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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 93

नैमिषारण्य से गया तक; राजर्षि गय के यज्ञ

स्थान-स्थान पर ठहरते हुए पाण्डव नैमिषारण्य पहुँचते हैं और गोमती के तीर्थों में स्नान करते हैं; फिर कन्यातीर्थ, अश्वतीर्थ, गोतीर्थ, कालकोटि, वृषप्रस्थ पर्वत, बाहुदा नदी, प्रयाग, गंगा-यमुना के संगम और प्रजापति की वेदी की यात्रा करते हैं। वे राजर्षि गय के पर्वत पर आते हैं, जहाँ गयशिर, पवित्र महानदी, पवित्रकूट और ब्रह्मसर हैं और जहाँ महादेव नित्य विराजते हैं; वहाँ अक्षयवट के पास विद्वान् ब्राह्मणों के बीच वे चातुर्मास्य यज्ञ करते हैं। वहाँ ब्रह्मचारी शमठ आधूर्तरजा के पुत्र राजा गय की कथा सुनाते हैं, जिनके यज्ञ — अन्न के पर्वतों, घी और दही की नदियों तथा अगणित दक्षिणाओं वाले — अद्वितीय थे।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (3.93.1)

ते तथा सहिता वीरा वसन्तस्तत्र तत्र ह । क्रमेण पृथिवीपाल नैमिषारण्यमागताः ॥

te tathā sahitā vīrā vasantastatra tatra ha | krameṇa pṛthivīpāla naimiṣāraṇyamāgatāḥ

हे पृथ्वीपाल! इस प्रकार साथ-साथ यहाँ-वहाँ ठहरते हुए वे वीर क्रमशः नैमिषारण्य पहुँचे।

श्लोक 2 (3.93.2)

ततस्तीर्थेषु पुण्येषु गोमत्याः पाण्डवा नृप । कृताभिषेकाः प्रददुर्गाश्च वित्तं च भारत ॥

tatastīrtheṣu puṇyeṣu gomatyāḥ pāṇḍavā nṛpa | kṛtābhiṣekāḥ pradadurgāśca vittaṃ ca bhārata

हे नृप! फिर पाण्डवों ने गोमती के पवित्र तीर्थों में स्नान किया, और हे भारत, गायें तथा धन दान किए।

श्लोक 3 (3.93.3)

तत्र देवान्पितॄन्विप्रांस्तर्पयित्वा पुनःपुनः । कन्यातीर्थेऽश्वतीर्थे च गवां तीर्थे च भारत ॥

tatra devānpitṝnviprāṃstarpayitvā punaḥpunaḥ | kanyātīrthe'śvatīrthe ca gavāṃ tīrthe ca bhārata

हे भारत! वहाँ कन्यातीर्थ, अश्वतीर्थ और गोतीर्थ में उन्होंने देवताओं, पितरों और ब्राह्मणों का बार-बार तर्पण किया।

श्लोक 4 (3.93.4)

कालकोट्यां वृषप्रस्थे गिरावुष्य च कौरवाः । बाहुदायां महीपाल चक्रुः सर्वेऽभिषेचनम् ॥

kālakoṭyāṃ vṛṣaprasthe girāvuṣya ca kauravāḥ | bāhudāyāṃ mahīpāla cakruḥ sarve'bhiṣecanam

हे महीपाल! कालकोटि में और वृषप्रस्थ पर्वत पर निवास करके सब कौरवों ने बाहुदा नदी में स्नान किया।

श्लोक 5 (3.93.5)

प्रयागे देवयजने देवानां पृथिवीपते । ऊषुराप्लुत्य गात्राणि तपश्चातस्थुरुत्तमम् ॥

prayāge devayajane devānāṃ pṛthivīpate | ūṣurāplutya gātrāṇi tapaścātasthuruttamam

हे पृथ्वीपति! देवताओं के यज्ञस्थल प्रयाग में उन्होंने स्नान किया, वहाँ निवास किया और उत्तम तप किया।

श्लोक 6 (3.93.6)

गङ्गायमुनयोश्चैव संगमे सत्यसंगराः । विपाप्मानो महात्मानो विप्रेभ्यः प्रददुर्वसु ॥

gaṅgāyamunayoścaiva saṃgame satyasaṃgarāḥ | vipāpmāno mahātmāno viprebhyaḥ pradadurvasu

और गंगा-यमुना के संगम पर उन सत्यप्रतिज्ञ महात्माओं ने निष्पाप होकर ब्राह्मणों को धन दिया।

श्लोक 7 (3.93.7)

