आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 91
ब्राह्मणों का साथ और पाण्डवों का प्रस्थान
युधिष्ठिर के प्रस्थान की तैयारी पर वनवासी ब्राह्मण उनके साथ चलने की प्रार्थना करते हैं, क्योंकि तीर्थ हिंस्र पशुओं और राक्षसों से घिरे हैं और पाण्डवों की रक्षा के बिना वहाँ पहुँचना सम्भव नहीं; युधिष्ठिर भावविभोर होकर स्वीकार कर लेते हैं। फिर व्यास, नारद और पर्वत काम्यक वन में उनसे मिलने आते हैं और उपदेश देते हैं कि तीर्थयात्री को शरीर के नियम के साथ मन से भी शुद्ध होना चाहिए, क्योंकि द्वेषरहित और मैत्रीपूर्ण मन ही सच्ची शुद्धि है। मार्गशीर्ष की पूर्णिमा बीतने पर पुष्य नक्षत्र में पाण्डव, द्रौपदी और धौम्य चीर और मृगचर्म धारण किए, शस्त्र और कवच से सज्जित, चौदह से अधिक रथों और सेवकों के साथ पूर्व दिशा की ओर चल पड़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.91.1)
ततः प्रयान्तं कौन्तेयं ब्राह्मणा वनवासिनः । अभिगम्य तदा राजन्निदं वचनमब्रुवन् ॥
tataḥ prayāntaṃ kaunteyaṃ brāhmaṇā vanavāsinaḥ | abhigamya tadā rājannidaṃ vacanamabruvan
हे राजन्! तब प्रस्थान करते हुए कुन्तीपुत्र के पास वनवासी ब्राह्मण आए और यह बोले —
ब्राह्मणा ऊचुः
श्लोक 2 (3.91.2)
राजंस्तीर्थानि गन्तासि पुण्यानि भ्रातृभिः सह । देवर्षिणा च सहितो लोमशेन महात्मना ॥
rājaṃstīrthāni gantāsi puṇyāni bhrātṛbhiḥ saha | devarṣiṇā ca sahito lomaśena mahātmanā
राजन्! आप अपने भाइयों के साथ और महात्मा देवर्षि लोमश के साथ पवित्र तीर्थों की यात्रा पर जा रहे हैं।
श्लोक 3 (3.91.3)
अस्मानपि महाराज नेतुमर्हसि पाण्डव । अस्माभिर्हि न शक्यानि त्वदृते तानि कौरव ॥
asmānapi mahārāja netumarhasi pāṇḍava | asmābhirhi na śakyāni tvadṛte tāni kaurava
महाराज पाण्डव! हमें भी अपने साथ ले चलिए; हे कौरव, आपके बिना हम उन तक नहीं पहुँच सकते।
श्लोक 4 (3.91.4)
श्वापदैरुपसृष्टानि दुर्गाणि विषमाणि च । अगम्यानि नरैरल्पैस्तीर्थानि मनुजेश्वर ॥
śvāpadairupasṛṣṭāni durgāṇi viṣamāṇi ca | agamyāni narairalpaistīrthāni manujeśvara
हे मनुजेश्वर! वे तीर्थ हिंस्र पशुओं से घिरे, दुर्गम और विषम हैं; थोड़े-से लोग वहाँ नहीं जा सकते।
श्लोक 5 (3.91.5)
भवतो भ्रातरः शूरा धनुर्धरवराः सदा । भवद्भिः पालिताः शूरैर्गच्छामो वयमप्युत ॥
bhavato bhrātaraḥ śūrā dhanurdharavarāḥ sadā | bhavadbhiḥ pālitāḥ śūrairgacchāmo vayamapyuta
आपके भाई शूरवीर हैं और सदा श्रेष्ठ धनुर्धर हैं; आप वीरों से रक्षित होकर हम भी चल सकेंगे।
श्लोक 6 (3.91.6)
भवत्प्रसादाद्धि वयं प्राप्नुयामः सुखं फलम् । तीर्थानां पृथिवीपाल वनानां च विशांपते ॥
bhavatprasādāddhi vayaṃ prāpnuyāmaḥ sukhaṃ phalam | tīrthānāṃ pṛthivīpāla vanānāṃ ca viśāṃpate
हे पृथ्वीपाल, हे प्रजानाथ! आपकी कृपा से हम तीर्थों और वनों का सुखद फल प्राप्त करें।
