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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 311

कर्ण द्वारा कवच-कुण्डल का दान

ब्राह्मण के वेश में आए इन्द्र कर्ण द्वारा प्रस्तावित स्त्रियाँ, गाँव, गौएँ, भूमि और राज्य ठुकराकर केवल उसके जन्मजात कवच और कुण्डल माँगते हैं। उन्हें पहचान चुका कर्ण बदले में कुछ माँगता है, और इन्द्र उसे अपनी अमोघ शक्ति देते हैं, जो कर्ण के हाथ से एक बलवान शत्रु को मारकर इन्द्र के पास लौट आएगी — पर जिसे कर्ण मारना चाहता है, उसकी रक्षा स्वयं नारायण कृष्ण करते हैं। कर्ण मुख पर बिना कोई विकार लाए अपने शरीर से कवच और कुण्डल काट देता है, जिस पर देवता और मनुष्य जयघोष करते हैं, और पाण्डवों का कार्य सिद्ध मानकर इन्द्र स्वर्ग लौट जाते हैं। जनमेजय पूछते हैं कि उस समय पाण्डव कहाँ थे, और वैशम्पायन बताते हैं कि जयद्रथ से द्रौपदी को छुड़ाकर और काम्यक में मार्कण्डेय की कथाएँ सुनकर वे द्वैतवन लौट आए।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.311.1)

देवराजमनुप्राप्तं ब्राह्मणच्छद्मनाऽऽवृतम् । दृष्ट्वास्वागतमित्याह न बुबोधास्य मानसम् ॥

devarājamanuprāptaṃ brāhmaṇacchadmanā''vṛtam | dṛṣṭvāsvāgatamityāha na bubodhāsya mānasam

ब्राह्मण के वेश में छिपकर आए देवराज को देखकर उसने "स्वागत है" कहा, परन्तु उनके मन की बात न जान सका।

श्लोक 2 (3.311.2)

हिरण्यकण्ठीः प्रमदा ग्रामान्वा बहुगोकुलान् । किं ददानीति तं विप्रमुवाचाधिरथिस्ततः ॥

hiraṇyakaṇṭhīḥ pramadā grāmānvā bahugokulān | kiṃ dadānīti taṃ vipramuvācādhirathistataḥ

तब अधिरथपुत्र ने उस ब्राह्मण से कहा — "मैं आपको क्या दूँ — सोने के कण्ठहार पहने स्त्रियाँ, या बहुत-से गोकुलों वाले गाँव?"

ब्राह्मण उवाच

श्लोक 3 (3.311.3)

हिरण्यकण्ठ्यः प्रमदा यच्चान्यत्प्रीतिवर्धनम् । नाहं दत्तमिहेच्छामि तदर्थिभ्यः प्रदीयताम् ॥

hiraṇyakaṇṭhyaḥ pramadā yaccānyatprītivardhanam | nāhaṃ dattamihecchāmi tadarthibhyaḥ pradīyatām

"सोने के कण्ठहार वाली स्त्रियाँ और जो कुछ भी आनन्द बढ़ाने वाला है — वह मैं यहाँ दान में नहीं चाहता। वह उन्हें दिया जाए जो उसे चाहते हों।

श्लोक 4 (3.311.4)

यदेतत्सहजं वर्म कुण्डले च तवानघ । एतदुत्कृत्य मे देहि यदि सत्यव्रतो भवान् ॥

yadetatsahajaṃ varma kuṇḍale ca tavānagha | etadutkṛtya me dehi yadi satyavrato bhavān

हे निष्पाप, तुम्हारा यह जन्मजात कवच और ये कुण्डल — इन्हें काटकर मुझे दे दो, यदि तुम सत्यव्रती हो।

श्लोक 5 (3.311.5)

एतदिच्छाम्यहं भिक्षां त्वया दत्तां परंतप । एष मे सर्वलाभानां लाभः परमको मतः ॥

etadicchāmyahaṃ bhikṣāṃ tvayā dattāṃ paraṃtapa | eṣa me sarvalābhānāṃ lābhaḥ paramako mataḥ

