आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 6
धृतराष्ट्र द्वारा विदुर को वापस बुलाना
विदुर के पाण्डवों के आश्रम की ओर चले जाने पर धृतराष्ट्र पश्चात्ताप से व्याकुल होकर सभा के द्वार पर अचेत गिर पड़ते हैं। वे अपने भाई को लौटा लाने के लिए संजय को काम्यक वन भेजते हैं। संजय युधिष्ठिर के साथ बैठे विदुर को राजा का संदेश देते हैं; विदुर हस्तिनापुर लौट आते हैं, राजा उन्हें गले लगाकर क्षमा माँगते हैं और दोनों भाइयों में फिर से मेल हो जाता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.6.1)
गते तु विदुरे राजन्नाश्रमं पाण्डवान्प्रति । धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः पर्यतप्यत दुर्मनाः ॥
gate tu vidure rājannāśramaṃ pāṇḍavānprati | dhṛtarāṣṭro mahāprājñaḥ paryatapyata durmanāḥ
हे राजन्, जब विदुर पाण्डवों के आश्रम की ओर चले गए, तब महाबुद्धिमान धृतराष्ट्र का मन खिन्न हो गया और वे संताप करने लगे।
श्लोक 2 (3.6.2)
विदुरस्य प्रभावं च सन्धिविग्रहकारितम् । विवृद्धिं च परां मत्वा पाण्डवानां भविष्यति ॥
vidurasya prabhāvaṃ ca sandhivigrahakāritam | vivṛddhiṃ ca parāṃ matvā pāṇḍavānāṃ bhaviṣyati
वे विदुर के प्रभाव का, सन्धि और विग्रह की नीति में उनकी निपुणता का, तथा आगे चलकर पाण्डवों की होने वाली महान् उन्नति का विचार करने लगे।
श्लोक 3 (3.6.3)
स सभाद्वारमागम्य विदुरस्मारमोहितः । समक्षं पार्थिवेन्द्राणां विसंज्ञः प्रापतद्भुवि ॥
sa sabhādvāramāgamya vidurasmāramohitaḥ | samakṣaṃ pārthivendrāṇāṃ visaṃjñaḥ prāpatadbhuvi
विदुर की याद से व्याकुल होकर वे सभा के द्वार पर आए और राजाओं के सामने ही संज्ञाहीन होकर भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 4 (3.6.4)
स तु लब्ध्वा चिरात्संज्ञां समुत्थाय महीतलात् । समीपोपस्थितं राजा संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥
sa tu labdhvā cirātsaṃjñāṃ samutthāya mahītalāt | samīpopasthitaṃ rājā saṃjayaṃ vākyamabravīt
बहुत देर बाद होश आने पर राजा भूमि से उठे और पास खड़े संजय से बोले।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 5 (3.6.5)
भ्राता मम सुहृच्चैव साक्षाद्धर्म इवापरः । तस्य स्मृत्याऽद्य सुभृशं हृदयं दीर्यतीव मे ॥
bhrātā mama suhṛccaiva sākṣāddharma ivāparaḥ | tasya smṛtyā'dya subhṛśaṃ hṛdayaṃ dīryatīva me
"मेरा भाई मेरा सुहृद् भी है, मानो साक्षात् दूसरा धर्म हो। आज उसकी याद से मेरा हृदय जैसे फटा जा रहा है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (3.6.6)
तमानय स्वधर्मज्ञं मम भ्रातरमाशु वै । इति ब्रुवन्स नृपतिः कृपणं पर्यदेवयत् ॥
tamānaya svadharmajñaṃ mama bhrātaramāśu vai | iti bruvansa nṛpatiḥ kṛpaṇaṃ paryadevayat
"अपने धर्म को जानने वाले मेरे भाई को शीघ्र यहाँ ले आओ।" ऐसा कहते हुए राजा दीन भाव से विलाप करने लगे।
श्लोक 7 (3.6.7)
पश्चात्तापाभिसंतप्तो विदुरस्मारमोहितः । भ्रातृस्नेहादिदं राजा संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥
paścāttāpābhisaṃtapto vidurasmāramohitaḥ | bhrātṛsnehādidaṃ rājā saṃjayaṃ vākyamabravīt
पश्चात्ताप से संतप्त और विदुर की स्मृति से मोहित राजा ने भ्रातृस्नेह के कारण संजय से यह कहा —
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 8 (3.6.8)
गच्छ संजय जानीहि भ्रातरं विदुरं मम । यदि जीवति रोषेण मया पापेन निर्धुतः ॥
gaccha saṃjaya jānīhi bhrātaraṃ viduraṃ mama | yadi jīvati roṣeṇa mayā pāpena nirdhutaḥ
"जाओ संजय, मेरे भाई विदुर का पता लगाओ — जिसे मुझ पापी ने क्रोध में निकाल दिया था, वह जीवित भी है या नहीं।"
श्लोक 9 (3.6.9)
न हि तेन मम भ्रात्रा सुसूक्ष्ममपि किंचन । व्यलीकं कृतपूर्वं वै प्राज्ञेनामितबुद्धिना ॥
na hi tena mama bhrātrā susūkṣmamapi kiṃcana | vyalīkaṃ kṛtapūrvaṃ vai prājñenāmitabuddhinā
"मेरे उस बुद्धिमान और अपार मेधा वाले भाई ने पहले कभी मेरा तनिक भी अप्रिय नहीं किया।"
