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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 90

अर्जुन का लोमश को सन्देश और युधिष्ठिर का परिजन-विसर्जन

लोमश अर्जुन का यह अनुरोध सुनाते हैं कि वे युधिष्ठिर को तीर्थों तक ले जाएँ और मार्ग में राक्षसों से पाण्डवों की रक्षा करें; वे उनके साथ चलने का वचन देते हैं और तीर्थयात्रा को मनु आदि राजर्षियों का अपनाया मार्ग बताते हैं। इन्द्र उन्हें स्मरण करते हैं, यह जानकर हर्षित युधिष्ठिर चलने को तैयार हो जाते हैं। लोमश के कहने पर कि थोड़े परिजनों के साथ चलें, वे भिक्षाजीवी ब्राह्मणों और यतियों, कष्ट न सह सकने वालों, स्वादिष्ट भोजन के आदी लोगों और राजभक्त पुरवासियों को लौटा देते हैं — धृतराष्ट्र के पास, और उनके न देने पर द्रुपद के पास। अधिकांश लोग हस्तिनापुर लौट जाते हैं, जहाँ धृतराष्ट्र उनका स्नेह से स्वागत करते हैं, और युधिष्ठिर लोमश तथा थोड़े-से ब्राह्मणों के साथ तीन रातें और काम्यक वन में रहते हैं।

अध्याय 89अध्याय-सूचीअध्याय 91

लोमश उवाच

श्लोक 1 (3.90.1)

धनंजयेन चाप्युक्तं यत्तच्छृणु युधिष्ठिर । युधिष्ठिरं भ्रातरं मे योजयेर्धर्म्यया धिया ॥

dhanaṃjayena cāpyuktaṃ yattacchṛṇu yudhiṣṭhira | yudhiṣṭhiraṃ bhrātaraṃ me yojayerdharmyayā dhiyā

हे युधिष्ठिर! धनंजय ने जो कहा, वह भी सुनो — 'मेरे भाई युधिष्ठिर को धर्ममयी बुद्धि से युक्त कीजिए।

श्लोक 2 (3.90.2)

त्वं हि धर्मान्परान्वेत्थ तपांसि च तपोधन । श्रीमतां चापि जानासि धर्मं राज्ञां सनातनम् ॥

tvaṃ hi dharmānparānvettha tapāṃsi ca tapodhana | śrīmatāṃ cāpi jānāsi dharmaṃ rājñāṃ sanātanam

हे तपोधन! आप श्रेष्ठ धर्मों और तपस्याओं को जानते हैं, और श्रीसम्पन्न राजाओं के सनातन धर्म को भी जानते हैं।

श्लोक 3 (3.90.3)

स भवान्परमं वेद पावनं पुरुषं प्रति । तेन संयोजयेथास्त्वं तीर्थपुण्येन पाण्डवान् ॥

sa bhavānparamaṃ veda pāvanaṃ puruṣaṃ prati | tena saṃyojayethāstvaṃ tīrthapuṇyena pāṇḍavān

मनुष्य को पवित्र करने वाला जो सबसे श्रेष्ठ साधन है, उसे आप जानते हैं; उसी तीर्थ-पुण्य से पाण्डवों को युक्त कीजिए।

श्लोक 4 (3.90.4)

यथा तीर्थानि गच्छेत गाश्च दद्यात्स पार्थिवः । तथा सर्वात्मना कार्यमिति मामर्जुनोऽब्रवीत् ॥

yathā tīrthāni gaccheta gāśca dadyātsa pārthivaḥ | tathā sarvātmanā kāryamiti māmarjuno'bravīt

जिस प्रकार वह राजा तीर्थों में जाए और गोदान करे, वैसा पूरे मन से कीजिए' — ऐसा अर्जुन ने मुझसे कहा।

श्लोक 5 (3.90.5)

भवता चानुगुप्तोऽसौ चरेत्तीर्थानि सर्वशः । रक्षोभ्यो रक्षितव्यश्च दुर्गेषु विषमेषु च ॥

bhavatā cānugupto'sau carettīrthāni sarvaśaḥ | rakṣobhyo rakṣitavyaśca durgeṣu viṣameṣu ca