हे शत्रुओं को तपाने वाले, मैं तुमसे यही भिक्षा चाहता हूँ; सब लाभों में इसे ही मैं परम लाभ मानता हूँ।"

कर्ण उवाच

श्लोक 6 (3.311.6)

अवनिं प्रमदा गाश्च निर्वापं बहुवार्षिकम् । तत्ते विप्र प्रदास्यामि न तु वर्म सकुण्डलम् ॥

avaniṃ pramadā gāśca nirvāpaṃ bahuvārṣikam | tatte vipra pradāsyāmi na tu varma sakuṇḍalam

"हे विप्र, भूमि, स्त्रियाँ, गौएँ और बहुत वर्षों तक चलने वाली जीविका — यह सब मैं आपको दूँगा, परन्तु कुण्डलों सहित कवच नहीं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (3.311.7)

एवं बहुविधैर्वाक्यैर्वार्यमाणः स तु द्विजः । कर्णेन भरतश्रेष्ठ नान्यं वरमयाचत ॥

evaṃ bahuvidhairvākyairvāryamāṇaḥ sa tu dvijaḥ | karṇena bharataśreṣṭha nānyaṃ varamayācata

हे भरतश्रेष्ठ, कर्ण ने अनेक प्रकार के वचनों से उसे रोकना चाहा, फिर भी उस ब्राह्मण ने दूसरा कोई वर नहीं माँगा।

श्लोक 8 (3.311.8)

सान्त्वितश्च यथाशक्ति पूजितश्च यथाविधि । न चान्यं स द्विजश्रेष्ठः कामयामास वै वरम् ॥

sāntvitaśca yathāśakti pūjitaśca yathāvidhi | na cānyaṃ sa dvijaśreṣṭhaḥ kāmayāmāsa vai varam

कर्ण ने यथाशक्ति उसे मनाया और विधिपूर्वक उसका सत्कार किया, फिर भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने कोई दूसरा वर नहीं चाहा।

श्लोक 9 (3.311.9)

यदा नान्यं प्रवृणुते वरं वै द्विजसत्तमः । विनाऽस्य सहजं वर्म कुण्डले च विशांपते । तदैनमब्रवीद्भूयो राधेयः प्रहसन्निव ॥

yadā nānyaṃ pravṛṇute varaṃ vai dvijasattamaḥ | vinā'sya sahajaṃ varma kuṇḍale ca viśāṃpate | tadainamabravīdbhūyo rādheyaḥ prahasanniva

हे प्रजापालक, जब उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उसके जन्मजात कवच और कुण्डलों के सिवा कोई दूसरा वर नहीं माँगा, तब राधापुत्र मानो हँसते हुए फिर उससे बोला—

कर्ण उवाच

श्लोक 10 (3.311.10)

सहजं वर्म मे विप्र कुण्डले चामृतोद्भवे । तेनावध्योस्मि लोकेषु ततो नैतज्जहाम्यहम् ॥

sahajaṃ varma me vipra kuṇḍale cāmṛtodbhave | tenāvadhyosmi lokeṣu tato naitajjahāmyaham

"हे विप्र, मेरा कवच जन्मजात है और कुण्डल अमृत से उत्पन्न हैं; इन्हीं के कारण मैं संसार में अवध्य हूँ, इसलिए मैं इन्हें नहीं छोड़ूँगा।

श्लोक 11 (3.311.11)

विशालं पृथिवीराज्यं क्षेमं निहतकण्टकम् । प्रतिगृह्णीष्व मत्तस्त्वं साधु ब्राह्मणपुङ्गव ॥

viśālaṃ pṛthivīrājyaṃ kṣemaṃ nihatakaṇṭakam | pratigṛhṇīṣva mattastvaṃ sādhu brāhmaṇapuṅgava

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, इसके बदले मुझसे विशाल, सुरक्षित और निष्कण्टक पृथ्वी का राज्य सहर्ष ग्रहण कीजिए।

श्लोक 12 (3.311.12)

कुण्डलाभ्यां विमुक्तोऽहंवर्मणा सहजेन च । दमनीयो भविष्यामि शत्रूणां द्विजसत्तम ॥

kuṇḍalābhyāṃ vimukto'haṃvarmaṇā sahajena ca | damanīyo bhaviṣyāmi śatrūṇāṃ dvijasattama

