आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 89
लोमश द्वारा इन्द्र का सन्देश
धौम्य अभी बोल ही रहे थे कि महर्षि लोमश पाण्डवों के बीच आ पहुँचते हैं। वे युधिष्ठिर को बताते हैं कि उन्होंने अर्जुन को इन्द्र के आधे आसन पर बैठे देखा है, और अर्जुन ने रुद्र से ब्रह्मशिर अस्त्र, यम, कुबेर, वरुण और इन्द्र से दिव्य अस्त्र तथा गन्धर्वों से गीत, नृत्य और वाद्य की विद्या पाई है। फिर वे इन्द्र का सन्देश सुनाते हैं — अर्जुन देवताओं का महान कार्य पूरा करके शीघ्र लौटेगा; युधिष्ठिर तप में लगें; कर्ण अर्जुन की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं, और इन्द्र उसका भय दूर करेंगे; तथा तीर्थयात्रा में लोमश उनका मार्गदर्शन करेंगे।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (3.89.1)
एवं संभाषमाणे तु धौम्ये कौरवनन्दन । लोमशः स महातेजा ऋषिस्तत्राजगाम ह ॥
evaṃ saṃbhāṣamāṇe tu dhaumye kauravanandana | lomaśaḥ sa mahātejā ṛṣistatrājagāma ha
हे कुरुनन्दन! जब धौम्य इस प्रकार कह रहे थे, तभी महातेजस्वी ऋषि लोमश वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 2 (3.89.2)
तं पाण्डवाग्रजो राजा सगणो ब्राह्मणाश्च ते । उपातिष्ठन्महाभागं दिवि शक्रमिवामराः ॥
taṃ pāṇḍavāgrajo rājā sagaṇo brāhmaṇāśca te | upātiṣṭhanmahābhāgaṃ divi śakramivāmarāḥ
पाण्डवों में ज्येष्ठ राजा युधिष्ठिर अपने साथियों और उन ब्राह्मणों के साथ उन महाभाग ऋषि की सेवा में वैसे ही उपस्थित हुए, जैसे स्वर्ग में देवता इन्द्र की सेवा में उपस्थित होते हैं।
श्लोक 3 (3.89.3)
समभ्यर्च्य यथान्यायं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । पप्रच्छागमने हेतुमटने च प्रयोजनम् ॥
samabhyarcya yathānyāyaṃ dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | papracchāgamane hetumaṭane ca prayojanam
धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक उनका पूजन किया और उनके आने का कारण तथा उनके भ्रमण का प्रयोजन पूछा।
श्लोक 4 (3.89.4)
स पृष्टः पाण्डुपुत्रेण प्रीयमाणो महामनाः । उवाच श्लक्ष्णया वाचा हर्षयन्निव पाण्डवान् ॥
sa pṛṣṭaḥ pāṇḍuputreṇa prīyamāṇo mahāmanāḥ | uvāca ślakṣṇayā vācā harṣayanniva pāṇḍavān
पाण्डुपुत्र के पूछने पर वे उदारचित्त ऋषि प्रसन्न हुए और मधुर वाणी में बोले, मानो पाण्डवों को हर्षित कर रहे हों।
लोमश उवाच
श्लोक 5 (3.89.5)
संचरन्नस्मि कौन्तेय सर्वांल्लोकान्यदृच्छया । गतः शक्रस्य भवनं तत्रापश्यं सुरेश्वरम् ॥
saṃcarannasmi kaunteya sarvāṃllokānyadṛcchayā | gataḥ śakrasya bhavanaṃ tatrāpaśyaṃ sureśvaram