'आपसे रक्षित होकर वह सभी तीर्थों में विचरण करे। दुर्गम और विषम स्थानों में राक्षसों से उसकी रक्षा की जानी चाहिए।

श्लोक 6 (3.90.6)

दधीच इव देवेन्द्रं यथा चाप्यङ्गिरा रविम् । तथा रक्षस्व कौन्तेयान्राक्षसेभ्यो द्विजोत्तम ॥

dadhīca iva devendraṃ yathā cāpyaṅgirā ravim | tathā rakṣasva kaunteyānrākṣasebhyo dvijottama

हे द्विजश्रेष्ठ! जैसे दधीच ने देवराज इन्द्र की और अंगिरा ने सूर्य की रक्षा की थी, वैसे ही आप कुन्तीपुत्रों की राक्षसों से रक्षा कीजिए।

श्लोक 7 (3.90.7)

यातुधाना हि बहवो राक्षसाः पर्वतोपमाः । त्वयाऽभिगुप्तान्कौन्तेयान्न विवर्तेयुरन्तिकम् ॥

yātudhānā hi bahavo rākṣasāḥ parvatopamāḥ | tvayā'bhiguptānkaunteyānna vivarteyurantikam

क्योंकि पर्वत जैसे विशाल बहुत-से यातुधान राक्षस हैं; पर आपके द्वारा रक्षित कुन्तीपुत्रों के निकट वे नहीं आ सकेंगे।'

श्लोक 8 (3.90.8)

सोऽहमिन्द्रस्य वचनान्नियोगादर्जुनस्य च । रक्षमाणो भयेभ्यस्त्वां चरिष्यामि त्वया सह ॥

so'hamindrasya vacanānniyogādarjunasya ca | rakṣamāṇo bhayebhyastvāṃ cariṣyāmi tvayā saha

इसलिए इन्द्र के वचन और अर्जुन के आग्रह से मैं भयों से तुम्हारी रक्षा करता हुआ तुम्हारे साथ विचरण करूँगा।

श्लोक 9 (3.90.9)

द्विस्तीर्थानि मया पूर्वं दृष्टानि कुरुनन्दन । इदं तृतीयं द्रक्ष्यामि तान्येव भवता सह ॥

dvistīrthāni mayā pūrvaṃ dṛṣṭāni kurunandana | idaṃ tṛtīyaṃ drakṣyāmi tānyeva bhavatā saha

हे कुरुनन्दन! मैंने पहले दो बार तीर्थों के दर्शन किए हैं; अब तीसरी बार उन्हीं को तुम्हारे साथ देखूँगा।

श्लोक 10 (3.90.10)

इयं राजर्षिभिर्याता पुण्यकृद्भिर्युधिष्ठिर । मन्वादिभिर्महाराज तीर्थयात्रा भयापहा ॥

iyaṃ rājarṣibhiryātā puṇyakṛdbhiryudhiṣṭhira | manvādibhirmahārāja tīrthayātrā bhayāpahā

हे महाराज युधिष्ठिर! भय को दूर करने वाली यह तीर्थयात्रा मनु आदि पुण्यकर्मा राजर्षियों ने की थी।

श्लोक 11 (3.90.11)

नानृजुर्नाकृतात्मा च नाविद्यो न च पापकृत् । स्नाति तीर्थेषु कौरव्य न च वक्रमतिर्नरः ॥

nānṛjurnākṛtātmā ca nāvidyo na ca pāpakṛt | snāti tīrtheṣu kauravya na ca vakramatirnaraḥ

हे कौरव्य! जो कुटिल है, जिसने मन को वश में नहीं किया, जो अविद्वान्, पापी या वक्रबुद्धि है, वह तीर्थों में स्नान नहीं करता।

श्लोक 12 (3.90.12)

त्वं तु धर्ममतिर्नित्यं धर्मज्ञः सत्यसंगरः । विमुक्तः सर्वपापेभ्यो भूय एव भविष्यसि ॥

tvaṃ tu dharmamatirnityaṃ dharmajñaḥ satyasaṃgaraḥ | vimuktaḥ sarvapāpebhyo bhūya eva bhaviṣyasi