तपस्विजनजुष्टां च ततो वेदीं प्रजापतेः । जग्मुः पाण्डुसुता राजन्ब्राह्मणैः सह भारत ॥

tapasvijanajuṣṭāṃ ca tato vedīṃ prajāpateḥ | jagmuḥ pāṇḍusutā rājanbrāhmaṇaiḥ saha bhārata

हे राजन्, हे भारत! फिर पाण्डुपुत्र ब्राह्मणों के साथ तपस्वियों से सेवित प्रजापति की वेदी पर गए।

श्लोक 8 (3.93.8)

तत्र ते न्यवसन्वीरास्तपश्चातस्थुरुत्तमम् । संतर्पयन्तः सततं वन्येन हविषा द्विजान् ॥

tatra te nyavasanvīrāstapaścātasthuruttamam | saṃtarpayantaḥ satataṃ vanyena haviṣā dvijān

वहाँ वे वीर रहे और उत्तम तप किया, तथा वन के हविष्य से ब्राह्मणों को निरन्तर तृप्त करते रहे।

श्लोक 9 (3.93.9)

ततो महीधरं जग्मुर्धर्मज्ञेनाभिसत्कृतम् । राजर्षिणा पुण्यकृता गयेनानुपमद्युते ॥

tato mahīdharaṃ jagmurdharmajñenābhisatkṛtam | rājarṣiṇā puṇyakṛtā gayenānupamadyute

हे अनुपम तेजस्वी राजन्! फिर वे उस पर्वत पर गए जिसे धर्मज्ञ और पुण्यकर्मा राजर्षि गय ने सम्मानित किया था,

श्लोक 10 (3.93.10)

नगो गयशिरो यत्र पुण्या चैव महानदी । वानीरमालिनी रम्या नदी पुलिनशोभिता ॥

nago gayaśiro yatra puṇyā caiva mahānadī | vānīramālinī ramyā nadī pulinaśobhitā

जहाँ गयशिर पर्वत है और पवित्र महानदी बहती है — बेंत की पंक्तियों से सजी, रेतीले तटों से शोभित वह रमणीय नदी;

श्लोक 11 (3.93.11)

दिव्यं पवित्रकूटं च पवित्रधरणीधरम् । ऋषिजुष्टं सुपुण्यं तत्तीर्थं ब्रह्मसरोऽतुलम् ॥

divyaṃ pavitrakūṭaṃ ca pavitradharaṇīdharam | ṛṣijuṣṭaṃ supuṇyaṃ tattīrthaṃ brahmasaro'tulam

दिव्य पवित्रकूट, वह पावन पर्वत; और ऋषियों से सेवित अत्यन्त पुण्यमय अतुलनीय ब्रह्मसर तीर्थ;

श्लोक 12 (3.93.12)

अगस्त्यो भगवान्यत्र गतो वैवस्वतं प्रति । उवास च स्वयं तत्र धर्मराजः सनातनः ॥

agastyo bhagavānyatra gato vaivasvataṃ prati | uvāsa ca svayaṃ tatra dharmarājaḥ sanātanaḥ

जहाँ भगवान् अगस्त्य वैवस्वत यम के पास गए थे, और जहाँ सनातन धर्मराज स्वयं निवास करते थे;

श्लोक 13 (3.93.13)

सर्वासां सरितां चैव समुद्भेदो विशांपते । यत्र संनिहितो नित्यं महादेवः पिनाकधृक् ॥

sarvāsāṃ saritāṃ caiva samudbhedo viśāṃpate | yatra saṃnihito nityaṃ mahādevaḥ pinākadhṛk

हे प्रजानाथ! जहाँ सब नदियों का उद्गम है और जहाँ पिनाकधारी महादेव नित्य विराजमान रहते हैं।

श्लोक 14 (3.93.14)

परिपूर्णः परंज्योतिः परमात्मा सनातनः । ब्रह्मादिभिरुपास्योऽयं भगवान्परमेश्वरः ॥

paripūrṇaḥ paraṃjyotiḥ paramātmā sanātanaḥ | brahmādibhirupāsyo'yaṃ bhagavānparameśvaraḥ

वे परिपूर्ण, परम ज्योति और सनातन परमात्मा हैं; ब्रह्मा आदि देवताओं के उपास्य ये भगवान् परमेश्वर हैं।

श्लोक 15 (3.93.15)

तं प्रणम्य महादेवं चतुर्वर्गफलप्रदम् । सिद्धिक्षेत्रमिदं मत्वा सर्वेषां मोक्षकाङ्क्षिणाम् ॥

taṃ praṇamya mahādevaṃ caturvargaphalapradam | siddhikṣetramidaṃ matvā sarveṣāṃ mokṣakāṅkṣiṇām

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — चारों पुरुषार्थों का फल देने वाले उन महादेव को प्रणाम करके, और इस स्थान को सब मोक्षार्थियों के लिए सिद्धिक्षेत्र मानकर,

