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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 7

कर्ण का पाण्डवों पर आक्रमण का प्रस्ताव

यह सुनकर कि विदुर लौट आए हैं और राजा से उनका मेल हो गया है, दुर्योधन शकुनि, कर्ण और दुःशासन को बुलाकर मन्त्रणा करता है कि पाण्डवों को वापस बुलाए जाने से कैसे रोका जाए, और कहता है कि यदि वे लौटे तो वह प्राण दे देगा। शकुनि उसे भरोसा दिलाता है कि पाण्डव अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ेंगे, पर कर्ण प्रस्ताव रखता है कि शस्त्र लेकर वन में ही पाण्डवों को मार डाला जाए। जब वे रथों पर निकल पड़ते हैं, तब दिव्य दृष्टि से यह देखकर व्यास उन्हें रोक देते हैं और धृतराष्ट्र से बात करने जाते हैं।

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.7.1)

श्रुत्वा च विदुरं प्राप्तं राज्ञा च परिसान्त्वितम् । धृतराष्ट्रात्मजो राजा पर्यतप्यत दुर्मतिः ॥

śrutvā ca viduraṃ prāptaṃ rājñā ca parisāntvitam | dhṛtarāṣṭrātmajo rājā paryatapyata durmatiḥ

जब धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र राजा दुर्योधन ने सुना कि विदुर लौट आए हैं और राजा ने उन्हें मना लिया है, तब वह संतप्त हो उठा।

श्लोक 2 (3.7.2)

स सौबलेयमानाय्य कर्णदुःशासनौ तथा । अब्रवीद्वचनं राजा प्रविश्याबुद्धिजं तमः ॥

sa saubaleyamānāyya karṇaduḥśāsanau tathā | abravīdvacanaṃ rājā praviśyābuddhijaṃ tamaḥ

अज्ञान से उपजे अन्धकार में डूबे उस राजा ने सुबलपुत्र शकुनि को तथा कर्ण और दुःशासन को बुलवाया और कहा —

दुर्योधन उवाच

श्लोक 3 (3.7.3)

एष प्रत्यागतो मन्त्री धृतराष्ट्रस्य संमतः । विदुरः पाण्डुपुत्राणां सुहृद्विद्वान्हिते रतः ॥

eṣa pratyāgato mantrī dhṛtarāṣṭrasya saṃmataḥ | viduraḥ pāṇḍuputrāṇāṃ suhṛdvidvānhite rataḥ

"धृतराष्ट्र के विश्वासपात्र मन्त्री विदुर लौट आए हैं — वे विद्वान् हैं, पाण्डुपुत्रों के सुहृद् हैं और उन्हीं के हित में लगे रहते हैं।"

श्लोक 4 (3.7.4)

यावदस्य पुनर्बुद्धिं विदुरो नापकर्षति । पाण्डवानयने तावन्मन्त्रयध्वं हितं मम ॥

yāvadasya punarbuddhiṃ viduro nāpakarṣati | pāṇḍavānayane tāvanmantrayadhvaṃ hitaṃ mama

"इससे पहले कि विदुर फिर से राजा की बुद्धि को पाण्डवों को वापस बुलाने की ओर मोड़ दें, तुम लोग मेरे हित की मन्त्रणा करो।"

श्लोक 5 (3.7.5)

अथ पश्याम्यहं पार्थान्प्राप्तानिह कथंचन । पुनः शोषं गमिष्यामि निरसुर्निष्परिग्रहः ॥

atha paśyāmyahaṃ pārthānprāptāniha kathaṃcana | punaḥ śoṣaṃ gamiṣyāmi nirasurniṣparigrahaḥ

"यदि मैंने किसी प्रकार पृथापुत्रों को यहाँ लौटा हुआ देखा, तो मैं फिर से सूखकर प्राणहीन और सर्वस्वहीन हो जाऊँगा।"

श्लोक 6 (3.7.6)

विषमुद्बन्धनं चैव शस्त्रमग्निप्रवेशनम् । करिष्ये न हि तानृद्धान्पुनर्द्रष्टुमिहोत्सहे ॥

viṣamudbandhanaṃ caiva śastramagnipraveśanam | kariṣye na hi tānṛddhānpunardraṣṭumihotsahe

"मैं विष खा लूँगा, फाँसी लगा लूँगा, शस्त्र से प्राण दे दूँगा या आग में प्रवेश कर जाऊँगा; क्योंकि उन्हें फिर यहाँ समृद्ध देखना मुझसे सहा नहीं जाएगा।"

शकुनिरुवाच

श्लोक 7 (3.7.7)

किं बालिशमतिं राजन्नास्थितोऽसि विशांपते । गतास्ते समयं कृत्वा नैतदेवं भविष्यति ॥

kiṃ bāliśamatiṃ rājannāsthito'si viśāṃpate | gatāste samayaṃ kṛtvā naitadevaṃ bhaviṣyati

