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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 315

यक्ष का धर्म के रूप में प्रकट होना

चारों भाई मृत्यु से उठ खड़े होते हैं और उनकी भूख-प्यास मिट जाती है; युधिष्ठिर सरोवर वाले उस प्राणी से पूछते हैं कि वह वास्तव में कौन है। यक्ष स्वयं को युधिष्ठिर के पिता धर्म के रूप में प्रकट करता है, जिसने उनकी परीक्षा के लिए मृग बनकर ब्राह्मण की अरणी हरी थी। वह तीन वर देता है: ब्राह्मण की अग्नियाँ लुप्त न हों; तेरहवें वर्ष में पाण्डव मनचाहे रूप धरकर विराटनगर में बिना पहचाने रहें; और युधिष्ठिर सदा लोभ, मोह और क्रोध को जीतें तथा उनका मन दान, तप और सत्य में लगा रहे। भाई ब्राह्मण को उसकी अरणी लौटा देते हैं, और इस आख्यान के पाठ के पुण्य के वर्णन के साथ आरण्यकपर्व समाप्त होता है।

अध्याय 314अध्याय-सूची

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.315.1)

ततस्ते यक्षवचनादुदतिष्ठन्त पाण्डवाः । क्षुत्पिपासे च सर्वेषां क्षणेन व्यपगच्छताम् ॥

tataste yakṣavacanādudatiṣṭhanta pāṇḍavāḥ | kṣutpipāse ca sarveṣāṃ kṣaṇena vyapagacchatām

तब यक्ष के कहने से पाण्डव उठ खड़े हुए, और क्षण भर में सबकी भूख और प्यास मिट गई।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (3.315.2)

सरस्येकेन पादेन तिष्ठन्तमपराजितम् । पृच्छामि को भवान्देवो न मे यक्षो मतो भवान् ॥

sarasyekena pādena tiṣṭhantamaparājitam | pṛcchāmi ko bhavāndevo na me yakṣo mato bhavān

"सरोवर में एक पैर पर खड़े हे अपराजित, मैं आपसे पूछता हूँ — आप कौन-से देवता हैं? मैं आपको यक्ष नहीं मानता।

श्लोक 3 (3.315.3)

वसूनां वा भवानेको रुद्राणामथवा भवान् । अथवा मरुतां श्रेष्ठो वज्री वा त्रिदशेश्वरः ॥

vasūnāṃ vā bhavāneko rudrāṇāmathavā bhavān | athavā marutāṃ śreṣṭho vajrī vā tridaśeśvaraḥ

क्या आप वसुओं में से एक हैं, या रुद्रों में से कोई? अथवा मरुतों में श्रेष्ठ हैं, या वज्रधारी देवराज इन्द्र?

श्लोक 4 (3.315.4)

मम हि भ्रातर इमे सहस्रशतयोधिनः । तं योधं न प्रपश्यामि येन सर्वे निपातिताः ॥

mama hi bhrātara ime sahasraśatayodhinaḥ | taṃ yodhaṃ na prapaśyāmi yena sarve nipātitāḥ

मेरे ये भाई तो लाखों योद्धाओं से लड़ने वाले हैं; मुझे ऐसा कोई योद्धा नहीं दिखता जिसने इन सबको मार गिराया हो।

श्लोक 5 (3.315.5)

सुखं प्रति प्रबुद्धानामिन्द्रियाण्युपलक्षये । स भवान्सुहृदोऽस्माकमथवा नः पिता भवान् ॥

sukhaṃ prati prabuddhānāmindriyāṇyupalakṣaye | sa bhavānsuhṛdo'smākamathavā naḥ pitā bhavān

मैं देखता हूँ कि इनकी इन्द्रियाँ ऐसी हैं मानो ये सुख की नींद से जागे हों। क्या आप हमारे कोई सुहृद् हैं, अथवा हमारे पिता?"

यक्ष उवाच

श्लोक 6 (3.315.6)

अहं ते जनकस्तात धर्मो मृदुपराक्रम । त्वां दिदृक्षुरनुप्राप्तो विद्धि मां भरतर्षभ ॥

ahaṃ te janakastāta dharmo mṛduparākrama | tvāṃ didṛkṣuranuprāpto viddhi māṃ bharatarṣabha

"वत्स, मैं तुम्हारा पिता धर्म हूँ, हे कोमल पराक्रम वाले। हे भरतश्रेष्ठ, जान लो कि मैं तुम्हें देखने की इच्छा से यहाँ आया हूँ।

श्लोक 7 (3.315.7)

