśa rājabhavanaṃ punaḥ śokāturā tataḥ

मंजूषा को विसर्जित करके, पिता के जाग जाने के भय से, शोकातुर होकर फिर राजभवन में लौट आई।

श्लोक 26 (3.309.26)

मञ्जूषा त्वश्वनद्याः सा ययौ चर्मण्वतीं नदीम् । चर्मण्वत्याश्चयमुनां ततो गङ्गां जगाम ह ॥

mañjūṣā tvaśvanadyāḥ sā yayau carmaṇvatīṃ nadīm | carmaṇvatyāścayamunāṃ tato gaṅgāṃ jagāma ha

वह मंजूषा अश्वनदी से चर्मण्वती नदी में गई, चर्मण्वती से यमुना में, और वहाँ से गंगा में पहुँची।

श्लोक 27 (3.309.27)

गङ्गायाः सूतविषयं चम्पामनुययौ पुरीम् । स मञ्जूषागतो गर्भस्तरङ्गैरुह्यमानकः ॥

gaṅgāyāḥ sūtaviṣayaṃ campāmanuyayau purīm | sa mañjūṣāgato garbhastaraṅgairuhyamānakaḥ

गंगा से लहरों पर बहता हुआ वह मंजूषा में रखा बालक सूतों के प्रदेश में चम्पा नगरी तक पहुँचा।

श्लोक 28 (3.309.28)

अमृतादुत्थितं दिव्यं तनुवर्म सकुण्डलम् । धारयामास तं गर्भं दैवं च विधिनिर्मितम् ॥

amṛtādutthitaṃ divyaṃ tanuvarma sakuṇḍalam | dhārayāmāsa taṃ garbhaṃ daivaṃ ca vidhinirmitam

और विधि के रचे दैव ने उस बालक के शरीर पर अमृत से उत्पन्न दिव्य कवच को कुण्डलों सहित बनाए रखा।

श्लोक 29 (3.309.29)

एतद्गुह्यं महाराज सूर्यस्यासीन्महात्मनः । स सूर्यसंभवो गर्भः कुन्त्या गर्भेण धारितः ॥

etadguhyaṃ mahārāja sūryasyāsīnmahātmanaḥ | sa sūryasaṃbhavo garbhaḥ kuntyā garbheṇa dhāritaḥ

हे महाराज, यह महात्मा सूर्य का रहस्य था — सूर्य से उत्पन्न वह बालक कुन्ती के गर्भ में धारण किया गया था।

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