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आरण्यक (वन) पर्व · अध्याय 88

उत्तर दिशा के तीर्थ

धौम्य उत्तर दिशा के वर्णन से अपना विवरण पूरा करते हैं: सरस्वती और यमुना, प्लक्षावतरण, अग्निशिर जहाँ सहदेव ने यज्ञ किया, भरत के अश्वमेधों का स्थान, शरभंग का आश्रम, दृषद्वती, दाल्भ्य का आश्रम, विशाखयूप, और पलाशक जहाँ नदियाँ जमदग्नि के यज्ञ में आईं। वे गंगाद्वार, कनखल, पुरु पर्वत और भृगुतुंग का वर्णन करते हैं, और अन्त में नारायण के आश्रम बदरी की सबसे पवित्र स्थान के रूप में स्तुति करते हैं। वे युधिष्ठिर को आश्वासन देते हैं कि इन तीर्थों की यात्रा से अर्जुन के लिए उनकी उत्कण्ठा दूर हो जाएगी।

अध्याय 87अध्याय-सूचीअध्याय 89

धौम्य उवाच

श्लोक 1 (3.88.1)

उदीच्यां राजशार्दूल दिशि पुण्यानि यानि वै । तानि ते कीर्तयिष्यामि पुण्यान्यायतनानि च ॥

udīcyāṃ rājaśārdūla diśi puṇyāni yāni vai | tāni te kīrtayiṣyāmi puṇyānyāyatanāni ca

हे राजसिंह, अब मैं तुम्हें उत्तर दिशा के पुण्य स्थानों और पवित्र तीर्थों का वर्णन सुनाऊँगा।

श्लोक 2 (3.88.2)

शृणुष्वावहितो भूत्वा मम मन्त्रयतः प्रभो । कथाप्रतिग्रहो वीर श्रद्धां जनयते शुभाम् ॥

śṛṇuṣvāvahito bhūtvā mama mantrayataḥ prabho | kathāpratigraho vīra śraddhāṃ janayate śubhām

हे प्रभो, मेरी बात ध्यान देकर सुनो; हे वीर, ऐसी कथाओं को ग्रहण करने से शुभ श्रद्धा उत्पन्न होती है।

श्लोक 3 (3.88.3)

सरस्वती महापुण्या ह्रदिनी तीर्थमालिनी । समुद्रगा महावेगा यमुना यत्र पाण्डव ॥

sarasvatī mahāpuṇyā hradinī tīrthamālinī | samudragā mahāvegā yamunā yatra pāṇḍava

हे पाण्डव, वहाँ अत्यन्त पवित्र सरस्वती है, जो कुण्डों से भरी और तीर्थों की माला से सजी है; और वहीं समुद्र की ओर बहने वाली वेगवती यमुना है।

श्लोक 4 (3.88.4)

यत्र पुण्यतरं तीर्थं प्लक्षावतरणं शुभम् । यत्र सारस्वतैरिष्ट्वा गच्छन्त्यवभृथं द्विजाः ॥

yatra puṇyataraṃ tīrthaṃ plakṣāvataraṇaṃ śubham | yatra sārasvatairiṣṭvā gacchantyavabhṛthaṃ dvijāḥ

वहाँ और भी पवित्र, कल्याणकारी प्लक्षावतरण तीर्थ है, जहाँ ब्राह्मण सारस्वत यज्ञ करके अवभृथ स्नान के लिए जाते हैं।

श्लोक 5 (3.88.5)

पुण्यं चाख्यायते दिव्यं शिवमग्निशिरोऽनघ । सहदेवोऽयजद्यत्र शम्याक्षेपेण भारत ॥

puṇyaṃ cākhyāyate divyaṃ śivamagniśiro'nagha | sahadevo'yajadyatra śamyākṣepeṇa bhārata

हे निष्पाप, हे भारत, वहीं पवित्र, दिव्य और कल्याणकारी अग्निशिर तीर्थ बताया जाता है, जहाँ सहदेव ने शम्या (जुए की कील) फेंककर नापी गई भूमि पर यज्ञ किया था।

