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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 8

व्यास का धृतराष्ट्र को उपदेश

व्यास धृतराष्ट्र को चेतावनी देते हैं कि छल से ठगे गए पाण्डव तेरहवाँ वर्ष पूरा होने पर कौरवों पर अपना क्रोध उतारेंगे, और उनसे आग्रह करते हैं कि पाण्डवों को मारने की योजना बना रहे दुर्योधन को रोकें। वे राजा को विदुर, भीष्म, कृप और द्रोण की सलाह मानने को कहते हैं, और सुझाते हैं कि दुर्योधन अकेला वन में जाकर पाण्डवों के साथ रहे, ताकि उनमें स्नेह उत्पन्न हो सके।

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व्यास उवाच

श्लोक 1 (3.8.1)

धृतराष्ट्र महाप्राज्ञ निबोध वचनं मम । वक्ष्यामि त्वां कौरवाणां सर्वेषां हितमुत्तमम् ॥

dhṛtarāṣṭra mahāprājña nibodha vacanaṃ mama | vakṣyāmi tvāṃ kauravāṇāṃ sarveṣāṃ hitamuttamam

"हे महाबुद्धिमान धृतराष्ट्र, मेरी बात सुनो। मैं तुम्हें वह बताऊँगा जो सब कौरवों के लिए परम हितकर है।"

श्लोक 2 (3.8.2)

न मे प्रियं महाबाहो यद्गताः पाण्डवा वनम् । निकृत्या निकृताश्चैव दुर्योधनपुरोगमैः ॥

na me priyaṃ mahābāho yadgatāḥ pāṇḍavā vanam | nikṛtyā nikṛtāścaiva duryodhanapurogamaiḥ

"हे महाबाहु, मुझे यह अच्छा नहीं लगा कि दुर्योधन आदि ने छल से पाण्डवों को ठगा और वे वन को चले गए।"

श्लोक 3 (3.8.3)

ते स्मरन्तः परिक्लेशान्वर्षे पूर्णे त्रयोदशे । विमोक्ष्यन्ति विषं क्रुद्धाः कौरवेयेषु भारत ॥

te smarantaḥ parikleśānvarṣe pūrṇe trayodaśe | vimokṣyanti viṣaṃ kruddhāḥ kauraveyeṣu bhārata

"हे भारत, अपने क्लेशों को याद करते हुए वे तेरहवाँ वर्ष पूरा होने पर क्रोध में भरकर कौरवों पर अपना विष उगलेंगे।"

श्लोक 4 (3.8.4)

तदयं किंनु पापात्मा तव पुत्रः सुमन्दधीः । पाण्डवान्नित्यसंक्रुद्धो राज्यहेतोर्जिघांसति ॥

tadayaṃ kiṃnu pāpātmā tava putraḥ sumandadhīḥ | pāṇḍavānnityasaṃkruddho rājyahetorjighāṃsati

"फिर यह तुम्हारा पापी और मन्दबुद्धि पुत्र, जो पाण्डवों पर सदा क्रुद्ध रहता है, राज्य के लिए उन्हें क्यों मारना चाहता है?"

श्लोक 5 (3.8.5)

वार्यतां साध्वयं मूढः शमं गच्छतु ते सुतः । वनस्थांस्तानयं हन्तुमिच्छन्प्राणान्विमोक्ष्यति ॥

vāryatāṃ sādhvayaṃ mūḍhaḥ śamaṃ gacchatu te sutaḥ | vanasthāṃstānayaṃ hantumicchanprāṇānvimokṣyati

"इस मूर्ख को भली-भाँति रोको; तुम्हारा पुत्र शान्त हो जाए। वनवासी पाण्डवों को मारने की इच्छा करेगा तो यह स्वयं अपने प्राण गँवा बैठेगा।"

श्लोक 6 (3.8.6)

