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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 314

यक्ष के प्रश्न

यक्ष प्रश्न, अध्याय 2 / 2

युधिष्ठिर सरोवर पर पहुँचकर अपने चारों भाइयों को मरा पड़ा पाते हैं, विलाप करते हैं और इसका कारण खोजते हैं। जल से आती एक वाणी, जो पहले स्वयं को बगुला और फिर यक्ष बताती है, उन्हें प्रश्नों का उत्तर दिए बिना जल पीने से रोकती है। लम्बे संवाद में यक्ष सूर्य, वेद, धर्म, मित्रता, सच्चे ब्राह्मण की पहचान और अन्त में सुख, सबसे बड़े आश्चर्य, मार्ग और समाचार के विषय में पूछता है, और युधिष्ठिर हर प्रश्न का उत्तर देते हैं। एक भाई का जीवन माँगने का अवसर मिलने पर वे नकुल को चुनते हैं, ताकि उनके पिता की दोनों पत्नियों का एक-एक पुत्र जीवित रहे; इसी निष्पक्षता से प्रसन्न होकर यक्ष चारों भाइयों को जीवित कर देता है।

अध्याय 313अध्याय-सूचीअध्याय 315

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.314.1)

स ददर्श हतान्भ्रातॄँल्लोकपालानिव च्युतान् । युगान्ते समनुप्राप्ते शक्रवैश्रवणोपमान् ॥

sa dadarśa hatānbhrātṝm̐llokapālāniva cyutān | yugānte samanuprāpte śakravaiśravaṇopamān

युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को मरा पड़ा देखा, मानो युग के अन्त में लोकपाल अपने स्थानों से गिर पड़े हों, जबकि वे इन्द्र और कुबेर के समान थे।

श्लोक 2 (3.314.2)

विनिकीर्णधनुर्बाणं दृष्ट्वा निहतमर्जुनम् । भीमसेनं यमौ चैव निर्विचेष्टान्गतायुषः ॥

vinikīrṇadhanurbāṇaṃ dṛṣṭvā nihatamarjunam | bhīmasenaṃ yamau caiva nirviceṣṭāngatāyuṣaḥ

उन्होंने देखा कि अर्जुन मरा पड़ा है और उसका धनुष-बाण इधर-उधर बिखरा है; भीमसेन और दोनों जुड़वाँ भाई भी निश्चेष्ट और प्राणहीन पड़े हैं।

श्लोक 3 (3.314.3)

स दीर्घमुष्णं निःश्वस्य शोकबाष्पपरिप्लुतः । तान्दृष्ट्वा पतितान्भ्रातॄन्सर्वांश्चिन्तासमन्वितः ॥

sa dīrghamuṣṇaṃ niḥśvasya śokabāṣpapariplutaḥ | tāndṛṣṭvā patitānbhrātṝnsarvāṃścintāsamanvitaḥ

अपने सब भाइयों को गिरा हुआ देखकर उन्होंने लम्बी, गरम साँस ली; शोक के आँसुओं में डूबे हुए वे गहरी चिन्ता में पड़ गए।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 4 (3.314.4)

ननु त्वया महाबाहो प्रतिज्ञातं वृकोदर । सुयोधनस्य भेत्स्यामि गदया सक्थिनी रणे ॥

nanu tvayā mahābāho pratijñātaṃ vṛkodara | suyodhanasya bhetsyāmi gadayā sakthinī raṇe

"हे महाबाहु वृकोदर, क्या तुमने प्रतिज्ञा नहीं की थी कि 'मैं युद्ध में अपनी गदा से सुयोधन की जाँघें तोड़ दूँगा'?"

श्लोक 5 (3.314.5)

व्यर्थं तदद्य मे सर्वं त्वयि वीरे निपातिते । महात्मनि महाबाहो कुरूणां कीर्तिवर्धने ॥

vyarthaṃ tadadya me sarvaṃ tvayi vīre nipātite | mahātmani mahābāho kurūṇāṃ kīrtivardhane

"हे महाबाहु, कुरुओं की कीर्ति बढ़ाने वाले महात्मा वीर, तुम्हारे गिर जाने से आज मेरे लिए वह सब व्यर्थ हो गया।"

श्लोक 6 (3.314.6)

मनुष्यसंभवा वाचो विधर्मिण्यः प्रतिश्रुताः । भवतां दिव्यवाचस्तु ता भवन्तु कथं मृषा ॥

manuṣyasaṃbhavā vāco vidharmiṇyaḥ pratiśrutāḥ | bhavatāṃ divyavācastu tā bhavantu kathaṃ mṛṣā

"मनुष्यों के मुख से निकली प्रतिज्ञाएँ भले ही झूठी पड़ जाएँ, पर तुम्हारे विषय में कही गई दिव्य वाणियाँ भला मिथ्या कैसे हो सकती हैं?"

श्लोक 7 (3.314.7)

देवाश्चापि यदाऽवोचन्सूतके त्वां धनंजय । सहस्राक्षादनवरः कुन्ति पुत्रस्तवेति वै ॥

devāścāpi yadā'vocansūtake tvāṃ dhanaṃjaya | sahasrākṣādanavaraḥ kunti putrastaveti vai

"हे धनंजय, तुम्हारे जन्म के समय देवताओं ने भी कहा था, 'कुन्ती, तुम्हारा यह पुत्र सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र से किसी प्रकार कम न होगा।'"

श्लोक 8 (3.314.8)

उत्तरे पारियात्रे च जगुर्भूतानि सर्वशः । विप्रनष्टां श्रियं चैषामाहर्ता पुनरोजसा ॥

uttare pāriyātre ca jagurbhūtāni sarvaśaḥ | vipranaṣṭāṃ śriyaṃ caiṣāmāhartā punarojasā

"और उत्तर के पारियात्र पर्वत पर सब प्राणियों ने गाया था कि यह अपने पराक्रम से इन भाइयों की खोई हुई लक्ष्मी को फिर लौटा लाएगा।"

श्लोक 9 (3.314.9)

नास्य जेता रणे कश्चिदजेता नैष कस्यचित् । सोऽयं मृत्युवशं यातः कथं जिष्णुर्महाबलः ॥

nāsya jetā raṇe kaścidajetā naiṣa kasyacit | so'yaṃ mṛtyuvaśaṃ yātaḥ kathaṃ jiṣṇurmahābalaḥ

"युद्ध में उसे कोई जीत नहीं सकता था, और वह किसी से हारने वाला नहीं था। फिर वह महाबली जिष्णु मृत्यु के वश में कैसे चला गया?"

श्लोक 10 (3.314.10)

अयं ममाशां संहत्य शेते भूमौ धनंजयः । आश्रित्य यं वयं नाथं दुःखान्येतानि सेहिम ॥

ayaṃ mamāśāṃ saṃhatya śete bhūmau dhanaṃjayaḥ | āśritya yaṃ vayaṃ nāthaṃ duḥkhānyetāni sehima

"मेरी सारी आशाओं को समेटकर यह धनंजय धरती पर सो रहा है, वही जिसे अपना रक्षक मानकर हमने ये सारे दुःख सहे।"

श्लोक 11 (3.314.11)

रणे प्रगल्भौ वीरौ च सदा शत्रुनिबर्हणौ । कथं रिपुवशं यातौ कुन्तीपुत्रौ महाबलौ । यौ सर्वास्त्राप्रतिहतौ भीमसेनधनंजयौ ॥

raṇe pragalbhau vīrau ca sadā śatrunibarhaṇau | kathaṃ ripuvaśaṃ yātau kuntīputrau mahābalau | yau sarvāstrāpratihatau bhīmasenadhanaṃjayau

"जो युद्ध में निर्भीक और वीर थे, सदा शत्रुओं का संहार करते थे, जिन्हें कोई अस्त्र रोक नहीं सकता था, कुन्ती के वे दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और धनंजय शत्रु के वश में कैसे आ गए?"

श्लोक 12 (3.314.12)

अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम दुर्हृदः । यमौ यदेतौ दृष्ट्वाऽद्य पतितौ नावदीर्यते ॥

aśmasāramayaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ mama durhṛdaḥ | yamau yadetau dṛṣṭvā'dya patitau nāvadīryate

"निश्चय ही मेरा यह अभागा हृदय लोहे का बना है, जो आज इन दोनों जुड़वाँ भाइयों को गिरा हुआ देखकर भी फट नहीं जाता।"

श्लोक 13 (3.314.13)

शास्त्रज्ञा देशकालज्ञास्तपोयुक्ताः क्रियान्विताः । अकृत्वा सदृशं कर्म किं शेध्वं पुरुषर्षभाः ॥

śāstrajñā deśakālajñāstapoyuktāḥ kriyānvitāḥ | akṛtvā sadṛśaṃ karma kiṃ śedhvaṃ puruṣarṣabhāḥ

"हे नरश्रेष्ठो, तुम शास्त्रों के ज्ञाता थे, देश और काल को समझते थे, तपस्वी और कर्मनिष्ठ थे। फिर अपने योग्य कर्म किए बिना तुम यहाँ क्यों पड़े हो?"