श्लोक 6 (3.88.6)

एतस्मिन्नेव चार्थेऽसौ इन्द्रगीता युधिष्ठिर । गाथा चरति लोकेऽस्मिन्गीयमाना द्विजातिभिः ॥

etasminneva cārthe'sau indragītā yudhiṣṭhira | gāthā carati loke'smingīyamānā dvijātibhiḥ

हे युधिष्ठिर, इसी विषय में इन्द्र द्वारा गाई हुई एक गाथा इस लोक में प्रचलित है, जिसे द्विज गाते हैं—

श्लोक 7 (3.88.7)

अग्नयः सहदेवेन ये चिता यमुनामनु । ते तस्य कुरुशार्दूल सहस्रशतदक्षिणाः ॥

agnayaḥ sahadevena ye citā yamunāmanu | te tasya kuruśārdūla sahasraśatadakṣiṇāḥ

"हे कुरुसिंह, सहदेव ने यमुना के किनारे-किनारे जो अग्नियाँ चयन कीं, उनमें से प्रत्येक में लाख-लाख की दक्षिणा दी गई थी।"

श्लोक 8 (3.88.8)

तत्रैव भरतो राजा चक्रवर्ती महायशाः । विंशतिं सप्त चाष्टौ च हयमेधानुपाहरत् ॥

tatraiva bharato rājā cakravartī mahāyaśāḥ | viṃśatiṃ sapta cāṣṭau ca hayamedhānupāharat

वहीं महायशस्वी चक्रवर्ती राजा भरत ने बीस, सात और आठ अश्वमेध यज्ञ किए।

श्लोक 9 (3.88.9)

कामकृद्यो द्विजातीनां श्रुतस्तात यथा पुरा । अत्यन्तमाश्रमः पुण्यः शरभङ्गस्य विश्रुतः ॥

kāmakṛdyo dvijātīnāṃ śrutastāta yathā purā | atyantamāśramaḥ puṇyaḥ śarabhaṅgasya viśrutaḥ

हे तात, वहीं शरभंग का अत्यन्त पवित्र और विख्यात आश्रम है, जिनके विषय में प्राचीन काल से सुना जाता है कि वे द्विजों की कामनाएँ पूरी करते थे।

श्लोक 10 (3.88.10)

सरस्वती नदी सद्भिः सततं पार्थ पूजिता । वालखिल्यैर्महाराज यत्रेष्टमृषिभिः पुरा ॥

sarasvatī nadī sadbhiḥ satataṃ pārtha pūjitā | vālakhilyairmahārāja yatreṣṭamṛṣibhiḥ purā

हे पार्थ, वहीं सत्पुरुषों द्वारा सदा पूजित सरस्वती नदी है, जहाँ हे महाराज, पूर्वकाल में वालखिल्य ऋषियों ने यज्ञ किया था।

श्लोक 11 (3.88.11)

दृषद्वती महापुण्या यत्र ख्याता युधिष्ठिर । न्यग्रोधाख्यस्तु पुण्याख्यः पाञ्चाल्यो द्विपदां वर । दाल्भ्यघोषश्च दाल्भ्यश्च धरणीस्थो महात्मनः ॥

dṛṣadvatī mahāpuṇyā yatra khyātā yudhiṣṭhira | nyagrodhākhyastu puṇyākhyaḥ pāñcālyo dvipadāṃ vara | dālbhyaghoṣaśca dālbhyaśca dharaṇīstho mahātmanaḥ

हे युधिष्ठिर, वहाँ परम पवित्र दृषद्वती विख्यात है; और हे नरश्रेष्ठ, वहीं पुण्य नाम से प्रसिद्ध न्यग्रोध और पांचाल्य हैं; दाल्भ्यघोष है, और महात्मा दाल्भ्य का पृथ्वी पर स्थित—

श्लोक 12 (3.88.12)

कौन्तेयानन्तयशसः सुव्रतस्यामितौजसः । आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥

kaunteyānantayaśasaḥ suvratasyāmitaujasaḥ | āśramaḥ khyāyate puṇyastriṣu lokeṣu viśrutaḥ

