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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 92

अधर्मियों की समृद्धि क्यों — लोमश का उत्तर

मार्ग में युधिष्ठिर लोमश से पूछते हैं कि वे स्वयं को गुणहीन नहीं मानते, फिर भी किसी भी राजा से अधिक दुःख क्यों भोग रहे हैं, जबकि उनके अधर्मी शत्रु फल-फूल रहे हैं। लोमश उत्तर देते हैं कि अधर्म से मिली समृद्धि क्षणिक होती है और अन्त में जड़ सहित विनाश लाती है। दैत्यों और दानवों ने धर्म त्याग दिया और तीर्थों से विमुख रहे; दर्प, अभिमान, क्रोध और निर्लज्जता ने उन्हें घेर लिया, लक्ष्मी उन्हें छोड़कर देवताओं के पास चली गईं, अलक्ष्मी और कलि उनमें समा गए और वे नष्ट हो गए; जबकि देवताओं ने तीर्थयात्रा, तप, यज्ञ और दान से परम कल्याण पाया। इसी प्रकार नृग, शिबि, भगीरथ, इक्ष्वाकु आदि राजाओं की भाँति तीर्थों में स्नान करके युधिष्ठिर भी अपनी श्री फिर पाएँगे, और धृतराष्ट्र के पुत्र दैत्यों की तरह शीघ्र नष्ट हो जाएँगे।

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युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (3.92.1)

न वै निर्गुणमात्मानं मन्ये देवर्षिसत्तम । तथाऽस्मि दुःखसंतप्तो यथा नान्यो महीपतिः ॥

na vai nirguṇamātmānaṃ manye devarṣisattama | tathā'smi duḥkhasaṃtapto yathā nānyo mahīpatiḥ

हे देवर्षिश्रेष्ठ! मैं अपने को गुणहीन नहीं मानता, फिर भी मैं ऐसे दुःख से संतप्त हूँ जैसा कोई दूसरा राजा नहीं हुआ।

श्लोक 2 (3.92.2)

परांश्च निर्गुणान्मन्ये न च धर्मगतानपि । ते च लोमश लोकेऽस्मिन्नृध्यन्ते केन हेतुना ॥

parāṃśca nirguṇānmanye na ca dharmagatānapi | te ca lomaśa loke'sminnṛdhyante kena hetunā

और मैं अपने शत्रुओं को गुणहीन तथा धर्म से विमुख मानता हूँ; फिर भी, हे लोमश, वे इस लोक में फल-फूल रहे हैं — किस कारण से?

लोमश उवाच

श्लोक 3 (3.92.3)

नात्र दुःखं त्वया राजन्कार्यं पार्थ कथंचन । यदधर्मेण वर्धेयुरधर्मरुचयो जनाः ॥

nātra duḥkhaṃ tvayā rājankāryaṃ pārtha kathaṃcana | yadadharmeṇa vardheyuradharmarucayo janāḥ

राजन्, हे पार्थ! इस बात पर तुम्हें किसी प्रकार दुःख नहीं करना चाहिए कि अधर्म में रुचि रखने वाले लोग अधर्म से बढ़ते हैं।

श्लोक 4 (3.92.4)

वर्धत्यधर्मेण नरस्ततो भद्राणि पश्यति । ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ॥

vardhatyadharmeṇa narastato bhadrāṇi paśyati | tataḥ sapatnāñjayati samūlastu vinaśyati

मनुष्य अधर्म से बढ़ता है, फिर सुख-सौभाग्य देखता है, फिर शत्रुओं को जीतता है; पर अन्त में जड़ सहित नष्ट हो जाता है।

श्लोक 5 (3.92.5)

यत्र धर्मेण वर्धन्ते राजानो राजसत्तम । सर्वान्सपत्नान्बाधन्ते राज्यं चैषां विवर्धते ॥

yatra dharmeṇa vardhante rājāno rājasattama | sarvānsapatnānbādhante rājyaṃ caiṣāṃ vivardhate

हे राजश्रेष्ठ! पर जहाँ राजा धर्म से बढ़ते हैं, वे सब शत्रुओं को दबा देते हैं और उनका राज्य बढ़ता जाता है।

श्लोक 6 (3.92.6)

मया हि दृष्टा दैतेया दानवाश्च महीपते । वर्धमाना ह्यधर्मेण क्षयं चोपगताः पुनः ॥

mayā hi dṛṣṭā daiteyā dānavāśca mahīpate | vardhamānā hyadharmeṇa kṣayaṃ copagatāḥ punaḥ

हे महीपते! मैंने दैत्यों और दानवों को अधर्म से बढ़ते और फिर विनाश को प्राप्त होते देखा है।

श्लोक 7 (3.92.7)

पुरा देवयुगे चैव दृष्टं सर्वं मया विभो । अरोचयन्सुरा धर्मं धर्मं तत्यजिरेऽसुराः ॥

purā devayuge caiva dṛṣṭaṃ sarvaṃ mayā vibho | arocayansurā dharmaṃ dharmaṃ tatyajire'surāḥ