श्लोक 14 (3.314.14)

अविक्षतशरीराश्चाप्यप्रमृष्टशरासनाः । असंज्ञा भुवि संगम्य किं शेध्वमपराजिताः ॥

avikṣataśarīrāścāpyapramṛṣṭaśarāsanāḥ | asaṃjñā bhuvi saṃgamya kiṃ śedhvamaparājitāḥ

"तुम्हारे शरीरों पर कोई घाव नहीं है, तुम्हारे धनुषों को किसी ने छुआ तक नहीं। फिर हे अपराजित वीरो, तुम एक साथ अचेत होकर धरती पर क्यों पड़े हो?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (3.314.15)

सानूनि वाद्रेः संसुप्तान्दृष्ट्वा भ्रातॄन्महामतिः । सुखं प्रसुप्तान्प्रस्विन्नः खिन्नः कष्टां दशां गतः ॥

sānūni vādreḥ saṃsuptāndṛṣṭvā bhrātṝnmahāmatiḥ | sukhaṃ prasuptānprasvinnaḥ khinnaḥ kaṣṭāṃ daśāṃ gataḥ

अपने भाइयों को मानो पर्वत की ढलानों पर सुख से सोया हुआ देखकर वे परम बुद्धिमान राजा पसीने से भीग गए; थके और दुःखी होकर वे बड़ी कष्टदायक दशा में पहुँच गए।

श्लोक 16 (3.314.16)

एवमेवेदमित्युक्त्वा धर्मात्मा स नरेश्वरः । शोकसागरमध्यस्थो दध्यौ कारणमाकुलः ॥

evamevedamityuktvā dharmātmā sa nareśvaraḥ | śokasāgaramadhyastho dadhyau kāraṇamākulaḥ

"यह ऐसा ही है" कहकर शोक के सागर के बीच खड़े वे धर्मात्मा नरेश व्याकुल होकर इसके कारण पर विचार करने लगे।

श्लोक 17 (3.314.17)

इतिकर्तव्यतां चेति देशकालविभागवित् । नाभिपेदे महाबाहुश्चिन्तयानो महामतिः ॥

itikartavyatāṃ ceti deśakālavibhāgavit | nābhipede mahābāhuścintayāno mahāmatiḥ

देश और काल का विवेक रखने वाले वे महाबाहु, परम बुद्धिमान राजा सोचते रहे, पर यह निश्चय न कर सके कि अब क्या करना चाहिए।

श्लोक 18 (3.314.18)

अथ संस्तभ्य धर्मात्मा तदाऽऽत्मानं तपःसुतः । एवं विलप्य बहुधा धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । बुद्ध्या विचिन्तयामास वीराः केन निपातिताः ॥

atha saṃstabhya dharmātmā tadā''tmānaṃ tapaḥsutaḥ | evaṃ vilapya bahudhā dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | buddhyā vicintayāmāsa vīrāḥ kena nipātitāḥ

तब तप के पुत्र उस धर्मात्मा ने अपने आप को सँभाला। इस प्रकार अनेक तरह से विलाप करके धर्मपुत्र युधिष्ठिर बुद्धि से विचार करने लगे, "इन वीरों को किसने मार गिराया है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 19 (3.314.19)

नैषां शस्त्रप्रहारोऽस्ति पदं नेहास्ति कस्यचित् । भूतं महदिदं मन्ये भ्रातरो येन मे हताः ॥

naiṣāṃ śastraprahāro'sti padaṃ nehāsti kasyacit | bhūtaṃ mahadidaṃ manye bhrātaro yena me hatāḥ

"इन पर किसी शस्त्र के प्रहार का चिह्न नहीं है, और यहाँ किसी के पैरों का निशान भी नहीं है। मुझे लगता है कि कोई महान् प्राणी है, जिसने मेरे भाइयों को मार डाला है।"

श्लोक 20 (3.314.20)

एकाग्रं चिन्तयिष्यामि पीत्वा वेत्स्यामि वा जलम् । भ्रातॄणां व्यसनं घोरं सममेव महात्मनाम् ॥

ekāgraṃ cintayiṣyāmi pītvā vetsyāmi vā jalam | bhrātṝṇāṃ vyasanaṃ ghoraṃ samameva mahātmanām

"मैं एकाग्र होकर इस पर विचार करूँगा, या जल पीकर स्वयं जान लूँगा। मेरे सभी महात्मा भाइयों पर एक-सा भयंकर संकट आ पड़ा है।"

श्लोक 21 (3.314.21)

स्यात्तु दुर्योधनेनेदमुपांशु परिकल्पितम् । गान्धारराजरचितं सततं जिह्मबुद्धिना ॥

syāttu duryodhanenedamupāṃśu parikalpitam | gāndhārarājaracitaṃ satataṃ jihmabuddhinā

"या फिर यह दुर्योधन का गुप्त षड्यंत्र हो सकता है, जिसे कुटिल बुद्धि वाले गान्धारराज ने सदा की तरह रचा हो।"

श्लोक 22 (3.314.22)

यस्य कार्यमकार्यं वा सममेव भवत्युत । कस्तस्य विश्वसेद्वीरो दुष्कृतेरकृतात्मनः ॥

yasya kāryamakāryaṃ vā samameva bhavatyuta | kastasya viśvasedvīro duṣkṛterakṛtātmanaḥ

"जिसके लिए करने योग्य और न करने योग्य काम एक समान हैं, ऐसे दुष्कर्मी और असंयमी व्यक्ति पर कौन वीर भरोसा करेगा?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 23 (3.314.23)

अथवा पुरुषैर्गूढैः प्रयोगोऽयं दुरात्मनः । भवेदिति महाबुद्धिर्बहुधा समचिन्तयत् ॥

athavā puruṣairgūḍhaiḥ prayogo'yaṃ durātmanaḥ | bhavediti mahābuddhirbahudhā samacintayat

"अथवा यह उस दुष्टात्मा की कोई चाल हो, जो छिपे हुए लोगों से चलवाई गई हो।" इस प्रकार उन महाबुद्धिमान राजा ने अनेक तरह से विचार किया।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 24 (3.314.24)

आचार्यं किं नु वक्ष्यामि कृपं भीष्ममहं नु किम् । विदुरं किं नु वक्ष्यामि बृहस्पतिसमं नये ॥

ācāryaṃ kiṃ nu vakṣyāmi kṛpaṃ bhīṣmamahaṃ nu kim | viduraṃ kiṃ nu vakṣyāmi bṛhaspatisamaṃ naye

"मैं आचार्य द्रोण से क्या कहूँगा, कृप और भीष्म से क्या कहूँगा? नीति में बृहस्पति के समान विदुर से मैं क्या कहूँगा?"

श्लोक 25 (3.314.25)

अम्बां च किं नु वक्ष्यामि सर्वदा दुःखभागिनीम् । दृष्ट्वा मां भ्रातृभिर्हीनं पृच्छन्तीं पुत्रगृद्धिनीम् ॥

ambāṃ ca kiṃ nu vakṣyāmi sarvadā duḥkhabhāginīm | dṛṣṭvā māṃ bhrātṛbhirhīnaṃ pṛcchantīṃ putragṛddhinīm

"और सदा दुःख ही पाने वाली माता से मैं क्या कहूँगा, जब पुत्रों के लिए व्याकुल वे मुझे भाइयों के बिना देखकर पूछेंगी,"

श्लोक 26 (3.314.26)

यदा त्वं भ्रातृभिः सर्वैः शक्रतुल्यपराक्रमैः । सार्धं वनं गतो वीरैः कथमेकस्त्वमागतः ॥

yadā tvaṃ bhrātṛbhiḥ sarvaiḥ śakratulyaparākramaiḥ | sārdhaṃ vanaṃ gato vīraiḥ kathamekastvamāgataḥ

"'तुम तो इन्द्र के समान पराक्रमी अपने सब वीर भाइयों के साथ वन गए थे, फिर अकेले कैसे लौट आए?'"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (3.314.27)

कस्य किं नु विषेणेदमुदकं दूषितं यथा । मृतानामपि चैतेषां विकृतं नैव जायते । मुखवर्णाः प्रसन्ना मे भ्रातॄणामित्यचिन्तयत् ॥

kasya kiṃ nu viṣeṇedamudakaṃ dūṣitaṃ yathā | mṛtānāmapi caiteṣāṃ vikṛtaṃ naiva jāyate | mukhavarṇāḥ prasannā me bhrātṝṇāmityacintayat

"यह किसका काम है? क्या यह जल विष से दूषित किया गया है? पर मरने पर भी इनमें कोई विकार नहीं आया; मेरे भाइयों के मुखों का रंग अब भी खिला हुआ है," ऐसा उन्होंने सोचा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 28 (3.314.28)

एकैकशश्चौघबलानिमान्पुरुषसत्तमान् । कोऽन्यः प्रतिसमासेत कालान्तकयमादृते ॥

ekaikaśaścaughabalānimānpuruṣasattamān | ko'nyaḥ pratisamāseta kālāntakayamādṛte

"समय आने पर अन्त करने वाले यमराज के सिवा और कौन इन नरश्रेष्ठों का सामना कर सकता था, जिनमें से प्रत्येक बल का उमड़ता प्रवाह था?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 29 (3.314.29)

एतेन व्यवसायेन तत्तोयं व्यवगाढवान् । पातुकामश्च तत्तोयमन्तरिक्षात्स शुश्रुवे ॥

etena vyavasāyena tattoyaṃ vyavagāḍhavān | pātukāmaśca tattoyamantarikṣātsa śuśruve

यही निश्चय करके वे उस जल में उतरे, और जैसे ही उसे पीना चाहा, उन्हें आकाश से एक वाणी सुनाई दी,

यक्ष उवाच

श्लोक 30 (3.314.30)

अहं बकः शैवलमत्स्यभक्षो । नीता मया प्रेतवशं तवानुजाः । त्वं पञ्चमो भविता राजपुत्र । न चेत्प्रश्नान्पृच्छतो व्याकरोषि ॥

ahaṃ bakaḥ śaivalamatsyabhakṣo | nītā mayā pretavaśaṃ tavānujāḥ | tvaṃ pañcamo bhavitā rājaputra | na cetpraśnānpṛcchato vyākaroṣi

"मैं सिवार और मछलियाँ खाने वाला एक बगुला हूँ। तुम्हारे छोटे भाइयों को मैंने ही मृत्यु के वश में पहुँचाया है। हे राजपुत्र, यदि तुमने मेरे पूछे प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया, तो पाँचवें तुम होगे।"

श्लोक 31 (3.314.31)

मा तात साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च ॥

mā tāta sāhasaṃ kārṣīrmama pūrvaparigrahaḥ | praśnānuktvā tu kaunteya tataḥ piba harasva ca

"हे तात, दुस्साहस मत करो; इस जल पर पहले से मेरा अधिकार है। हे कुन्तीनन्दन, पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, फिर जल पियो और ले भी जाओ।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 32 (3.314.32)

रुद्राणां वा वसूनां वा मरुतां वा प्रधानभाक् । पृच्छामि को भवान्देवो नैतच्छकुनिना कृतम् ॥

rudrāṇāṃ vā vasūnāṃ vā marutāṃ vā pradhānabhāk | pṛcchāmi ko bhavāndevo naitacchakuninā kṛtam

"क्या आप रुद्रों, वसुओं या मरुतों के प्रधान हैं? मैं पूछता हूँ, आप कौन-से देवता हैं? यह किसी पक्षी का किया हुआ काम नहीं है।"

श्लोक 33 (3.314.33)

हिमवान्पारियात्रश्च विन्ध्यो मलय एव च । चत्वारः पर्वताः केन पातिता भुवि तेजसा ॥

himavānpāriyātraśca vindhyo malaya eva ca | catvāraḥ parvatāḥ kena pātitā bhuvi tejasā

"हिमालय, पारियात्र, विन्ध्य और मलय, इन चार पर्वतों को किसके तेज ने धरती पर गिरा दिया है?"