पर तुम्हारी बुद्धि सदा धर्म में लगी रहती है, तुम धर्मज्ञ और सत्यप्रतिज्ञ हो; तुम सब पापों से और भी अधिक मुक्त हो जाओगे।

श्लोक 13 (3.90.13)

यथा भगीरथो राजा राजानश्च गयादयः । यथा ययातिः कौन्तेय तथा त्वमपि पाण्डव ॥

yathā bhagīratho rājā rājānaśca gayādayaḥ | yathā yayātiḥ kaunteya tathā tvamapi pāṇḍava

हे कुन्तीनन्दन पाण्डव! जैसे राजा भगीरथ ने, गय आदि राजाओं ने और ययाति ने किया, वैसे ही तुम भी करोगे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 14 (3.90.14)

न हर्षात्संप्रपश्यामि वाक्यस्यास्योत्तरं क्वचित् । यन्मां स्मरति देवेशः किं नामाभ्यधिकं ततः ॥

na harṣātsaṃprapaśyāmi vākyasyāsyottaraṃ kvacit | yanmāṃ smarati deveśaḥ kiṃ nāmābhyadhikaṃ tataḥ

हर्ष के कारण मुझे इस बात का कोई उत्तर नहीं सूझता। देवराज मुझे स्मरण करते हैं — इससे बढ़कर और क्या हो सकता है?

श्लोक 15 (3.90.15)

भवता संगमो यस्य भ्राता चैव धनंजयः । वासवः स्मरते यस्य को नामाभ्यधिकस्ततः ॥

bhavatā saṃgamo yasya bhrātā caiva dhanaṃjayaḥ | vāsavaḥ smarate yasya ko nāmābhyadhikastataḥ

जिसे आपका संग मिला हो, जिसका भाई धनंजय हो और जिसे इन्द्र स्मरण करते हों — उससे बढ़कर भाग्यशाली कौन होगा?

श्लोक 16 (3.90.16)

यच्च मां भगवानाह तीर्थानां गमनं प्रति । धौम्यस्य वचनादेषा बुद्धिः पूर्वं कृतैव मे ॥

yacca māṃ bhagavānāha tīrthānāṃ gamanaṃ prati | dhaumyasya vacanādeṣā buddhiḥ pūrvaṃ kṛtaiva me

हे भगवन्! तीर्थयात्रा के विषय में आपने जो कहा, उसका निश्चय मैंने धौम्य के कहने पर पहले ही कर लिया था।

श्लोक 17 (3.90.17)

तद्यदा मन्यसे ब्रह्मन्गमनं तीर्थदर्शने । तदैव गन्तास्मि तीर्थान्येष मे निश्चयः परः ॥

tadyadā manyase brahmangamanaṃ tīrthadarśane | tadaiva gantāsmi tīrthānyeṣa me niścayaḥ paraḥ

अतः हे ब्रह्मन्! आप तीर्थ-दर्शन के लिए जब भी चलना उचित समझें, मैं तभी तीर्थों को चल दूँगा — यह मेरा दृढ़ निश्चय है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (3.90.18)

गमने कृतबुद्धिं तं पाण्डवं लोमशोऽब्रवीत् । लघुर्भव महाराज लघुः स्वैरं गमिष्यसि ॥

gamane kṛtabuddhiṃ taṃ pāṇḍavaṃ lomaśo'bravīt | laghurbhava mahārāja laghuḥ svairaṃ gamiṣyasi

जाने का निश्चय कर चुके उन पाण्डुपुत्र से लोमश ने कहा — 'महाराज! थोड़े परिजनों के साथ चलो; हल्के रहकर तुम सुखपूर्वक जा सकोगे।'

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 19 (3.90.19)

भिक्षाभुजो निवर्तन्तां ब्राह्मणा यतयश्च ये ॥

bhikṣābhujo nivartantāṃ brāhmaṇā yatayaśca ye

भिक्षा पर जीने वाले ब्राह्मण और यति लौट जाएँ।

श्लोक 20 (3.90.20)

क्षुत्तृडध्वश्रमायासशीतार्तिमसहिष्णवः । ते सर्वे विनिवर्तन्तां ये च मृष्टभुजो द्विजाः ॥

kṣuttṛḍadhvaśramāyāsaśītārtimasahiṣṇavaḥ | te sarve vinivartantāṃ ye ca mṛṣṭabhujo dvijāḥ