हे विभो! पूर्वकाल में देवयुग में मैंने यह सब देखा था — देवताओं ने धर्म को अपनाया और असुरों ने धर्म को त्याग दिया।

श्लोक 8 (3.92.8)

तीर्थानि देवा विविशुर्नाविशन्भारतासुराः । तानधर्मकृतो दर्पः पूर्वमेव समाविशत् ॥

tīrthāni devā viviśurnāviśanbhāratāsurāḥ | tānadharmakṛto darpaḥ pūrvameva samāviśat

हे भारत! देवता तीर्थों में स्नान को जाते थे, असुर नहीं जाते थे। अधर्म से उत्पन्न दर्प ने पहले ही उन्हें घेर लिया था।

श्लोक 9 (3.92.9)

दर्पान्मानः समभवन्मानात्क्रोधो व्यजायत । क्रोधादह्रीस्ततोऽलज्जा वृत्तं तेषां ततोऽनशत् ॥

darpānmānaḥ samabhavanmānātkrodho vyajāyata | krodhādahrīstato'lajjā vṛttaṃ teṣāṃ tato'naśat

दर्प से अभिमान उत्पन्न हुआ, अभिमान से क्रोध, क्रोध से निर्लज्जता और फिर बेहयाई; तब उनका सदाचार नष्ट हो गया।

श्लोक 10 (3.92.10)

तानलज्जान्गतश्रीकान्हीनवृत्तान्वृथाव्रतान् । क्षमा लक्ष्मीः स्वधर्मश्च नचिरात्प्रजहुस्ततः ॥

tānalajjāngataśrīkānhīnavṛttānvṛthāvratān | kṣamā lakṣmīḥ svadharmaśca nacirātprajahustataḥ

उन निर्लज्ज, श्रीहीन, आचारभ्रष्ट और व्यर्थ व्रत करने वालों को क्षमा, लक्ष्मी और स्वधर्म ने शीघ्र ही छोड़ दिया।

श्लोक 11 (3.92.11)

लक्ष्मीस्तु देवानगमदलक्ष्मीरसुरान्नृप ॥

lakṣmīstu devānagamadalakṣmīrasurānnṛpa

हे नृप! लक्ष्मी देवताओं के पास चली गईं और अलक्ष्मी असुरों के पास।

श्लोक 12 (3.92.12)

तानलक्ष्मीसमाविष्टान्दर्पोपहतचेतसः । दैतेयान्दानवांश्चैव कलिरप्याविशत्ततः ॥

tānalakṣmīsamāviṣṭāndarpopahatacetasaḥ | daiteyāndānavāṃścaiva kalirapyāviśattataḥ

अलक्ष्मी से आविष्ट और दर्प से नष्ट बुद्धि वाले उन दैत्यों और दानवों में फिर कलि ने भी प्रवेश किया।

श्लोक 13 (3.92.13)

तानलक्ष्मीसमाविष्टान्दानवान्कलिनाहतान् । दर्पाभिभूतान्कौन्तेय क्रियाहीनानचेतसः । मानाभिभूतानचिराद्विनाशः समपद्यत ॥

tānalakṣmīsamāviṣṭāndānavānkalināhatān | darpābhibhūtānkaunteya kriyāhīnānacetasaḥ | mānābhibhūtānacirādvināśaḥ samapadyata

हे कुन्तीनन्दन! अलक्ष्मी से आविष्ट, कलि से आहत, दर्प से अभिभूत, कर्महीन, विवेकहीन और अभिमान से दबे उन दानवों का शीघ्र ही विनाश हो गया।

श्लोक 14 (3.92.14)

निर्यशस्कास्तथा दैत्याः कृत्स्नशो विलयं गताः । अधर्मरुचयो राजन्नलक्ष्म्या समधिष्ठिताः ॥

niryaśaskāstathā daityāḥ kṛtsnaśo vilayaṃ gatāḥ | adharmarucayo rājannalakṣmyā samadhiṣṭhitāḥ

हे राजन्! इस प्रकार अधर्म में रुचि रखने वाले और अलक्ष्मी के अधीन हुए दैत्य यशहीन होकर पूर्णतः नष्ट हो गए।

श्लोक 15 (3.92.15)

देवास्तु सागरांश्चैव सरितश्च सरांसि च । अभ्यगच्छन्धर्मशीलाः पुण्यान्यायतनानि च ॥

devāstu sāgarāṃścaiva saritaśca sarāṃsi ca | abhyagacchandharmaśīlāḥ puṇyānyāyatanāni ca

परन्तु धर्मशील देवता समुद्रों, नदियों, सरोवरों और पवित्र देवस्थानों में गए।

श्लोक 16 (3.92.16)