"हे प्रजानाथ राजन्, तुमने यह कैसी बचकानी सोच अपना ली है? वे प्रतिज्ञा करके गए हैं; ऐसा नहीं होगा।"

श्लोक 8 (3.7.8)

सत्यवाक्ये स्थिताः सर्वे पाण्डवा भरतर्षभ । पितुस्ते वचनं तात न ग्रहीष्यन्ति कर्हिचित् ॥

satyavākye sthitāḥ sarve pāṇḍavā bharatarṣabha | pituste vacanaṃ tāta na grahīṣyanti karhicit

"हे भरतश्रेष्ठ, सभी पाण्डव अपने सत्य वचन पर दृढ़ हैं। तात, वे तुम्हारे पिता की बात कभी नहीं मानेंगे।"

श्लोक 9 (3.7.9)

अथवा ते ग्रहीष्यन्ति पुनरेष्यन्ति वा पुरम् । निरस्य समयं सर्वे पणोऽस्माकं भविष्यति ॥

athavā te grahīṣyanti punareṣyanti vā puram | nirasya samayaṃ sarve paṇo'smākaṃ bhaviṣyati

"अथवा यदि वे मान भी लें और सब प्रतिज्ञा तोड़कर नगर लौट आएँ, तो फिर से हमारा दाँव चलेगा।"

श्लोक 10 (3.7.10)

सर्वे भवामो मध्यस्था राज्ञश्छन्दानुवर्तिनः । छिद्रं बहु प्रपश्यन्तः पाण्डवानां सुसंवृताः ॥

sarve bhavāmo madhyasthā rājñaśchandānuvartinaḥ | chidraṃ bahu prapaśyantaḥ pāṇḍavānāṃ susaṃvṛtāḥ

"हम सब राजा की इच्छा के अनुसार चलते हुए तटस्थ बने रहें, और भली-भाँति छिपे रहकर पाण्डवों की अनेक दुर्बलताओं पर दृष्टि रखें।"

दुःशासन उवाच

श्लोक 11 (3.7.11)

एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि मातुल । नित्यं हि मे कथयतस्तव बुद्धिर्विरोचते ॥

evametanmahāprājña yathā vadasi mātula | nityaṃ hi me kathayatastava buddhirvirocate

"हे महाबुद्धिमान मामा, जैसा आप कहते हैं वैसा ही है। आप जब भी बोलते हैं, आपकी बुद्धि मुझे सदा उज्ज्वल दिखती है।"

कर्ण उवाच

श्लोक 12 (3.7.12)

काममीक्षामहे सर्वे दुर्योधन तवेप्सितम् । ऐकमत्यं हि नो राजन्सर्वेषामेव लक्षये ॥

kāmamīkṣāmahe sarve duryodhana tavepsitam | aikamatyaṃ hi no rājansarveṣāmeva lakṣaye

"हे दुर्योधन, हम सब तुम्हारी इच्छा पूरी करना चाहते हैं; राजन्, मैं देखता हूँ कि हम सबका एक ही मत है।"

श्लोक 13 (3.7.13)

नागमिष्यन्ति ते धीरा अकृत्वा कालसंविदम् । आगमिष्यन्ति चेन्मोहात्पुनर्द्यूतेन ताञ्जय ॥

nāgamiṣyanti te dhīrā akṛtvā kālasaṃvidam | āgamiṣyanti cenmohātpunardyūtena tāñjaya

"वे धीर पुरुष तय की हुई अवधि पूरी किए बिना नहीं लौटेंगे; और यदि मोहवश लौट भी आए, तो उन्हें फिर से जुए में जीत लेना।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 14 (3.7.14)

एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा । नातिहृष्टमनाः क्षिप्रमभवत्स पराङ्मुखः ॥

evamuktastu karṇena rājā duryodhanastadā | nātihṛṣṭamanāḥ kṣipramabhavatsa parāṅmukhaḥ

कर्ण के ऐसा कहने पर राजा दुर्योधन प्रसन्न नहीं हुआ और उसने तुरन्त मुँह फेर लिया।

श्लोक 15 (3.7.15)

उपलभ्य ततः कर्णो विवृत्य नयने शुभे । रोषाद्दुःशासनं चैव सौबलं च तमेव च ॥

upalabhya tataḥ karṇo vivṛtya nayane śubhe | roṣādduḥśāsanaṃ caiva saubalaṃ ca tameva ca

यह भाँपकर कर्ण ने अपनी सुन्दर आँखें फैलाईं और क्रोध में दुःशासन, शकुनि तथा स्वयं दुर्योधन को सम्बोधित किया।

श्लोक 16 (3.7.16)

