Skip to main content

आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 95

अगस्त्य और लोपामुद्रा का विवाह

लोपामुद्रा के युवा होने पर अगस्त्य विदर्भराज से उसका हाथ माँगते हैं। मुनि के शाप से डरे पर पुत्री को देना न चाहने वाले राजा की दुविधा स्वयं लोपामुद्रा दूर करती है और अपने को अगस्त्य को सौंपने के लिए कहती है। वह राजसी वस्त्र त्यागकर वल्कल और मृगचर्म धारण करती है और गंगाद्वार में अगस्त्य के साथ तप करती है। जब मुनि उसे सहवास के लिए बुलाते हैं, तो वह चाहती है कि वे आभूषणों से सजकर उसके पिता के महल जैसी शय्या पर उसके पास आएँ। तप का व्यय करके धन उत्पन्न करना न चाहकर अगस्त्य धन माँगने निकल पड़ते हैं।

अध्याय 94अध्याय-सूचीअध्याय 96

लोमश उवाच

श्लोक 1 (3.95.1)

यदात्वमन्यतागस्त्यो गार्हस्थ्ये तां क्षमामिति । तदाऽभिगम्य प्रोवाच वैदर्भं पृथिवीपतिम् ॥

yadātvamanyatāgastyo gārhasthye tāṃ kṣamāmiti | tadā'bhigamya provāca vaidarbhaṃ pṛthivīpatim

जब अगस्त्य ने समझा कि वह गृहस्थ-जीवन के योग्य हो गई है, तब वे विदर्भ के राजा के पास जाकर बोले —

अगस्त्य उवाच

श्लोक 2 (3.95.2)

राजन्निवेशे बुद्धिर्मे वर्तते पुत्रकारणात् । वरयेत्वां महीपाल लोपामुद्रां प्रयच्छ मे ॥

rājanniveśe buddhirme vartate putrakāraṇāt | varayetvāṃ mahīpāla lopāmudrāṃ prayaccha me

"राजन्, पुत्र के लिए मेरा मन विवाह करने का है। हे महीपाल, मैं आपसे याचना करता हूँ — लोपामुद्रा मुझे दे दीजिए।"

लोमश उवाच

श्लोक 3 (3.95.3)

एवमुक्तः स मुनिना महीपालो विचेतनः । प्रत्याख्यानाय चाशक्तः प्रदातुं चैव नैच्छत ॥

evamuktaḥ sa muninā mahīpālo vicetanaḥ | pratyākhyānāya cāśaktaḥ pradātuṃ caiva naicchata

मुनि के ऐसा कहने पर राजा सुध-बुध खो बैठे। वे मना करने में असमर्थ थे, और कन्या को देना भी नहीं चाहते थे।

श्लोक 4 (3.95.4)

ततः स भार्यामभ्येत्य प्रोवाच पृथिवीपतिः । महर्षिर्वीर्यवानेष क्रुद्धः शापाग्निना दहेत् ॥

tataḥ sa bhāryāmabhyetya provāca pṛthivīpatiḥ | maharṣirvīryavāneṣa kruddhaḥ śāpāgninā dahet

तब राजा अपनी रानी के पास जाकर बोले — "यह महर्षि बड़े शक्तिशाली हैं। क्रुद्ध हो गए तो शाप की आग से हमें भस्म कर देंगे।"

श्लोक 5 (3.95.5)

तं तथा दुःखितं दृष्ट्वा सभार्यं पृथिवीपतिम् । लोपामुद्राऽभिगम्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥

taṃ tathā duḥkhitaṃ dṛṣṭvā sabhāryaṃ pṛthivīpatim | lopāmudrā'bhigamyedaṃ kāle vacanamabravīt

राजा और रानी को इस प्रकार दुखी देखकर लोपामुद्रा उनके पास आई और अवसर के अनुकूल यह बात बोली —

लोपामुद्रोवाच

श्लोक 6 (3.95.6)

न मत्कृते महीपाल पीडामभ्येतुमर्हसि । प्रयच्छ मामगस्त्याय त्राह्यात्मानं मया पितः ॥

na matkṛte mahīpāla pīḍāmabhyetumarhasi | prayaccha māmagastyāya trāhyātmānaṃ mayā pitaḥ

"महाराज, मेरे कारण आप कष्ट न उठाइए। पिताजी, मुझे अगस्त्य को दे दीजिए और मेरे द्वारा अपनी रक्षा कीजिए।"

लोमश उवाच

श्लोक 7 (3.95.7)

दुहितुर्वचनाद्राजा सोऽगस्त्याय महात्मने । लोपामुद्रां ततः प्रादाद्विधिपूर्वं विशांपते ॥

duhiturvacanādrājā so'gastyāya mahātmane | lopāmudrāṃ tataḥ prādādvidhipūrvaṃ viśāṃpate

हे प्रजानाथ, पुत्री के कहने पर राजा ने लोपामुद्रा को विधिपूर्वक महात्मा अगस्त्य को सौंप दिया।

