आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 94
इल्वल और वातापि; लोपामुद्रा का जन्म
अगस्त्य के आश्रम के पास ठहरे युधिष्ठिर ने लोमश से पूछा कि मुनि ने वातापि का नाश क्यों किया। लोमश बताते हैं कि एक ब्राह्मण से पुत्र न मिलने पर दैत्य इल्वल ब्राह्मणों की हत्या करने लगा: वह अपने भाई वातापि को मेढ़ा बनाकर पकाता, अतिथि को खिलाता और फिर उसे पुकारकर जीवित कर देता, जिससे वह ब्राह्मण की पसली फाड़कर निकल आता। इसी बीच अगस्त्य ने अपने पितरों को संतान के अभाव में गड्ढे में उलटे लटकते देखा और उन्हें पुत्र का वचन दिया। योग्य पत्नी न मिलने पर उन्होंने सब प्राणियों के श्रेष्ठ अंगों से एक उत्तम स्त्री रची और उसे संतानहीन विदर्भराज को सौंप दिया, जिनके घर वह अनुपम लोपामुद्रा के रूप में बड़ी हुई, और कोई पुरुष उसका वरण करने का साहस न कर सका।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.94.1)
ततः संप्रस्थितो राजा कौन्तेयो भूरिदक्षिणः । अगस्त्याश्रममासाद्य दुर्जयायामुवास ह ॥
tataḥ saṃprasthito rājā kaunteyo bhūridakṣiṇaḥ | agastyāśramamāsādya durjayāyāmuvāsa ha
तदनन्तर प्रचुर दक्षिणा देने वाले कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर आगे बढ़े और अगस्त्य के आश्रम पहुँचकर दुर्जया नगरी में ठहरे।
श्लोक 2 (3.94.2)
तत्रैव लोमशं राजा पप्रच्छ वदतांवरः । अगस्त्येनेह वातापिः किमर्थमुपशामितः ॥
tatraiva lomaśaṃ rājā papraccha vadatāṃvaraḥ | agastyeneha vātāpiḥ kimarthamupaśāmitaḥ
वहीं वक्ताओं में श्रेष्ठ राजा ने लोमश से पूछा — "अगस्त्य ने यहाँ वातापि का अंत किस कारण किया?"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 3 (3.94.3)
आसीद्वा किंप्रभावश्च स दैत्यो मानवान्तकः । किमर्थं चोदितो मन्युरगस्त्यस्य महात्मनः ॥
āsīdvā kiṃprabhāvaśca sa daityo mānavāntakaḥ | kimarthaṃ codito manyuragastyasya mahātmanaḥ
"और मनुष्यों का संहार करने वाले उस दैत्य का प्रभाव कैसा था? महात्मा अगस्त्य का क्रोध किस लिए भड़का?"
लोमश उवाच
श्लोक 4 (3.94.4)
इल्वलो नाम दैतेय आसीत्कौरवनन्दन । मणिमत्यां पुरि पुरा वातापिस्तस्य चानुजः ॥
ilvalo nāma daiteya āsītkauravanandana | maṇimatyāṃ puri purā vātāpistasya cānujaḥ
हे कुरुनन्दन, प्राचीन काल में मणिमती नगरी में इल्वल नाम का एक दैत्य रहता था, और वातापि उसका छोटा भाई था।
श्लोक 5 (3.94.5)
स ब्राह्मणं तपोयुक्तमुवाच दितिनन्दनः । पुत्रं मे भगवानेकमिन्द्रतुल्यं प्रयच्छतु ॥
sa brāhmaṇaṃ tapoyuktamuvāca ditinandanaḥ | putraṃ me bhagavānekamindratulyaṃ prayacchatu
उस दितिपुत्र ने एक तपस्वी ब्राह्मण से कहा — "भगवन्, मुझे इन्द्र के समान एक पुत्र प्रदान कीजिए।"
श्लोक 6 (3.94.6)
तस्मै स ब्राह्मणो नादात्पुत्रं वासवसंमितम् । चुक्रोध सोऽसुरस्तस्य ब्राह्मणस्य ततो भृशम् ॥
tasmai sa brāhmaṇo nādātputraṃ vāsavasaṃmitam | cukrodha so'surastasya brāhmaṇasya tato bhṛśam
