आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 310
अधिरथ और राधा को बालक कर्ण की प्राप्ति
धृतराष्ट्र का मित्र सूत अधिरथ अपनी निःसन्तान पत्नी राधा के साथ गंगा पर आता है, और राधा बहकर आती मंजूषा को देखती है। उसे खोलकर वे एक तेजस्वी बालक पाते हैं और उसे देवताओं का दिया पुत्र मानकर अपना लेते हैं; स्वर्ण-कवच के कारण उसका नाम वसुषेण और कानों के कुण्डलों के कारण कर्ण रखा जाता है। वह अंग देश में बड़ा होता है, पृथा को गुप्तचर से उसका पता चलता है; फिर वह हस्तिनापुर में द्रोण, कृप और परशुराम से अस्त्रविद्या सीखता है, दुर्योधन का मित्र और अर्जुन का प्रतिद्वन्द्वी बनता है, और उसका कवच युधिष्ठिर की चिन्ता का कारण बनता है। मध्याह्न में सूर्योपासना के समय ब्राह्मणों को कुछ भी मना न करने वाले कर्ण के पास इन्द्र ब्राह्मण के वेश में भिक्षा माँगने आते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.310.1)
एतस्मिन्नेव काले तु धृतराष्ट्रस्य वै सखा । सूतोऽधिरथ इत्येव सदारो जाह्नवीं ययौ ॥
etasminneva kāle tu dhṛtarāṣṭrasya vai sakhā | sūto'dhiratha ityeva sadāro jāhnavīṃ yayau
उसी समय धृतराष्ट्र का मित्र अधिरथ नाम का सूत अपनी पत्नी के साथ जाह्नवी (गंगा) पर गया।
श्लोक 2 (3.310.2)
तस्य भार्याऽभवद्राजन्रूपेणासदृशी भुवि । राधा नाम महाभागा न सा पुत्रमविन्दत । अपत्यार्थे परं यत्नमकरोच्च विशेषतः ॥
tasya bhāryā'bhavadrājanrūpeṇāsadṛśī bhuvi | rādhā nāma mahābhāgā na sā putramavindata | apatyārthe paraṃ yatnamakarocca viśeṣataḥ
हे राजन्, उसकी पत्नी राधा नाम की महाभागा थी, जिसके रूप की बराबरी पृथ्वी पर कोई नहीं कर सकता था। उसे पुत्र नहीं हुआ था, और सन्तान के लिए उसने विशेष रूप से बड़ा प्रयत्न किया था।
श्लोक 3 (3.310.3)
सा ददर्शाथ मञ्जूषामुह्यमानां यदृच्छया । दत्तरक्षाप्रतिसरामन्वालम्भनशोभनाम् ॥
sā dadarśātha mañjūṣāmuhyamānāṃ yadṛcchayā | dattarakṣāpratisarāmanvālambhanaśobhanām
संयोग से उसने बहती हुई वह मंजूषा देखी, जिस पर रक्षा के लिए प्रतिसर (रक्षा-सूत्र) बँधा था और जो अनुलेपन से सुशोभित थी,
श्लोक 4 (3.310.4)
ऊर्मीतरङ्गैर्जाह्नव्याः समानीतामुपह्वरम् । विवर्तमानां बहुशः पुनःपुनरितस्ततः ॥
ūrmītaraṅgairjāhnavyāḥ samānītāmupahvaram | vivartamānāṃ bahuśaḥ punaḥpunaritastataḥ
जिसे जाह्नवी की लहरें तट के निकट ले आई थीं और जो बार-बार इधर-उधर उलटती-पलटती जा रही थी।
श्लोक 5 (3.310.5)
ततः सा वायुना राजन्स्रोतसा च बलीयसा । उपानीता यतः सूतः सभार्यो जलमाश्रितः ॥
tataḥ sā vāyunā rājansrotasā ca balīyasā | upānītā yataḥ sūtaḥ sabhāryo jalamāśritaḥ
हे राजन्, फिर वायु और प्रबल धारा उसे वहाँ ले आई जहाँ सूत अपनी पत्नी के साथ जल में खड़ा था।
श्लोक 6 (3.310.6)