हे कुन्तीनन्दन! अपनी इच्छा से सब लोकों में विचरता हुआ मैं इन्द्र के भवन में गया और वहाँ मैंने देवराज को देखा।
श्लोक 6 (3.89.6)
तव च भ्रातरं वीरमपश्यं सव्यसाचिनम् । शक्रस्यार्धासनगतं तत्र मे विस्मयो महान् ॥
tava ca bhrātaraṃ vīramapaśyaṃ savyasācinam | śakrasyārdhāsanagataṃ tatra me vismayo mahān
और वहाँ मैंने तुम्हारे वीर भाई सव्यसाची को इन्द्र के आधे आसन पर बैठे देखा। तब मुझे बड़ा विस्मय हुआ,
श्लोक 7 (3.89.7)
आसीत्पुरुषशार्दूल दृष्ट्वा पार्थं तथागतम् । आह मां तत्र देवेशो गच्छ पाण्डुसुतान्प्रति ॥
āsītpuruṣaśārdūla dṛṣṭvā pārthaṃ tathāgatam | āha māṃ tatra deveśo gaccha pāṇḍusutānprati
हे पुरुषसिंह, अर्जुन को उस स्थिति में देखकर। तब देवराज ने मुझसे कहा — 'पाण्डुपुत्रों के पास जाओ।'
श्लोक 8 (3.89.8)
सोऽहमभ्यागतः क्षिप्रं दिदृक्षुस्त्वां सहानुजम् । वचनात्पुरुहूतस्य पार्थस्य च महात्मनः ॥
so'hamabhyāgataḥ kṣipraṃ didṛkṣustvāṃ sahānujam | vacanātpuruhūtasya pārthasya ca mahātmanaḥ
इसलिए इन्द्र और महात्मा अर्जुन के कहने पर मैं तुम्हें और तुम्हारे छोटे भाइयों को देखने की इच्छा से शीघ्र यहाँ आया हूँ।
श्लोक 9 (3.89.9)
आख्यास्ये ते प्रियं तात महत्पाण्डवनन्दन । भ्रातृभिः सहितो राजन्कृष्णया चैव तच्छृणु ॥
ākhyāsye te priyaṃ tāta mahatpāṇḍavanandana | bhrātṛbhiḥ sahito rājankṛṣṇayā caiva tacchṛṇu
हे तात, हे पाण्डवनन्दन! मैं तुम्हें एक अत्यन्त प्रिय समाचार सुनाऊँगा। हे राजन्! अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ उसे सुनो।
श्लोक 10 (3.89.10)
यत्त्वयोक्तो महाबाहुरस्त्रार्थं भरतर्षभ । तदस्त्रमाप्तं पार्थेन रुद्रादप्रतिमं विभो ॥
yattvayokto mahābāhurastrārthaṃ bharatarṣabha | tadastramāptaṃ pārthena rudrādapratimaṃ vibho
हे भरतश्रेष्ठ, हे प्रभो! जिस अस्त्र के लिए तुमने महाबाहु अर्जुन को भेजा था, वह अनुपम अस्त्र अर्जुन ने रुद्र से प्राप्त कर लिया है —
श्लोक 11 (3.89.11)
यत्तद्ब्रह्मशिरो नाम तपसा रुद्रमागमत् । अमृतादुत्थितं रौद्रं तल्लब्धं सव्यसाचिना ॥
yattadbrahmaśiro nāma tapasā rudramāgamat | amṛtādutthitaṃ raudraṃ tallabdhaṃ savyasācinā
वह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र, जो तपस्या से रुद्र को प्राप्त हुआ था। अमृत से उत्पन्न वह रौद्र अस्त्र सव्यसाची ने पा लिया है,
श्लोक 12 (3.89.12)
तत्समन्त्रं ससंहारं सप्रायश्चित्तमङ्गलम् । वज्रमस्त्राणि चान्यानि दण्डादीनि युधिष्ठिर ॥