यशः सत्यं दमः शौचमार्जवं ह्रीरचापलम् । दानं तपो ब्रह्मचर्यमित्येतास्तनवो मम ॥

yaśaḥ satyaṃ damaḥ śaucamārjavaṃ hrīracāpalam | dānaṃ tapo brahmacaryamityetāstanavo mama

यश, सत्य, इन्द्रियसंयम, शौच, सरलता, लज्जा, अचंचलता, दान, तप और ब्रह्मचर्य — ये मेरे शरीर हैं।

श्लोक 8 (3.315.8)

अहिंसा समता शान्तिस्तपः शौचममत्सरः । द्वाराण्येतानि मे विद्धि प्रियो ह्यसि सुतो मम ॥

ahiṃsā samatā śāntistapaḥ śaucamamatsaraḥ | dvārāṇyetāni me viddhi priyo hyasi suto mama

अहिंसा, समता, शान्ति, तप, शौच और मत्सरहीनता — इन्हें मेरे द्वार जानो। तुम मेरे प्रिय पुत्र हो।

श्लोक 9 (3.315.9)

दिष्ट्या पञ्चसु रक्तोऽसि दिष्ट्या ते षट्पदी जिता । द्वे पूर्वे मध्यमे द्वे च द्वे चान्ते सांपरायिके ॥

diṣṭyā pañcasu rakto'si diṣṭyā te ṣaṭpadī jitā | dve pūrve madhyame dve ca dve cānte sāṃparāyike

सौभाग्य से तुम पाँचों में अनुरक्त हो, और सौभाग्य से तुमने छहों को जीत लिया है — दो जो आरम्भ में आते हैं, दो मध्य में, और दो अन्त में, जो परलोक की ओर ले जाते हैं।

श्लोक 10 (3.315.10)

धर्मोऽहमिति भद्रं ते जिज्ञासुस्त्वामिहागतः । आनृशंस्येन तुष्टोऽस्मि वरं दास्यामि तेऽनघ ॥

dharmo'hamiti bhadraṃ te jijñāsustvāmihāgataḥ | ānṛśaṃsyena tuṣṭo'smi varaṃ dāsyāmi te'nagha

मैं धर्म हूँ; तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हारी परीक्षा लेने यहाँ आया था। तुम्हारी अक्रूरता से मैं प्रसन्न हूँ; हे निष्पाप, मैं तुम्हें वर दूँगा।

श्लोक 11 (3.315.11)

वरं वृणीष्व राजेन्द्र दाता ह्यस्मि तवानघ । ये हि मे पुरुषा भक्ता न तेषामस्ति दुर्गतिः ॥

varaṃ vṛṇīṣva rājendra dātā hyasmi tavānagha | ye hi me puruṣā bhaktā na teṣāmasti durgatiḥ

हे राजेन्द्र, वर माँगो; हे निष्पाप, मैं तुम्हें देने को तैयार हूँ। जो मनुष्य मेरे भक्त हैं, उनकी कभी दुर्गति नहीं होती।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 12 (3.315.12)

अरणी तु हृता यस्य मृगेण वदतां वर । तस्याग्नयो न लुप्येरन्प्रथमोऽस्तु वरो मम ॥

araṇī tu hṛtā yasya mṛgeṇa vadatāṃ vara | tasyāgnayo na lupyeranprathamo'stu varo mama

"हे वक्ताओं में श्रेष्ठ, मेरा पहला वर यह हो कि जिसकी अरणी मृग हर ले गया है, उसकी अग्नियाँ लुप्त न हों।"

धर्म उवाच

श्लोक 13 (3.315.13)

आरणेयमिदं तस्य ब्राह्मणस्य हृतं मया । मृगवेषेण कौन्तेय जिज्ञासार्थं तवानघ ॥

āraṇeyamidaṃ tasya brāhmaṇasya hṛtaṃ mayā | mṛgaveṣeṇa kaunteya jijñāsārthaṃ tavānagha

"हे कुन्तीपुत्र, हे निष्पाप, उस ब्राह्मण की यह अरणी मृग का वेश धरकर तुम्हारी परीक्षा के लिए मैंने ही हरी थी।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (3.315.14)

ददानीत्येव भगवानुत्तरं प्रत्यपद्यत । अन्यं वरय भद्रं ते वरं त्वममरोपम ॥

dadānītyeva bhagavānuttaraṃ pratyapadyata | anyaṃ varaya bhadraṃ te varaṃ tvamamaropama

भगवान् धर्म ने उत्तर दिया, "मैं यह वर देता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो; हे देवतुल्य, कोई दूसरा वर माँगो।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 15 (3.315.15)