श्लोक 8 (3.95.8)

प्राप्य भार्यामगस्त्यस्तु लोपामुद्रामभाषत । महार्हाण्युत्सृजैतानि वासांस्याभरणानि च ॥

prāpya bhāryāmagastyastu lopāmudrāmabhāṣata | mahārhāṇyutsṛjaitāni vāsāṃsyābharaṇāni ca

पत्नी को पाकर अगस्त्य ने लोपामुद्रा से कहा — "ये बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण त्याग दो।"

श्लोक 9 (3.95.9)

ततः सा दर्शनीयानि महार्हाणि तनूनि च । समुत्ससर्ज रम्भोरूर्वसनान्यायतेक्षणा ॥

tataḥ sā darśanīyāni mahārhāṇi tanūni ca | samutsasarja rambhorūrvasanānyāyatekṣaṇā

तब कदली-स्तम्भ जैसी जाँघों वाली उस विशाल नेत्रों वाली ने अपने सुन्दर, बहुमूल्य और महीन वस्त्र उतार दिए।

श्लोक 10 (3.95.10)

ततश्चीराणि जग्राह वल्कलान्यजिनानि च । समानव्रतचर्या च बभूवायतलोचना ॥

tataścīrāṇi jagrāha valkalānyajināni ca | samānavratacaryā ca babhūvāyatalocanā

उसने चीर, वल्कल और मृगचर्म धारण कर लिए, और वह आयतलोचना व्रत और आचरण में पति के समान हो गई।

श्लोक 11 (3.95.11)

गङ्गाद्वारमथागम्य भगवानृषिसत्तमः । उग्रमातिष्ठत तपः सह पत्न्याऽनुकूलया ॥

gaṅgādvāramathāgamya bhagavānṛṣisattamaḥ | ugramātiṣṭhata tapaḥ saha patnyā'nukūlayā

फिर ऋषिश्रेष्ठ भगवान अगस्त्य गंगाद्वार पहुँचकर अपनी अनुकूल पत्नी के साथ कठोर तप करने लगे।

श्लोक 12 (3.95.12)

सा प्रीत्या बहुमानाच्च पतिं पर्यचरत्तदा । अगस्त्यश्च परां प्रीतिं भार्यायामगमत्प्रभुः ॥

sā prītyā bahumānācca patiṃ paryacarattadā | agastyaśca parāṃ prītiṃ bhāryāyāmagamatprabhuḥ

वह प्रेम और बड़े आदर के साथ पति की सेवा करती रही, और प्रभु अगस्त्य को भी अपनी पत्नी से गहरा प्रेम हो गया।

श्लोक 13 (3.95.13)

ततो बहुतिथे काले लोपामुद्रां विशांपते । तपसा द्योतितां स्नातां ददर्श भगवानृषिः ॥

tato bahutithe kāle lopāmudrāṃ viśāṃpate | tapasā dyotitāṃ snātāṃ dadarśa bhagavānṛṣiḥ

हे प्रजापालक, बहुत समय बीतने पर भगवान ऋषि ने तप से दीप्त लोपामुद्रा को ऋतुस्नान किए हुए देखा।

श्लोक 14 (3.95.14)

स तस्याः परिचारेण शौचेन च दमेन च । श्रिया रूपेण च प्रीतो मैथुनायाजुहाव ताम् ॥

sa tasyāḥ paricāreṇa śaucena ca damena ca | śriyā rūpeṇa ca prīto maithunāyājuhāva tām

उसकी सेवा, पवित्रता और संयम से तथा उसकी शोभा और रूप से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे सहवास के लिए बुलाया।

श्लोक 15 (3.95.15)

ततः सा प्राञ्जलिर्भूत्वा लज्जमानेव भामिनी । तदा सप्रणयं वाक्यं भगवन्तमथाब्रवीत् ॥

tataḥ sā prāñjalirbhūtvā lajjamāneva bhāminī | tadā sapraṇayaṃ vākyaṃ bhagavantamathābravīt

तब वह भामिनी हाथ जोड़कर, मानो लजाती हुई, प्रेमपूर्वक भगवान से बोली —

लोपामुद्रोवाच

श्लोक 16 (3.95.16)

असंशयं प्रजाहेतोर्भार्यां पतिरविन्दत । या तु त्वयि मम प्रीतिस्तामृषे कर्तुमर्हसि ॥

asaṃśayaṃ prajāhetorbhāryāṃ patiravindata | yā tu tvayi mama prītistāmṛṣe kartumarhasi

"इसमें संदेह नहीं कि पति संतान के लिए ही पत्नी ग्रहण करता है। परन्तु हे ऋषि, आपके प्रति मेरे मन में जो प्रेम है, उसका भी आपको मान रखना चाहिए।

श्लोक 17 (3.95.17)

यथा पितुर्गृहे विप्र प्रासादे शयनं मम । तथाविधे त्वं शयने मामुपैतुमिहार्हसि ॥

yathā piturgṛhe vipra prāsāde śayanaṃ mama | tathāvidhe tvaṃ śayane māmupaitumihārhasi