श्लोक 10 (3.6.10)
स व्यलीकं कथं प्राप्तो मत्तः परमबुद्धिमान् । न जह्याज्जीवितं प्राज्ञ तं गच्छानय संजय ॥
sa vyalīkaṃ kathaṃ prāpto mattaḥ paramabuddhimān | na jahyājjīvitaṃ prājña taṃ gacchānaya saṃjaya
"वह परम बुद्धिमान मेरे हाथों अपमानित कैसे हुआ? हे बुद्धिमान, कहीं वह प्राण न त्याग दे — संजय, जाओ, उसे ले आओ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 11 (3.6.11)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राज्ञस्तमनुमान्य च । संजयो बाढमित्युक्त्वा प्राद्रवत्काम्यकं प्रति ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā rājñastamanumānya ca | saṃjayo bāḍhamityuktvā prādravatkāmyakaṃ prati
राजा के वचन सुनकर और उनकी बात मानकर संजय ने 'बहुत अच्छा' कहा और शीघ्रता से काम्यक वन की ओर चल पड़े।
श्लोक 12 (3.6.12)
सोऽचिरेण समासाद्य तद्वनं यत्र पाण्डवाः । रौरवाजिनसंवीतं ददर्शाथ युधिष्ठिरम् ॥
so'cireṇa samāsādya tadvanaṃ yatra pāṇḍavāḥ | rauravājinasaṃvītaṃ dadarśātha yudhiṣṭhiram
शीघ्र ही वे उस वन में पहुँचे जहाँ पाण्डव रहते थे, और वहाँ उन्होंने रुरु मृग का चर्म ओढ़े युधिष्ठिर को देखा,
श्लोक 13 (3.6.13)
विदुरेण सहासीनं ब्राह्मणैश्च सहस्रशः । भ्रातृभिश्चाभिसंगुप्तं देवैरिव पुरंदरम् ॥
vidureṇa sahāsīnaṃ brāhmaṇaiśca sahasraśaḥ | bhrātṛbhiścābhisaṃguptaṃ devairiva puraṃdaram
जो विदुर और सहस्रों ब्राह्मणों के साथ बैठे थे और अपने भाइयों से वैसे ही घिरे थे जैसे देवताओं से पुरन्दर इन्द्र।
श्लोक 14 (3.6.14)
युधिष्ठिरमुपागम्य पूजयामास संजयः । भीमार्जुनयमाश्चापि तद्युक्तं प्रतिपेदिरे ॥
yudhiṣṭhiramupāgamya pūjayāmāsa saṃjayaḥ | bhīmārjunayamāścāpi tadyuktaṃ pratipedire
संजय ने युधिष्ठिर के पास जाकर उनका सम्मान किया, और भीम, अर्जुन तथा नकुल-सहदेव ने भी उनका यथोचित स्वागत किया।
श्लोक 15 (3.6.15)
राज्ञा पृष्टः स कुशलं सुखासीनश्च संजयः । शशंसागमने हेतुमिदं चैवाब्रवीद्वचः ॥
rājñā pṛṣṭaḥ sa kuśalaṃ sukhāsīnaśca saṃjayaḥ | śaśaṃsāgamane hetumidaṃ caivābravīdvacaḥ
राजा युधिष्ठिर ने कुशल पूछी और जब संजय सुख से बैठ गए, तब उन्होंने अपने आने का कारण बताया और यह कहा —
सञ्जय उवाच
श्लोक 16 (3.6.16)
राजा स्मरति ते क्षत्तर्धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । तं पश्य गत्वा त्वं क्षिप्रं संजीवय च पार्थिवम् ॥
rājā smarati te kṣattardhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | taṃ paśya gatvā tvaṃ kṣipraṃ saṃjīvaya ca pārthivam
"हे क्षत्ता, अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र आपको याद कर रहे हैं। आप शीघ्र जाकर उनसे मिलिए और राजा को नया जीवन दीजिए।"
श्लोक 17 (3.6.17)
सोऽनुमान्य नरश्रेष्ठान्पाण्डवान्कुरुनन्दनान् । नियोगाद्राजसिंहस्य गन्तुमर्हसि सत्तम ॥
so'numānya naraśreṣṭhānpāṇḍavānkurunandanān | niyogādrājasiṃhasya gantumarhasi sattama
"हे सज्जनश्रेष्ठ, कुरुकुल को आनन्द देने वाले इन नरश्रेष्ठ पाण्डवों से अनुमति लेकर उस राजसिंह की आज्ञा से आपको चलना चाहिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (3.6.18)
एवमुक्तस्तु विदुरो धीमान्स्वजनवत्सलः । युधिष्ठिरस्यानुमते पुनरायाद्गजाह्वयम् ॥
evamuktastu viduro dhīmānsvajanavatsalaḥ | yudhiṣṭhirasyānumate punarāyādgajāhvayam
ऐसा कहे जाने पर अपने स्वजनों से स्नेह रखने वाले बुद्धिमान विदुर युधिष्ठिर की अनुमति लेकर फिर हस्तिनापुर लौट आए।
श्लोक 19 (3.6.19)
तमब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । दिष्ट्या प्राप्तोऽसि धर्मज्ञ दिष्ट्या स्मरसि मेऽनघ ॥
tamabravīnmahātejā dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | diṣṭyā prāpto'si dharmajña diṣṭyā smarasi me'nagha
महातेजस्वी अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्र ने उनसे कहा — "हे धर्मज्ञ, सौभाग्य है कि तुम आ गए! हे निष्पाप, सौभाग्य है कि तुम्हें मेरी याद है!"