tatsamantraṃ sasaṃhāraṃ saprāyaścittamaṅgalam | vajramastrāṇi cānyāni daṇḍādīni yudhiṣṭhira
उसके मन्त्रों, उसे लौटाने की विधि, प्रायश्चित्त और मंगल-विधि सहित; और हे युधिष्ठिर, वज्र तथा दण्ड आदि अन्य अस्त्र भी।
श्लोक 13 (3.89.13)
यमात्कुबेराद्वरुणादिन्द्राच्च कुरुनन्दन । अस्त्राण्यधीतवान्पार्थो दिव्यान्यमितविक्रमः ॥
yamātkuberādvaruṇādindrācca kurunandana | astrāṇyadhītavānpārtho divyānyamitavikramaḥ
हे कुरुनन्दन! अतुल पराक्रमी अर्जुन ने यम, कुबेर, वरुण और इन्द्र से दिव्य अस्त्रों की शिक्षा पाई है।
श्लोक 14 (3.89.14)
विश्वावसोस्तु तनयाद्गीतं नृत्यं च साम च । वादित्रं च यथान्यायं प्रत्यविन्दद्यथाविधि ॥
viśvāvasostu tanayādgītaṃ nṛtyaṃ ca sāma ca | vāditraṃ ca yathānyāyaṃ pratyavindadyathāvidhi
विश्वावसु के पुत्र से उसने विधिपूर्वक गीत, नृत्य, सामगान और यथोचित रूप से वाद्य-संगीत भी सीखा है।
श्लोक 15 (3.89.15)
एवं कृतास्त्रः कौन्तेयो गान्धर्वं वेदमात्मवान् । सुखं वसति बीभत्सुरनुजस्यानुजस्तव ॥
evaṃ kṛtāstraḥ kaunteyo gāndharvaṃ vedamātmavān | sukhaṃ vasati bībhatsuranujasyānujastava
इस प्रकार अस्त्रविद्या में निपुण होकर और गान्धर्ववेद सीखकर, तुम्हारे छोटे भाई का छोटा भाई, आत्मसंयमी कुन्तीपुत्र बीभत्सु सुखपूर्वक रह रहा है।
श्लोक 16 (3.89.16)
यदर्थं मां सुरश्रेष्ठ इदं वचनमब्रवीत् । तच्च ते कथयिष्यामि युधिष्ठिर निबोध मे ॥
yadarthaṃ māṃ suraśreṣṭha idaṃ vacanamabravīt | tacca te kathayiṣyāmi yudhiṣṭhira nibodha me
अब मैं तुम्हें बताऊँगा कि देवश्रेष्ठ इन्द्र ने मुझसे यह बात किस प्रयोजन से कही थी। हे युधिष्ठिर, मेरी बात सुनो।
श्लोक 17 (3.89.17)
भवान्मनुष्यलोकेऽपि गमिष्यति न संशयः । ब्रूयाद्युधिष्ठिरं तत्र वचनान्मे द्विजोत्तम ॥
bhavānmanuṣyaloke'pi gamiṣyati na saṃśayaḥ | brūyādyudhiṣṭhiraṃ tatra vacanānme dvijottama
'आप निःसन्देह मनुष्यलोक में भी जाएँगे। हे द्विजश्रेष्ठ! वहाँ मेरी ओर से युधिष्ठिर से यह कहिए —
श्लोक 18 (3.89.18)
आगमिष्यति ते भ्राता कृतास्त्रः क्षिप्रमर्जुनः । सुरकार्यं महत्कृत्वा यदशक्यं दिवौकसैः ॥
āgamiṣyati te bhrātā kṛtāstraḥ kṣipramarjunaḥ | surakāryaṃ mahatkṛtvā yadaśakyaṃ divaukasaiḥ
तुम्हारा भाई अर्जुन अस्त्रविद्या में निपुण होकर शीघ्र लौटेगा, देवताओं का वह महान कार्य पूरा करके जिसे स्वर्गवासी स्वयं नहीं कर सकते।
श्लोक 19 (3.89.19)
तपसाऽपि त्वमात्मानं योजय भ्रातृभिः सह । तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् ॥