हे विप्र, जैसी शय्या मेरे पिता के घर महल में थी, वैसी ही शय्या पर आपको यहाँ मेरे पास आना चाहिए।

श्लोक 18 (3.95.18)

इच्छामि त्वां स्रग्विणं च भूषणैश्च विभूषितम् । उपसर्तुं यथाकामं दिव्याभरणभूषिता ॥

icchāmi tvāṃ sragviṇaṃ ca bhūṣaṇaiśca vibhūṣitam | upasartuṃ yathākāmaṃ divyābharaṇabhūṣitā

मैं चाहती हूँ कि आप माला पहनें और आभूषणों से सजे हों, और मैं भी दिव्य आभूषणों से विभूषित होकर इच्छानुसार आपके पास आऊँ।

श्लोक 19 (3.95.19)

अन्यथा नोपतिष्ठेयं चीरकाषायवासिनी । नैवापवित्रो विप्रर्षे भूषणोयं कथंचन ॥

anyathā nopatiṣṭheyaṃ cīrakāṣāyavāsinī | naivāpavitro viprarṣe bhūṣaṇoyaṃ kathaṃcana

अन्यथा मैं चीर और गेरुए वस्त्र पहने आपके पास नहीं आऊँगी। हे विप्रर्षि, तपस्वियों का यह वेश किसी भी प्रकार अपवित्र नहीं होना चाहिए।"

अगस्त्य उवाच

श्लोक 20 (3.95.20)

न ते धनानि विद्यन्ते लोपामुद्रे तथा मम । यथाविधानि कल्याणि पितुस्तव सुमध्यमे ॥

na te dhanāni vidyante lopāmudre tathā mama | yathāvidhāni kalyāṇi pitustava sumadhyame

"लोपामुद्रे, हे कल्याणी, हे सुन्दर कटि वाली, जैसा धन तुम्हारे पिता के पास है, वैसा मेरे पास नहीं है।"

लोपामुद्रोवाच

श्लोक 21 (3.95.21)

ईशोसि तपसा सर्वं समाहर्तुं तपोधन । क्षणेन जीवलोके यद्वसु किंचन विद्यते ॥

īśosi tapasā sarvaṃ samāhartuṃ tapodhana | kṣaṇena jīvaloke yadvasu kiṃcana vidyate

"हे तपोधन, आप अपने तप से इस जीवलोक में जो भी धन है, उसे क्षण भर में एकत्र कर सकते हैं।"

अगस्त्य उवाच

श्लोक 22 (3.95.22)

एवमेतद्यथाऽऽत्थ त्वं तपोव्ययकरं तु तत् । यथा तु मे न नश्येत तपस्तन्मां प्रचोदय ॥

evametadyathā''ttha tvaṃ tapovyayakaraṃ tu tat | yathā tu me na naśyeta tapastanmāṃ pracodaya

"तुम ठीक कहती हो, परन्तु ऐसा करने से मेरा तप क्षीण होगा। कोई ऐसा उपाय बताओ जिससे मेरा तप नष्ट न हो।"

लोपामुद्रोवाच

श्लोक 23 (3.95.23)

अल्पावशिष्टः कालोऽयमृतोर्मम तपोधन । न चान्यथाऽहमिच्छामि त्वामुपैतुं कथंचन ॥

alpāvaśiṣṭaḥ kālo'yamṛtormama tapodhana | na cānyathā'hamicchāmi tvāmupaituṃ kathaṃcana

"हे तपोधन, मेरे ऋतुकाल का थोड़ा ही समय शेष है, और मैं किसी दूसरे प्रकार से आपके पास आना नहीं चाहती।

श्लोक 24 (3.95.24)

न चापि धर्ममिच्छामि विलोप्तुं ते कथंचन । एवं तु मे यथाकामं संपादयितुमर्हसि ॥

na cāpi dharmamicchāmi viloptuṃ te kathaṃcana | evaṃ tu me yathākāmaṃ saṃpādayitumarhasi

न ही मैं किसी प्रकार आपके धर्म का लोप करना चाहती हूँ। इसलिए आप मेरी यह इच्छा मेरे मनचाहे ढंग से पूरी कीजिए।"

अगस्त्य उवाच

श्लोक 25 (3.95.25)

यद्येष कामः सुभगे तव बुद्ध्या विनिश्चितः । हर्तुं गच्छाम्यहं भद्रे चर काममिह स्थिता ॥

yadyeṣa kāmaḥ subhage tava buddhyā viniścitaḥ | hartuṃ gacchāmyahaṃ bhadre cara kāmamiha sthitā

"हे सुभगे, यदि तुमने अपनी बुद्धि से यही इच्छा पक्की कर ली है, तो हे भद्रे, मैं धन लाने जाता हूँ। तुम यहीं रहकर इच्छानुसार विचरो।"

अध्याय 94अध्याय-सूचीअध्याय 96