सा तु कौतूहलात्प्राप्तां ग्राहयामास भामिनी । ततो निवेदयामास सूतस्याधिरथस्य वै ॥
sā tu kautūhalātprāptāṃ grāhayāmāsa bhāminī | tato nivedayāmāsa sūtasyādhirathasya vai
उस भामिनी ने कौतूहलवश उसे पकड़वा लिया, और फिर सूत अधिरथ को इसकी सूचना दी।
श्लोक 7 (3.310.7)
स तामुद्धृत्य मञ्जूषामुत्सार्य जलमन्तिकात् । यन्त्रैरुद्घाटयामास सोऽपश्यत्तत्रबालकम् ॥
sa tāmuddhṛtya mañjūṣāmutsārya jalamantikāt | yantrairudghāṭayāmāsa so'paśyattatrabālakam
उसने मंजूषा को उठाकर जल से दूर रखा, औज़ारों से उसे खोला और उसके भीतर एक बालक को देखा,
श्लोक 8 (3.310.8)
मृष्टकुण्डलयुक्तेन वदनेन विराजितम् । परिम्लानमुखं बालं रुदन्तं क्षुधितं भृशम् ॥
mṛṣṭakuṇḍalayuktena vadanena virājitam | parimlānamukhaṃ bālaṃ rudantaṃ kṣudhitaṃ bhṛśam
जिसका मुख चमकते कुण्डलों से सुशोभित था — मुरझाए मुख वाला, रोता हुआ और बहुत भूखा बालक।
श्लोक 9 (3.310.9)
स तु तं परया लक्ष्म्या दृष्ट्वा युक्तं वरात्मजम् । स सूतो भार्यया सार्धं विस्मयोत्फुल्ललोचनः । अङ्कमारोप्य तं बालं भार्यां वचनमब्रवीत् ॥
sa tu taṃ parayā lakṣmyā dṛṣṭvā yuktaṃ varātmajam | sa sūto bhāryayā sārdhaṃ vismayotphullalocanaḥ | aṅkamāropya taṃ bālaṃ bhāryāṃ vacanamabravīt
उस श्रेष्ठ बालक को परम शोभा से युक्त देखकर सूत और उसकी पत्नी की आँखें विस्मय से फैल गईं; बालक को गोद में लेकर उसने अपनी पत्नी से कहा—
अधिरथ उवाच
श्लोक 10 (3.310.10)
इदमत्यद्भुतं भीरु यतो जातोस्मि भामिनि । दृष्टवान्देवगर्भोऽयं मन्येऽस्माकमुपागतः ॥
idamatyadbhutaṃ bhīru yato jātosmi bhāmini | dṛṣṭavāndevagarbho'yaṃ manye'smākamupāgataḥ
"हे भीरु, हे भामिनि, यह अत्यन्त अद्भुत है; जब से मैं जन्मा हूँ, ऐसा कभी नहीं देखा। मुझे लगता है कि यह कोई देवपुत्र है जो हमारे पास आया है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (3.310.11)
अनपत्यस्य पुत्रोऽयं देवैर्दत्तो ध्रुवं मम । इत्युक्त्वा तं ददौ पुत्रं राधायै स महीपते ॥
anapatyasya putro'yaṃ devairdatto dhruvaṃ mama | ityuktvā taṃ dadau putraṃ rādhāyai sa mahīpate
"निश्चय ही देवताओं ने मुझ निःसन्तान को यह पुत्र दिया है।" हे पृथ्वीपति, ऐसा कहकर उसने वह पुत्र राधा को दे दिया।
श्लोक 12 (3.310.12)
प्रतिजग्राह तं राधा विधिवद्दिव्यरूपिणम् । पुत्रं कमलगर्भाभं देवगर्भं श्रिया वृतम् ॥
pratijagrāha taṃ rādhā vidhivaddivyarūpiṇam | putraṃ kamalagarbhābhaṃ devagarbhaṃ śriyā vṛtam
राधा ने उस दिव्यरूप, कमल के भीतरी भाग जैसी कान्ति वाले, शोभा से घिरे देवपुत्र को विधिपूर्वक पुत्र रूप में ग्रहण किया।
श्लोक 13 (3.310.13)
स्तन्यं समस्रवच्चास्य दैवादित्यथ निश्चयः । पुपोष चैनं विधिवद्ववृधे स च वीर्यवान् । ततः प्रभृति चाप्यन्ये प्राभवन्नौरसाः सुताः ॥