श्लोक 34 (3.314.34)

त्वयाऽतीव महत्कर्म कृतं च बलिनां वर । विनिघ्नता महेष्वासांश्चतुरोऽपि ममात्मजान् ॥

tvayā'tīva mahatkarma kṛtaṃ ca balināṃ vara | vinighnatā maheṣvāsāṃścaturo'pi mamātmajān

"हे बलवानों में श्रेष्ठ, मेरे पुत्रों के समान इन चारों महाधनुर्धरों को मारकर आपने अत्यन्त महान् कर्म किया है।"

श्लोक 35 (3.314.35)

यान्न देवा न गन्धर्वा नासुराश्च न राक्षसाः । विषहेरन्महायुद्धे कृतं ते तन्महाद्भुतम् ॥

yānna devā na gandharvā nāsurāśca na rākṣasāḥ | viṣaheranmahāyuddhe kṛtaṃ te tanmahādbhutam

"जिनका सामना महायुद्ध में न देवता कर सकते थे, न गन्धर्व, न असुर और न राक्षस, उन्हें आपने गिरा दिया, यह अत्यन्त अद्भुत कार्य है।"

श्लोक 36 (3.314.36)

न ते जानामि यत्कार्यं नाभिजानामि काङ्क्षितम् । कौतूहलं महज्जातं साध्वसं चागतं मम ॥

na te jānāmi yatkāryaṃ nābhijānāmi kāṅkṣitam | kautūhalaṃ mahajjātaṃ sādhvasaṃ cāgataṃ mama

"मैं नहीं जानता कि आप क्या करना चाहते हैं, और न यह जानता हूँ कि आप क्या चाहते हैं। मेरे मन में बड़ा कौतूहल जाग उठा है और भय भी समा गया है।"

श्लोक 37 (3.314.37)

येनास्म्युद्विग्नहृदयः समुत्पन्नशिरोज्वरः । पृच्छामि भगवंस्तस्मात्को भवानिह तिष्ठति ॥

yenāsmyudvignahṛdayaḥ samutpannaśirojvaraḥ | pṛcchāmi bhagavaṃstasmātko bhavāniha tiṣṭhati

"इससे मेरा हृदय उद्विग्न है और सिर मानो ज्वर से तप रहा है। इसलिए हे भगवन्, मैं पूछता हूँ, यहाँ स्थित आप कौन हैं?"

यक्ष उवाच

श्लोक 38 (3.314.38)

यक्षोऽहमस्मि भद्रं ते नास्मि पक्षी जलेचरः । मयैते निहताः सर्वे भ्रातरस्ते निवारिताः ॥

yakṣo'hamasmi bhadraṃ te nāsmi pakṣī jalecaraḥ | mayaite nihatāḥ sarve bhrātaraste nivāritāḥ

"तुम्हारा कल्याण हो, मैं यक्ष हूँ, जल में रहने वाला पक्षी नहीं। तुम्हारे इन सब भाइयों को मैंने रोका था, और मैंने ही इन्हें मार गिराया।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 39 (3.314.39)

ततस्तामशिवां श्रुत्वा वाचं स परुषाक्षराम् । यक्षस्य ब्रुवतो राजन्नाकम्पत तदाऽऽस्थितः ॥

tatastāmaśivāṃ śrutvā vācaṃ sa paruṣākṣarām | yakṣasya bruvato rājannākampata tadā''sthitaḥ

हे राजन्, यक्ष के बोले हुए वे कठोर और अमंगल वचन सुनकर भी युधिष्ठिर वहीं डटे रहे और काँपे नहीं।

श्लोक 40 (3.314.40)

विरूपाक्षं महाकायं यक्षं तालसमुच्छ्रयम् । ज्वलनार्कप्रतीकाशमधृष्यं पर्वतोपमम् ॥

virūpākṣaṃ mahākāyaṃ yakṣaṃ tālasamucchrayam | jvalanārkapratīkāśamadhṛṣyaṃ parvatopamam

वह यक्ष विकृत नेत्रों वाला और विशाल शरीर वाला था; ताड़ के वृक्ष जितना ऊँचा, अग्नि और सूर्य के समान दमकता हुआ, अजेय और पर्वत के समान।

श्लोक 41 (3.314.41)

सेतुमाश्रित्य तिष्ठन्तं ददर्श भरतर्षभः । मेघगम्भीरनादेन तर्जयन्तं महास्वनम् ॥

setumāśritya tiṣṭhantaṃ dadarśa bharatarṣabhaḥ | meghagambhīranādena tarjayantaṃ mahāsvanam

भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर ने उसे बाँध पर खड़ा देखा, जो मेघों जैसी गम्भीर गर्जना से ऊँचे स्वर में धमका रहा था।

श्लोक 42 (3.314.42)

उवाच यक्षः कौन्तेयं भ्रातृशोकप्रपीडितम् ॥

uvāca yakṣaḥ kaunteyaṃ bhrātṛśokaprapīḍitam

तब यक्ष ने भाइयों के शोक से पीड़ित कुन्तीपुत्र से कहा,

यक्ष उवाच

श्लोक 43 (3.314.43)

इमे ते भ्रातरो राजन्वार्यमाणा मयाऽसकृत् । बलात्तोयं जिहीर्षन्तस्ततो वै मृदिता मया । न पेयमुदकं राजन्प्राणानिह परीप्सता ॥

ime te bhrātaro rājanvāryamāṇā mayā'sakṛt | balāttoyaṃ jihīrṣantastato vai mṛditā mayā | na peyamudakaṃ rājanprāṇāniha parīpsatā

"हे राजन्, मैंने तुम्हारे इन भाइयों को बार-बार रोका, पर ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे, इसलिए मैंने इन्हें कुचल डाला। हे राजन्, जो यहाँ अपने प्राण बचाना चाहे, उसे यह जल नहीं पीना चाहिए।"

श्लोक 44 (3.314.44)

पार्थ मा साहसं कार्षीर्मम पूर्वपरिग्रहः । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च ॥

pārtha mā sāhasaṃ kārṣīrmama pūrvaparigrahaḥ | praśnānuktvā tu kaunteya tataḥ piba harasva ca

"हे पार्थ, दुस्साहस मत करो; इस जल पर पहले से मेरा अधिकार है। हे कुन्तीनन्दन, पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, फिर जल पियो और ले भी जाओ।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 45 (3.314.45)

न चाहं कामये यक्ष तव पूर्वपरिग्रहम् ॥

na cāhaṃ kāmaye yakṣa tava pūrvaparigraham

"हे यक्ष, जिस पर पहले से आपका अधिकार है, उसकी मैं इच्छा नहीं करता।"

श्लोक 46 (3.314.46)

कामं नैतत्प्रशंसन्ति सन्तो हि पुरुषाः सदा । यदात्मना स्वमात्मानं प्रशंसेत्पुरुषर्षभ । यथाप्रज्ञं तु ते प्रश्नान्प्रतिवक्ष्यामि पृच्छ माम् ॥

kāmaṃ naitatpraśaṃsanti santo hi puruṣāḥ sadā | yadātmanā svamātmānaṃ praśaṃsetpuruṣarṣabha | yathāprajñaṃ tu te praśnānprativakṣyāmi pṛccha mām

"हे पुरुषश्रेष्ठ, सज्जन कभी इसकी सराहना नहीं करते कि कोई अपने ही मुँह से अपनी बड़ाई करे। फिर भी अपनी बुद्धि के अनुसार मैं आपके प्रश्नों का उत्तर दूँगा। पूछिए।"

यक्ष उवाच

श्लोक 47 (3.314.47)

किंस्विदादित्यमुन्नयति के च तस्याभितश्चराः । कश्चैनमस्तं नयति कस्मिंश्च प्रतितिष्ठति ॥

kiṃsvidādityamunnayati ke ca tasyābhitaścarāḥ | kaścainamastaṃ nayati kasmiṃśca pratitiṣṭhati

"सूर्य को कौन उदित करता है? उसके चारों ओर कौन चलते हैं? उसे अस्त कौन करता है? और वह किसमें प्रतिष्ठित है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 48 (3.314.48)

ब्रह्मादित्यमुन्नयति देवास्तस्याभितश्चराः । धर्मश्चास्तं नयति च सत्ये च प्रतितिष्ठति ॥

brahmādityamunnayati devāstasyābhitaścarāḥ | dharmaścāstaṃ nayati ca satye ca pratitiṣṭhati

"ब्रह्म सूर्य को उदित करता है, देवता उसके चारों ओर चलते हैं, धर्म उसे अस्त करता है, और वह सत्य में प्रतिष्ठित है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 49 (3.314.49)

केन स्विच्छ्रोत्रियो भवति केन स्विद्विन्दते महत् । केन स्विद्द्वितीयवान्भवति राजन्केन च बुद्धिमान् ॥

kena svicchrotriyo bhavati kena svidvindate mahat | kena sviddvitīyavānbhavati rājankena ca buddhimān

