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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 1

पाण्डवों द्वारा धृतराष्ट्र की सेवा

जनमेजय पूछते हैं कि राज्य पाकर उनके पूर्वज पुत्रहीन धृतराष्ट्र के साथ कैसे रहे। वैशम्पायन बताते हैं कि पन्द्रह वर्ष तक पाण्डवों ने धृतराष्ट्र को आगे रखकर और हर बात में उनसे पूछकर राज्य किया; कुन्ती, द्रौपदी तथा अन्य स्त्रियाँ गान्धारी की सेवा में लगी रहीं और युधिष्ठिर वृद्ध राजा को सब सुख-सामग्री जुटाते रहे। युधिष्ठिर ने भाइयों को आदेश दिया कि धृतराष्ट्र को पुत्रों का अभाव कभी न खले; भीम को छोड़कर सबने यह माना, क्योंकि भीम द्यूतसभा में हुआ अन्याय भूल नहीं पाते थे।

अध्याय-सूचीअध्याय 2

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (15.1.1)

प्राप्य पैतामहं राज्यं मम पूर्वपितामहाः । कथमासन्महाराजे धृतराष्ट्रे महात्मनि ॥

prāpya paitāmahaṃ rājyaṃ mama pūrvapitāmahāḥ | kathamāsanmahārāje dhṛtarāṣṭre mahātmani

अपने पितामहों का राज्य पा लेने के बाद मेरे पूर्वज महाराज धृतराष्ट्र, उन महात्मा, के साथ कैसे रहे?

श्लोक 2 (15.1.2)

स तु राजा हतामात्यो हतपुत्रो निराश्रयः । कथमासीद्धतैश्वर्यो गान्धारी च तपस्विनी ॥

sa tu rājā hatāmātyo hataputro nirāśrayaḥ | kathamāsīddhataiśvaryo gāndhārī ca tapasvinī

और वह राजा, जिसके मन्त्री और पुत्र मारे गए थे, जिसका कोई आश्रय नहीं रहा और जिसका ऐश्वर्य नष्ट हो गया था, कैसे रहा? और तपस्विनी गान्धारी कैसे रहीं?

श्लोक 3 (15.1.3)

कियन्तं चैव कालं ते मम पूर्वपितामहाः । स्थिता राज्ये महात्मानस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥

kiyantaṃ caiva kālaṃ te mama pūrvapitāmahāḥ | sthitā rājye mahātmānastanme vyākhyātumarhasi

और मेरे वे महात्मा पूर्वज कितने समय तक राज्य में रहे? यह मुझे बताने की कृपा करें।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 4 (15.1.4)

प्राप्य राज्यं महात्मानः पाण्डवा हतशत्रवः । धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य पृथिवीं पर्यपालयन् ॥

prāpya rājyaṃ mahātmānaḥ pāṇḍavā hataśatravaḥ | dhṛtarāṣṭraṃ puraskṛtya pṛthivīṃ paryapālayan

शत्रुओं का संहार कर महात्मा पाण्डवों ने राज्य पाया और धृतराष्ट्र को आगे रखकर पृथ्वी का पालन किया।

श्लोक 5 (15.1.5)

धृतराष्ट्रमुपातिष्ठद्विदुरः संजयस्तथा । वैश्यापुत्रश्च मेधावी युयुत्सुः कुरुसत्तम ॥

dhṛtarāṣṭramupātiṣṭhadviduraḥ saṃjayastathā | vaiśyāputraśca medhāvī yuyutsuḥ kurusattama

हे कुरुश्रेष्ठ, विदुर और संजय धृतराष्ट्र की सेवा में रहते थे, और वैश्या-पुत्र बुद्धिमान् युयुत्सु भी।

श्लोक 6 (15.1.6)

पाण्डवाः सर्वकार्येषु पर्यपृच्छन्त तं नृपम् । चक्रुस्तेनाभ्यनुज्ञाता वर्षाणि दश पञ्च च ॥

pāṇḍavāḥ sarvakāryeṣu paryapṛcchanta taṃ nṛpam | cakrustenābhyanujñātā varṣāṇi daśa pañca ca