श्लोक 16 (3.93.16)

तत्र ते पाण्डवा वीराश्चातुर्मास्यैस्तदेजिरे । ऋषियज्ञेन महता यत्राक्षयवटो महान् । अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम् ॥

tatra te pāṇḍavā vīrāścāturmāsyaistadejire | ṛṣiyajñena mahatā yatrākṣayavaṭo mahān | akṣaye devayajane akṣayaṃ yatra vai phalam

वहाँ वीर पाण्डवों ने चातुर्मास्य यज्ञों और ऋषियों के महान यज्ञ द्वारा आराधना की, जहाँ विशाल अक्षयवट है। उस अक्षय देवयजन में फल भी अक्षय होता है।

श्लोक 17 (3.93.17)

ये तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्निश्चितमानसाः । ब्राह्मणास्तत्र शतशः समाजग्मुस्तपोधनाः ॥

ye tu tatropavāsāṃstu cakrurniścitamānasāḥ | brāhmaṇāstatra śataśaḥ samājagmustapodhanāḥ

वहाँ दृढ़ मन से उपवास करने वाले सैकड़ों तपोधन ब्राह्मण एकत्र हुए।

श्लोक 18 (3.93.18)

चातुर्मास्येनायजन्त आर्षेण विधिना तदा । तत्र विद्यातपोवृद्धा ब्राह्मणा वेदपारगाः । कथां प्रचक्रिरे पुण्यां सदसिस्था महात्मनाम् ॥

cāturmāsyenāyajanta ārṣeṇa vidhinā tadā | tatra vidyātapovṛddhā brāhmaṇā vedapāragāḥ | kathāṃ pracakrire puṇyāṃ sadasisthā mahātmanām

उन्होंने ऋषियों की विधि से चातुर्मास्य यज्ञ किया। वहाँ विद्या और तप में बढ़े-चढ़े, वेदों के पारंगत ब्राह्मण सभा में बैठकर महात्माओं की पवित्र कथा कहने लगे।

श्लोक 19 (3.93.19)

तत्र विद्याव्रतस्नातः कौमारं व्रतमास्थितः । शमठोऽकथयद्राजन्नाधूर्तरजसं गयम् ॥

tatra vidyāvratasnātaḥ kaumāraṃ vratamāsthitaḥ | śamaṭho'kathayadrājannādhūrtarajasaṃ gayam

हे राजन्! वहाँ विद्या और व्रत पूर्ण करके स्नातक हुए, आजन्म ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करने वाले शमठ ने आधूर्तरजा के पुत्र गय की कथा कही।

शमठ उवाच

श्लोक 20 (3.93.20)

आधूर्तरजसः पुत्रो गयो राजर्षिसत्तमः । पुण्यानि तस्य कर्माणि तानि मे शृणु भारत ॥

ādhūrtarajasaḥ putro gayo rājarṣisattamaḥ | puṇyāni tasya karmāṇi tāni me śṛṇu bhārata

आधूर्तरजा के पुत्र गय राजर्षियों में श्रेष्ठ थे। हे भारत! उनके पुण्य कर्म मुझसे सुनो।

श्लोक 21 (3.93.21)

यस्य यज्ञो बभूवेह बह्वन्नो बहुदक्षिणः । यत्रान्नपर्वता राजञ्शतशोऽथ सहस्रशः ॥

yasya yajño babhūveha bahvanno bahudakṣiṇaḥ | yatrānnaparvatā rājañśataśo'tha sahasraśaḥ

हे राजन्! उनका यज्ञ यहीं हुआ था, जिसमें प्रचुर अन्न और बहुत-सी दक्षिणा दी गई; वहाँ सैकड़ों-हजारों अन्न के पर्वत थे,

श्लोक 22 (3.93.22)

घृतकुल्याश्च दध्नश्च नद्यो बहुशतास्तथा । व्यञ्जनानां प्रवाहाश्च महार्हाणां सहस्रशः ॥

ghṛtakulyāśca dadhnaśca nadyo bahuśatāstathā | vyañjanānāṃ pravāhāśca mahārhāṇāṃ sahasraśaḥ

घी की नहरें, दही की सैकड़ों नदियाँ और बहुमूल्य व्यंजनों के हजारों प्रवाह थे।

श्लोक 23 (3.93.23)

अहन्यहनि चाप्येवं याचतां संप्रदीयते । अन्ये च ब्राह्मणा राजन्भुञ्जतेऽन्नं सुसंस्कृतम् ॥

ahanyahani cāpyevaṃ yācatāṃ saṃpradīyate | anye ca brāhmaṇā rājanbhuñjate'nnaṃ susaṃskṛtam