—हे कौन्तेय, उन अनन्त यशस्वी, उत्तम व्रत वाले और अमित तेजस्वी महात्मा का आश्रम, जो पवित्र कहा जाता है और तीनों लोकों में विख्यात है।

श्लोक 13 (3.88.13)

एतावर्णाववर्णौ च विश्रुतौ मनुजाधिप । ईजाते क्रतुभिर्मुख्यैः पुण्यैर्भरतसत्तम ॥

etāvarṇāvavarṇau ca viśrutau manujādhipa | ījāte kratubhirmukhyaiḥ puṇyairbharatasattama

हे मनुजाधिप, हे भरतसत्तम, वहीं एतवर्ण और अवर्ण नामक दो विख्यात ऋषियों ने श्रेष्ठ और पवित्र यज्ञ किए थे।

श्लोक 14 (3.88.14)

समेत्य बहुशो देवाः सेन्द्राः सवरुणाः पुरा । विशाखयूपेऽतप्यन्त तेन पुण्यतमश्च सः ॥

sametya bahuśo devāḥ sendrāḥ savaruṇāḥ purā | viśākhayūpe'tapyanta tena puṇyatamaśca saḥ

वहीं विशाखयूप में पूर्वकाल में इन्द्र और वरुण सहित देवताओं ने अनेक बार एकत्र होकर तप किया था; इसी से वह परम पवित्र है।

श्लोक 15 (3.88.15)

ऋषिर्महान्महाभागो जमदग्निर्महायशाः । पलाशकेषु पुण्येषु रम्येष्वयजत प्रभुः ॥

ṛṣirmahānmahābhāgo jamadagnirmahāyaśāḥ | palāśakeṣu puṇyeṣu ramyeṣvayajata prabhuḥ

महाभाग, महायशस्वी महान् ऋषि, समर्थ जमदग्नि ने पवित्र और रमणीय पलाशकों में यज्ञ किया था,

श्लोक 16 (3.88.16)

यत्र सर्वाः सरिच्छ्रेष्ठाः साक्षात्तमृषिसत्तमम् । स्वं स्वं तोयमुपादाय परिवार्योपतस्थिरे ॥

yatra sarvāḥ saricchreṣṭhāḥ sākṣāttamṛṣisattamam | svaṃ svaṃ toyamupādāya parivāryopatasthire

जहाँ सभी श्रेष्ठ नदियाँ साक्षात् रूप में अपना-अपना जल लेकर उस ऋषिश्रेष्ठ को घेरकर उनकी सेवा में उपस्थित हुई थीं।

श्लोक 17 (3.88.17)

अपि चात्र महाराज स्वयं विश्वावसुर्जगौ । इमं श्लोकं तदा वीर प्रेक्ष्य दीक्षां महात्मनः ॥

api cātra mahārāja svayaṃ viśvāvasurjagau | imaṃ ślokaṃ tadā vīra prekṣya dīkṣāṃ mahātmanaḥ

हे महाराज, हे वीर, यहीं स्वयं विश्वावसु ने उन महात्मा की यज्ञ-दीक्षा देखकर यह श्लोक गाया था—

श्लोक 18 (3.88.18)

यजमानस्य वै देवाञ्जमदग्नेर्महात्मनः । आगम्य सरितो विप्रान्मधुना समतर्पयन् ॥

yajamānasya vai devāñjamadagnermahātmanaḥ | āgamya sarito viprānmadhunā samatarpayan

"जब महात्मा जमदग्नि देवताओं का यजन कर रहे थे, तब नदियों ने आकर ब्राह्मणों को मधु से तृप्त किया।"

श्लोक 19 (3.88.19)

गन्धर्वयक्षरक्षोभिरप्सरोभिश्च सेवितम् । किरातकिन्नरावासं शैलं शिखरिणां वरम् ॥

gandharvayakṣarakṣobhirapsarobhiśca sevitam | kirātakinnarāvāsaṃ śailaṃ śikhariṇāṃ varam

गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों और अप्सराओं से सेवित, किरातों और किन्नरों के निवास उस श्रेष्ठ पर्वत को—

श्लोक 20 (3.88.20)

बिभेद तरसा गङ्गा गङ्गाद्वारं युधिष्ठिर । पुण्यं तत्ख्यायते राजन्ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥

bibheda tarasā gaṅgā gaṅgādvāraṃ yudhiṣṭhira | puṇyaṃ tatkhyāyate rājanbrahmarṣigaṇasevitam

—हे युधिष्ठिर, गंगा ने वेग से गंगाद्वार पर भेद डाला; हे राजन्, ब्रह्मर्षियों के समूहों से सेवित वह स्थान पवित्र कहा जाता है।

श्लोक 21 (3.88.21)

सनत्कुमारः कौरव्य पुण्यं कनखलं तथा । पर्वतश्च पुरुर्नाम यत्र यातः पुरूरवाः ॥

sanatkumāraḥ kauravya puṇyaṃ kanakhalaṃ tathā | parvataśca pururnāma yatra yātaḥ purūravāḥ

हे कौरव्य, वहीं सनत्कुमार का पवित्र तीर्थ और कनखल है, और पुरु नामक पर्वत है, जहाँ पुरूरवा गए थे।

श्लोक 22 (3.88.22)

भृगुर्यत्र तपस्तेपे महर्षिगणसेविते । राजन्स आश्रमः ख्यातो भृगुतुङ्गो महागिरिः ॥

bhṛguryatra tapastepe maharṣigaṇasevite | rājansa āśramaḥ khyāto bhṛgutuṅgo mahāgiriḥ

जहाँ महर्षियों के समूहों से सेवित स्थान में भृगु ने तप किया था, हे राजन्, वह आश्रम भृगुतुंग नामक महान् पर्वत के रूप में विख्यात है।

श्लोक 23 (3.88.23)

यः स भूतं भविष्यच्च भवच्च भरतर्षभ । नारायणः प्रभुर्विष्णुः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ॥

yaḥ sa bhūtaṃ bhaviṣyacca bhavacca bharatarṣabha | nārāyaṇaḥ prabhurviṣṇuḥ śāśvataḥ puruṣottamaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, जो भूत, भविष्य और वर्तमान हैं—वे नारायण, प्रभु विष्णु, शाश्वत पुरुषोत्तम—

श्लोक 24 (3.88.24)

तस्यातियशसः पुण्यां विशालां बदरीमनु । आश्रमः ख्यायते पुण्यस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥

tasyātiyaśasaḥ puṇyāṃ viśālāṃ badarīmanu | āśramaḥ khyāyate puṇyastriṣu lokeṣu viśrutaḥ

—उन अतियशस्वी का आश्रम पवित्र विशाला बदरी के समीप है, जो पुण्य कहा जाता है और तीनों लोकों में विख्यात है।

श्लोक 25 (3.88.25)

उष्णतोयवहा गङ्गा शीततोयवहा पुरा । सुवर्णसिकता राजन्विशालां बदरीमनु ॥

uṣṇatoyavahā gaṅgā śītatoyavahā purā | suvarṇasikatā rājanviśālāṃ badarīmanu

हे राजन्, विशाला बदरी के समीप सुनहरी रेत वाली गंगा बहती है, जो गर्म जल भी बहाती है और पहले की भाँति शीतल जल भी।

श्लोक 26 (3.88.26)

ऋषयो यत्र देवाश्च महाभागा महौजसः । प्राप्य नित्यं नमस्यन्ति देवं नारायणं प्रभुम् ॥

ṛṣayo yatra devāśca mahābhāgā mahaujasaḥ | prāpya nityaṃ namasyanti devaṃ nārāyaṇaṃ prabhum

वहाँ महाभाग और महातेजस्वी ऋषि और देवता आकर सदा प्रभु नारायण देव को प्रणाम करते हैं।

श्लोक 27 (3.88.27)