श्लोक 7 (3.91.7)
तव वीर्यपरित्राताः शुद्धास्तीर्थपरिप्लुताः । भवेम धूतपाप्मानस्तीर्थसंदर्शनान्नृप ॥
tava vīryaparitrātāḥ śuddhāstīrthapariplutāḥ | bhavema dhūtapāpmānastīrthasaṃdarśanānnṛpa
हे नृप! आपके पराक्रम से रक्षित होकर, तीर्थों में स्नान से शुद्ध होकर, हम तीर्थ-दर्शन से निष्पाप हो जाएँ।
श्लोक 8 (3.91.8)
भवानपि नरेन्द्रस्य कार्तवीर्यस्य भारत । अष्टकस्य च राजर्षेर्लोमपादस्य चैव ह ॥
bhavānapi narendrasya kārtavīryasya bhārata | aṣṭakasya ca rājarṣerlomapādasya caiva ha
हे भारत! आप भी राजा कार्तवीर्य, राजर्षि अष्टक और लोमपाद के,
श्लोक 9 (3.91.9)
भरतस्य च वीरस्य सार्वभौमस्य पार्थिव । ध्रुवं प्राप्स्यति दुष्प्रापाँल्लोकांस्तीर्थपरिप्लुतः ॥
bharatasya ca vīrasya sārvabhaumasya pārthiva | dhruvaṃ prāpsyati duṣprāpām̐llokāṃstīrthapariplutaḥ
तथा हे राजन्, सार्वभौम सम्राट् वीर भरत के उन दुर्लभ लोकों को तीर्थों में स्नान करके निश्चय ही प्राप्त करेंगे।
श्लोक 10 (3.91.10)
प्रभासादीनि तीर्थानि महेन्द्रादींश्च पर्वतान् । गङ्गाद्याः सरितश्चैव प्लक्षादींश्च पर्वतान् ॥
prabhāsādīni tīrthāni mahendrādīṃśca parvatān | gaṅgādyāḥ saritaścaiva plakṣādīṃśca parvatān
प्रभास आदि तीर्थ, महेन्द्र आदि पर्वत, गंगा आदि नदियाँ और प्लक्ष आदि पर्वत —
श्लोक 11 (3.91.11)
त्वया सह महीपाल द्रष्टुमिच्छामहे वयम् । भवद्भिः पालिताः शूरैस्तीर्थान्यायतनानि च ॥
tvayā saha mahīpāla draṣṭumicchāmahe vayam | bhavadbhiḥ pālitāḥ śūraistīrthānyāyatanāni ca
हे महीपाल! आप वीरों से रक्षित होकर हम इन तीर्थों और देवस्थानों को आपके साथ देखना चाहते हैं।
श्लोक 12 (3.91.12)
यदि ते ब्राह्मणेष्वस्ति काचित्प्रीतिर्जनाधिप । कुरु क्षिप्रं वचोऽस्माकं ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥
yadi te brāhmaṇeṣvasti kācitprītirjanādhipa | kuru kṣipraṃ vaco'smākaṃ tataḥ śreyo'bhipatsyase
हे जनाधिप! यदि ब्राह्मणों के प्रति आपके मन में कुछ भी प्रीति है, तो शीघ्र हमारी बात मानिए; इससे आपका कल्याण होगा।
श्लोक 13 (3.91.13)
तीर्थानि हि महाबाहो तपोविघ्नकरैः सदा । अनुकीर्णानि रक्षोभिस्तेभ्यो नस्त्रातुमर्हसि ॥
tīrthāni hi mahābāho tapovighnakaraiḥ sadā | anukīrṇāni rakṣobhistebhyo nastrātumarhasi
हे महाबाहो! तीर्थ सदा तपस्या में विघ्न डालने वाले राक्षसों से भरे रहते हैं; उनसे आप हमारी रक्षा कीजिए।
श्लोक 14 (3.91.14)
तीर्थान्युक्तानि धौम्येन नारदेन च धीमता । यान्युवाच च देवर्षिर्लोमशः सुमहातपाः ॥
tīrthānyuktāni dhaumyena nāradena ca dhīmatā | yānyuvāca ca devarṣirlomaśaḥ sumahātapāḥ
धौम्य और बुद्धिमान नारद ने जिन तीर्थों का वर्णन किया है, और महातपस्वी देवर्षि लोमश ने जिनके विषय में कहा है —
