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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 313

सरोवर पर गिरे भाई

यक्ष प्रश्न, अध्याय 1 / 2

वन में व्यर्थ भाग-दौड़ से थके पाण्डव एक वृक्ष के नीचे विश्राम करते हैं, और हर भाई अपने संकट के लिए स्वयं को दोषी ठहराता है। युधिष्ठिर नकुल को जल खोजने भेजते हैं; एक निर्मल सरोवर पर आकाशवाणी उसे प्रश्नों के उत्तर दिए बिना जल पीने से रोकती है, पर वह फिर भी पी लेता है और मृत होकर गिर पड़ता है। सहदेव, अर्जुन और भीम एक-एक करके वहाँ जाते हैं और उनकी भी यही दशा होती है। उनके देर तक न लौटने से चिंतित युधिष्ठिर स्वयं वन से होकर उस अद्भुत सरोवर तक पहुँचते हैं।

अध्याय 312अध्याय-सूचीअध्याय 314

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (3.313.1)

नापदामस्ति मर्यादा न निमित्तं न कारणम् । धर्मस्तु विभजत्यर्थमुभयोः पुण्यपापयोः ॥

nāpadāmasti maryādā na nimittaṃ na kāraṇam | dharmastu vibhajatyarthamubhayoḥ puṇyapāpayoḥ

विपत्तियों की कोई सीमा नहीं होती; न उनके लिए कोई निमित्त चाहिए, न कोई कारण। पुण्य और पाप, दोनों के फल का बँटवारा धर्म ही करता है।

भीम उवाच

श्लोक 2 (3.313.2)

प्रातिकाम्यनयत्कृष्णां सभायां प्रेष्यवत्तदा । न मया निहतस्तत्र तेन प्राप्ताः स्म संशयम् ॥

prātikāmyanayatkṛṣṇāṃ sabhāyāṃ preṣyavattadā | na mayā nihatastatra tena prāptāḥ sma saṃśayam

जब प्रातिकामी द्रौपदी को दासी की तरह सभा में ले आया था, तब मैंने उसे वहीं नहीं मार डाला। इसी कारण हम इस संकट में पड़े हैं।

अर्जुन उवाच

श्लोक 3 (3.313.3)

वाचस्तीक्ष्णास्थिभेदिन्यः सूतपुत्रेण भाषिताः । अतितीव्रा मया क्षान्तास्तेन प्राप्ताः स्म संशयं ॥

vācastīkṣṇāsthibhedinyaḥ sūtaputreṇa bhāṣitāḥ | atitīvrā mayā kṣāntāstena prāptāḥ sma saṃśayaṃ

सूतपुत्र कर्ण ने हड्डियों तक को भेद देने वाले तीखे वचन कहे थे, और मैंने वे अत्यंत कठोर वचन सह लिए। इसी कारण हम इस संकट में पड़े हैं।

सहदेव उवाच

श्लोक 4 (3.313.4)

शकुनिस्त्वां यदाऽजैषीदक्षद्यूतेन भारत । स मया न हतस्तत्र तेन प्राप्ताः स्म संशयम् ॥

śakunistvāṃ yadā'jaiṣīdakṣadyūtena bhārata | sa mayā na hatastatra tena prāptāḥ sma saṃśayam

हे भारत, जब शकुनि ने जुए में आपको हराया था, तब मैंने उसे वहीं नहीं मारा। इसी कारण हम इस संकट में पड़े हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (3.313.5)

ततो युधिष्ठिरो राजा नकुलं वाक्यमब्रवीत् । आरुह्य वृक्षं माद्रेय निरीक्षस्व दिशो दश ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā nakulaṃ vākyamabravīt | āruhya vṛkṣaṃ mādreya nirīkṣasva diśo daśa

तब राजा युधिष्ठिर ने नकुल से कहा, "हे माद्रीपुत्र, किसी वृक्ष पर चढ़कर दसों दिशाओं में देखो।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 6 (3.313.6)

पानीयमन्तिके पश्य वृक्षान्वाप्युदकाश्रयान् । एते हि भ्रातरः श्रान्तास्तव तात पिपासिताः ॥

pānīyamantike paśya vṛkṣānvāpyudakāśrayān | ete hi bhrātaraḥ śrāntāstava tāta pipāsitāḥ