उस ब्राह्मण ने उसे इन्द्र के समान पुत्र नहीं दिया, तब वह असुर उस ब्राह्मण पर अत्यन्त कुपित हो गया।
श्लोक 7 (3.94.7)
तदाप्रभृतिराजेन्द्र इल्वलो ब्रह्महाऽसुरः । मन्युमान्भ्रातरं छागं मायावी ह्यकरोत्ततः ॥
tadāprabhṛtirājendra ilvalo brahmahā'suraḥ | manyumānbhrātaraṃ chāgaṃ māyāvī hyakarottataḥ
हे राजेन्द्र, उसी समय से ब्रह्महत्यारा, क्रोधी और मायावी असुर इल्वल ने अपने भाई को बकरा बना दिया।
श्लोक 8 (3.94.8)
मेषरूपी च वातापिः कामरूप्यभवत्क्षणात् । संस्कृत्यतं भोजयति ततो विप्रं जिधांसति ॥
meṣarūpī ca vātāpiḥ kāmarūpyabhavatkṣaṇāt | saṃskṛtyataṃ bhojayati tato vipraṃ jidhāṃsati
इच्छानुसार रूप धारण करने वाला वातापि क्षण भर में मेढ़ा बन जाता। इल्वल उसे पकाकर किसी ब्राह्मण को खिलाता और फिर उस ब्राह्मण को मार डालना चाहता।
श्लोक 9 (3.94.9)
स चाह्वयति यं वाचा गतं वैवस्वतक्षयम् । स पुनर्देहमास्थाय जीवन्स्म प्रत्यदृश्यत ॥
sa cāhvayati yaṃ vācā gataṃ vaivasvatakṣayam | sa punardehamāsthāya jīvansma pratyadṛśyata
इल्वल जिसे भी वाणी से पुकारता, वह यमलोक जा चुका हो तब भी फिर से देह धारण करके जीवित दिखाई देने लगता।
श्लोक 10 (3.94.10)
ततो वातापिमसुरं छागं कृत्वा सुसंस्कृतम् । तं ब्राह्मणं भोजयित्वा पुनरेव समाह्वयत् ॥
tato vātāpimasuraṃ chāgaṃ kṛtvā susaṃskṛtam | taṃ brāhmaṇaṃ bhojayitvā punareva samāhvayat
इस प्रकार वह असुर वातापि को बकरा बनाकर भली-भाँति पकाता, उस ब्राह्मण को खिलाता और फिर उसे पुकारता।
श्लोक 11 (3.94.11)
तामिल्वलेन महता स्वरेण गिरमीरिताम् । श्रुत्वाऽतिमायो बलवान्क्षिप्रं ब्राह्मणकण्टकः ॥
tāmilvalena mahatā svareṇa giramīritām | śrutvā'timāyo balavānkṣipraṃ brāhmaṇakaṇṭakaḥ
इल्वल के ऊँचे स्वर में कही गई उस पुकार को सुनकर वह अत्यन्त मायावी, बलवान, ब्राह्मणों का काँटा शीघ्र ही
श्लोक 12 (3.94.12)
तस्य पार्श्वं विनिर्भिद्य ब्राह्मणस्य महासुरः । वातापिः प्रहसन्राजन्निश्चक्राम विशांपते ॥
tasya pārśvaṃ vinirbhidya brāhmaṇasya mahāsuraḥ | vātāpiḥ prahasanrājanniścakrāma viśāṃpate
उस ब्राह्मण की पसली फाड़कर हँसता हुआ बाहर निकल आता — वह महान असुर वातापि, हे राजन्, हे प्रजापालक।
श्लोक 13 (3.94.13)
एवं स ब्राह्मणान्राजन्भोजयित्वा पुनःपुनः । हिंसयामास दैतेय इल्वलो दुष्टचेतनः ॥
evaṃ sa brāhmaṇānrājanbhojayitvā punaḥpunaḥ | hiṃsayāmāsa daiteya ilvalo duṣṭacetanaḥ
हे राजन्, इसी प्रकार दुष्टबुद्धि दैत्य इल्वल बार-बार ब्राह्मणों को भोजन कराकर उनकी हत्या करता रहा।
श्लोक 14 (3.94.14)
अगस्त्यश्चापि भगवानेतस्मिन्काल एव तु । पितॄन्ददर्श गर्ते वै लम्बमानानधोमुखान् ॥
agastyaścāpi bhagavānetasminkāla eva tu | pitṝndadarśa garte vai lambamānānadhomukhān
उसी समय भगवान अगस्त्य ने अपने पितरों को एक गड्ढे में नीचे मुँह किए लटकते देखा।
श्लोक 15 (3.94.15)