"मनुष्य वेदज्ञ किससे होता है? महत्ता किससे पाता है? हे राजन्, उसे साथी किससे मिलता है? और वह बुद्धिमान किससे बनता है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 50 (3.314.50)

श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विन्दते महत् । धृत्या द्वितीयवान्भवति बुद्धिमान्वृद्धसेवया ॥

śrutena śrotriyo bhavati tapasā vindate mahat | dhṛtyā dvitīyavānbhavati buddhimānvṛddhasevayā

"शास्त्र के अध्ययन से मनुष्य वेदज्ञ होता है, तप से महत्ता पाता है, धैर्य से उसे साथी मिलता है, और वृद्धों की सेवा से वह बुद्धिमान बनता है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 51 (3.314.51)

किं ब्राह्मणानां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव । कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ॥

kiṃ brāhmaṇānāṃ devatvaṃ kaśca dharmaḥ satāmiva | kaścaiṣāṃ mānuṣo bhāvaḥ kimeṣāmasatāmiva

"ब्राह्मणों का देवत्व क्या है? सज्जनों जैसा उनका धर्म क्या है? उनका मानवीय भाव क्या है? और उनमें दुष्टों जैसा क्या है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 52 (3.314.52)

स्वाध्याय एषां देवत्वं तप एषां सतामिव । मरणं मानुषो भावः परिवादोऽसतामिव ॥

svādhyāya eṣāṃ devatvaṃ tapa eṣāṃ satāmiva | maraṇaṃ mānuṣo bhāvaḥ parivādo'satāmiva

"वेद का स्वाध्याय उनका देवत्व है, तप सज्जनों जैसा उनका धर्म है, मृत्यु उनका मानवीय भाव है, और परनिन्दा उनमें दुष्टों जैसी बात है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 53 (3.314.53)

किं क्षत्रियाणां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव । कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ॥

kiṃ kṣatriyāṇāṃ devatvaṃ kaśca dharmaḥ satāmiva | kaścaiṣāṃ mānuṣo bhāvaḥ kimeṣāmasatāmiva

"क्षत्रियों का देवत्व क्या है? सज्जनों जैसा उनका धर्म क्या है? उनका मानवीय भाव क्या है? और उनमें दुष्टों जैसा क्या है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 54 (3.314.54)

इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव । भयं वै मानुषो भावः परित्यागोऽसतामिव ॥

iṣvastrameṣāṃ devatvaṃ yajña eṣāṃ satāmiva | bhayaṃ vai mānuṣo bhāvaḥ parityāgo'satāmiva

"बाण और अस्त्र उनका देवत्व हैं, यज्ञ सज्जनों जैसा उनका धर्म है, भय उनका मानवीय भाव है, और साथ छोड़ देना उनमें दुष्टों जैसी बात है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 55 (3.314.55)

किमेकं यज्ञियं साम किमेकं यज्ञियं यजुः । का चैषां वृणुते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते ॥

kimekaṃ yajñiyaṃ sāma kimekaṃ yajñiyaṃ yajuḥ | kā caiṣāṃ vṛṇute yajñaṃ kāṃ yajño nātivartate

"यज्ञ का एकमात्र साम क्या है? यज्ञ का एकमात्र यजुः क्या है? कौन यज्ञ का वरण करती है? और यज्ञ किसका उल्लंघन नहीं करता?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 56 (3.314.56)

प्राणो वै यज्ञियं साम मनो वै यज्ञियं यजुः । ऋगेका वृणुते यज्ञं तां यज्ञो नातिवर्तते ॥

prāṇo vai yajñiyaṃ sāma mano vai yajñiyaṃ yajuḥ | ṛgekā vṛṇute yajñaṃ tāṃ yajño nātivartate

"प्राण ही यज्ञ का साम है, मन ही यज्ञ का यजुः है; अकेली ऋचा यज्ञ का वरण करती है, और यज्ञ उसका उल्लंघन नहीं करता।"

यक्ष उवाच

श्लोक 57 (3.314.57)

किंस्विदावपतां श्रेष्ठं किंस्विन्निवपतां वरम् । किंस्वित्प्रतिष्ठमानानां किंस्वित्प्रसवतां वरम् ॥

kiṃsvidāvapatāṃ śreṣṭhaṃ kiṃsvinnivapatāṃ varam | kiṃsvitpratiṣṭhamānānāṃ kiṃsvitprasavatāṃ varam

"बोने वालों के लिए सबसे श्रेष्ठ क्या है? रोपने वालों के लिए उत्तम क्या है? प्रतिष्ठा चाहने वालों के लिए श्रेष्ठ क्या है? और सन्तान उत्पन्न करने वालों के लिए उत्तम क्या है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 58 (3.314.58)

वर्षमावपतां श्रेष्ठं बीजं निवपतां वरम् । गावः प्रतिष्ठमानानां पुत्रः प्रसवतां वरः ॥

varṣamāvapatāṃ śreṣṭhaṃ bījaṃ nivapatāṃ varam | gāvaḥ pratiṣṭhamānānāṃ putraḥ prasavatāṃ varaḥ

"बोने वालों के लिए वर्षा श्रेष्ठ है, रोपने वालों के लिए बीज उत्तम है, प्रतिष्ठा चाहने वालों के लिए गौएँ श्रेष्ठ हैं, और सन्तान उत्पन्न करने वालों के लिए पुत्र उत्तम है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 59 (3.314.59)

इन्द्रियार्थाननुभवन्बुद्धिमाँल्लोकपूजितः । संमतः सर्वभूतानामुच्छ्वसन्को न जीवति ॥

indriyārthānanubhavanbuddhimām̐llokapūjitaḥ | saṃmataḥ sarvabhūtānāmucchvasanko na jīvati

"वह कौन है जो इन्द्रियों के विषयों का भोग करता है, बुद्धिमान है, संसार में पूजित और सब प्राणियों में सम्मानित है, फिर भी साँस लेते हुए जीवित नहीं है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 60 (3.314.60)

देवतातिथिभृत्यानां पितॄणामात्मनश्च यः । न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्वसन्न स जीवति ॥

devatātithibhṛtyānāṃ pitṝṇāmātmanaśca yaḥ | na nirvapati pañcānāmucchvasanna sa jīvati

"जो देवता, अतिथि, आश्रित जन, पितर और स्वयं अपने आप, इन पाँचों को उनका भाग नहीं देता, वह साँस लेते हुए भी जीवित नहीं है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 61 (3.314.61)

किंस्विद्गुरुतरं भूमेः किंस्विदुच्चतरं च खात् । किंस्विच्छीघ्रतरं वायोः किंस्विद्बहुतरं तृणात् ॥

kiṃsvidgurutaraṃ bhūmeḥ kiṃsviduccataraṃ ca khāt | kiṃsvicchīghrataraṃ vāyoḥ kiṃsvidbahutaraṃ tṛṇāt

"पृथ्वी से भारी क्या है? आकाश से ऊँचा क्या है? वायु से तेज़ क्या है? और तिनकों से अधिक संख्या में क्या है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 62 (3.314.62)

माता गुरुतरा भूमेः खात्पितोच्चतरस्तथा । मनः शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुतरी तृणात् ॥

mātā gurutarā bhūmeḥ khātpitoccatarastathā | manaḥ śīghrataraṃ vātāccintā bahutarī tṛṇāt

"माता पृथ्वी से भारी है, पिता आकाश से ऊँचा है, मन वायु से तेज़ है, और चिन्ताएँ तिनकों से भी अधिक हैं।"

यक्ष उवाच

श्लोक 63 (3.314.63)

किंस्वित्सुप्तं न निमिषति किंस्विज्जातं न चेङ्गते । कस्यस्विद्धृदयं नास्ति का स्विद्वेगेन वर्धते ॥

kiṃsvitsuptaṃ na nimiṣati kiṃsvijjātaṃ na ceṅgate | kasyasviddhṛdayaṃ nāsti kā svidvegena vardhate

"क्या है जो सोते हुए भी आँखें नहीं मूँदता? क्या है जो जन्म लेकर भी हिलता नहीं? किसका हृदय नहीं होता? और कौन अपने वेग से बढ़ती है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 64 (3.314.64)

मत्स्यः सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चेङ्गते । अश्मनो हृदयं नास्ति नदी वेगेन वर्धते ॥

matsyaḥ supto na nimiṣatyaṇḍaṃ jātaṃ na ceṅgate | aśmano hṛdayaṃ nāsti nadī vegena vardhate

"मछली सोते हुए भी आँखें नहीं मूँदती, अण्डा जन्म लेकर भी नहीं हिलता, पत्थर का हृदय नहीं होता, और नदी अपने वेग से बढ़ती है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 65 (3.314.65)

किंस्वित्प्रवसतो मित्रं किंस्विन्मित्रं गृहे सतः । आतुरस्य च किं मित्रं किंस्विन्मित्रं मरिष्यतः ॥

kiṃsvitpravasato mitraṃ kiṃsvinmitraṃ gṛhe sataḥ | āturasya ca kiṃ mitraṃ kiṃsvinmitraṃ mariṣyataḥ

"परदेस जाने वाले का मित्र कौन है? घर में रहने वाले का मित्र कौन है? रोगी का मित्र कौन है? और मरने वाले का मित्र कौन है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 66 (3.314.66)

विद्या प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः । आतुरस्य भिषङ्मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ॥

vidyā pravasato mitraṃ bhāryā mitraṃ gṛhe sataḥ | āturasya bhiṣaṅmitraṃ dānaṃ mitraṃ mariṣyataḥ

"परदेस जाने वाले की मित्र विद्या है, घर में रहने वाले की मित्र पत्नी है, रोगी का मित्र वैद्य है, और मरने वाले का मित्र दान है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 67 (3.314.67)

कोऽतिथिः सर्वभूतानां किं स्विद्धर्मं सनातनम् । अमृतं किंस्विद्राजेन्द्र किंस्वित्सर्वमिदं जगत् ॥

ko'tithiḥ sarvabhūtānāṃ kiṃ sviddharmaṃ sanātanam | amṛtaṃ kiṃsvidrājendra kiṃsvitsarvamidaṃ jagat