हे द्विजश्रेष्ठ, कुण्डलों और जन्मजात कवच से रहित होकर मैं शत्रुओं के लिए सहज ही वश में करने योग्य हो जाऊँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (3.311.13)

यदन्यं न वरं वव्रे भगवान्पाकशासनः । ततः प्रहस्य कर्णस्तं पुनरित्यब्रवीद्वचः ॥

yadanyaṃ na varaṃ vavre bhagavānpākaśāsanaḥ | tataḥ prahasya karṇastaṃ punarityabravīdvacaḥ

जब भगवान् पाकशासन (इन्द्र) ने दूसरा कोई वर नहीं माँगा, तब कर्ण ने हँसकर फिर उनसे ये वचन कहे—

कर्ण उवाच

श्लोक 14 (3.311.14)

विदितो देवदेवेश प्रागेवासि मम प्रभो । न तु न्याय्यं मया दातुं तव शक्र वृथा वरम् ॥

vidito devadeveśa prāgevāsi mama prabho | na tu nyāyyaṃ mayā dātuṃ tava śakra vṛthā varam

"हे देवदेवेश, हे प्रभु, मैंने आपको पहले ही पहचान लिया था। परन्तु हे शक्र, आपको बिना कुछ लिए वर देना मेरे लिए उचित नहीं।

श्लोक 15 (3.311.15)

त्वं हि देवेश्वरः साक्षात्त्वया देयो वरो मम । अन्येषां चैव भूतानामीश्वरो ह्यसि भूतकृत् ॥

tvaṃ hi deveśvaraḥ sākṣāttvayā deyo varo mama | anyeṣāṃ caiva bhūtānāmīśvaro hyasi bhūtakṛt

क्योंकि आप साक्षात् देवताओं के स्वामी हैं; वर तो आपको मुझे देना चाहिए। आप अन्य सब प्राणियों के भी ईश्वर और सृष्टिकर्ता हैं।

श्लोक 16 (3.311.16)

यदि दास्यामि ते देव कुण्डले कवचं तथा । वध्यतामुपयास्यामि त्वं च शक्रावहास्यताम् ॥

yadi dāsyāmi te deva kuṇḍale kavacaṃ tathā | vadhyatāmupayāsyāmi tvaṃ ca śakrāvahāsyatām

हे देव, यदि मैं आपको कुण्डल और कवच दे दूँ, तो मैं वध के योग्य हो जाऊँगा और हे शक्र, आप उपहास के पात्र बनेंगे।

श्लोक 17 (3.311.17)

तस्माद्विनिमयं कृत्वा कुण्डलेवर्म चोत्तमम् । हरस्व शक्रकामं मे न दद्यामहमन्यथा ॥

tasmādvinimayaṃ kṛtvā kuṇḍalevarma cottamam | harasva śakrakāmaṃ me na dadyāmahamanyathā

इसलिए हे शक्र, विनिमय कीजिए — कुण्डल और उत्तम कवच ले लीजिए और मेरी कामना पूरी कीजिए; अन्यथा मैं इन्हें नहीं दूँगा।"

शक्र उवाच

श्लोक 18 (3.311.18)

विदितोऽहं रवेः पूर्वमायानेव तवान्तिकम् । तेन ते सर्वमाख्यातमेवमेतन्न संशयः ॥

vidito'haṃ raveḥ pūrvamāyāneva tavāntikam | tena te sarvamākhyātamevametanna saṃśayaḥ

"मेरे तुम्हारे पास आते समय ही सूर्य को मेरा पता चल गया था; उन्होंने ही तुम्हें सब कुछ बता दिया है। निःसन्देह बात ऐसी ही है।

श्लोक 19 (3.311.19)

काममस्तु तथा तात तव कर्ण यथेच्छसि । वर्जयित्वा तु मे वज्रं प्रवृणीष्व यथेच्छसि ॥

kāmamastu tathā tāta tava karṇa yathecchasi | varjayitvā tu me vajraṃ pravṛṇīṣva yathecchasi