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 20 (3.6.20)
अद्य चाहं दिवारात्रौ त्वत्कृते भरतर्षभ । प्रजागरे प्रपश्यामि विचित्रं देहमात्मनः ॥
adya cāhaṃ divārātrau tvatkṛte bharatarṣabha | prajāgare prapaśyāmi vicitraṃ dehamātmanaḥ
"हे भरतश्रेष्ठ, तुम्हारे कारण मैं दिन-रात जागता रहा हूँ और अपने शरीर को विचित्र-सा पाता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (3.6.21)
सोऽङ्कमानीय विदुरं मूर्धन्याघ्राय चैव ह । क्षम्यतामिति चोवाच यदुक्तोऽसि मयाऽनघ ॥
so'ṅkamānīya viduraṃ mūrdhanyāghrāya caiva ha | kṣamyatāmiti covāca yadukto'si mayā'nagha
उन्होंने विदुर को गोद में लेकर उनका मस्तक सूँघा और कहा — "हे निष्पाप, मैंने तुमसे जो कहा था, उसे क्षमा करो।"
विदुर उवाच
श्लोक 22 (3.6.22)
क्षान्तमेव मया राजन्गुरुर्मे परमो भवान् । तथाऽहमागतः शीघ्रं त्वद्दर्शनपरायणः ॥
kṣāntameva mayā rājangururme paramo bhavān | tathā'hamāgataḥ śīghraṃ tvaddarśanaparāyaṇaḥ
"हे राजन्, मैंने तो क्षमा कर ही दिया है; आप मेरे परम गुरु हैं। इसीलिए आपके दर्शन की उत्कण्ठा लेकर मैं शीघ्र चला आया।"
श्लोक 23 (3.6.23)
भवन्ति हि नरव्याघ्र पुरुषा धर्मचेतनाः । दीनानुकम्पिनो राजन्नात्र कार्या विचारणा ॥
bhavanti hi naravyāghra puruṣā dharmacetanāḥ | dīnānukampino rājannātra kāryā vicāraṇā
"हे नरव्याघ्र, जिनका मन धर्म में लगा होता है, ऐसे पुरुष दीनों पर दया करते ही हैं; हे राजन्, इसमें सोच-विचार की कोई बात नहीं।"
श्लोक 24 (3.6.24)
पाण्डोः पुत्रा यादृशास्ते तादृशा मे सुतास्तव । दीना इतीव मे बुद्धिरभिपन्नाऽद्य तान्प्रति ॥
pāṇḍoḥ putrā yādṛśāste tādṛśā me sutāstava | dīnā itīva me buddhirabhipannā'dya tānprati
"जैसे पाण्डु के पुत्र हैं, वैसे ही मेरे लिए आपके पुत्र हैं; पर वे दीन दशा में हैं, इसलिए आज मेरा मन उनकी ओर झुक गया।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (3.6.25)
अन्योन्यमनुनीयैवं भ्रातरौ द्वौ महाद्युती । विदुरो धृतराष्ट्रश्च लेभाते परमां मुदम् ॥
anyonyamanunīyaivaṃ bhrātarau dvau mahādyutī | viduro dhṛtarāṣṭraśca lebhāte paramāṃ mudam
इस प्रकार एक-दूसरे को मनाकर दोनों तेजस्वी भाई, विदुर और धृतराष्ट्र, अत्यन्त प्रसन्न हुए।