stanyaṃ samasravaccāsya daivādityatha niścayaḥ | pupoṣa cainaṃ vidhivadvavṛdhe sa ca vīryavān | tataḥ prabhṛti cāpyanye prābhavannaurasāḥ sutāḥ
दैवयोग से उसके लिए राधा के स्तनों में दूध उतर आया — ऐसा निश्चय हुआ। उसने विधिपूर्वक उसका पालन-पोषण किया और वह पराक्रमी बालक बढ़ने लगा; उसके बाद उनके अपने औरस पुत्र भी उत्पन्न हुए।
श्लोक 14 (3.310.14)
नामकर्म च चक्रुस्ते कुण्डले तस्य दृश्यते । कर्ण इत्येव तं बालं दृष्ट्वा कर्णं सकुण्डलम् ॥
nāmakarma ca cakruste kuṇḍale tasya dṛśyate | karṇa ityeva taṃ bālaṃ dṛṣṭvā karṇaṃ sakuṇḍalam
उन्होंने उसका नामकरण-संस्कार किया; उसके कुण्डल दिखाई देते थे, इसलिए कानों में कुण्डल वाले उस बालक को देखकर उसका नाम "कर्ण" ही रखा।
श्लोक 15 (3.310.15)
वसुवर्मधरं दृष्ट्वा तं बालं हेमकुण्डलम् । नामास्य वसुषेणेति ततश्चक्रुर्द्विजातयः ॥
vasuvarmadharaṃ dṛṣṭvā taṃ bālaṃ hemakuṇḍalam | nāmāsya vasuṣeṇeti tataścakrurdvijātayaḥ
स्वर्ण-कवच धारण किए और सोने के कुण्डलों वाले उस बालक को देखकर ब्राह्मणों ने उसका नाम वसुषेण रखा।
श्लोक 16 (3.310.16)
एवं स सूतपुत्रत्वं जगामामितविक्रमः । वसुषेण इतिख्यातो वृष इत्येव च प्रभुः ॥
evaṃ sa sūtaputratvaṃ jagāmāmitavikramaḥ | vasuṣeṇa itikhyāto vṛṣa ityeva ca prabhuḥ
इस प्रकार वह अपार पराक्रमी सूतपुत्र बन गया, और वसुषेण तथा वृष नाम से प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 17 (3.310.17)
सूतस्य ववृधेऽङ्गेषु ज्येष्ठः पुत्रः स वीर्यवान् । चारेण विदितश्चासीत्पृथया दिव्यवर्मभृत् ॥
sūtasya vavṛdhe'ṅgeṣu jyeṣṭhaḥ putraḥ sa vīryavān | cāreṇa viditaścāsītpṛthayā divyavarmabhṛt
सूत का वह पराक्रमी ज्येष्ठ पुत्र अंग देश में बड़ा हुआ; और दिव्य कवचधारी उस पुत्र का पता पृथा को एक गुप्तचर से चल गया।
श्लोक 18 (3.310.18)
सूतस्त्वधिरथः पुत्रं विवृद्धं समयेन तम् । दृष्ट्वा प्रस्थापयामास पुरं वारणसाह्वयम् ॥
sūtastvadhirathaḥ putraṃ vivṛddhaṃ samayena tam | dṛṣṭvā prasthāpayāmāsa puraṃ vāraṇasāhvayam
जब सूत अधिरथ ने देखा कि उसका पुत्र समय पर बड़ा हो गया है, तो उसने उसे हाथी के नाम वाले नगर (हस्तिनापुर) भेज दिया।
श्लोक 19 (3.310.19)
तत्रोपसदनं चक्रे द्रोणस्येष्वस्त्रकर्मणि । सख्यं दुर्योधनेनैवमगमत्स च वीर्यवान् ॥
tatropasadanaṃ cakre droṇasyeṣvastrakarmaṇi | sakhyaṃ duryodhanenaivamagamatsa ca vīryavān
वहाँ उसने धनुर्विद्या और अस्त्रविद्या सीखने के लिए द्रोण का शिष्यत्व ग्रहण किया, और इस प्रकार वह पराक्रमी युवक दुर्योधन का मित्र बन गया।
श्लोक 20 (3.310.20)
द्रोणात्कृपाच्च रामाच्च सोऽस्त्रग्रामं चतुर्विधम् । लब्ध्वा लोकेऽभवत्ख्यातः परमेष्वासतां गतः ॥