हे तात कर्ण, जैसा तुम चाहते हो वैसा ही हो। मेरे वज्र को छोड़कर जो चाहो, माँग लो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 20 (3.311.20)

ततः कर्णः प्रहृष्टस्तु उपसंगम्य वासवम् । अमोघां शक्तिमभ्येत्य वव्रे सम्पूर्णमानसः ॥

tataḥ karṇaḥ prahṛṣṭastu upasaṃgamya vāsavam | amoghāṃ śaktimabhyetya vavre sampūrṇamānasaḥ

तब कर्ण ने प्रसन्न होकर वासव के पास जाकर, पूर्ण मनोरथ होकर, अमोघ शक्ति माँगी।

कर्ण उवाच

श्लोक 21 (3.311.21)

वर्मणा कुण्डलाभ्यां च शक्तिं मे देहि वासव । अमोघां शत्रुसङ्घानां घातिनीं पृतनामुखे ॥

varmaṇā kuṇḍalābhyāṃ ca śaktiṃ me dehi vāsava | amoghāṃ śatrusaṅghānāṃ ghātinīṃ pṛtanāmukhe

"हे वासव, कवच और कुण्डलों के बदले मुझे अपनी अमोघ शक्ति दीजिए, जो युद्ध के मुहाने पर शत्रु-समूहों का संहार करती है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (3.311.22)

ततः सञ्चिन्त्य मनसा मुहूर्तमिव वासवः । शक्त्यर्थं पृथिवीपाल कर्णं वाक्यमथाब्रवीत् ॥

tataḥ sañcintya manasā muhūrtamiva vāsavaḥ | śaktyarthaṃ pṛthivīpāla karṇaṃ vākyamathābravīt

हे पृथ्वीपाल, तब वासव ने क्षण भर मन में विचार किया और शक्ति के विषय में कर्ण से यह वचन कहा—

इन्द्र उवाच

श्लोक 23 (3.311.23)

कुण्डले मे प्रयच्छस्व वर्म चैव शरीरजम् । गृहाण कर्ण शक्तिं त्वमनेन समयेन च ॥

kuṇḍale me prayacchasva varma caiva śarīrajam | gṛhāṇa karṇa śaktiṃ tvamanena samayena ca

"मुझे अपने कुण्डल और शरीर के साथ उत्पन्न कवच दे दो, और हे कर्ण, इस शर्त पर यह शक्ति ले लो।

श्लोक 24 (3.311.24)

अमोघा हन्ति शतशः शत्रून्मम करच्युता । पुनश्च पाणिमभ्येति मम दैत्यान्विनिघ्नतः ॥

amoghā hanti śataśaḥ śatrūnmama karacyutā | punaśca pāṇimabhyeti mama daityānvinighnataḥ

मेरे हाथ से छूटकर यह अमोघ शक्ति सैकड़ों शत्रुओं को मारती है, और दैत्यों का संहार करते समय फिर मेरे हाथ में लौट आती है।

श्लोक 25 (3.311.25)

सेयं तव करप्राप्ता हत्वैकं रिपुमूर्जितम् । गर्जन्तं प्रतपन्तं च मामेवैष्यति सूतज ॥

seyaṃ tava karaprāptā hatvaikaṃ ripumūrjitam | garjantaṃ pratapantaṃ ca māmevaiṣyati sūtaja

परन्तु हे सूतपुत्र, तुम्हारे हाथ में आकर यह गरजते और तपते हुए किसी एक बलवान शत्रु को मारकर मेरे ही पास लौट आएगी।"

कर्ण उवाच

श्लोक 26 (3.311.26)

एकमेवाहमिच्छामि रिपुं हन्तुं महाहवे । गर्जन्तंप्रतपन्तं च यतो मम भयं भवेत् ॥

ekamevāhamicchāmi ripuṃ hantuṃ mahāhave | garjantaṃpratapantaṃ ca yato mama bhayaṃ bhavet

"मैं महायुद्ध में केवल एक ही शत्रु को मारना चाहता हूँ — जो गरजता और तपता है, और जिससे मुझे भय है।"