tapasā'pi tvamātmānaṃ yojaya bhrātṛbhiḥ saha | tapaso hi paraṃ nāsti tapasā vindate mahat
तुम भी अपने भाइयों के साथ स्वयं को तप में लगाओ। तप से बढ़कर कुछ नहीं है; तप से ही महान फल मिलता है।
श्लोक 20 (3.89.20)
अहं च कर्णं जानामि यथावद्भरतर्षभ । सत्यसन्धं महोत्साहं महावीर्यं महाबलम् ॥
ahaṃ ca karṇaṃ jānāmi yathāvadbharatarṣabha | satyasandhaṃ mahotsāhaṃ mahāvīryaṃ mahābalam
हे भरतश्रेष्ठ! मैं कर्ण को भी भली-भाँति जानता हूँ — वह सत्यप्रतिज्ञ, महान उत्साही, महापराक्रमी और महाबली है,
श्लोक 21 (3.89.21)
महाहवेष्वप्रतिमं महायुद्धविशारदम् । महाधनुर्धरं वीरं महास्त्रं वरवर्णिनम् ॥
mahāhaveṣvapratimaṃ mahāyuddhaviśāradam | mahādhanurdharaṃ vīraṃ mahāstraṃ varavarṇinam
बड़े-बड़े युद्धों में अद्वितीय, महासंग्राम में निपुण, महाधनुर्धर वीर, महान अस्त्रों का ज्ञाता और अत्यन्त सुन्दर है;
श्लोक 22 (3.89.22)
महेश्वरसुतप्रख्यमादित्यतनयं प्रभुम् । तथाऽर्जुनमतिस्कन्धं सहजोल्वणपौरुषम् ॥
maheśvarasutaprakhyamādityatanayaṃ prabhum | tathā'rjunamatiskandhaṃ sahajolvaṇapauruṣam
वह सूर्य का प्रतापी पुत्र है, महेश्वर के पुत्र स्कन्द के समान। उसी प्रकार मैं ऊँचे कंधों वाले, जन्मजात प्रचण्ड पौरुष से युक्त अर्जुन को भी जानता हूँ।
श्लोक 23 (3.89.23)
न स पार्थस्य संग्रामे कलामर्हति षोडशीम् ॥
na sa pārthasya saṃgrāme kalāmarhati ṣoḍaśīm
युद्ध में कर्ण अर्जुन की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं है।
श्लोक 24 (3.89.24)
यच्चापि ते भयं कर्णान्मनसिस्थमरिंदम । तच्चाप्यपहरिष्यामि सव्यसाचिन्युपागते ॥
yaccāpi te bhayaṃ karṇānmanasisthamariṃdama | taccāpyapahariṣyāmi savyasācinyupāgate
हे शत्रुदमन! कर्ण से जो भय तुम्हारे मन में बैठा है, उसे भी मैं सव्यसाची के लौट आने पर दूर कर दूँगा।
श्लोक 25 (3.89.25)
यच्च ते मानसं वीर तीर्थयात्रामिमां प्रति । स महर्षिर्लोमशस्ते कथयिष्यत्यसंशयम् ॥
yacca te mānasaṃ vīra tīrthayātrāmimāṃ prati | sa maharṣirlomaśaste kathayiṣyatyasaṃśayam
हे वीर! इस तीर्थयात्रा के विषय में तुम्हारे मन में जो कुछ है, उसके बारे में महर्षि लोमश तुम्हें निःसन्देह बताएँगे।
श्लोक 26 (3.89.26)
यच्च किंचित्तपोयुक्तं फलं तीर्थेषु भारत । ब्रह्मर्षिरेष ब्रूयात्ते न तच्छ्रद्धेयमन्यथा ॥
yacca kiṃcittapoyuktaṃ phalaṃ tīrtheṣu bhārata | brahmarṣireṣa brūyātte na tacchraddheyamanyathā
हे भारत! तीर्थों में तप से युक्त जो भी फल मिलता है, वह ये ब्रह्मर्षि तुम्हें बताएँगे। उस पर श्रद्धा रखना, उसे अन्यथा मत समझना।'