droṇātkṛpācca rāmācca so'stragrāmaṃ caturvidham | labdhvā loke'bhavatkhyātaḥ parameṣvāsatāṃ gataḥ
द्रोण, कृप और परशुराम से चारों प्रकार की अस्त्रविद्या प्राप्त करके वह संसार में प्रसिद्ध हुआ और महान धनुर्धर बना।
श्लोक 21 (3.310.21)
संधाय धार्तराष्ट्रेण पार्थानां विप्रिये रतः । योद्धुमाशंसते नित्यं फल्गुनेन महात्मना ॥
saṃdhāya dhārtarāṣṭreṇa pārthānāṃ vipriye rataḥ | yoddhumāśaṃsate nityaṃ phalgunena mahātmanā
धृतराष्ट्र के पुत्र से मेल करके वह पार्थों का अहित करने में लगा रहता था और सदा महात्मा फाल्गुन (अर्जुन) से युद्ध करने की आकांक्षा रखता था।
श्लोक 22 (3.310.22)
सदा हि तस्य स्पर्धाऽऽसीदर्जुनेन विशांपते । अर्जुनस्य च कर्णेन यतो द्वन्द्वं बभूव ह ॥
sadā hi tasya spardhā''sīdarjunena viśāṃpate | arjunasya ca karṇena yato dvandvaṃ babhūva ha
हे प्रजापालक, उसकी अर्जुन से और अर्जुन की कर्ण से सदा प्रतिस्पर्धा रही, जब से उनका आमना-सामना हुआ था।
श्लोक 23 (3.310.23)
एतद्गुह्यं महाराज सूर्यस्यासीन्न संशयः । यः सूर्यसंभवः कर्णः कुर्यात्प्रतिकूले रतः ॥
etadguhyaṃ mahārāja sūryasyāsīnna saṃśayaḥ | yaḥ sūryasaṃbhavaḥ karṇaḥ kuryātpratikūle rataḥ
हे महाराज, निःसन्देह यह सूर्य का रहस्य था कि सूर्य से उत्पन्न कर्ण विरोध में ही रत रहेगा।
श्लोक 24 (3.310.24)
तं तु कुण्डलिनं दृष्ट्वा वर्मणा च समन्वितम् । अवध्यं समरे मत्वा पर्यतप्यद्युधिष्ठिरः ॥
taṃ tu kuṇḍalinaṃ dṛṣṭvā varmaṇā ca samanvitam | avadhyaṃ samare matvā paryatapyadyudhiṣṭhiraḥ
उसे कुण्डलों और कवच से युक्त देखकर, युद्ध में अवध्य मानकर युधिष्ठिर सन्तप्त रहते थे।
श्लोक 25 (3.310.25)
यदा च कर्णो राजेन्द्र भानुमन्तं दिवाकरम् । स्तौति मध्यंदिने प्राप्ते प्राञ्जलिः सलिलोत्थितः ॥
yadā ca karṇo rājendra bhānumantaṃ divākaram | stauti madhyaṃdine prāpte prāñjaliḥ salilotthitaḥ
और हे राजेन्द्र, जब मध्याह्न होने पर कर्ण जल से निकलकर हाथ जोड़े तेजस्वी दिवाकर सूर्य की स्तुति करता था,
श्लोक 26 (3.310.26)
तत्रैनमुपतिष्ठन्ति ब्राह्मणा धनहेतुना । नादेयं तस्य तत्काले किंचिदस्ति द्विजातिषु ॥
tatrainamupatiṣṭhanti brāhmaṇā dhanahetunā | nādeyaṃ tasya tatkāle kiṃcidasti dvijātiṣu
तब ब्राह्मण धन की इच्छा से उसके पास आते थे; उस समय ऐसी कोई वस्तु नहीं थी जो वह ब्राह्मणों को न दे।
श्लोक 27 (3.310.27)
तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा भिक्षां देहीत्युपस्थितः । स्वागतं चेति राधेयस्तमथ प्रत्यभाषत ॥
tamindro brāhmaṇo bhūtvā bhikṣāṃ dehītyupasthitaḥ | svāgataṃ ceti rādheyastamatha pratyabhāṣata
इन्द्र ब्राह्मण का रूप धारण करके "भिक्षा दो" कहते हुए उसके सामने उपस्थित हुए। तब राधापुत्र ने उनसे कहा — "आपका स्वागत है।"