इन्द्र उवाच

श्लोक 27 (3.311.27)

एकं हनिष्यसि रिपुं गर्जन्तं बलिनं रणे । त्वं तु यं प्रार्थयस्येकं रक्ष्यते स महात्मना ॥

ekaṃ haniṣyasi ripuṃ garjantaṃ balinaṃ raṇe | tvaṃ tu yaṃ prārthayasyekaṃ rakṣyate sa mahātmanā

"तुम रण में एक गरजते हुए बलवान शत्रु को मारोगे। परन्तु जिस एक को तुम चाहते हो, उसकी रक्षा एक महात्मा करते हैं —

श्लोक 28 (3.311.28)

यमाहुर्वेदविद्वांसो वराहमपराजितम् । नारायणमचिन्त्यं च तेन कृष्णेन रक्ष्यते ॥

yamāhurvedavidvāṃso varāhamaparājitam | nārāyaṇamacintyaṃ ca tena kṛṣṇena rakṣyate

जिन्हें वेदज्ञ अपराजित वराह और अचिन्त्य नारायण कहते हैं — वही कृष्ण उसकी रक्षा करते हैं।"

कर्ण उवाच

श्लोक 29 (3.311.29)

एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वं दानवानां निषूदन । वधिष्यामि रणे शत्रुं यो मे स्थाता पुरस्सरः ॥

evametadyathā''ttha tvaṃ dānavānāṃ niṣūdana | vadhiṣyāmi raṇe śatruṃ yo me sthātā purassaraḥ

"हे दानवों के संहारक, बात वैसी ही है जैसी आप कहते हैं। फिर भी जो शत्रु मेरे सामने सबसे आगे खड़ा होगा, उसे मैं रण में मारूँगा।

श्लोक 30 (3.311.30)

एवमप्यस्तु भगवन्नेकवीरवधे मम । अमोघां देहि मे शक्तिं यथा हन्यां प्रतापिनम् ॥

evamapyastu bhagavannekavīravadhe mama | amoghāṃ dehi me śaktiṃ yathā hanyāṃ pratāpinam

हे भगवन्, ऐसा ही हो — एक वीर के वध के लिए ही सही, मुझे अमोघ शक्ति दीजिए, जिससे मैं किसी प्रतापी शत्रु को मार सकूँ।

श्लोक 31 (3.311.31)

उत्कृत्य तु प्रदास्यामि कुण्डले कवचं च ते । निकृत्तेषु तु गात्रेषु न मे बीभत्सता भवेत् ॥

utkṛtya tu pradāsyāmi kuṇḍale kavacaṃ ca te | nikṛtteṣu tu gātreṣu na me bībhatsatā bhavet

मैं कुण्डल और कवच काटकर आपको दे दूँगा; परन्तु कटे हुए अंगों से मेरा शरीर वीभत्स न दिखे।"

इन्द्र उवाच

श्लोक 32 (3.311.32)

न ते बीभत्सता कर्ण भविष्यति कथञ्चन । व्रणश्चैव न गात्रेषु यस्त्वं नानृतमिच्छसि ॥

na te bībhatsatā karṇa bhaviṣyati kathañcana | vraṇaścaiva na gātreṣu yastvaṃ nānṛtamicchasi

"हे कर्ण, तुम किसी प्रकार कुरूप नहीं होगे, न तुम्हारे अंगों पर कोई घाव रहेगा, क्योंकि तुम असत्य नहीं चाहते।

श्लोक 33 (3.311.33)

यादृशस्ते पितुर्वर्णस्तेजश्च वदतांवर । तादृशेनैव वर्णेन त्वं कर्ण भविता पुनः ॥

yādṛśaste piturvarṇastejaśca vadatāṃvara | tādṛśenaiva varṇena tvaṃ karṇa bhavitā punaḥ

हे वक्ताओं में श्रेष्ठ कर्ण, जैसा तुम्हारे पिता का वर्ण और तेज है, वैसे ही वर्ण से तुम फिर युक्त हो जाओगे।

श्लोक 34 (3.311.34)