देखो, कहीं पास में जल है, या जल के किनारे उगने वाले वृक्ष हैं। प्रिय, तुम्हारे ये भाई थके हुए हैं और प्यासे हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (3.313.7)

नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य शासनात् । तत उत्थाय मतिमाञ्शीघ्रमारुह्य पादपम् । अब्रवीद्भ्रातरं ज्येष्ठमभिवीक्ष्य समन्ततः ॥

nakulastu tathetyuktvā bhrāturjyeṣṭhasya śāsanāt | tata utthāya matimāñśīghramāruhya pādapam | abravīdbhrātaraṃ jyeṣṭhamabhivīkṣya samantataḥ

बड़े भाई की आज्ञा सुनकर नकुल ने कहा, "जैसी आज्ञा।" फिर वह बुद्धिमान उठा, शीघ्र एक वृक्ष पर चढ़ गया और चारों ओर देखकर अपने बड़े भाई से बोला।

नकुल उवाच

श्लोक 8 (3.313.8)

पश्यामि बहुलान्राजन्वृक्षानुदकसंश्रयान् । सारसानां च निर्ह्रादस्तत्रोदकमसंशयम् ॥

paśyāmi bahulānrājanvṛkṣānudakasaṃśrayān | sārasānāṃ ca nirhrādastatrodakamasaṃśayam

"हे राजन्, मुझे जल के पास उगने वाले बहुत-से वृक्ष दिखाई दे रहे हैं और सारसों की आवाज़ भी सुनाई दे रही है। वहाँ जल अवश्य है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 9 (3.313.9)

ततोऽब्रवीत्सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । गच्छ सौम्य ततः शीघ्रं तूणैः पानीयमानय ॥

tato'bravītsatyadhṛtiḥ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | gaccha saumya tataḥ śīghraṃ tūṇaiḥ pānīyamānaya

तब सत्य पर अडिग कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने कहा, "सौम्य, शीघ्र वहाँ जाओ और तरकशों में जल भर लाओ।"

श्लोक 10 (3.313.10)

नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा भ्रातुर्ज्येष्ठस्य शासनात् । प्राद्रवद्यत्र पानीयं शीघ्रं चैवान्वपद्यत ॥

nakulastu tathetyuktvā bhrāturjyeṣṭhasya śāsanāt | prādravadyatra pānīyaṃ śīghraṃ caivānvapadyata

नकुल "जैसी आज्ञा" कहकर बड़े भाई के आदेश से जल की ओर दौड़ा और शीघ्र ही वहाँ पहुँच गया।

श्लोक 11 (3.313.11)

स दृष्ट्वा विमलं तोयं सारसैः परिवारितम् । पातुकामस्ततो वाचमन्तरिक्षात्स शुश्रुवे ॥

sa dṛṣṭvā vimalaṃ toyaṃ sārasaiḥ parivāritam | pātukāmastato vācamantarikṣātsa śuśruve

उसने सारसों से घिरा हुआ निर्मल जल देखा। वह पीने ही वाला था कि उसे आकाश से एक वाणी सुनाई दी।

यक्ष उवाच

श्लोक 12 (3.313.12)

मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा तु माद्रेय ततः पिब हरस्व च ॥

mā tāta sāhasaṃ kārṣīrmama pūrvaparigrahaḥ | praśnānuktvā tu mādreya tataḥ piba harasva ca

"वत्स, दुस्साहस मत करो; इस जल पर पहले से मेरा अधिकार है। हे माद्रीपुत्र, पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, फिर जल पियो और ले भी जाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (3.313.13)

अनादृत्य तु तद्वाक्यं नकुलः सुपिपासितः । अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपात ह ॥

anādṛtya tu tadvākyaṃ nakulaḥ supipāsitaḥ | apibacchītalaṃ toyaṃ pītvā ca nipapāta ha

उस वाणी की परवाह न करके प्यास से व्याकुल नकुल ने शीतल जल पी लिया, और पीते ही वह गिर पड़ा।

श्लोक 14 (3.313.14)