सोऽपृच्छल्लम्बमानांस्तान्भगवन्तश्च किंपराः । किमर्थं वेह लम्बध्वे गर्ते यूयमधोमुखाः । संतानहेतोरिति ते प्रत्यूचुर्ब्रह्मवादिनः ॥
so'pṛcchallambamānāṃstānbhagavantaśca kiṃparāḥ | kimarthaṃ veha lambadhve garte yūyamadhomukhāḥ | saṃtānahetoriti te pratyūcurbrahmavādinaḥ
उन्होंने लटकते हुए पितरों से पूछा — "पूज्यगण, आप किस प्रयोजन में लगे हैं? आप इस गड्ढे में नीचे मुँह किए क्यों लटक रहे हैं?" उन ब्रह्मवादियों ने उत्तर दिया — "संतान के लिए।"
श्लोक 16 (3.94.16)
ते तस्मै कथयामासुर्वयं ते पितरः स्वकाः । गर्तमेतमनुप्राप्ता लम्बामः प्रसवार्थिनः ॥
te tasmai kathayāmāsurvayaṃ te pitaraḥ svakāḥ | gartametamanuprāptā lambāmaḥ prasavārthinaḥ
उन्होंने उनसे कहा — "हम तुम्हारे ही पितर हैं। इस गड्ढे में आ पड़े हैं और संतान की आशा में लटक रहे हैं।
पितर ऊचुः
श्लोक 17 (3.94.17)
यदि नो जनयेथास्त्वमगस्त्यापत्यमुत्तमम् । स्यान्नोस्मान्निरयान्मोक्षस्त्वं च पुत्राप्नुया गतिम् ॥
yadi no janayethāstvamagastyāpatyamuttamam | syānnosmānnirayānmokṣastvaṃ ca putrāpnuyā gatim
अगस्त्य, यदि तुम उत्तम संतान उत्पन्न करो तो हमें इस नरक से मुक्ति मिल जाए, और पुत्र, तुम्हें भी उत्तम गति प्राप्त हो।"
लोमश उवाच
श्लोक 18 (3.94.18)
स तानुवाच तेजस्वी सत्यधर्मपरायणः । करिष्ये पितरः कामं व्येतु वो मानसो ज्वरः ॥
sa tānuvāca tejasvī satyadharmaparāyaṇaḥ | kariṣye pitaraḥ kāmaṃ vyetu vo mānaso jvaraḥ
सत्य और धर्म में तत्पर उस तेजस्वी मुनि ने उनसे कहा — "पितृगण, मैं आपकी इच्छा पूरी करूँगा। आपके मन का संताप दूर हो।"
श्लोक 19 (3.94.19)
ततः प्रसवसन्तानं चिन्तयन्भगवानृषिः । आत्मनः प्रसवस्यार्थे नापश्यत्सदृशीं स्त्रियम् ॥
tataḥ prasavasantānaṃ cintayanbhagavānṛṣiḥ | ātmanaḥ prasavasyārthe nāpaśyatsadṛśīṃ striyam
तब संतान-परम्परा के विषय में सोचते हुए भगवान ऋषि को अपनी संतान उत्पन्न करने योग्य कोई समान स्त्री दिखाई न दी।
श्लोक 20 (3.94.20)
स तस्य तस्य सत्त्वस्य तत्तदङ्गमनुत्तमम् । संगृह्यतत्समैरङ्गैर्निर्ममे स्त्रियमुत्तमाम् ॥
sa tasya tasya sattvasya tattadaṅgamanuttamam | saṃgṛhyatatsamairaṅgairnirmame striyamuttamām
तब उन्होंने भिन्न-भिन्न प्राणियों का जो-जो अंग सबसे सुन्दर था, उसे ग्रहण किया और उन्हीं के समान अंगों से एक परम उत्तम स्त्री की रचना की।
श्लोक 21 (3.94.21)
स तां विदर्भराजाय पुत्रकामाय ताम्यते । निर्मितामात्मनोऽर्थाय मुनिः प्रादान्महातपाः ॥
sa tāṃ vidarbharājāya putrakāmāya tāmyate | nirmitāmātmano'rthāya muniḥ prādānmahātapāḥ
महातपस्वी मुनि ने अपने लिए रची हुई उस कन्या को संतान के लिए तरसते विदर्भराज को दे दिया।
श्लोक 22 (3.94.22)
सा तत्र जज्ञे सुभगा विद्युत्सौदामनी यथा । विभ्राजमाना वपुषा व्यवर्धत शुभानना ॥
sā tatra jajñe subhagā vidyutsaudāmanī yathā | vibhrājamānā vapuṣā vyavardhata śubhānanā