विद्यमानेषु शस्त्रेषु यद्यमोघामसंशये । प्रमत्तो मोक्ष्यसे चापि त्वय्येवैषा पतिष्यति ॥

vidyamāneṣu śastreṣu yadyamoghāmasaṃśaye | pramatto mokṣyase cāpi tvayyevaiṣā patiṣyati

परन्तु यदि अन्य शस्त्रों के रहते हुए और बिना किसी संकट के तुम असावधानी से यह अमोघ शक्ति छोड़ोगे, तो यह तुम पर ही गिरेगी।"

कर्ण उवाच

श्लोक 35 (3.311.35)

संशयं परमं प्राप्य विमोक्ष्ये वासवीमिमाम् । यथा मामात्थ शक्र त्वं सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ॥

saṃśayaṃ paramaṃ prāpya vimokṣye vāsavīmimām | yathā māmāttha śakra tvaṃ satyametadbravīmi te

"हे शक्र, जैसा आप मुझसे कहते हैं, घोर संकट में पड़ने पर ही मैं यह वासवी शक्ति छोड़ूँगा; मैं आपसे यह सत्य कहता हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 36 (3.311.36)

ततः शक्तिं प्रज्वलितां प्रतिगृह्य विशांपते । शस्त्रं गृहीत्वा निशितं सर्वगात्राण्यकृन्तत ॥

tataḥ śaktiṃ prajvalitāṃ pratigṛhya viśāṃpate | śastraṃ gṛhītvā niśitaṃ sarvagātrāṇyakṛntata

हे प्रजापालक, तब प्रज्वलित शक्ति ग्रहण करके उसने एक तीखा शस्त्र लिया और अपने सारे अंगों को काटने लगा।

श्लोक 37 (3.311.37)

ततो देवा मानवा दानवाश्च । निकृन्तन्तं कर्णमात्मानमेव । दृष्ट्वा सर्वे सिंहनादान्प्रणेदु- । र्न ह्यस्यासीन्मुखजो वै विकारः ॥

tato devā mānavā dānavāśca | nikṛntantaṃ karṇamātmānameva | dṛṣṭvā sarve siṃhanādānpraṇedu- | rna hyasyāsīnmukhajo vai vikāraḥ

तब देवता, मनुष्य और दानव — सब कर्ण को अपने ही शरीर को काटते देखकर सिंहनाद करने लगे; क्योंकि उसके मुख पर कोई विकार नहीं आया।

श्लोक 38 (3.311.38)

ततो दिव्या दुन्दुभयः प्रणेदुः । पपातोच्चैः पुष्पवर्षं च दिव्यम् । दृष्ट्वा कर्णं शस्त्रसंकृत्तगात्रं । मुहुश्चापि स्मयमानं नृवीरम् ॥

tato divyā dundubhayaḥ praṇeduḥ | papātoccaiḥ puṣpavarṣaṃ ca divyam | dṛṣṭvā karṇaṃ śastrasaṃkṛttagātraṃ | muhuścāpi smayamānaṃ nṛvīram

तब दिव्य दुन्दुभियाँ बज उठीं और ऊपर से दिव्य पुष्पों की वर्षा हुई, जब उन्होंने नरवीर कर्ण को शस्त्र से कटे अंगों के साथ भी बार-बार मुस्कुराते देखा।

श्लोक 39 (3.311.39)

ततश्छित्त्वा कवचं दिव्यमङ्गा- । त्तथैवार्द्रं प्रददौ वासवाय । तथोत्कृत्य प्रददौ कुण्डले ते । कर्णात्तस्मात्कर्मणा तेन कर्णः ॥

tataśchittvā kavacaṃ divyamaṅgā- | ttathaivārdraṃ pradadau vāsavāya | tathotkṛtya pradadau kuṇḍale te | karṇāttasmātkarmaṇā tena karṇaḥ

तब अपने शरीर से दिव्य कवच काटकर उसने उसे गीला ही वासव को दे दिया; और इसी प्रकार कुण्डल काटकर उन्हें भी दे दिया। कानों से कुण्डल काटने के उस कर्म के कारण वह "कर्ण" कहलाया।

श्लोक 40 (3.311.40)