उवाच परमक्रुद्ध उद्यम्यात्मानमात्मना । अथो मम मतं यत्तु तन्निबोधत भूमिपाः ॥

uvāca paramakruddha udyamyātmānamātmanā | atho mama mataṃ yattu tannibodhata bhūmipāḥ

अत्यन्त क्रोध में भरकर, तनकर खड़े होते हुए उसने कहा — "हे भूपालो, अब मेरा मत सुनो।"

कर्ण उवाच

श्लोक 17 (3.7.17)

प्रियं सर्वे करिष्यामो राज्ञः किं करवामहे । न चास्य शक्नुमः स्थातुं प्रिये सर्वे ह्यतन्द्रिताः ॥

priyaṃ sarve kariṣyāmo rājñaḥ kiṃ karavāmahe | na cāsya śaknumaḥ sthātuṃ priye sarve hyatandritāḥ

"हम सब राजा का प्रिय करना चाहते हैं — और करें भी क्या? फिर भी, पूरी तत्परता के बावजूद, हममें से कोई उसका प्रिय कर पाने में समर्थ नहीं हो रहा।"

श्लोक 18 (3.7.18)

वयं तु शस्त्राण्यादाय रथानास्थाय दंशिताः । गच्छामः सहिता हन्तुं पाण्डवान्वनगोचरान् ॥

vayaṃ tu śastrāṇyādāya rathānāsthāya daṃśitāḥ | gacchāmaḥ sahitā hantuṃ pāṇḍavānvanagocarān

"आओ, हम शस्त्र उठाएँ, कवच पहनकर रथों पर चढ़ें और साथ मिलकर वन में विचरते पाण्डवों को मारने चलें।"

श्लोक 19 (3.7.19)

तेषु सर्वेषु शान्तेषु गतेष्वविदितां गतिम् । निर्विवादा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्रास्तथा वयम् ॥

teṣu sarveṣu śānteṣu gateṣvaviditāṃ gatim | nirvivādā bhaviṣyanti dhārtarāṣṭrāstathā vayam

"जब वे सब शान्त हो जाएँगे और उस अज्ञात गति को चले जाएँगे, तब धृतराष्ट्र के पुत्र और हम सब निर्विवाद हो जाएँगे।"

श्लोक 20 (3.7.20)

यावदेव परिद्यूना यावच्छोकपरायणाः । यावन्मित्रविहीनाश्च तावद्गच्छाम माचिरम् ॥

yāvadeva paridyūnā yāvacchokaparāyaṇāḥ | yāvanmitravihīnāśca tāvadgacchāma māciram

"जब तक वे थके-हारे हैं, जब तक शोक में डूबे हैं, जब तक मित्रहीन हैं — तभी, बिना देर किए, हमें चल पड़ना चाहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (3.7.21)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पूजयन्तः पुनः पुनः । प्रहृष्टमनसः सर्वे प्रत्यूचुः सूतजं तदा ॥

tasya tadvacanaṃ śrutvā pūjayantaḥ punaḥ punaḥ | prahṛṣṭamanasaḥ sarve pratyūcuḥ sūtajaṃ tadā

उसकी बात सुनकर वे सब बार-बार उसकी प्रशंसा करने लगे और प्रसन्न मन से सूतपुत्र को उत्तर दिया।

श्लोक 22 (3.7.22)

एवमुक्त्वा सुसंरब्धा रथैः सर्वे पृथक्पृथक् । निर्ययुः पाण्डवान्हन्तुं सहिताः कृतनिश्चयाः ॥

evamuktvā susaṃrabdhā rathaiḥ sarve pṛthakpṛthak | niryayuḥ pāṇḍavānhantuṃ sahitāḥ kṛtaniścayāḥ

ऐसा कहकर वे सब अत्यन्त उत्तेजित होकर अलग-अलग रथों पर सवार हुए और पाण्डवों को मारने का दृढ़ निश्चय करके एक साथ निकल पड़े।

श्लोक 23 (3.7.23)

तान्प्रस्थितान्परिज्ञाय कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । आजगाम विशुद्धात्मा दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ॥

tānprasthitānparijñāya kṛṣṇadvaipāyanaḥ prabhuḥ | ājagāma viśuddhātmā dṛṣṭvā divyena cakṣuṣā

उन्हें निकला जानकर विशुद्धात्मा भगवान् कृष्णद्वैपायन ने अपनी दिव्य दृष्टि से सब देख लिया और वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 24 (3.7.24)

प्रतिषिध्याथ तान्सर्वान्भगवाँल्लोकपूजितः । प्रज्ञाचक्षुषमासीनमुवाचाभ्येत्य सत्वरम् ॥

pratiṣidhyātha tānsarvānbhagavām̐llokapūjitaḥ | prajñācakṣuṣamāsīnamuvācābhyetya satvaram

उन सबको रोककर लोकपूजित भगवान् व्यास शीघ्र ही वहाँ बैठे प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्र के पास गए और उनसे बोले।

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