वर्षाणि द्वादशारण्ये त्रयोदशमुपस्थितम् । तत्र नो नाभिजानीयुर्वसतो मनुजाः क्वचित् ॥

varṣāṇi dvādaśāraṇye trayodaśamupasthitam | tatra no nābhijānīyurvasato manujāḥ kvacit

"वन में बारह वर्ष बीत चुके हैं और अब तेरहवाँ वर्ष आ पहुँचा है। उसमें हम कहीं भी रहें, कोई भी मनुष्य हमें पहचान न पाए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (3.315.16)

ददानीत्येव भगवानुत्तरं प्रत्यपद्यत । भूयश्चाश्वासयामास कौन्तेयं सत्यविक्रमम् ॥

dadānītyeva bhagavānuttaraṃ pratyapadyata | bhūyaścāśvāsayāmāsa kaunteyaṃ satyavikramam

भगवान् ने उत्तर दिया, "मैं यह वर देता हूँ," और फिर सत्यपराक्रमी कुन्तीपुत्र को आश्वासन दिया —

धर्म उवाच

श्लोक 17 (3.315.17)

यद्यपि स्वेन रूपेण चरिष्यथ महीमिमाम् । न वो विज्ञास्यते कश्चित्त्रिषु लोकेषु भारत ॥

yadyapi svena rūpeṇa cariṣyatha mahīmimām | na vo vijñāsyate kaścittriṣu lokeṣu bhārata

"हे भारत, यदि तुम अपने निज रूप में भी इस पृथ्वी पर विचरोगे, तब भी तीनों लोकों में कोई तुम्हें नहीं पहचान पाएगा।

श्लोक 18 (3.315.18)

वर्षं त्रयोदशमिदं मत्प्रसादात्कुरूद्वहाः । विराटनगरे गूढा अविज्ञाताश्चरिष्यथ ॥

varṣaṃ trayodaśamidaṃ matprasādātkurūdvahāḥ | virāṭanagare gūḍhā avijñātāścariṣyatha

हे कुरुश्रेष्ठो, मेरी कृपा से तुम यह तेरहवाँ वर्ष विराटनगर में छिपकर और अनजाने रहकर बिताओगे।

श्लोक 19 (3.315.19)

यद्वः संकल्पितं रूपं मनसा यस्य यादृशम् । तादृशं तादृशं सर्वे छन्दतो धारयिष्यथ ॥

yadvaḥ saṃkalpitaṃ rūpaṃ manasā yasya yādṛśam | tādṛśaṃ tādṛśaṃ sarve chandato dhārayiṣyatha

तुममें से जिसने मन में जैसा रूप सोचा होगा, तुम सब अपनी इच्छा से वैसा-वैसा ही रूप धारण कर लोगे।

श्लोक 20 (3.315.20)

अरणीसहितं भाण्डं ब्राह्मणाय प्रयच्छत । जिज्ञासार्थं मया ह्येतदाहृतं मृगरूपिणा ॥

araṇīsahitaṃ bhāṇḍaṃ brāhmaṇāya prayacchata | jijñāsārthaṃ mayā hyetadāhṛtaṃ mṛgarūpiṇā

अरणी सहित यह पात्र ब्राह्मण को लौटा दो; मृग का रूप धरकर मैंने इसे केवल तुम्हारी परीक्षा के लिए हरा था।

श्लोक 21 (3.315.21)

प्रवृणीष्वापरं सौम्य वरमिष्टं ददानि ते । न तृप्यामि नरश्रेष्ठ प्रयच्छन्वै वरांस्तथा ॥

pravṛṇīṣvāparaṃ saumya varamiṣṭaṃ dadāni te | na tṛpyāmi naraśreṣṭha prayacchanvai varāṃstathā

हे सौम्य, एक और मनचाहा वर माँग लो, मैं तुम्हें दूँगा। हे नरश्रेष्ठ, इस प्रकार वर देते हुए मेरा मन नहीं भरता।

श्लोक 22 (3.315.22)

तृतीयं गृह्यतां पुत्र वरमप्रतिमं महत् । त्वं हि मत्प्रभवो राजन्विदुरश्च ममांशजः ॥

tṛtīyaṃ gṛhyatāṃ putra varamapratimaṃ mahat | tvaṃ hi matprabhavo rājanviduraśca mamāṃśajaḥ

पुत्र, एक तीसरा वर भी लो, जो महान् और अनुपम हो। हे राजन्, तुम मुझसे उत्पन्न हुए हो, और विदुर मेरे अंश से जन्मे हैं।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 23 (3.315.23)