पाण्डव सब कार्यों में उन राजा से परामर्श लेते थे, और उनकी अनुमति से उन्होंने पन्द्रह वर्ष इसी प्रकार बिताए।

श्लोक 7 (15.1.7)

सदाऽभिगम्य ते वीराः पर्युपासन्त तं नृपम् । पादाभिवादनं कृत्वा धर्मराजमते स्थिताः ॥

sadā'bhigamya te vīrāḥ paryupāsanta taṃ nṛpam | pādābhivādanaṃ kṛtvā dharmarājamate sthitāḥ

वे वीर प्रतिदिन उनके पास जाकर उन राजा की सेवा करते थे और उनके चरणों में प्रणाम करके धर्मराज युधिष्ठिर की इच्छा के अनुसार ही चलते थे।

श्लोक 8 (15.1.8)

ते मूर्ध्नि समुपाघ्राताः सर्वकार्याणि चक्रिरे । कुन्तिभोजसुता चैव गान्धारीमन्ववर्तत ॥

te mūrdhni samupāghrātāḥ sarvakāryāṇi cakrire | kuntibhojasutā caiva gāndhārīmanvavartata

धृतराष्ट्र द्वारा मस्तक सूँघकर (स्नेह से चूमकर) दुलारे जाने पर वे उनके सब कार्य करते थे; और कुन्तिभोज की पुत्री कुन्ती गान्धारी की सेवा में लगी रहती थीं।

श्लोक 9 (15.1.9)

द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चान्याः पाण्डवस्त्रियः । समां वृत्तिमवर्तन्त तयोः श्वश्र्वोर्यथाविधि ॥

draupadī ca subhadrā ca yāścānyāḥ pāṇḍavastriyaḥ | samāṃ vṛttimavartanta tayoḥ śvaśrvoryathāvidhi

द्रौपदी, सुभद्रा और पाण्डवों की जो अन्य स्त्रियाँ थीं, वे उन दोनों सासों के साथ विधिपूर्वक समान व्यवहार करती थीं।

श्लोक 10 (15.1.10)

शयनानि महार्हाणि वासांस्याभरणानि च । राजार्हाणि च सर्वाणि भक्ष्यभोज्यान्यनेकशः ॥

śayanāni mahārhāṇi vāsāṃsyābharaṇāni ca | rājārhāṇi ca sarvāṇi bhakṣyabhojyānyanekaśaḥ

बहुमूल्य शय्याएँ, वस्त्र और आभूषण, राजाओं के योग्य सब सामग्री तथा अनेक प्रकार के भक्ष्य-भोज्य पदार्थ —

श्लोक 11 (15.1.11)

युधिष्ठिरो महाराज धृतराष्ट्रेऽभ्युपाहरत् । तथैव कुन्ती गान्धार्यां गुरुवृत्तिमवर्तत ॥

yudhiṣṭhiro mahārāja dhṛtarāṣṭre'bhyupāharat | tathaiva kuntī gāndhāryāṃ guruvṛttimavartata

हे महाराज, ये सब युधिष्ठिर धृतराष्ट्र को अर्पित करते रहे; और उसी प्रकार कुन्ती गान्धारी के साथ बड़ी बहन के समान आदरपूर्वक व्यवहार करती रहीं।

श्लोक 12 (15.1.12)

विदुरः संजयश्चैव युयुत्सुश्चैव कौरव । उपासते स्म तं वृद्धं हतपुत्रं जनाधिपम् ॥

viduraḥ saṃjayaścaiva yuyutsuścaiva kaurava | upāsate sma taṃ vṛddhaṃ hataputraṃ janādhipam

हे कुरुवंशी, विदुर, संजय और युयुत्सु पुत्रहीन उन वृद्ध राजा की सेवा करते रहते थे।

श्लोक 13 (15.1.13)

श्यालो द्रोणस्य यश्चासीद्दयितो ब्राह्मणो महान् । स च तस्मिन्महेष्वासः कृपः समभवत्तदा ॥

śyālo droṇasya yaścāsīddayito brāhmaṇo mahān | sa ca tasminmaheṣvāsaḥ kṛpaḥ samabhavattadā