"सब प्राणियों का अतिथि कौन है? सनातन धर्म क्या है? हे राजेन्द्र, अमृत क्या है? और यह सारा जगत् क्या है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 68 (3.314.68)

अतिथिः सर्वभूतानामग्निः सोमो गवामृतम् । सनातनोऽमृतो धर्मो वायुः सर्वमिदं जगत् ॥

atithiḥ sarvabhūtānāmagniḥ somo gavāmṛtam | sanātano'mṛto dharmo vāyuḥ sarvamidaṃ jagat

"अग्नि सब प्राणियों का अतिथि है; सोम, अर्थात् गौ का दूध, अमृत है; कभी न मरने वाला धर्म ही सनातन धर्म है; और वायु ही यह सारा जगत् है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 69 (3.314.69)

किंस्विदेको विचरते जातः को जायते पुनः । किंस्विद्धिमस्य भैषज्यं किंस्विदावपनं महत् ॥

kiṃsvideko vicarate jātaḥ ko jāyate punaḥ | kiṃsviddhimasya bhaiṣajyaṃ kiṃsvidāvapanaṃ mahat

"कौन अकेला विचरता है? कौन जन्म लेकर फिर से जन्म लेता है? शीत की औषधि क्या है? और बीज बोने का सबसे बड़ा क्षेत्र क्या है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 70 (3.314.70)

सूर्य एको विचरते चन्द्रमा जायते पुनः । अग्निर्हिमस्य भैषज्यं भूमिरावपनं महत् ॥

sūrya eko vicarate candramā jāyate punaḥ | agnirhimasya bhaiṣajyaṃ bhūmirāvapanaṃ mahat

"सूर्य अकेला विचरता है, चन्द्रमा फिर-फिर जन्म लेता है, अग्नि शीत की औषधि है, और पृथ्वी बीज बोने का सबसे बड़ा क्षेत्र है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 71 (3.314.71)

किंस्विदेकपदं धर्म्यं किंस्विदेकपदं यशः । किंस्विदेकपदं स्वर्ग्यं किंस्विदेकपदं सुखम् ॥

kiṃsvidekapadaṃ dharmyaṃ kiṃsvidekapadaṃ yaśaḥ | kiṃsvidekapadaṃ svargyaṃ kiṃsvidekapadaṃ sukham

"धर्म का एकमात्र आधार क्या है? यश का एकमात्र आधार क्या है? स्वर्ग का एकमात्र साधन क्या है? और सुख का एकमात्र आधार क्या है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 72 (3.314.72)

दाक्ष्यमेकपदं धर्म्यं दानमेकपदं यशः । सत्यमेकपदं स्वर्ग्यं शीलमेकपदं सुखम् ॥

dākṣyamekapadaṃ dharmyaṃ dānamekapadaṃ yaśaḥ | satyamekapadaṃ svargyaṃ śīlamekapadaṃ sukham

"दक्षता धर्म का एकमात्र आधार है, दान यश का एकमात्र आधार है, सत्य स्वर्ग का एकमात्र साधन है, और शील सुख का एकमात्र आधार है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 73 (3.314.73)

किंस्विदात्मा मनुष्यस्य किंस्विद्दैवकृतः सखा । उपजीवनं किंस्विदस्य किंस्विदस्य परायणम् ॥

kiṃsvidātmā manuṣyasya kiṃsviddaivakṛtaḥ sakhā | upajīvanaṃ kiṃsvidasya kiṃsvidasya parāyaṇam

"मनुष्य की आत्मा क्या है? दैव ने उसे कौन-सा सखा दिया है? उसकी जीविका का आधार क्या है? और उसका परम आश्रय क्या है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 74 (3.314.74)

पुत्र आत्मा मनुष्यस्य भार्या दैवकृतः सखा । उपजीवनं च पर्जन्यो दानमस्य परायणम् ॥

putra ātmā manuṣyasya bhāryā daivakṛtaḥ sakhā | upajīvanaṃ ca parjanyo dānamasya parāyaṇam

"पुत्र मनुष्य की आत्मा है, पत्नी दैव का दिया हुआ सखा है, मेघ उसकी जीविका का आधार है, और दान उसका परम आश्रय है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 75 (3.314.75)

धन्यानामुत्तमं किंस्विद्धनानां स्यात्किमुत्तमम् । लाभानामुत्तमं किंस्यात्सुखानां स्यात्किमुत्तमं ॥

dhanyānāmuttamaṃ kiṃsviddhanānāṃ syātkimuttamam | lābhānāmuttamaṃ kiṃsyātsukhānāṃ syātkimuttamaṃ

"प्रशंसनीय गुणों में उत्तम क्या है? धनों में उत्तम क्या है? लाभों में उत्तम क्या है? और सुखों में उत्तम क्या है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 76 (3.314.76)

धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम् । लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा ॥

dhanyānāmuttamaṃ dākṣyaṃ dhanānāmuttamaṃ śrutam | lābhānāṃ śreya ārogyaṃ sukhānāṃ tuṣṭiruttamā

"प्रशंसनीय गुणों में दक्षता उत्तम है, धनों में शास्त्र-ज्ञान उत्तम है, लाभों में आरोग्य श्रेष्ठ है, और सुखों में सन्तोष उत्तम है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 77 (3.314.77)

किंस्विद्धर्मपरं लोके कश्च धर्मः सदाफलः । किं नियम्य न शोचन्ति कैश्च सन्धिर्न जीर्यते ॥

kiṃsviddharmaparaṃ loke kaśca dharmaḥ sadāphalaḥ | kiṃ niyamya na śocanti kaiśca sandhirna jīryate

"संसार में सबसे श्रेष्ठ धर्म क्या है? कौन-सा धर्म सदा फल देता है? किसे वश में करके मनुष्य शोक नहीं करते? और किनके साथ की गई मित्रता कभी पुरानी नहीं पड़ती?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 78 (3.314.78)

आनृशंस्यं परं धर्मस्त्रेताधर्मः सदाफलः । मनो यम्य न शोचन्ति सन्धिः सद्भिर्न जीर्यते ॥

ānṛśaṃsyaṃ paraṃ dharmastretādharmaḥ sadāphalaḥ | mano yamya na śocanti sandhiḥ sadbhirna jīryate

"अक्रूरता सबसे श्रेष्ठ धर्म है; तीन पवित्र अग्नियों का धर्म सदा फल देता है; मन को वश में करके मनुष्य शोक नहीं करते; और सज्जनों के साथ की गई मित्रता कभी पुरानी नहीं पड़ती।"

यक्ष उवाच

श्लोक 79 (3.314.79)

किं नु हित्वा प्रियो भवति किंनु हित्वा न शोचति । किंनु हित्वाऽर्थवान्भवति किंनु हित्वा सुखी भवेत् ॥

kiṃ nu hitvā priyo bhavati kiṃnu hitvā na śocati | kiṃnu hitvā'rthavānbhavati kiṃnu hitvā sukhī bhavet

"क्या छोड़कर मनुष्य प्रिय होता है? क्या छोड़कर वह शोक नहीं करता? क्या छोड़कर वह धनवान होता है? और क्या छोड़कर वह सुखी होता है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 80 (3.314.80)

मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति । कामं हित्वाऽर्थवान्भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत् ॥

mānaṃ hitvā priyo bhavati krodhaṃ hitvā na śocati | kāmaṃ hitvā'rthavānbhavati lobhaṃ hitvā sukhī bhavet

"अभिमान छोड़कर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोध छोड़कर शोक नहीं करता, कामना छोड़कर धनवान होता है, और लोभ छोड़कर सुखी होता है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 81 (3.314.81)

किमर्थं ब्राह्मणे दानं किमर्थं नटनर्तके । किमर्थं चैव भृत्येषु किमर्थं चैव राजसु ॥

kimarthaṃ brāhmaṇe dānaṃ kimarthaṃ naṭanartake | kimarthaṃ caiva bhṛtyeṣu kimarthaṃ caiva rājasu

"ब्राह्मण को दान किस लिए दिया जाता है? नटों और नर्तकों को किस लिए? सेवकों को किस लिए? और राजाओं को किस लिए?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 82 (3.314.82)

धर्मार्थं ब्राह्मणे दानं यशोर्थं नटनर्तके । भृत्येषु सङ्ग्रहार्थं च भयार्थं चैव राजसु ॥

dharmārthaṃ brāhmaṇe dānaṃ yaśorthaṃ naṭanartake | bhṛtyeṣu saṅgrahārthaṃ ca bhayārthaṃ caiva rājasu

"ब्राह्मण को दान धर्म के लिए, नटों और नर्तकों को यश के लिए, सेवकों को उन्हें अपने साथ जोड़े रखने के लिए, और राजाओं को भय के कारण दिया जाता है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 83 (3.314.83)

केन स्विदावृतो लोकः केन स्विन्न प्रकाशते । केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्गं न गच्छति ॥

kena svidāvṛto lokaḥ kena svinna prakāśate | kena tyajati mitrāṇi kena svargaṃ na gacchati

संसार किससे ढका हुआ है? वह प्रकाशित क्यों नहीं होता? मनुष्य मित्रों को क्यों त्याग देता है, और स्वर्ग क्यों नहीं जाता?