श्लोक 15 (3.91.15)
विधिवत्तानि सर्वाणि पर्यटस्व नराधिप । धूतपाप्मा सहास्माभिर्लोमशेनाभिपालितः ॥
vidhivattāni sarvāṇi paryaṭasva narādhipa | dhūtapāpmā sahāsmābhirlomaśenābhipālitaḥ
हे नराधिप! उन सबकी विधिपूर्वक यात्रा कीजिए और हमारे साथ, लोमश से रक्षित होकर, निष्पाप हो जाइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (3.91.16)
स राजा पूज्यमानस्तैर्हर्षादश्रुपरिप्लुतः । भीमसेनादिभिर्वीरैर्भ्रातृभिः परिवारितः ॥
sa rājā pūjyamānastairharṣādaśrupariplutaḥ | bhīmasenādibhirvīrairbhrātṛbhiḥ parivāritaḥ
उनके द्वारा इस प्रकार सम्मानित होकर, भीमसेन आदि वीर भाइयों से घिरे राजा की आँखें हर्ष के आँसुओं से भर आईं,
श्लोक 17 (3.91.17)
बाढमित्यब्रवीत्सर्वांस्तानृषीन्पाण्डवर्षभः । लोमशं समनुज्ञाप्य धौम्यं चैव पुरोहितम् ॥
bāḍhamityabravītsarvāṃstānṛṣīnpāṇḍavarṣabhaḥ | lomaśaṃ samanujñāpya dhaumyaṃ caiva purohitam
और पाण्डवश्रेष्ठ ने उन सब ऋषियों से कहा — 'ठीक है।' फिर लोमश और पुरोहित धौम्य की अनुमति लेकर
श्लोक 18 (3.91.18)
ततः स पाण्डवश्रेष्ठो भ्रातृभिः सहितो वशी । द्रौपद्या चानवद्याङ्ग्या गमनाय मनो दधे ॥
tataḥ sa pāṇḍavaśreṣṭho bhrātṛbhiḥ sahito vaśī | draupadyā cānavadyāṅgyā gamanāya mano dadhe
उस जितेन्द्रिय पाण्डवश्रेष्ठ ने अपने भाइयों और अनिन्द्य सुन्दरी द्रौपदी के साथ प्रस्थान का मन बनाया।
श्लोक 19 (3.91.19)
अथ व्यासो महाभागस्तथा पर्वतनारदौ । काम्यके पाण्डवं द्रष्टुं समाजग्मुर्मनीषिणः ॥
atha vyāso mahābhāgastathā parvatanāradau | kāmyake pāṇḍavaṃ draṣṭuṃ samājagmurmanīṣiṇaḥ
तब महाभाग व्यास तथा पर्वत और नारद — ये मनीषी — पाण्डव से मिलने काम्यक वन में आए।
श्लोक 20 (3.91.20)
तेषां युधिष्ठिरो राजा पूजां चक्रे यथाविधि । सत्कृतास्ते महाभागा युधिष्ठिरमथाब्रुवन् ॥
teṣāṃ yudhiṣṭhiro rājā pūjāṃ cakre yathāvidhi | satkṛtāste mahābhāgā yudhiṣṭhiramathābruvan
राजा युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक उनका पूजन किया; सत्कार पाकर उन महाभाग ऋषियों ने युधिष्ठिर से कहा —
ऋषय ऊचुः
श्लोक 21 (3.91.21)
युधिष्ठिरयमौ भीम मनसा कुरुतार्जवम् । मनसा कृतशौचा वै शुद्धास्तीर्थानि यास्यथ ॥
yudhiṣṭhirayamau bhīma manasā kurutārjavam | manasā kṛtaśaucā vai śuddhāstīrthāni yāsyatha
युधिष्ठिर, नकुल-सहदेव और भीम! अपने मन को सरल बनाओ। मन से शुद्ध होकर ही तुम पवित्र होकर तीर्थों को जाओगे।
श्लोक 22 (3.91.22)
शरीरनियमं प्राहुर्ब्राह्मणा मानुषं व्रतम् । मनोविशुद्धां बुद्धिं च दैवमाहुर्व्रतं द्विजाः ॥
śarīraniyamaṃ prāhurbrāhmaṇā mānuṣaṃ vratam | manoviśuddhāṃ buddhiṃ ca daivamāhurvrataṃ dvijāḥ
ब्राह्मण शरीर के नियम को मानुष व्रत कहते हैं, और मन से शुद्ध हुई बुद्धि को द्विज दैव व्रत कहते हैं।