द्रोण के साले, उन्हें प्रिय महान् ब्राह्मण और महाधनुर्धर कृपाचार्य उस समय धृतराष्ट्र के समीप ही रहते थे।

श्लोक 14 (15.1.14)

व्यासश्च भगवान्नित्यमासांचक्रे नृपेण ह । कथाः कुर्वन्पुराणर्षिर्देवर्षिपितृरक्षसाम् ॥

vyāsaśca bhagavānnityamāsāṃcakre nṛpeṇa ha | kathāḥ kurvanpurāṇarṣirdevarṣipitṛrakṣasām

पुरातन ऋषि भगवान् व्यास प्रतिदिन राजा के पास बैठकर देवर्षियों, पितरों और राक्षसों की कथाएँ सुनाया करते थे।

श्लोक 15 (15.1.15)

धर्मयुक्तानि कार्याणि व्यवहारान्वितानि च । धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातो विदुरस्तान्यकारयत् ॥

dharmayuktāni kāryāṇi vyavahārānvitāni ca | dhṛtarāṣṭrābhyanujñāto vidurastānyakārayat

धर्मसंगत तथा व्यवहार (न्याय-प्रशासन) से सम्बन्धित कार्य विदुर धृतराष्ट्र की अनुमति से कराते थे।

श्लोक 16 (15.1.16)

सामन्तेभ्यः प्रियाण्यस्य कार्याणि सुबहून्यपि । प्राप्यन्तेऽर्थैः सुलघुभिः सुनयाद्विदुरस्य वै ॥

sāmantebhyaḥ priyāṇyasya kāryāṇi subahūnyapi | prāpyante'rthaiḥ sulaghubhiḥ sunayādvidurasya vai

विदुर की उत्तम नीति के कारण राजा के लिए सीमावर्ती सामन्तों से अपेक्षित अनेक प्रिय कार्य भी बहुत थोड़े व्यय से सिद्ध हो जाते थे।

श्लोक 17 (15.1.17)

अकरोद्बन्धमोक्षं च वध्यानां मोक्षणं तथा । न च धर्मसुतो राजा कदाचित्किञ्चिदब्रवीत् ॥

akarodbandhamokṣaṃ ca vadhyānāṃ mokṣaṇaṃ tathā | na ca dharmasuto rājā kadācitkiñcidabravīt

उन्होंने बन्दियों को छुड़ाया और वध के लिए दण्डित लोगों को भी मुक्त कराया; और धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने इस विषय में कभी कुछ नहीं कहा।

श्लोक 18 (15.1.18)

विहारयात्रासु पुनः कुरुराजो युधिष्ठिरः । सर्वान्कामानुपस्थाप्य धृतराष्ट्रे न्यवेदयत् ॥

vihārayātrāsu punaḥ kururājo yudhiṣṭhiraḥ | sarvānkāmānupasthāpya dhṛtarāṣṭre nyavedayat

विहार-यात्राओं में कुरुराज युधिष्ठिर सब इच्छित वस्तुएँ जुटाकर धृतराष्ट्र को समर्पित करते थे।

श्लोक 19 (15.1.19)

आरालिकाः सूपकारा रागषाडविकास्तथा । उपातिष्ठन्त राजानं धृतराष्ट्रं यथापुरम् ॥

ārālikāḥ sūpakārā rāgaṣāḍavikāstathā | upātiṣṭhanta rājānaṃ dhṛtarāṣṭraṃ yathāpuram

साग-सब्जी बनाने वाले, रसोइये और मसालेदार चटनी-व्यंजन बनाने वाले पहले की तरह राजा धृतराष्ट्र की सेवा में उपस्थित रहते थे।

श्लोक 20 (15.1.20)

वासांसि च महार्हाणि माल्यानि विविधानि च । उपाजह्रुर्यथाकालं धृतराष्ट्रस्य पाण्डवाः ॥

vāsāṃsi ca mahārhāṇi mālyāni vividhāni ca | upājahruryathākālaṃ dhṛtarāṣṭrasya pāṇḍavāḥ

पाण्डव समय-समय पर धृतराष्ट्र के लिए बहुमूल्य वस्त्र और तरह-तरह की मालाएँ लाते थे।

श्लोक 21 (15.1.21)