चिरायमाणे नकुले कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अब्रवीद्भ्रातरं वीरं सहदेवमरिंदमम् ॥

cirāyamāṇe nakule kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | abravīdbhrātaraṃ vīraṃ sahadevamariṃdamam

नकुल के लौटने में देर होने पर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने शत्रुओं का दमन करने वाले अपने वीर भाई सहदेव से कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 15 (3.313.15)

भ्राता चिरायते तात सहदेव तवाग्रजः । तं चैवानय सोदर्यं पानीयं च त्वमानय ॥

bhrātā cirāyate tāta sahadeva tavāgrajaḥ | taṃ caivānaya sodaryaṃ pānīyaṃ ca tvamānaya

"प्रिय सहदेव, तुम्हारे बड़े भाई को बहुत देर हो गई है। अपने उस सगे भाई को भी ले आओ और जल भी लेते आओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (3.313.16)

सहदेवस्तथेत्युक्त्वा तां दिशं प्रत्यपद्यत । ददर्श च हतं भूमौ भ्रातरं नकुलं तदा ॥

sahadevastathetyuktvā tāṃ diśaṃ pratyapadyata | dadarśa ca hataṃ bhūmau bhrātaraṃ nakulaṃ tadā

सहदेव "जैसी आज्ञा" कहकर उसी दिशा में गया, और वहाँ उसने अपने भाई नकुल को भूमि पर मृत पड़ा देखा।

श्लोक 17 (3.313.17)

भ्रातृशोकाभिसंतप्तस्तृषया च प्रपीडितः । अभिदुद्राव पानीयं ततो वागभ्यभाषत ॥

bhrātṛśokābhisaṃtaptastṛṣayā ca prapīḍitaḥ | abhidudrāva pānīyaṃ tato vāgabhyabhāṣata

भाई के शोक से संतप्त और प्यास से पीड़ित होकर वह जल की ओर दौड़ा। तब वह वाणी बोली।

यक्ष उवाच

श्लोक 18 (3.313.18)

मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा यथाकामं पिबस्व च हरस्व च ॥

mā tāta sāhasaṃ kārṣīrmama pūrvaparigrahaḥ | praśnānuktvā yathākāmaṃ pibasva ca harasva ca

"वत्स, दुस्साहस मत करो; इस जल पर पहले से मेरा अधिकार है। मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, फिर इच्छानुसार पियो और ले भी जाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (3.313.19)

अनादृत्य तु तद्वाक्यं सहदेवः पिपासितः । अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपात ह ॥

anādṛtya tu tadvākyaṃ sahadevaḥ pipāsitaḥ | apibacchītalaṃ toyaṃ pītvā ca nipapāta ha

उस वाणी की परवाह न करके प्यासे सहदेव ने शीतल जल पी लिया, और पीते ही वह गिर पड़ा।

श्लोक 20 (3.313.20)

अथाब्रवीत्स विजयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भ्रातरौ ते चिरगतौ बीभत्सो शत्रुकर्शन ॥

athābravītsa vijayaṃ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | bhrātarau te ciragatau bībhatso śatrukarśana

तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने अर्जुन से कहा, "शत्रुओं को क्षीण करने वाले बीभत्सु, तुम्हारे दोनों भाइयों को गए बहुत देर हो गई है।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 21 (3.313.21)

तौ चैवानय भद्रं ते पानीयं च त्वमानय । त्वं हि नस्तात सर्वेषां दुःखितानामपाश्रयः ॥

tau caivānaya bhadraṃ te pānīyaṃ ca tvamānaya | tvaṃ hi nastāta sarveṣāṃ duḥkhitānāmapāśrayaḥ

तुम्हारा कल्याण हो, उन दोनों को ले आओ और जल भी लाओ। प्रिय, हम सब दुखियों का सहारा तुम्हीं हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 22 (3.313.22)

एवमुक्तो गुडाकेशः प्रगृह्य सशरं धनुः । आमुक्तखङ्गो मेधावी तत्सरः प्रत्यपद्यत ॥

evamukto guḍākeśaḥ pragṛhya saśaraṃ dhanuḥ | āmuktakhaṅgo medhāvī tatsaraḥ pratyapadyata