यथाऽऽह विदुरः प्राज्ञो यथा भीष्मो यथा वयम् । यथा कृपश्च द्रोणश्च तथा साधु विधीयताम् ॥

yathā''ha viduraḥ prājño yathā bhīṣmo yathā vayam | yathā kṛpaśca droṇaśca tathā sādhu vidhīyatām

"जैसा बुद्धिमान विदुर ने कहा है, जैसा भीष्म ने, जैसा मैं कहता हूँ, और जैसा कृप तथा द्रोण कहते हैं, वैसा ही उचित कार्य करो।"

श्लोक 7 (3.8.7)

विग्रहो हि महाप्राज्ञ स्वजनेन विगर्हितः । अधर्म्यमयशस्यं च मा राजन्प्रतिपद्यथाः ॥

vigraho hi mahāprājña svajanena vigarhitaḥ | adharmyamayaśasyaṃ ca mā rājanpratipadyathāḥ

"हे महाप्राज्ञ, अपने ही स्वजनों से कलह निन्दित है। राजन्, अधर्म और अपयश देने वाला मार्ग मत अपनाओ।"

श्लोक 8 (3.8.8)

समीक्षा यादृशी ह्यस्य पाण्डवान्प्रति भारत । उपेक्ष्यमाणा सा राजन्महान्तमनयं व्रजेत् ॥

samīkṣā yādṛśī hyasya pāṇḍavānprati bhārata | upekṣyamāṇā sā rājanmahāntamanayaṃ vrajet

"हे भारत, पाण्डवों के प्रति उसकी जो दृष्टि है, राजन्, यदि उसकी उपेक्षा की गई तो वह बड़े अनर्थ तक ले जाएगी।"

श्लोक 9 (3.8.9)

अथवाऽयं सुमन्दात्मा वनं गच्छतु ते सुतः । पाण्डवैः सहितो राजन्नेक एवासहायवान् ॥

athavā'yaṃ sumandātmā vanaṃ gacchatu te sutaḥ | pāṇḍavaiḥ sahito rājanneka evāsahāyavān

"अथवा, राजन्, तुम्हारा यह मन्दात्मा पुत्र अकेला और बिना किसी सहायक के वन में जाकर पाण्डवों के साथ रहे।"

श्लोक 10 (3.8.10)

ततः संसर्गजः स्नेहः पुत्रस्य तव पाण्डवैः । यदि स्यात्कृतकृत्यस्त्वं भवेथाः पुरुषर्षभ ॥

tataḥ saṃsargajaḥ snehaḥ putrasya tava pāṇḍavaiḥ | yadi syātkṛtakṛtyastvaṃ bhavethāḥ puruṣarṣabha

"तब यदि साथ रहने से तुम्हारे पुत्र और पाण्डवों में स्नेह उत्पन्न हो जाए, तो हे पुरुषश्रेष्ठ, तुम कृतार्थ हो जाओगे।"

श्लोक 11 (3.8.11)

अथवा जायमानस्य यच्छीलमनुजायते । श्रूयते तन्महाराज नामृतस्यापसर्पति ॥

athavā jāyamānasya yacchīlamanujāyate | śrūyate tanmahārāja nāmṛtasyāpasarpati

"अथवा, हे महाराज, ऐसा सुना जाता है कि जन्म के साथ जो स्वभाव आता है, वह मृत्यु तक नहीं छूटता।"

श्लोक 12 (3.8.12)

कथं वा मन्यते भीष्मो द्रोणोऽथ विदुरोऽपि वा । भवान्वाऽत्र परं कार्यं पुरा चार्थो निवर्तते ॥

kathaṃ vā manyate bhīṣmo droṇo'tha viduro'pi vā | bhavānvā'tra paraṃ kāryaṃ purā cārtho nivartate

"भीष्म, द्रोण, विदुर अथवा स्वयं तुम क्या सोचते हो? अवसर हाथ से निकल जाने से पहले यहाँ जो श्रेष्ठ हो, वही किया जाए।"

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