मैरेयमधुमांसानि पानकानि लघूनि च । चित्रान्भक्ष्यविकारांश्च चक्रुस्तस्य यथा पुरा ॥

maireyamadhumāṃsāni pānakāni laghūni ca | citrānbhakṣyavikārāṃśca cakrustasya yathā purā

वे उनके लिए पहले की ही भाँति मैरेय (मद्य), मधु और मांस, हल्के पेय तथा तरह-तरह के पकवान तैयार कराते थे।

श्लोक 22 (15.1.22)

ये चापि पृथिवीपालाः समाजग्मुस्ततस्ततः । उपातिष्ठन्त ते सर्वे कौरवेन्द्रं यथापुरा ॥

ye cāpi pṛthivīpālāḥ samājagmustatastataḥ | upātiṣṭhanta te sarve kauravendraṃ yathāpurā

इधर-उधर से आए हुए जो राजा थे, वे सब भी पहले की तरह कौरवेन्द्र धृतराष्ट्र की सेवा में उपस्थित रहते थे।

श्लोक 23 (15.1.23)

कुन्ती च द्रौपदी चैव सात्वती च यशस्विनी । उलूपी नागकन्या च देवी चित्राङ्गदा तथा ॥

kuntī ca draupadī caiva sātvatī ca yaśasvinī | ulūpī nāgakanyā ca devī citrāṅgadā tathā

कुन्ती, द्रौपदी, यशस्विनी सात्वती, नागकन्या उलूपी और देवी चित्राङ्गदा —

श्लोक 24 (15.1.24)

धृष्टकेतोश्च भगिनी जरासन्धसुता तथा । एताश्चान्याश्च बह्व्यो वै योषितः पुरुषर्षभ । किंकराः पर्युपातिष्ठन्सर्वाः सुबलजां तथा ॥

dhṛṣṭaketośca bhaginī jarāsandhasutā tathā | etāścānyāśca bahvyo vai yoṣitaḥ puruṣarṣabha | kiṃkarāḥ paryupātiṣṭhansarvāḥ subalajāṃ tathā

धृष्टकेतु की बहन और जरासन्ध की पुत्री — ये तथा अन्य बहुत-सी स्त्रियाँ, हे पुरुषश्रेष्ठ, सब सुबलपुत्री गान्धारी की सेविकाएँ बनकर उनकी सेवा करती थीं।

श्लोक 25 (15.1.25)

यथा पुत्रवियुक्तोऽयं न किञ्चिद्दुःखमाप्नुयात् । इति तानन्वशाद्भातॄन्नित्यमेव युधिष्ठिरः ॥

yathā putraviyukto'yaṃ na kiñcidduḥkhamāpnuyāt | iti tānanvaśādbhātṝnnityameva yudhiṣṭhiraḥ

"पुत्रों के वियोग से यह राजा किसी प्रकार का दुःख न पाए" — इस प्रकार युधिष्ठिर सदा अपने भाइयों को आदेश देते रहते थे।

श्लोक 26 (15.1.26)

एवं ते धर्मराजस्य श्रुत्वा वचनमर्थवत् । सविशेषमवर्तन्त भीममेकं तदा विना ॥

evaṃ te dharmarājasya śrutvā vacanamarthavat | saviśeṣamavartanta bhīmamekaṃ tadā vinā

धर्मराज के ये सार्थक वचन सुनकर भीम को छोड़कर शेष सब भाई धृतराष्ट्र के साथ विशेष आदरपूर्वक व्यवहार करते थे।

श्लोक 27 (15.1.27)

न हि तत्तस्य वीरस्य हृदयादपसर्पति । धृतराष्ट्रस्य दुर्बुद्ध्या यद्वृत्तं द्यूतमण्डले ॥

na hi tattasya vīrasya hṛdayādapasarpati | dhṛtarāṣṭrasya durbuddhyā yadvṛttaṃ dyūtamaṇḍale

क्योंकि द्यूतसभा में धृतराष्ट्र की दुर्बुद्धि के कारण जो कुछ हुआ था, वह उस वीर (भीम) के हृदय से कभी नहीं हटता था।

अध्याय-सूचीअध्याय 2