ऐसा कहे जाने पर निद्रा को जीतने वाले बुद्धिमान अर्जुन ने बाणों सहित धनुष उठाया, तलवार बाँधी और उस सरोवर की ओर चल पड़ा।

श्लोक 23 (3.313.23)

यतः पुरुषशार्दूलौ पानीयहरणे गतौ । तौ ददर्श हतौ तत्र भ्रातरौ श्वेतवाहनः ॥

yataḥ puruṣaśārdūlau pānīyaharaṇe gatau | tau dadarśa hatau tatra bhrātarau śvetavāhanaḥ

जहाँ वे दोनों पुरुषसिंह जल लाने गए थे, वहाँ श्वेत घोड़ों वाले अर्जुन ने अपने दोनों भाइयों को मृत पड़ा देखा।

श्लोक 24 (3.313.24)

विगतासू नरव्याघ्रौ शयानौ वसुधातले । प्रसुप्ताविव तौ दृष्ट्वा नरसिंहः सुदुःखितः । धनुरुद्यम्य कौन्तेयो व्यलोकयत तद्वनम् ॥

vigatāsū naravyāghrau śayānau vasudhātale | prasuptāviva tau dṛṣṭvā narasiṃhaḥ suduḥkhitaḥ | dhanurudyamya kaunteyo vyalokayata tadvanam

उन दोनों नरश्रेष्ठों को भूमि पर प्राणहीन, मानो सोए हुए, पड़ा देखकर वह नरसिंह अत्यंत दुखी हुआ। कुन्तीपुत्र ने धनुष उठाकर उस वन में चारों ओर देखा।

श्लोक 25 (3.313.25)

नापश्यत्तत्र किंचित्स भूतमस्मिन्महावने । सव्यसाची पिपासार्तः पानीयं सोऽभ्यधावत ॥

nāpaśyattatra kiṃcitsa bhūtamasminmahāvane | savyasācī pipāsārtaḥ pānīyaṃ so'bhyadhāvata

उस विशाल वन में उसे कहीं कोई प्राणी दिखाई नहीं दिया। तब प्यास से व्याकुल सव्यसाची जल की ओर दौड़ा।

श्लोक 26 (3.313.26)

अभिधावंस्ततो वाचमन्तरिक्षात्स शुश्रुवे । यत्त्वमिच्छसि पानीयं नैतच्छक्यं बलात्त्वया ॥

abhidhāvaṃstato vācamantarikṣātsa śuśruve | yattvamicchasi pānīyaṃ naitacchakyaṃ balāttvayā

दौड़ते हुए उसने आकाश से एक वाणी सुनी: "जिस जल को तुम चाहते हो, उसे तुम बलपूर्वक नहीं ले सकते।

यक्ष उवाच

श्लोक 27 (3.313.27)

कौन्तेय यदि वै प्रश्नान्मयोक्तान्प्रतिवक्ष्यसि । ततः पास्यसि पानीयं हरिष्यसि च भारत ॥

kaunteya yadi vai praśnānmayoktānprativakṣyasi | tataḥ pāsyasi pānīyaṃ hariṣyasi ca bhārata

हे कुन्तीपुत्र, हे भारत, यदि तुम मेरे पूछे प्रश्नों के उत्तर दोगे, तो जल पी भी सकोगे और ले भी जा सकोगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (3.313.28)

वारितस्त्वब्रवीत्पार्थो दृश्यमानो निवारय । यावद्बाणैर्विनिर्भिन्नः पुनर्नैवं वदिष्यसि ॥

vāritastvabravītpārtho dṛśyamāno nivāraya | yāvadbāṇairvinirbhinnaḥ punarnaivaṃ vadiṣyasi

इस प्रकार रोके जाने पर पार्थ ने कहा, "सामने आकर मुझे रोको! जब मेरे बाण तुम्हें बींध डालेंगे, तब तुम फिर ऐसा नहीं कहोगे।"

श्लोक 29 (3.313.29)

एवमुक्त्वा ततः पार्थः शरैरस्त्रानुमन्त्रितैः । प्रववर्ष दिशः कृत्स्नाः शब्दवेधं च दर्शयन् । कर्णिनालीकनाराचानुत्सृजन्भरतर्षभः ॥

evamuktvā tataḥ pārthaḥ śarairastrānumantritaiḥ | pravavarṣa diśaḥ kṛtsnāḥ śabdavedhaṃ ca darśayan | karṇinālīkanārācānutsṛjanbharatarṣabhaḥ