दिन-प्रतिदिन इसी प्रकार माँगने वालों को दान दिया जाता था; और हे राजन्, अन्य ब्राह्मण भलीभाँति तैयार किया हुआ अन्न खाते थे।

श्लोक 24 (3.93.24)

तत्र वै दक्षिणाकाले ब्रह्मघोषो दिवं गतः । न च प्रज्ञायते किंचिद्ब्रह्मशब्देन भारत ॥

tatra vai dakṣiṇākāle brahmaghoṣo divaṃ gataḥ | na ca prajñāyate kiṃcidbrahmaśabdena bhārata

हे भारत! वहाँ दक्षिणा के समय वेदघोष स्वर्ग तक पहुँच गया, और वेदध्वनि के आगे और कुछ सुनाई नहीं देता था।

श्लोक 25 (3.93.25)

पुण्येन चरता राजन्भूर्दिशः खं नभस्तथा । आपूर्णमासीच्छब्देन तदप्यासीन्महाद्भुतम् ॥

puṇyena caratā rājanbhūrdiśaḥ khaṃ nabhastathā | āpūrṇamāsīcchabdena tadapyāsīnmahādbhutam

हे राजन्! फैलती हुई उस पवित्र ध्वनि से पृथ्वी, दिशाएँ, आकाश और अन्तरिक्ष भर गए; यह भी बड़ा अद्भुत था।

श्लोक 26 (3.93.26)

यत्र स्म गाथा गायन्ति मनुष्या भरतर्षभ । अन्नपानैः शुभैस्तृप्ता देशे देशे सुवर्चसः ॥

yatra sma gāthā gāyanti manuṣyā bharatarṣabha | annapānaiḥ śubhaistṛptā deśe deśe suvarcasaḥ

हे भरतश्रेष्ठ! वहाँ अच्छे अन्न-पान से तृप्त, तेजस्वी मनुष्य देश-देश में ये गाथाएँ गाते थे —

श्लोक 27 (3.93.27)

गयस्य यज्ञे के त्वद्य प्राणिनो भोक्तुमीप्सवः । तत्र भोजनशिष्टस्य पर्वताः पञ्चविंशतिः ॥

gayasya yajñe ke tvadya prāṇino bhoktumīpsavaḥ | tatra bhojanaśiṣṭasya parvatāḥ pañcaviṃśatiḥ

'गय के यज्ञ में अब कौन प्राणी भोजन करना चाहता है? वहाँ भोजन से बचे अन्न के पच्चीस पर्वत पड़े हैं।'

श्लोक 28 (3.93.28)

न तत्पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे । गयो यदकरोद्यज्ञे राजर्षिरमितद्युतिः ॥

na tatpūrve janāścakrurna kariṣyanti cāpare | gayo yadakarodyajñe rājarṣiramitadyutiḥ

'अमित तेजस्वी राजर्षि गय ने अपने यज्ञ में जो किया, वह न पहले के लोगों ने किया, न आगे के लोग करेंगे।'

श्लोक 29 (3.93.29)

कथं तु देवा हविषा गयेन परितर्पिताः । पुनः शक्ष्यन्त्युपादातुमन्यैर्दत्तानि कानिचित् ॥

kathaṃ tu devā haviṣā gayena paritarpitāḥ | punaḥ śakṣyantyupādātumanyairdattāni kānicit

'गय के हविष्य से तृप्त हुए देवता भला फिर दूसरों के दिए हुए कुछ भी कैसे ग्रहण कर सकेंगे?'

श्लोक 30 (3.93.30)

सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारकाः । यथा वा वर्षतो धारा असंख्येयाः स्म केनचित् । तथा गणयितुं शक्या गययज्ञे न दक्षिणाः ॥

sikatā vā yathā loke yathā vā divi tārakāḥ | yathā vā varṣato dhārā asaṃkhyeyāḥ sma kenacit | tathā gaṇayituṃ śakyā gayayajñe na dakṣiṇāḥ

'जैसे संसार में बालू के कण, आकाश में तारे और बरसती वर्षा की धाराएँ कोई नहीं गिन सकता, वैसे ही गय के यज्ञ की दक्षिणाएँ नहीं गिनी जा सकतीं।'

श्लोक 31 (3.93.31)

एवंविधाः सुबहवस्तस्य यज्ञा महीपतेः । बभूवुरस्य सरसः समीपे कुरुनन्दन ॥

evaṃvidhāḥ subahavastasya yajñā mahīpateḥ | babhūvurasya sarasaḥ samīpe kurunandana

हे कुरुनन्दन! उस राजा के ऐसे बहुत-से यज्ञ इसी सरोवर के समीप हुए थे।

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