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 84 (3.314.84)

अज्ञानेनावृतो लोकस्तमसा न प्रकाशते । लोभात्त्यजति मित्राणि सङ्गात्स्वर्गं न गच्छति ॥

ajñānenāvṛto lokastamasā na prakāśate | lobhāttyajati mitrāṇi saṅgātsvargaṃ na gacchati

"संसार अज्ञान से ढका हुआ है; अन्धकार के कारण वह प्रकाशित नहीं होता। लोभ के कारण मनुष्य मित्रों को त्याग देता है, और आसक्ति के कारण स्वर्ग नहीं जाता।"

यक्ष उवाच

श्लोक 85 (3.314.85)

मृतः कथं स्यात्पुरुषः कथं राष्ट्रं मृतं भवेत् । श्राद्धं मृतं कथं वा स्यात्कथं यज्ञो मृतो भवेत् ॥

mṛtaḥ kathaṃ syātpuruṣaḥ kathaṃ rāṣṭraṃ mṛtaṃ bhavet | śrāddhaṃ mṛtaṃ kathaṃ vā syātkathaṃ yajño mṛto bhavet

"मनुष्य मृत कैसे होता है? राष्ट्र मृत कैसे होता है? श्राद्ध मृत कैसे होता है? और यज्ञ मृत कैसे होता है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 86 (3.314.86)

मृतो दरिद्रः पुरुषो मृतं राष्ट्रमराजकम् । मृतमश्रोत्रियं श्राद्धं मृतो यज्ञस्त्वदक्षिणः ॥

mṛto daridraḥ puruṣo mṛtaṃ rāṣṭramarājakam | mṛtamaśrotriyaṃ śrāddhaṃ mṛto yajñastvadakṣiṇaḥ

"दरिद्र मनुष्य मृत है, राजा के बिना राष्ट्र मृत है, वेदज्ञ ब्राह्मण के बिना श्राद्ध मृत है, और दक्षिणा के बिना यज्ञ मृत है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 87 (3.314.87)

का दिक्किमुदकं पार्थ किमन्नं किं च वै विषम् । श्राद्धस्य कालमाख्याहि ततः पिब हरस्व च ॥

kā dikkimudakaṃ pārtha kimannaṃ kiṃ ca vai viṣam | śrāddhasya kālamākhyāhi tataḥ piba harasva ca

"हे पार्थ, दिशा क्या है? जल क्या है? अन्न क्या है? और विष क्या है? श्राद्ध का समय बताओ, फिर जल पियो और ले भी जाओ।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 88 (3.314.88)

सन्तो दिग्जलमाकाशं गौरन्नं ब्राह्मणं विषम् । श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः कथं वा यक्ष मन्यसे ॥

santo digjalamākāśaṃ gaurannaṃ brāhmaṇaṃ viṣam | śrāddhasya brāhmaṇaḥ kālaḥ kathaṃ vā yakṣa manyase

"सज्जन ही दिशा हैं, आकाश जल है, गौ अन्न है, और ब्राह्मण का धन विष है। जब ब्राह्मण उपलब्ध हो, वही श्राद्ध का समय है। या हे यक्ष, आप इसे कैसे मानते हैं?"

यक्ष उवाच

श्लोक 89 (3.314.89)

तपः किं लक्षणं प्रोक्तं को दमश्च प्रकीर्तितः । क्षमा च का परा प्रोक्ता का च ह्रीः परिकीर्तिता ॥

tapaḥ kiṃ lakṣaṇaṃ proktaṃ ko damaśca prakīrtitaḥ | kṣamā ca kā parā proktā kā ca hrīḥ parikīrtitā

"तप का लक्षण क्या कहा गया है? दम किसे कहते हैं? परम क्षमा किसे कहा गया है? और लज्जा किसे कहते हैं?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 90 (3.314.90)

तपः स्वधर्मवर्तित्वं मनसो दमनं दमः । क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुत्वं ह्रीरकार्यनिवर्तनम् ॥

tapaḥ svadharmavartitvaṃ manaso damanaṃ damaḥ | kṣamā dvandvasahiṣṇutvaṃ hrīrakāryanivartanam

"अपने धर्म में स्थित रहना तप है, मन का दमन दम है, सुख-दुःख जैसे द्वन्द्वों को सहना क्षमा है, और न करने योग्य कर्मों से लौट आना लज्जा है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 91 (3.314.91)

किं ज्ञानं प्रोच्यते राजन्कः शमश्च प्रकीर्तितः । दया च का परा प्रोक्ता किं चार्जवमुदाहृतम् ॥

kiṃ jñānaṃ procyate rājankaḥ śamaśca prakīrtitaḥ | dayā ca kā parā proktā kiṃ cārjavamudāhṛtam

"हे राजन्, ज्ञान किसे कहते हैं? शम किसे कहा गया है? परम दया किसे कहते हैं? और सरलता किसे कहा गया है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 92 (3.314.92)

ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः शमश्चित्तप्रशान्तता । दया सर्वसुखैषित्वमार्जवं समचित्तता ॥

jñānaṃ tattvārthasambodhaḥ śamaścittapraśāntatā | dayā sarvasukhaiṣitvamārjavaṃ samacittatā

"तत्त्व के अर्थ को ठीक-ठीक समझना ज्ञान है, चित्त की शान्ति शम है, सबके सुख की कामना दया है, और समचित्तता सरलता है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 93 (3.314.93)

कः शत्रुर्दुर्जयः पुंसां कश्च व्याधिरनन्तकः । कीदृशश्च स्मृतः साधुरसाधुः कीदृशः स्मृतः ॥

kaḥ śatrurdurjayaḥ puṃsāṃ kaśca vyādhiranantakaḥ | kīdṛśaśca smṛtaḥ sādhurasādhuḥ kīdṛśaḥ smṛtaḥ

"मनुष्यों का कौन-सा शत्रु दुर्जय है? कौन-सा रोग अन्तहीन है? साधु किसे माना गया है, और असाधु किसे?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 94 (3.314.94)

क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लोभो व्याधिरनन्तकः । सर्वभूतहितः साधुरसाधुर्निर्दयः स्मृतः ॥

krodhaḥ sudurjayaḥ śatrurlobho vyādhiranantakaḥ | sarvabhūtahitaḥ sādhurasādhurnirdayaḥ smṛtaḥ

"क्रोध अत्यन्त दुर्जय शत्रु है, लोभ अन्तहीन रोग है; सब प्राणियों का हित करने वाला साधु है, और निर्दय व्यक्ति असाधु माना गया है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 95 (3.314.95)

को मोहः प्रोच्यते राजन्कश्च मानः प्रकीर्तितः । किमालस्यं च विज्ञेयं कश्च शोकः प्रकीर्तितः ॥

ko mohaḥ procyate rājankaśca mānaḥ prakīrtitaḥ | kimālasyaṃ ca vijñeyaṃ kaśca śokaḥ prakīrtitaḥ

"हे राजन्, मोह किसे कहते हैं? मान किसे कहा गया है? आलस्य किसे समझना चाहिए? और शोक किसे कहते हैं?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 96 (3.314.96)

मोहो हि धर्ममूढत्वं मानस्त्वात्माभिमानिता । धर्मनिष्क्रियताऽऽलस्यं शोकस्त्वज्ञानमुच्यते ॥

moho hi dharmamūḍhatvaṃ mānastvātmābhimānitā | dharmaniṣkriyatā''lasyaṃ śokastvajñānamucyate

"धर्म के विषय में मूढ़ होना मोह है, अपने को बड़ा मानना मान है, धर्म का पालन न करना आलस्य है, और अज्ञान को ही शोक कहा जाता है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 97 (3.314.97)

किं स्थैर्यमृषिभिः प्रोक्तं किं च धैर्यमुदाहृतम् । स्नानं च किं परं प्रोक्तं दानं च किमिहोच्यते ॥

kiṃ sthairyamṛṣibhiḥ proktaṃ kiṃ ca dhairyamudāhṛtam | snānaṃ ca kiṃ paraṃ proktaṃ dānaṃ ca kimihocyate

"ऋषियों ने स्थिरता किसे कहा है? धैर्य किसे कहते हैं? परम स्नान किसे कहा गया है? और यहाँ दान किसे कहते हैं?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 98 (3.314.98)

स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्यं धैर्यमिन्द्रियनिग्रहः । स्नानं मनोमलत्यागो दानं वै भूतरक्षणम् ॥

svadharme sthiratā sthairyaṃ dhairyamindriyanigrahaḥ | snānaṃ manomalatyāgo dānaṃ vai bhūtarakṣaṇam

"अपने धर्म में दृढ़ रहना स्थिरता है, इन्द्रियों को वश में रखना धैर्य है, मन के मैल को त्याग देना स्नान है, और प्राणियों की रक्षा करना ही दान है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 99 (3.314.99)

कः पण्डितः पुमान्ज्ञेयो नास्तिकः कश्च उच्यते । को मूर्खः कश्च कामः स्यात्को मत्सर इति स्मृतः ॥

kaḥ paṇḍitaḥ pumānjñeyo nāstikaḥ kaśca ucyate | ko mūrkhaḥ kaśca kāmaḥ syātko matsara iti smṛtaḥ

"किस पुरुष को पण्डित जानना चाहिए? नास्तिक किसे कहते हैं? मूर्ख कौन है? काम क्या है? और मत्सर किसे माना गया है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 100 (3.314.100)

धर्मज्ञः पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते । कामः संसारहेतुश्च हृत्तापो मत्सरः स्मृतः ॥

dharmajñaḥ paṇḍito jñeyo nāstiko mūrkha ucyate | kāmaḥ saṃsārahetuśca hṛttāpo matsaraḥ smṛtaḥ

"धर्म को जानने वाला पण्डित है, नास्तिक को मूर्ख कहा जाता है, काम संसार का कारण है, और हृदय की जलन को मत्सर कहा गया है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 101 (3.314.101)

कोऽहंकार इति प्रोक्तः कश्च दम्भः प्रकीर्तितः । किं तद्दैवं परं प्रोक्तं किं तत्पैशुन्यमुच्यते ॥

ko'haṃkāra iti proktaḥ kaśca dambhaḥ prakīrtitaḥ | kiṃ taddaivaṃ paraṃ proktaṃ kiṃ tatpaiśunyamucyate

"अहंकार किसे कहा गया है? दम्भ किसे कहते हैं? परम दैव किसे कहा गया है? और चुगली किसे कहते हैं?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 102 (3.314.102)

महाऽज्ञानमहंकारो दम्भो धर्मो ध्वजोच्छ्रयः । दैवं दानफलं प्रोक्तं पैशुन्यं परदूषणम् ॥

mahā'jñānamahaṃkāro dambho dharmo dhvajocchrayaḥ | daivaṃ dānaphalaṃ proktaṃ paiśunyaṃ paradūṣaṇam