यह कहकर पार्थ ने अस्त्र-मंत्रों से अभिमंत्रित बाणों की सब दिशाओं में वर्षा कर दी और केवल शब्द सुनकर लक्ष्य भेदने का अपना कौशल दिखाया। उस भरतश्रेष्ठ ने कर्णी, नालीक और नाराच बाण छोड़े।

श्लोक 30 (3.313.30)

स त्वमोघानिषून्मुक्त्वा तृष्णयाऽभिप्रपीडितः । अनेकैरिषुसंघातैरन्तरिक्षे ववर्ष ह ॥

sa tvamoghāniṣūnmuktvā tṛṣṇayā'bhiprapīḍitaḥ | anekairiṣusaṃghātairantarikṣe vavarṣa ha

प्यास से अत्यंत पीड़ित होते हुए भी उसने अपने अचूक बाण छोड़े और अनेक बाण-समूहों से आकाश में वर्षा की।

यक्ष उवाच

श्लोक 31 (3.313.31)

किं विधानेन ते पार्थ प्रश्नानुक्त्वा पयः पिब । अनुक्त्वा च पिबन्प्रश्नान्पीत्वैव न भविष्यसि ॥

kiṃ vidhānena te pārtha praśnānuktvā payaḥ piba | anuktvā ca pibanpraśnānpītvaiva na bhaviṣyasi

"पार्थ, इस सबसे क्या लाभ? प्रश्नों के उत्तर देकर जल पियो। यदि प्रश्नों के उत्तर दिए बिना पियोगे, तो पीते ही नहीं बचोगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 32 (3.313.32)

स च मोघानिषून्दृष्ट्वा तृष्णया च प्रपीडितः । अवज्ञायैव तां वाचं पीत्वैव निपपात ह ॥

sa ca moghāniṣūndṛṣṭvā tṛṣṇayā ca prapīḍitaḥ | avajñāyaiva tāṃ vācaṃ pītvaiva nipapāta ha

अपने बाणों को व्यर्थ गया देखकर और प्यास से पीड़ित होकर उसने उस वाणी की अवहेलना की, जल पिया और पीते ही गिर पड़ा।

श्लोक 33 (3.313.33)

अथाब्रवीद्भीमसेनं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । नकुलः सहदेवश्च बीभत्सुश्च परंतप ॥

athābravīdbhīmasenaṃ kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | nakulaḥ sahadevaśca bībhatsuśca paraṃtapa

तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा, "परंतप, नकुल, सहदेव और बीभत्सु

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 34 (3.313.34)

चिरंगतास्तोयहेतोर्न चागच्छन्ति भारत । तांश्चैवानय भद्रं ते पानीयं च त्वमानय ॥

ciraṃgatāstoyahetorna cāgacchanti bhārata | tāṃścaivānaya bhadraṃ te pānīyaṃ ca tvamānaya

बहुत पहले जल के लिए गए थे और अब तक नहीं लौटे, हे भारत। तुम्हारा कल्याण हो, उन्हें ले आओ और जल भी लाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (3.313.35)

भीमसेनस्तथेत्युक्त्वा तं देशं प्रत्यपद्यत । यत्र ते पुरुषव्याघ्रा भ्रातरोऽस्य निपातिताः ॥

bhīmasenastathetyuktvā taṃ deśaṃ pratyapadyata | yatra te puruṣavyāghrā bhrātaro'sya nipātitāḥ

भीमसेन "जैसी आज्ञा" कहकर उस स्थान पर गया जहाँ उसके वे पुरुषसिंह भाई गिराए गए थे।

श्लोक 36 (3.313.36)

तान्दृष्ट्वा दुःखितो भीमस्तृषया च प्रपीडितः । अमन्यत महाबाहुः कर्म तद्यक्षरक्षसाम् ॥

tāndṛṣṭvā duḥkhito bhīmastṛṣayā ca prapīḍitaḥ | amanyata mahābāhuḥ karma tadyakṣarakṣasām