देवदेवो मया दृष्टो भवान्साक्षात्सनातनः । यं ददासि वरं तुष्टस्तं ग्रहीष्याम्यहं पितः ॥

devadevo mayā dṛṣṭo bhavānsākṣātsanātanaḥ | yaṃ dadāsi varaṃ tuṣṭastaṃ grahīṣyāmyahaṃ pitaḥ

"मैंने आप सनातन देवाधिदेव का साक्षात् दर्शन किया है। हे पिता, प्रसन्न होकर आप जो भी वर देंगे, उसे मैं ग्रहण करूँगा।

श्लोक 24 (3.315.24)

जयेयं लोभमोहौ च क्रोधं चाहं सदा विभो । दाने तपसि सत्ये च मनो मे सततं भवेत् ॥

jayeyaṃ lobhamohau ca krodhaṃ cāhaṃ sadā vibho | dāne tapasi satye ca mano me satataṃ bhavet

हे प्रभो, मैं सदा लोभ, मोह और क्रोध को जीतूँ, और मेरा मन निरन्तर दान, तप और सत्य में लगा रहे।"

धर्म उवाच

श्लोक 25 (3.315.25)

उपपन्नो गुणैरेतैः स्वभावेनासि पाण्डव । भवान्धर्मः पुनश्चैव यथोक्तं ते भविष्यति ॥

upapanno guṇairetaiḥ svabhāvenāsi pāṇḍava | bhavāndharmaḥ punaścaiva yathoktaṃ te bhaviṣyati

"हे पाण्डुपुत्र, ये गुण तो तुममें स्वभाव से ही हैं। तुम स्वयं धर्म हो; फिर भी जैसा तुमने कहा है, वैसा ही होगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 26 (3.315.26)

इत्युक्त्वान्तर्दधे धर्मो भगवाँल्लोकभावनः । समेताः पाण्डवाश्चैव सुखसुप्ता मनस्विनः ॥

ityuktvāntardadhe dharmo bhagavām̐llokabhāvanaḥ | sametāḥ pāṇḍavāścaiva sukhasuptā manasvinaḥ

यह कहकर लोकों के पालक भगवान् धर्म अन्तर्धान हो गए, और सुख की नींद से जागे वे मनस्वी पाण्डव फिर एक साथ हो गए।

श्लोक 27 (3.315.27)

उपेत्य चाश्रमं वीराः सर्व एव गतक्लमाः । आरणेयं ददुस्तस्मै ब्राह्मणाय तपस्विने ॥

upetya cāśramaṃ vīrāḥ sarva eva gataklamāḥ | āraṇeyaṃ dadustasmai brāhmaṇāya tapasvine

सारी थकान दूर हो जाने पर वे वीर आश्रम में लौटे और उस तपस्वी ब्राह्मण को उसकी अरणी दे दी।

श्लोक 28 (3.315.28)

इदं समुत्थानसमागतं महत् । पितुश्च पुत्रस्य च कीर्तिवर्धनम् । पठन्नरः स्याद्विजितेन्द्रियो वशी । सपुत्रपौत्रः शतवर्षभाग्भवेत् ॥

idaṃ samutthānasamāgataṃ mahat | pituśca putrasya ca kīrtivardhanam | paṭhannaraḥ syādvijitendriyo vaśī | saputrapautraḥ śatavarṣabhāgbhavet

भाइयों के फिर से उठ खड़े होने और पिता-पुत्र के मिलन का यह महान् प्रसंग पिता और पुत्र दोनों की कीर्ति बढ़ाने वाला है। इसका पाठ करने वाला मनुष्य जितेन्द्रिय और संयमी होता है तथा पुत्रों और पौत्रों सहित सौ वर्ष की आयु पाता है।

श्लोक 29 (3.315.29)

न चाप्यधर्मे न सुहृद्विभेदने । परस्वहारे परदारमर्शने । कदर्यभावे न रमेन्मनः सदा । नृणां सदाख्यानमिदं विजानताम् ॥

na cāpyadharme na suhṛdvibhedane | parasvahāre paradāramarśane | kadaryabhāve na ramenmanaḥ sadā | nṛṇāṃ sadākhyānamidaṃ vijānatām

जो लोग इस उत्तम आख्यान को जानते हैं, उनका मन कभी अधर्म में, मित्रों में फूट डालने में, पराया धन हरने में, परस्त्री-गमन में या कृपणता में नहीं रमता।

अध्याय 314अध्याय-सूची