"घोर अज्ञान ही अहंकार है, धर्म को ध्वजा की तरह ऊँचा उठाकर दिखाना दम्भ है, दान का फल ही दैव कहा गया है, और दूसरों में दोष निकालना चुगली है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 103 (3.314.103)

धर्मश्चार्थश्च कामश्च परस्परविरोधिनः । एषां नित्यविरुद्धानां कथमेकत्र संगमः ॥

dharmaścārthaśca kāmaśca parasparavirodhinaḥ | eṣāṃ nityaviruddhānāṃ kathamekatra saṃgamaḥ

"धर्म, अर्थ और काम आपस में एक-दूसरे के विरोधी हैं। सदा विरुद्ध रहने वाले इन तीनों का एक स्थान पर मेल कैसे हो सकता है?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 104 (3.314.104)

यदा धर्मश्च भार्या च परस्परवशानुगौ । तदा धर्मार्थकामानां त्रयाणामपि संगमः ॥

yadā dharmaśca bhāryā ca parasparavaśānugau | tadā dharmārthakāmānāṃ trayāṇāmapi saṃgamaḥ

"जब धर्म और पत्नी एक-दूसरे के अनुकूल चलते हैं, तब धर्म, अर्थ और काम, तीनों का मेल हो जाता है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 105 (3.314.105)

अक्षयो नरकः केन प्राप्यते भरतर्षभ । एतन्मे पृच्छतः प्रश्नं तच्छीघ्रं वक्तुमर्हसि ॥

akṣayo narakaḥ kena prāpyate bharatarṣabha | etanme pṛcchataḥ praśnaṃ tacchīghraṃ vaktumarhasi

"हे भरतश्रेष्ठ, अक्षय नरक किस कर्म से मिलता है? मैं तुमसे यह प्रश्न पूछता हूँ, इसका उत्तर शीघ्र दो।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 106 (3.314.106)

ब्राह्मणं स्वयमाहूय याचमानमकिंचनम् । पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात्सोऽक्षयं नरकं व्रजेत् ॥

brāhmaṇaṃ svayamāhūya yācamānamakiṃcanam | paścānnāstīti yo brūyātso'kṣayaṃ narakaṃ vrajet

"जो स्वयं किसी निर्धन, याचना करने वाले ब्राह्मण को बुलाकर बाद में कह दे कि 'कुछ नहीं है', वह अक्षय नरक में जाता है।"

श्लोक 107 (3.314.107)

वेदेषु धर्मशास्त्रेषु मिथ्या यो वै द्विजातिषु । देवेषु पितृधर्मेषु सोऽक्षयं नरकं व्रजेत् ॥

vedeṣu dharmaśāstreṣu mithyā yo vai dvijātiṣu | deveṣu pitṛdharmeṣu so'kṣayaṃ narakaṃ vrajet

"जो वेदों, धर्मशास्त्रों, द्विजों, देवताओं और पितरों के प्रति कर्तव्यों में मिथ्या आचरण करता है, वह अक्षय नरक में जाता है।"

श्लोक 108 (3.314.108)

विद्यमाने धने लोभाद्दानभोगविवर्जितः । पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात्सोऽक्षयं नरकं व्रजेत् ॥

vidyamāne dhane lobhāddānabhogavivarjitaḥ | paścānnāstīti yo brūyātso'kṣayaṃ narakaṃ vrajet

"जो धन रहते हुए भी लोभवश न दान करता है, न उसका उपभोग करता है, और फिर कह देता है कि 'कुछ नहीं है', वह अक्षय नरक में जाता है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 109 (3.314.109)

राजन्कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेन वा । ब्राह्मण्यं केन भवति प्रब्रूह्येतत्सुनिश्चितम् ॥

rājankulena vṛttena svādhyāyena śrutena vā | brāhmaṇyaṃ kena bhavati prabrūhyetatsuniścitam

"हे राजन्, ब्राह्मणत्व किससे होता है: कुल से, आचरण से, स्वाध्याय से या शास्त्र-ज्ञान से? यह मुझे निश्चित रूप से बताओ।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 110 (3.314.110)

शृणु यक्ष कुलं तात न स्वाध्यायो न च श्रुतम् । कारणं हि द्विजत्वे च वृत्तमेव न संशयः ॥

śṛṇu yakṣa kulaṃ tāta na svādhyāyo na ca śrutam | kāraṇaṃ hi dvijatve ca vṛttameva na saṃśayaḥ

"हे तात यक्ष, सुनिए: द्विजत्व का कारण न कुल है, न स्वाध्याय और न शास्त्र-ज्ञान; उसका कारण केवल आचरण है, इसमें कोई संशय नहीं।"

श्लोक 111 (3.314.111)

वृत्तं यत्नेन संरक्ष्यं ब्राह्मणेन विशेषतः । अक्षीणवृत्तो न क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥

vṛttaṃ yatnena saṃrakṣyaṃ brāhmaṇena viśeṣataḥ | akṣīṇavṛtto na kṣīṇo vṛttatastu hato hataḥ

"आचरण की रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिए, विशेषकर ब्राह्मण को। जिसका आचरण नष्ट नहीं हुआ, उसका कुछ नष्ट नहीं हुआ; पर जो आचरण से गिर गया, वह सचमुच नष्ट हो गया।"

श्लोक 112 (3.314.112)

पठकाः पाठकाश्चैव ये चान्ये शास्त्रचिन्तकाः । सर्वे व्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान्स पण्डितः ॥

paṭhakāḥ pāṭhakāścaiva ye cānye śāstracintakāḥ | sarve vyasanino mūrkhā yaḥ kriyāvānsa paṇḍitaḥ

"पढ़ने वाले, पढ़ाने वाले और शास्त्रों पर विचार करने वाले दूसरे सब लोग व्यसनों में पड़े मूर्ख ही हैं; जो कर्म करता है, वही पण्डित है।"

श्लोक 113 (3.314.113)

चतुर्वेदोऽपि दुर्वृत्तः स शूद्रादतिरिच्यते । योऽग्निहोत्रपरो दान्तः स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥

caturvedo'pi durvṛttaḥ sa śūdrādatiricyate | yo'gnihotraparo dāntaḥ sa brāhmaṇa iti smṛtaḥ

"चारों वेदों का ज्ञाता होकर भी जो दुराचारी है, वह शूद्र से भी गया-बीता है। जो अग्निहोत्र में तत्पर और जितेन्द्रिय है, वही ब्राह्मण माना गया है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 114 (3.314.114)

प्रियवचनवादी किं लभते । विमृशितकार्यकरः किं लभते । बहुमित्रकरः किं लभते । धर्मे रतः किं लभते कथय ॥

priyavacanavādī kiṃ labhate | vimṛśitakāryakaraḥ kiṃ labhate | bahumitrakaraḥ kiṃ labhate | dharme rataḥ kiṃ labhate kathaya

"प्रिय वचन बोलने वाले को क्या मिलता है? सोच-विचारकर काम करने वाले को क्या मिलता है? बहुत-से मित्र बनाने वाले को क्या मिलता है? और धर्म में लगे रहने वाले को क्या मिलता है? बताओ।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 115 (3.314.115)

प्रियवचनवादी प्रियो भवति । विमृशितकार्यकरोऽधिकं जयति । बहुमित्रकरः सुखं वसते । यश्च धर्मरतः स गतिं लभते ॥

priyavacanavādī priyo bhavati | vimṛśitakāryakaro'dhikaṃ jayati | bahumitrakaraḥ sukhaṃ vasate | yaśca dharmarataḥ sa gatiṃ labhate

"प्रिय वचन बोलने वाला सबका प्रिय हो जाता है, सोच-विचारकर काम करने वाला अधिक विजय पाता है, बहुत-से मित्र बनाने वाला सुख से रहता है, और जो धर्म में लगा रहता है, वह उत्तम गति पाता है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 116 (3.314.116)

को मोदते किमाश्चर्यं कः पन्थाः का च वार्तिका । वद मे चतुरः प्रश्नान्मृता जीवन्तु बान्धवाः ॥

ko modate kimāścaryaṃ kaḥ panthāḥ kā ca vārtikā | vada me caturaḥ praśnānmṛtā jīvantu bāndhavāḥ

"कौन सुखी है? आश्चर्य क्या है? मार्ग क्या है? और समाचार क्या है? मेरे इन चार प्रश्नों का उत्तर दो, और तुम्हारे मृत भाई जीवित हो जाएँ।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 117 (3.314.117)

पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा शाकं पचति स्वे गृहे । अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते ॥

pañcame'hani ṣaṣṭhe vā śākaṃ pacati sve gṛhe | anṛṇī cāpravāsī ca sa vāricara modate

"हे जलचर, जो पाँचवें या छठे दिन अपने ही घर में थोड़ा-सा साग पका लेता है, पर जिस पर कोई ऋण नहीं और जिसे परदेस में नहीं रहना पड़ता, वही सुखी है।"

श्लोक 118 (3.314.118)

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम् । शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥

ahanyahani bhūtāni gacchantīha yamālayam | śeṣāḥ sthāvaramicchanti kimāścaryamataḥ param

"प्रतिदिन प्राणी यमलोक को जा रहे हैं, फिर भी जो बचे हैं वे सदा यहीं बने रहना चाहते हैं। इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा?"