ततः शक्रः प्रहसन्वञ्चयित्वा । कर्णं लोके यशसा योजयित्वा । कृतं कार्यं पाण्डवानां हि मेने । ततः पश्चाद्दिवमेवोत्पपात ॥

tataḥ śakraḥ prahasanvañcayitvā | karṇaṃ loke yaśasā yojayitvā | kṛtaṃ kāryaṃ pāṇḍavānāṃ hi mene | tataḥ paścāddivamevotpapāta

तब शक्र हँसते हुए, कर्ण को छलकर और साथ ही उसे संसार में यश से जोड़कर, पाण्डवों का कार्य सिद्ध हुआ मानकर, फिर स्वर्ग को उड़ गए।

श्लोक 41 (3.311.41)

श्रुत्वा कर्णं मुषितं धार्तराष्ट्रा । दीनाः सर्वे भग्नदर्पा इवासन् । तां चावस्थां गमितं सूतपुत्रं । श्रुत्वा पार्था जहृषुः काननस्थाः ॥

śrutvā karṇaṃ muṣitaṃ dhārtarāṣṭrā | dīnāḥ sarve bhagnadarpā ivāsan | tāṃ cāvasthāṃ gamitaṃ sūtaputraṃ | śrutvā pārthā jahṛṣuḥ kānanasthāḥ

कर्ण के लुट जाने की बात सुनकर धृतराष्ट्र के सभी पुत्र दीन हो गए, मानो उनका दर्प टूट गया हो; और सूतपुत्र की यह दशा सुनकर वन में रहने वाले पार्थ हर्षित हुए।

जनमेजय उवाच

श्लोक 42 (3.311.42)

क्वस्था वीराः पाण्डवास्ते बभूवुः । कुतश्चैते श्रुतवन्तः प्रियं तत् । किं वाऽकार्षुर्द्वादशेऽब्दे व्यतीते । तन्मे सर्वं भगवान्व्याकरोतु ॥

kvasthā vīrāḥ pāṇḍavāste babhūvuḥ | kutaścaite śrutavantaḥ priyaṃ tat | kiṃ vā'kārṣurdvādaśe'bde vyatīte | tanme sarvaṃ bhagavānvyākarotu

"उस समय वे वीर पाण्डव कहाँ थे? उन्होंने यह प्रिय समाचार कहाँ से सुना? और बारहवाँ वर्ष बीत जाने पर उन्होंने क्या किया? पूज्यवर, यह सब मुझे बताइए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 43 (3.311.43)

लब्ध्वा कृष्णां सैन्धवं द्रावयित्वा । विप्रैः सार्धं काम्यकादाश्रमात्ते । मार्कण्डेयाच्छ्रुतवन्तः पुराणं । देवर्षीणां चरितं विस्तरेण ॥

labdhvā kṛṣṇāṃ saindhavaṃ drāvayitvā | vipraiḥ sārdhaṃ kāmyakādāśramātte | mārkaṇḍeyācchrutavantaḥ purāṇaṃ | devarṣīṇāṃ caritaṃ vistareṇa

कृष्णा (द्रौपदी) को वापस पाकर, सिन्धुराज (जयद्रथ) को भगाकर, और मार्कण्डेय से देवताओं और ऋषियों के चरित से भरी पुरातन कथाएँ विस्तार से सुनकर, वे ब्राह्मणों के साथ काम्यक आश्रम से चले,

श्लोक 44 (3.311.44)

प्रत्याजग्मुः सरथाः सानुयात्राः । सर्वैः सार्धं सूतपौरोगवैस्ते । ततो ययुर्द्वैतवनं नृवीरा । निस्तीर्यैवं वनवासं समग्रम् ॥

pratyājagmuḥ sarathāḥ sānuyātrāḥ | sarvaiḥ sārdhaṃ sūtapaurogavaiste | tato yayurdvaitavanaṃ nṛvīrā | nistīryaivaṃ vanavāsaṃ samagram

और अपने रथों तथा अनुयायियों के साथ, सब सारथियों और भण्डार-अधिकारियों सहित लौट आए; फिर वे नरवीर इस प्रकार सारा वनवास पार करके द्वैतवन को चले गए।

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