उन्हें देखकर महाबाहु भीम दुखी हो उठा; प्यास भी उसे सता रही थी। उसने इसे यक्षों या राक्षसों का काम समझा।

श्लोक 37 (3.313.37)

स चिन्तयामास तदा योद्धव्यं ध्रुवमद्य मे । पास्यामि तावत्पानीयमिति पार्थो वृकोदरः ॥

sa cintayāmāsa tadā yoddhavyaṃ dhruvamadya me | pāsyāmi tāvatpānīyamiti pārtho vṛkodaraḥ

तब पृथापुत्र वृकोदर ने सोचा, "आज मुझे निश्चय ही युद्ध करना पड़ेगा। पर पहले जल पी लेता हूँ।"

श्लोक 38 (3.313.38)

ततोऽभ्यधावत्पानीयं पिपासुः पुरुषर्षभः ॥

tato'bhyadhāvatpānīyaṃ pipāsuḥ puruṣarṣabhaḥ

तब वह प्यासा पुरुषश्रेष्ठ जल की ओर दौड़ा।

यक्ष उवाच

श्लोक 39 (3.313.39)

मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च ॥

mā tāta sāhasaṃ kārṣīrmama pūrvaparigrahaḥ | praśnānuktvā tu kaunteya tataḥ piba harasva ca

"वत्स, दुस्साहस मत करो; इस जल पर पहले से मेरा अधिकार है। हे कुन्तीपुत्र, पहले मेरे प्रश्नों के उत्तर दो, फिर जल पियो और ले भी जाओ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 40 (3.313.40)

एवमुक्तस्तदा भीमो यक्षेणामिततेजसा । अनुक्त्वैव तु तान्प्रश्नान्पीत्वैव निपपात ह ॥

evamuktastadā bhīmo yakṣeṇāmitatejasā | anuktvaiva tu tānpraśnānpītvaiva nipapāta ha

अपार तेजस्वी यक्ष के ऐसा कहने पर भी भीम ने उन प्रश्नों के उत्तर दिए बिना ही जल पी लिया और पीते ही गिर पड़ा।

श्लोक 41 (3.313.41)

ततः कुन्तीसुतो राजा प्रचिन्त्य पुरुषर्षभः । आत्मनाऽऽत्मानमन्विष्य विचारमकरोत्प्रभुः ॥

tataḥ kuntīsuto rājā pracintya puruṣarṣabhaḥ | ātmanā''tmānamanviṣya vicāramakarotprabhuḥ

तब पुरुषश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र राजा ने गहराई से सोचा; उस प्रभु ने अपने भीतर ही खोजकर स्थिति पर विचार किया।

श्लोक 42 (3.313.42)

ततश्चिरगतान्भ्रातॄनथाऽऽज्ञाय युधिष्ठिरः । चिरायमाणान्बहुशः पुनः पुनरुवाच ह ॥

tataściragatānbhrātṝnathā''jñāya yudhiṣṭhiraḥ | cirāyamāṇānbahuśaḥ punaḥ punaruvāca ha

यह जानकर कि भाइयों को गए बहुत समय हो गया है और वे अब भी नहीं लौटे, युधिष्ठिर बार-बार कहने लगे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 43 (3.313.43)

किंस्विद्वनमिदं दग्धं किंस्विद्दृष्टो मृतो भवेत् । प्रहरन्तो महाभूतं शप्तास्तेनाथ तेऽपतन् ॥

kiṃsvidvanamidaṃ dagdhaṃ kiṃsviddṛṣṭo mṛto bhavet | praharanto mahābhūtaṃ śaptāstenātha te'patan

"क्या यह वन शापग्रस्त है? क्या उनमें से किसी की मृत्यु हो गई है? या किसी महान प्राणी पर प्रहार करने से वे उसके शाप से गिर पड़े?