श्लोक 119 (3.314.119)

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना । नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां । महाजनो येन गतः स पन्था ॥

tarko'pratiṣṭhaḥ śrutayo vibhinnā | naiko muniryasya mataṃ pramāṇam | dharmasya tattvaṃ nihitaṃ guhāyāṃ | mahājano yena gataḥ sa panthā

"तर्क की कोई स्थिर नींव नहीं, श्रुतियाँ भिन्न-भिन्न हैं, कोई एक मुनि ऐसा नहीं जिसका मत अन्तिम प्रमाण हो। धर्म का तत्त्व गुफा में छिपा है। महापुरुष जिस राह पर चले, वही मार्ग है।"

श्लोक 120 (3.314.120)

पृथ्वी विभाण्डं गगनं पिधानं । सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन । मासर्तुदर्वीपरिघट्टनेन । भूतानि कालः पचतीति वार्ता ॥

pṛthvī vibhāṇḍaṃ gaganaṃ pidhānaṃ | sūryāgninā rātridivendhanena | māsartudarvīparighaṭṭanena | bhūtāni kālaḥ pacatīti vārtā

"पृथ्वी रूपी कड़ाही में, आकाश रूपी ढक्कन के नीचे, सूर्य रूपी अग्नि और रात-दिन रूपी ईंधन से, महीनों और ऋतुओं की करछी से चलाते हुए काल सब प्राणियों को पका रहा है; यही समाचार है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 121 (3.314.121)

व्याख्याता मे त्वया प्रश्ना यथातत्वं परंतप । पुरुषं त्विदानीं व्याख्याहि यश्च सर्वधनी नरः ॥

vyākhyātā me tvayā praśnā yathātatvaṃ paraṃtapa | puruṣaṃ tvidānīṃ vyākhyāhi yaśca sarvadhanī naraḥ

"हे परंतप, तुमने मेरे प्रश्नों की ठीक-ठीक व्याख्या कर दी। अब बताओ कि सच्चा पुरुष कौन है, और वह कौन मनुष्य है जो सारे धन का स्वामी है।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 122 (3.314.122)

दिवं स्पृशति भूमिं च शब्दः पुण्येन कर्मणा । यावत्स शब्दो भवति तावत्पुरुष उच्यते ॥

divaṃ spṛśati bhūmiṃ ca śabdaḥ puṇyena karmaṇā | yāvatsa śabdo bhavati tāvatpuruṣa ucyate

"पुण्य कर्मों से उत्पन्न कीर्ति स्वर्ग और पृथ्वी को छूती है; जब तक वह कीर्ति बनी रहती है, तब तक वह पुरुष कहलाता है।"

श्लोक 123 (3.314.123)

तुल्ये प्रियाप्रिये यस्य सुखदुःखे तथैव च । अतीतानागते चोभे स वै पुरुष उच्येत ॥

tulye priyāpriye yasya sukhaduḥkhe tathaiva ca | atītānāgate cobhe sa vai puruṣa ucyeta

"जिसके लिए प्रिय और अप्रिय, सुख और दुःख, तथा बीता हुआ और आने वाला, दोनों समान हों, वही वास्तव में पुरुष कहलाता है।"

श्लोक 124 (3.314.124)

समत्वं यस्य सर्वेषु निस्पृहः शान्तमानसः । सुप्रसन्नः सदा योगी स वै सर्वधनी नरः ॥

samatvaṃ yasya sarveṣu nispṛhaḥ śāntamānasaḥ | suprasannaḥ sadā yogī sa vai sarvadhanī naraḥ

"जो सबके प्रति समभाव रखता है, निःस्पृह है, शान्त मन वाला है, सदा प्रसन्न रहने वाला योगी है, वही सारे धन का स्वामी है।"

यक्ष उवाच

श्लोक 125 (3.314.125)

व्याख्यातः पुरुषो राजन्यश्च सर्वधनी नरः । तस्मात्त्वमेकं भ्रातृणां यमिच्छसि स जीवतु ॥

vyākhyātaḥ puruṣo rājanyaśca sarvadhanī naraḥ | tasmāttvamekaṃ bhrātṛṇāṃ yamicchasi sa jīvatu

"हे राजन्, तुमने बता दिया कि पुरुष कौन है और सारे धन का स्वामी कौन है। इसलिए अपने भाइयों में से जिस एक को तुम चाहो, वह जीवित हो जाए।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 126 (3.314.126)

श्यामो य एष रक्ताक्षो बृहत्साल इवोत्थितः । व्यूढोरस्को महाबाहुर्नकुलो यक्ष जीवतु ॥

śyāmo ya eṣa raktākṣo bṛhatsāla ivotthitaḥ | vyūḍhorasko mahābāhurnakulo yakṣa jīvatu

"हे यक्ष, यह जो साँवले रंग का, लाल आँखों वाला, ऊँचे साल वृक्ष की तरह खड़ा, चौड़ी छाती वाला महाबाहु है, वह नकुल जीवित हो।"

यक्ष उवाच

श्लोक 127 (3.314.127)

प्रियस्ते भीमसेनोऽयमर्जुनो वः परायणम् । त्वं कस्मान्नकुलं राजन्सापत्नं जीवमिच्छसि ॥

priyaste bhīmaseno'yamarjuno vaḥ parāyaṇam | tvaṃ kasmānnakulaṃ rājansāpatnaṃ jīvamicchasi

"यह भीमसेन तुम्हें प्रिय है और अर्जुन तुम सबका आश्रय है। फिर हे राजन्, तुम सौतेले भाई नकुल को जीवित क्यों करना चाहते हो?"

श्लोक 128 (3.314.128)

यस्य नागसहस्रेण दशसङ्ख्येन वै बलम् । तुल्यं तं भीममुत्सृज्य नकुलं जीवमिच्छसि ॥

yasya nāgasahasreṇa daśasaṅkhyena vai balam | tulyaṃ taṃ bhīmamutsṛjya nakulaṃ jīvamicchasi

"जिसका बल दस हज़ार हाथियों के बराबर है, उस भीम को छोड़कर तुम नकुल को जीवित करना चाहते हो?"

श्लोक 129 (3.314.129)

तथैनं मनुजाः प्राहुर्भीमसेनं प्रियं तव । अथ केनानुभावेन सापत्नं जीवमिच्छसि ॥

tathainaṃ manujāḥ prāhurbhīmasenaṃ priyaṃ tava | atha kenānubhāvena sāpatnaṃ jīvamicchasi

"लोग कहते हैं कि यह भीमसेन तुम्हें प्रिय है। तब किस विचार से तुम सौतेले भाई को जीवित करना चाहते हो?"

श्लोक 130 (3.314.130)

यस्य बाहुबलं सर्वे पाण्डवाः समुपासते । अर्जुनं तमपाहाय नकुलं जीवमिच्छसि ॥

yasya bāhubalaṃ sarve pāṇḍavāḥ samupāsate | arjunaṃ tamapāhāya nakulaṃ jīvamicchasi

"जिसके बाहुबल पर सब पाण्डव निर्भर हैं, उस अर्जुन को छोड़कर तुम नकुल को जीवित करना चाहते हो?"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 131 (3.314.131)

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद्धर्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥

dharma eva hato hanti dharmo rakṣati rakṣitaḥ | tasmāddharmaṃ na tyajāmi mā no dharmo hato'vadhīt

"नष्ट किया गया धर्म ही नष्ट करता है, और रक्षा किया गया धर्म रक्षा करता है। इसलिए मैं धर्म का त्याग नहीं करूँगा, कहीं ऐसा न हो कि नष्ट हुआ धर्म हमें ही नष्ट कर दे।"

श्लोक 132 (3.314.132)

आनृशंस्यं परो धर्मः परमार्थाच्च मे मतम् । आनृशंस्यं चिकीर्षामि नकुलो यक्ष जीवतु ॥

ānṛśaṃsyaṃ paro dharmaḥ paramārthācca me matam | ānṛśaṃsyaṃ cikīrṣāmi nakulo yakṣa jīvatu

"अक्रूरता ही परम धर्म है, और मेरे मत में यह परम लाभ से भी बढ़कर है। मैं अक्रूरता का ही आचरण करना चाहता हूँ; हे यक्ष, नकुल जीवित हो।"

श्लोक 133 (3.314.133)

धर्मशीलः सदा राजा इति मां मानवा विदुः । स्वधर्मान्न चलिष्यामि नकुलो यक्ष जीवतु ॥

dharmaśīlaḥ sadā rājā iti māṃ mānavā viduḥ | svadharmānna caliṣyāmi nakulo yakṣa jīvatu

"लोग मुझे सदा धर्म में स्थित रहने वाला राजा मानते हैं। मैं अपने धर्म से विचलित नहीं होऊँगा; हे यक्ष, नकुल जीवित हो।"

श्लोक 134 (3.314.134)

कुन्ती चैव तु माद्री च द्वे भार्ये तु पितुर्मम । उभे सपुत्रे स्यातां वै इति मे धीयते मतिः ॥

kuntī caiva tu mādrī ca dve bhārye tu piturmama | ubhe saputre syātāṃ vai iti me dhīyate matiḥ

"कुन्ती और माद्री, दोनों ही मेरे पिता की पत्नियाँ थीं। दोनों के पुत्र जीवित रहें, यही मेरा निश्चय है।"

श्लोक 135 (3.314.135)

यथा कुन्ती तथा माद्री विशेषो नास्ति मे तयोः । मातृभ्यां सममिच्छामि नकुलो यक्ष जीवतु ॥

yathā kuntī tathā mādrī viśeṣo nāsti me tayoḥ | mātṛbhyāṃ samamicchāmi nakulo yakṣa jīvatu

"जैसी कुन्ती हैं, वैसी ही माद्री हैं; मेरे लिए दोनों में कोई भेद नहीं। मैं दोनों माताओं के लिए समान भाव चाहता हूँ; हे यक्ष, नकुल जीवित हो।"

यक्ष उवाच

श्लोक 136 (3.314.136)

यस्य तेऽर्थाच्च कामाच्च आनृशंस्यं परं मतम् । तस्मात्ते भ्रातरः सर्वे जीवन्तु भरतर्षभ ॥

yasya te'rthācca kāmācca ānṛśaṃsyaṃ paraṃ matam | tasmātte bhrātaraḥ sarve jīvantu bharatarṣabha

"क्योंकि तुम अर्थ और काम, दोनों से बढ़कर अक्रूरता को श्रेष्ठ मानते हो, इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हारे सभी भाई जीवित हो जाएँ।"

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