तपोभिः क्रतुभिर्दानैराशीर्वादैश्च पाण्डव । प्रजहुः सर्वपापानि श्रेयश्च प्रतिपेदिरे ॥

tapobhiḥ kratubhirdānairāśīrvādaiśca pāṇḍava | prajahuḥ sarvapāpāni śreyaśca pratipedire

हे पाण्डव! तप, यज्ञ, दान और आशीर्वादों से उन्होंने सब पापों को त्याग दिया और कल्याण प्राप्त किया।

श्लोक 17 (3.92.17)

एवमादानवन्तश्च निरादानाश्च सर्वशः । तीर्थान्यगच्छन्विबुधास्तेनापुर्भूतिमुत्तमाम् ॥

evamādānavantaśca nirādānāśca sarvaśaḥ | tīrthānyagacchanvibudhāstenāpurbhūtimuttamām

इस प्रकार नियमों को धारण करने वाले और सब बन्धनों से मुक्त, सभी देवता सर्वत्र तीर्थों में गए, और उसी से उन्होंने परम ऐश्वर्य पाया।

श्लोक 18 (3.92.18)

तथा त्वमपि राजेन्द्र स्नात्वा तीर्थेषु सानुजः । पुनर्वेत्स्यसि तां लक्ष्मीमेष पन्थाः सनातनः ॥

tathā tvamapi rājendra snātvā tīrtheṣu sānujaḥ | punarvetsyasi tāṃ lakṣmīmeṣa panthāḥ sanātanaḥ

हे राजेन्द्र! इसी प्रकार तुम भी अपने छोटे भाइयों के साथ तीर्थों में स्नान करके वह लक्ष्मी फिर प्राप्त करोगे। यही सनातन मार्ग है।

श्लोक 19 (3.92.19)

यथैव हि नृगो राजा शिविरौशीनरो यथा । भगीरथो वसुमना गयः पूरुः पुरूरवाः ॥

yathaiva hi nṛgo rājā śivirauśīnaro yathā | bhagīratho vasumanā gayaḥ pūruḥ purūravāḥ

जैसे राजा नृग, उशीनरपुत्र शिबि, भगीरथ, वसुमना, गय, पूरु और पुरूरवा —

श्लोक 20 (3.92.20)

चरमाणास्तपो नित्यं स्पर्शनादम्भसश्च ते । तीर्थाभिगमनात्पूता दर्शनाच्च महात्मनाम् ॥

caramāṇāstapo nityaṃ sparśanādambhasaśca te | tīrthābhigamanātpūtā darśanācca mahātmanām

निरन्तर तप करते हुए, जल के स्पर्श से, तीर्थयात्रा से और महात्माओं के दर्शन से पवित्र होकर,

श्लोक 21 (3.92.21)

अलभन्त यशः पुण्यं धनानि च विशांपते । तथा त्वमपि राजेन्द्र लब्ध्वा सुविपुलां श्रियम् ॥

alabhanta yaśaḥ puṇyaṃ dhanāni ca viśāṃpate | tathā tvamapi rājendra labdhvā suvipulāṃ śriyam

हे प्रजानाथ! पवित्र यश और धन प्राप्त कर सके — वैसे ही, हे राजेन्द्र, तुम भी विपुल श्री प्राप्त करोगे।

श्लोक 22 (3.92.22)

यथा चेक्ष्वाकुरभवत्सपुत्रजनबान्धवः । मुचुकुन्दोऽथ मांधाता मरुत्तश्च महीपतिः ॥

yathā cekṣvākurabhavatsaputrajanabāndhavaḥ | mucukundo'tha māṃdhātā maruttaśca mahīpatiḥ

और जैसे इक्ष्वाकु अपने पुत्रों, प्रजाजनों और बन्धुओं सहित समृद्ध हुए, तथा मुचुकुन्द, मान्धाता और राजा मरुत्त,

श्लोक 23 (3.92.23)

कीर्तिं पुण्यामविन्दन्त यथा देवास्तपोबलात् । देवर्षयश्च कार्त्स्न्येन तथा त्वमपि वेत्स्यसि ॥

kīrtiṃ puṇyāmavindanta yathā devāstapobalāt | devarṣayaśca kārtsnyena tathā tvamapi vetsyasi

और जैसे देवताओं और देवर्षियों ने तप के बल से पूर्ण रूप से पवित्र कीर्ति पाई, वैसे ही तुम भी पाओगे।

श्लोक 24 (3.92.24)

धार्तराष्ट्रास्त्वधर्मेण मोहेन च वशीकृताः । नचिराद्वै विनङ्क्ष्यन्ति दैत्या इव न संशयः ॥

dhārtarāṣṭrāstvadharmeṇa mohena ca vaśīkṛtāḥ | nacirādvai vinaṅkṣyanti daityā iva na saṃśayaḥ

पर धृतराष्ट्र के पुत्र अधर्म और मोह के वश में होकर दैत्यों की भाँति शीघ्र ही नष्ट हो जाएँगे — इसमें संदेह नहीं।

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