यत्र नारायणो देवः परमात्मा सनातनः । तत्र कृत्स्नं जगत्सर्वं तीर्थान्यायतनानि च ॥

yatra nārāyaṇo devaḥ paramātmā sanātanaḥ | tatra kṛtsnaṃ jagatsarvaṃ tīrthānyāyatanāni ca

जहाँ सनातन परमात्मा नारायण देव विराजते हैं, वहीं सम्पूर्ण जगत् और सभी तीर्थ तथा पुण्य स्थान हैं।

श्लोक 28 (3.88.28)

तत्पुण्यं परमं ब्रह्म तत्तीर्थं तत्तपोवनम् । तत्परं परमं देवं भूतानां परमेश्वरम् ॥

tatpuṇyaṃ paramaṃ brahma tattīrthaṃ tattapovanam | tatparaṃ paramaṃ devaṃ bhūtānāṃ parameśvaram

वही पुण्य है, वही परम ब्रह्म है, वही तीर्थ है, वही तपोवन है; वही सर्वोपरि परम देव और प्राणियों के परमेश्वर हैं,

श्लोक 29 (3.88.29)

शाश्वतं परमं चैव धातारं परमं पदम् । यं विदित्वा न शोचन्ति विद्वांसः शास्त्रदृष्टयः ॥

śāśvataṃ paramaṃ caiva dhātāraṃ paramaṃ padam | yaṃ viditvā na śocanti vidvāṃsaḥ śāstradṛṣṭayaḥ

वे शाश्वत, परम, धाता और परम पद हैं; उन्हें जानकर शास्त्र की दृष्टि वाले विद्वान् शोक नहीं करते।

श्लोक 30 (3.88.30)

तत्र देवर्षयः सिद्धाः सर्वे चैव तपोधनाः । आदिदेवो महायोगी यत्रास्ते मधुसूदनः ॥

tatra devarṣayaḥ siddhāḥ sarve caiva tapodhanāḥ | ādidevo mahāyogī yatrāste madhusūdanaḥ

जहाँ आदिदेव, महायोगी मधुसूदन निवास करते हैं, वहाँ देवर्षि, सिद्ध और सभी तपस्वी रहते हैं।

श्लोक 31 (3.88.31)

पुण्यानामपि तत्पुण्यमत्र ते संशयोऽस्तु मा । एतानि राजन्पुण्यानि पृथिव्यां पृथिवीपते । कीर्तितानि नरश्रेष्ठ तीर्थान्यायतनानि च ॥

puṇyānāmapi tatpuṇyamatra te saṃśayo'stu mā | etāni rājanpuṇyāni pṛthivyāṃ pṛthivīpate | kīrtitāni naraśreṣṭha tīrthānyāyatanāni ca

वह पुण्यों में भी पुण्य है; इसमें तुम्हें कोई संशय न हो। हे राजन्, हे पृथ्वीपति, हे नरश्रेष्ठ, पृथ्वी के ये पवित्र तीर्थ और पुण्य स्थान मैंने तुम्हें बता दिए।

श्लोक 32 (3.88.32)

एतानि वसुभिः साध्यैरादित्यैर्मरुदश्विभिः । ऋषिभिर्देवकल्पैश्च सेवितानि महात्मभिः ॥

etāni vasubhiḥ sādhyairādityairmarudaśvibhiḥ | ṛṣibhirdevakalpaiśca sevitāni mahātmabhiḥ

ये वसुओं, साध्यों, आदित्यों, मरुतों और अश्विनीकुमारों से तथा देवतुल्य महात्मा ऋषियों से सेवित हैं।

श्लोक 33 (3.88.33)

चरन्नेतानि कौन्तेय सहितो ब्राह्मणर्षभैः । भ्रातृभिश्च महाभागैरुत्कण्ठां विजयिष्यसि ॥

carannetāni kaunteya sahito brāhmaṇarṣabhaiḥ | bhrātṛbhiśca mahābhāgairutkaṇṭhāṃ vijayiṣyasi

हे कौन्तेय, श्रेष्ठ ब्राह्मणों और अपने महाभाग भाइयों के साथ इनमें विचरण करते हुए तुम अपनी उत्कण्ठा पर विजय पा लोगे।

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