जो भूख, प्यास, मार्ग का श्रम, थकान और ठंड का कष्ट नहीं सह सकते, वे सब लौट जाएँ, और वे ब्राह्मण भी जो स्वादिष्ट भोजन के आदी हैं।

श्लोक 21 (3.90.21)

पक्वान्नलेह्यपानानां मांसानां च विकल्पकाः । तेऽपि सर्वे निवर्तन्तां ये च सूदानुयायिनः । मया यथोचिताऽऽजीव्यैः संविभक्ताश्च वृत्तिभिः ॥

pakvānnalehyapānānāṃ māṃsānāṃ ca vikalpakāḥ | te'pi sarve nivartantāṃ ye ca sūdānuyāyinaḥ | mayā yathocitā''jīvyaiḥ saṃvibhaktāśca vṛttibhiḥ

जो पके अन्न, लेह्य पदार्थों, पेयों और मांस के भेद में रुचि रखते हैं, वे सब भी लौट जाएँ, और जो रसोइयों के पीछे चलते हैं वे भी। मैंने उन्हें यथोचित आश्रितों और जीविका के साधनों से युक्त कर दिया है।

श्लोक 22 (3.90.22)

ये चाप्यनुगताः पौरा राजभक्तिपुरःसराः । धृतराष्ट्रं महाराजमभिगच्छन्तु ते च वै । स दास्यति यथाकालमुचिता यस्य या भृतिः ॥

ye cāpyanugatāḥ paurā rājabhaktipuraḥsarāḥ | dhṛtarāṣṭraṃ mahārājamabhigacchantu te ca vai | sa dāsyati yathākālamucitā yasya yā bhṛtiḥ

और जो पुरवासी राजभक्ति के कारण मेरे पीछे आए हैं, वे महाराज धृतराष्ट्र के पास चले जाएँ। वे समय पर प्रत्येक को उसकी उचित वृत्ति देंगे।

श्लोक 23 (3.90.23)

स चेद्यथोचितां वृत्तिं न दद्यान्मनुजेश्वरः । अस्मत्प्रियहितार्थाय पाञ्चाल्यो वः प्रदास्यति ॥

sa cedyathocitāṃ vṛttiṃ na dadyānmanujeśvaraḥ | asmatpriyahitārthāya pāñcālyo vaḥ pradāsyati

और यदि वे नरेश्वर तुम्हें उचित वृत्ति न दें, तो हमारे प्रेम और हित के लिए पांचालराज द्रुपद तुम्हें देंगे।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 24 (3.90.24)

ततो भूयिष्ठशः पौरा गुरौ भारे समाहिते । विप्राश्च यतयो मुख्या जग्मुर्नागपुरं प्रति ॥

tato bhūyiṣṭhaśaḥ paurā gurau bhāre samāhite | viprāśca yatayo mukhyā jagmurnāgapuraṃ prati

तब अधिकांश पुरवासी, मानो भारी बोझ से दबे हुए, तथा प्रमुख ब्राह्मण और यति नागपुर (हस्तिनापुर) को चले गए।

श्लोक 25 (3.90.25)

तान्सर्वान्धर्मराजस्य प्रेम्णा राजाऽम्बिकासुतः । प्रतिजग्राह विधिवद्धनैश्च समतर्पयत् ॥

tānsarvāndharmarājasya premṇā rājā'mbikāsutaḥ | pratijagrāha vidhivaddhanaiśca samatarpayat

अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र ने धर्मराज के प्रति स्नेह के कारण उन सबको विधिपूर्वक अपनाया और धन देकर संतुष्ट किया।

श्लोक 26 (3.90.26)

ततः कुन्तीसुतो राजा लघुभिर्ब्राह्मणैः सह । लोमशेन च सुप्रीतस्त्रिरात्रं काम्यकेऽवसत् ॥

tataḥ kuntīsuto rājā laghubhirbrāhmaṇaiḥ saha | lomaśena ca suprītastrirātraṃ kāmyake'vasat

तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर थोड़े-से ब्राह्मणों और लोमश के साथ अत्यन्त प्रसन्न होकर तीन रातें काम्यक वन में रहे।

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