श्लोक 23 (3.91.23)
मनो ह्यदुष्टं शौचाय पर्याप्तं वै नराधिप । मैत्रीं बुद्धिं समास्थाय शुद्धास्तीर्थानि गच्छत ॥
mano hyaduṣṭaṃ śaucāya paryāptaṃ vai narādhipa | maitrīṃ buddhiṃ samāsthāya śuddhāstīrthāni gacchata
हे नराधिप! शुद्धि के लिए निर्मल मन ही पर्याप्त है। मैत्रीभाव अपनाकर शुद्ध होकर तीर्थों को जाओ।
श्लोक 24 (3.91.24)
ते यूयं मानसैः शुद्धाः शरीरनियमव्रतैः । दैवं व्रतं समास्थाय यथोक्तं फलमाप्स्यथ ॥
te yūyaṃ mānasaiḥ śuddhāḥ śarīraniyamavrataiḥ | daivaṃ vrataṃ samāsthāya yathoktaṃ phalamāpsyatha
अतः तुम लोग मन से शुद्ध होकर, शरीर-नियम के व्रतों का पालन करते हुए और दैव व्रत को अपनाकर, बताया गया फल प्राप्त करोगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (3.91.25)
ते तथेति प्रतिज्ञाय कृष्णया सह पाण्डवाः । कृतस्वस्त्ययनाः सर्वे मुनिभिर्देवमानुषैः ॥
te tatheti pratijñāya kṛṣṇayā saha pāṇḍavāḥ | kṛtasvastyayanāḥ sarve munibhirdevamānuṣaiḥ
'ऐसा ही होगा' — यह वचन देकर द्रौपदी सहित सभी पाण्डवों ने, जिनके लिए दिव्य और मानव मुनियों ने स्वस्तिवाचन किया था,
श्लोक 26 (3.91.26)
लोमशस्योपसंगृह्य पादौ द्वैपायनस्य च । नारदस्य च राजेन्द्र देवर्षेः पर्वतस्य च ॥
lomaśasyopasaṃgṛhya pādau dvaipāyanasya ca | nāradasya ca rājendra devarṣeḥ parvatasya ca
हे राजेन्द्र! लोमश, द्वैपायन, नारद और देवर्षि पर्वत के चरण पकड़कर प्रणाम किया;
श्लोक 27 (3.91.27)
धौम्येन सहिता वीरास्तथा तैर्वनवासिभिः । मार्गशीर्ष्यामतीतायां पुष्येण प्रययुस्ततः ॥
dhaumyena sahitā vīrāstathā tairvanavāsibhiḥ | mārgaśīrṣyāmatītāyāṃ puṣyeṇa prayayustataḥ
फिर धौम्य और उन वनवासियों के साथ वे वीर मार्गशीर्ष की पूर्णिमा बीत जाने पर पुष्य नक्षत्र में वहाँ से चल पड़े।
श्लोक 28 (3.91.28)
कठिनानि समादाय चीराजिनजटाधराः । अभेद्यैः कवचैर्युक्तास्तीर्थान्यन्वचरंस्ततः ॥
kaṭhināni samādāya cīrājinajaṭādharāḥ | abhedyaiḥ kavacairyuktāstīrthānyanvacaraṃstataḥ
पिटारियाँ साथ लेकर, चीर, मृगचर्म और जटा धारण किए, अभेद्य कवच पहने वे तीर्थों की ओर चल पड़े,
श्लोक 29 (3.91.29)
इन्द्रसेनादिभिर्भृत्यै रथैः परिचतुर्दशैः । महानसव्यापृतैश्च तथाऽन्यैः परिचारकैः ॥
indrasenādibhirbhṛtyai rathaiḥ paricaturdaśaiḥ | mahānasavyāpṛtaiśca tathā'nyaiḥ paricārakaiḥ
इन्द्रसेन आदि सेवकों, चौदह से अधिक रथों, रसोई के काम में लगे लोगों और अन्य परिचारकों के साथ।
श्लोक 30 (3.91.30)
सायुधा बद्धनिस्त्रिंशास्तूणवन्तः समार्गणाः । प्राङ्मुखाः प्रययुर्वीराः पाण्डवा जनमेजय ॥
sāyudhā baddhanistriṃśāstūṇavantaḥ samārgaṇāḥ | prāṅmukhāḥ prayayurvīrāḥ pāṇḍavā janamejaya
हे जनमेजय! शस्त्रों से सज्जित, तलवारें बाँधे, तरकश और बाण लिए वे वीर पाण्डव पूर्व दिशा की ओर चल पड़े।