वहाँ वह सौभाग्यशालिनी कन्या बिजली की कौंध के समान जन्मी, और अपने रूप से दमकती हुई वह सुमुखी बढ़ने लगी।
श्लोक 23 (3.94.23)
जातमात्रां च तां दृष्ट्वा वैदर्भः पृथिवीपतिः । प्रहर्षेण द्विजातिभ्यो न्यवेदयत भारत ॥
jātamātrāṃ ca tāṃ dṛṣṭvā vaidarbhaḥ pṛthivīpatiḥ | praharṣeṇa dvijātibhyo nyavedayata bhārata
हे भारत, उसके जन्म लेते ही विदर्भ के राजा ने हर्षपूर्वक ब्राह्मणों को उसकी सूचना दी।
श्लोक 24 (3.94.24)
अभ्यनन्दन्त तां सर्वे ब्राह्मणा वसुधाधिप । लोपामुद्रेति तस्याश्च चक्रिरे नाम ते द्विजाः ॥
abhyanandanta tāṃ sarve brāhmaṇā vasudhādhipa | lopāmudreti tasyāśca cakrire nāma te dvijāḥ
हे पृथ्वीपति, सब ब्राह्मणों ने उसका अभिनन्दन किया और उन द्विजों ने उसका नाम लोपामुद्रा रखा।
श्लोक 25 (3.94.25)
ववृधे सा महाराज बिभ्रती रूपमुत्तमम् । अप्स्विवोत्पलिनी शीघ्रमग्नेरिव शिखा शुभा ॥
vavṛdhe sā mahārāja bibhratī rūpamuttamam | apsvivotpalinī śīghramagneriva śikhā śubhā
हे महाराज, उत्तम रूप धारण किए वह जल में कमलिनी और अग्नि की उज्ज्वल शिखा के समान शीघ्रता से बढ़ने लगी।
श्लोक 26 (3.94.26)
तां यौवनस्थां राजेन्द्रशतं कन्याः स्वलंकृताः । दास्यः शतं च कल्याणीमुपातस्थुर्वशानुगाः ॥
tāṃ yauvanasthāṃ rājendraśataṃ kanyāḥ svalaṃkṛtāḥ | dāsyaḥ śataṃ ca kalyāṇīmupātasthurvaśānugāḥ
हे राजेन्द्र, जब वह कल्याणी युवावस्था में पहुँची, तो सौ सजी-धजी कन्याएँ और सौ दासियाँ उसकी इच्छा के अनुसार उसकी सेवा में रहने लगीं।
श्लोक 27 (3.94.27)
सा स्म दासीशतवृता मध्ये कन्याशतस्य च । आस्ते तेजस्विनी कन्या रोहिणीव दिविप्रभा ॥
sā sma dāsīśatavṛtā madhye kanyāśatasya ca | āste tejasvinī kanyā rohiṇīva diviprabhā
सौ दासियों से घिरी, सौ कन्याओं के बीच बैठी वह तेजस्विनी कन्या आकाश में चमकती रोहिणी के समान शोभा पाती थी।
श्लोक 28 (3.94.28)
यौवनस्थामपि च तां शीलाचारसमन्विताम् । न वव्रे पुरुषः कश्चिद्भयात्तस्य महात्मनः ॥
yauvanasthāmapi ca tāṃ śīlācārasamanvitām | na vavre puruṣaḥ kaścidbhayāttasya mahātmanaḥ
यद्यपि वह युवा थी और शील तथा सदाचार से सम्पन्न थी, फिर भी उस महात्मा मुनि के भय से किसी पुरुष ने उसका वरण नहीं किया।
श्लोक 29 (3.94.29)
सा तु सत्यवती कन्या रूपेणाप्सरसोप्यति । तोषयामास पितरं शीलेन स्वजनं तथा ॥
sā tu satyavatī kanyā rūpeṇāpsarasopyati | toṣayāmāsa pitaraṃ śīlena svajanaṃ tathā
रूप में अप्सराओं से भी बढ़कर वह सत्यनिष्ठ कन्या अपने शील से पिता और स्वजनों को प्रसन्न रखती थी।
श्लोक 30 (3.94.30)
वैदर्भीं तु तथायुक्तां युवतीं प्रेक्ष्य वै पिता । मनसा चिन्तयामास कस्मै दद्यामिमांसुताम् ॥
vaidarbhīṃ tu tathāyuktāṃ yuvatīṃ prekṣya vai pitā | manasā cintayāmāsa kasmai dadyāmimāṃsutām
विदर्भ की राजकुमारी को ऐसी युवती हुई देखकर पिता मन ही मन सोचने लगे — "मैं अपनी इस पुत्री को किसे दूँ?"