श्लोक 44 (3.313.44)

न पश्यन्त्यथवा वीराः पानीयं यत्र ते गताः । अन्विच्छद्भिर्वने तोयं कालोऽयमतिपातितः ॥

na paśyantyathavā vīrāḥ pānīyaṃ yatra te gatāḥ | anvicchadbhirvane toyaṃ kālo'yamatipātitaḥ

या फिर वे वीर जहाँ गए हैं वहाँ उन्हें जल ही नहीं मिल रहा, और वन में जल खोजते-खोजते इतना समय बीत गया है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 45 (3.313.45)

किं नु तत्कारणं येन नायान्ति पुरुषर्षभाः । गच्छाम्येषां पदं द्रष्टुमिति कृत्वा युधिष्ठिरः ॥

kiṃ nu tatkāraṇaṃ yena nāyānti puruṣarṣabhāḥ | gacchāmyeṣāṃ padaṃ draṣṭumiti kṛtvā yudhiṣṭhiraḥ

वे पुरुषश्रेष्ठ किस कारण से नहीं लौट रहे? मैं जाकर उनके पदचिह्न देखता हूँ।" ऐसा निश्चय करके युधिष्ठिर

श्लोक 46 (3.313.46)

समुत्थाय महाबुद्धिर्दह्यमानेन चेतसा । व्यपेतजननिर्घोषं प्रविवेश महावनम् ॥

samutthāya mahābuddhirdahyamānena cetasā | vyapetajananirghoṣaṃ praviveśa mahāvanam

वे महाबुद्धिमान जलते हुए हृदय के साथ उठे और उस विशाल वन में प्रवेश किया, जहाँ मनुष्यों का कोई स्वर सुनाई नहीं देता था।

श्लोक 47 (3.313.47)

रुरुभिश्च वराहैश्च पक्षिभिश्च निषेवितम् । नीलभास्वरवर्णैश्च पादपैरुपशोभितम् ॥

rurubhiśca varāhaiśca pakṣibhiśca niṣevitam | nīlabhāsvaravarṇaiśca pādapairupaśobhitam

वह वन रुरु मृगों, वराहों और पक्षियों से भरा था, और गहरे, चमकीले नीले-हरे रंग के वृक्षों से सुशोभित था।

श्लोक 48 (3.313.48)

भ्रमरैरुपगीतं च पक्षिभिश्च समन्ततः । मृदुशाड्वलसंकीर्णभूमिभागं मनोहरम् ॥

bhramarairupagītaṃ ca pakṣibhiśca samantataḥ | mṛduśāḍvalasaṃkīrṇabhūmibhāgaṃ manoharam

चारों ओर भौंरों की गुंजार और पक्षियों के गीत गूँज रहे थे, और कोमल घास से ढकी उसकी भूमि मनोहर थी।

श्लोक 49 (3.313.49)

स गच्छन्कानने तस्मिन्हेमजालपरिष्कृतम् । ददर्श तत्सरः श्रीमान्विश्वकर्मकृतं यथा ॥

sa gacchankānane tasminhemajālapariṣkṛtam | dadarśa tatsaraḥ śrīmānviśvakarmakṛtaṃ yathā

उस वन में चलते हुए श्रीमान युधिष्ठिर ने वह सरोवर देखा, जो मानो सोने की जाली से सजा था, मानो स्वयं विश्वकर्मा ने उसे बनाया हो।

श्लोक 50 (3.313.50)

उपेतं नलिनीजालैः सिन्धुवारैः सवेतसैः । केतकैः करवीरैश्च पिप्पलैश्चैव संवृतम् ॥

upetaṃ nalinījālaiḥ sindhuvāraiḥ savetasaiḥ | ketakaiḥ karavīraiśca pippalaiścaiva saṃvṛtam

वह कमलों के समूहों से भरा था, और सिंधुवार, बेंत, केतकी, कनेर तथा पीपल के वृक्षों से घिरा था।

श्लोक 51 (3.313.51)

ततो धर्मसुतः श्रीमान्भ्रातृदर्शनलालसः । श्रमार्तस्तदुपागम्य सरो दृष्ट्वाऽथ विस्मितः ॥

tato dharmasutaḥ śrīmānbhrātṛdarśanalālasaḥ | śramārtastadupāgamya saro dṛṣṭvā'tha vismitaḥ

तब भाइयों को देखने के लिए आतुर श्रीमान धर्मपुत्र थकान से चूर होकर उस सरोवर के पास पहुँचे, और उसे देखकर विस्मित रह गए।

अध्याय 312अध्याय-सूचीअध्याय 314