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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 2

युधिष्ठिर द्वारा धृतराष्ट्र का सम्मान

पाण्डवों से सम्मानित धृतराष्ट्र ऋषियों के बीच सुखपूर्वक रहते हैं, ब्राह्मणों को भूमि और ग्राम दान करते हैं और पुत्रों के श्राद्ध-कर्म धन की कमी के बिना सम्पन्न करते हैं। युधिष्ठिर घोषणा करते हैं कि जो धृतराष्ट्र की आज्ञा में रहेगा वही उनका मित्र है; पाण्डव, गान्धारी और विदुर के साथ वृद्ध राजा की ऐसी सेवा करते हैं कि वे अपना शोक भुलाकर प्रतिदिन पाण्डवों की विजय की कामना करते हैं, और कोई भी उनकी या दुर्योधन की निन्दा करने का साहस नहीं करता। केवल भीम, युधिष्ठिर का अनुसरण करते हुए भी, धृतराष्ट्र को देखकर मन में खिन्न रहते हैं।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (15.2.1)

एवं सम्पूजितो राजा पाण्डवैरंबिकासुतः । विजहार यथापूर्वमृषिभिः पर्युपस्थितः ॥

evaṃ sampūjito rājā pāṇḍavairaṃbikāsutaḥ | vijahāra yathāpūrvamṛṣibhiḥ paryupasthitaḥ

इस प्रकार पाण्डवों से सम्मानित होकर अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र पहले की तरह ऋषियों से घिरे हुए सुखपूर्वक विहार करते रहे।

श्लोक 2 (15.2.2)

ब्रह्मदेयाग्रहारांश्च प्रददौ स कुरूद्वहः । तच्च कुन्तीसुतो राजा सर्वमेवान्वमोदत ॥

brahmadeyāgrahārāṃśca pradadau sa kurūdvahaḥ | tacca kuntīsuto rājā sarvamevānvamodata

उन कुरुश्रेष्ठ ने ब्राह्मणों को भूमि और ग्राम दान में दिए, और कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने इस सबका अनुमोदन किया।

श्लोक 3 (15.2.3)

आनृशंस्यपरो राजा प्रीयमाणो युधिष्ठिरः । उवाच स तदा भ्रातॄनमात्यांश्च महीपतिः । मया चैव भवद्भिश्च मान्य एष नराधिपः ॥

ānṛśaṃsyaparo rājā prīyamāṇo yudhiṣṭhiraḥ | uvāca sa tadā bhrātṝnamātyāṃśca mahīpatiḥ | mayā caiva bhavadbhiśca mānya eṣa narādhipaḥ

करुणा में तत्पर और प्रसन्न राजा युधिष्ठिर ने तब अपने भाइयों और मन्त्रियों से कहा — “ये नरेश मेरे और आप सबके माननीय हैं।”

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 4 (15.2.4)

निदेशे धृतराष्ट्रस्य यस्तिष्ठति स मे सुहृत् । विपरीतश्च मे शत्रुर्नियम्यश्च भवेन्नरः ॥

nideśe dhṛtarāṣṭrasya yastiṣṭhati sa me suhṛt | viparītaśca me śatrurniyamyaśca bhavennaraḥ

जो धृतराष्ट्र की आज्ञा में रहेगा, वह मेरा मित्र है; और जो उसके विपरीत चलेगा, वह मेरा शत्रु होगा और उसे रोका (दण्डित किया) जाएगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (15.2.5)

परिवृत्तेषु चाहःसु पुत्राणां श्राद्धकर्मणि । ददौ च राजा वित्तानि यावदस्य चिकीर्षितम् ॥

parivṛtteṣu cāhaḥsu putrāṇāṃ śrāddhakarmaṇi | dadau ca rājā vittāni yāvadasya cikīrṣitam

पुत्रों के श्राद्ध-कर्म के दिन आने पर राजा ने अपनी इच्छा के अनुसार जितना चाहा उतना धन दान किया।

श्लोक 6 (15.2.6)

ततः स राजा कौरव्यो धृतराष्ट्रो महामनाः । ब्राह्मणेभ्यो यथार्हेभ्यो ददौ वित्तान्यनेकशः ॥

tataḥ sa rājā kauravyo dhṛtarāṣṭro mahāmanāḥ | brāhmaṇebhyo yathārhebhyo dadau vittānyanekaśaḥ

तब उन उदार मन वाले कुरुवंशी राजा धृतराष्ट्र ने योग्य ब्राह्मणों को अपार धन दिया।

श्लोक 7 (15.2.7)

धर्मराजश्च भीमश्च सव्यसाची यमावपि । तत्सर्वमन्ववर्तन्त धृतराष्ट्रव्यपेक्षया ॥

dharmarājaśca bhīmaśca savyasācī yamāvapi | tatsarvamanvavartanta dhṛtarāṣṭravyapekṣayā

धर्मराज, भीम, सव्यसाची और दोनों जुड़वाँ भाई भी धृतराष्ट्र का मान रखते हुए इस सब में उनके अनुकूल चले।

श्लोक 8 (15.2.8)

कथं नु राजा वृद्धः स पुत्रपौत्रवधार्दितः । शोकमस्मत्कृतं प्राप्य न म्रियेतेति चिन्त्यते ॥

kathaṃ nu rājā vṛddhaḥ sa putrapautravadhārditaḥ | śokamasmatkṛtaṃ prāpya na mriyeteti cintyate

“पुत्रों और पौत्रों के वध से पीड़ित यह वृद्ध राजा हमारे कारण मिले शोक से कहीं मर न जाए” — वे ऐसा सोचते थे।

श्लोक 9 (15.2.9)

यावद्धि कुरुवीरस्य जीवत्पुत्रस्य वै सुखम् । तावत्सुखमवाप्नोति भोगांश्चैव व्यवस्थितान् ॥

yāvaddhi kuruvīrasya jīvatputrasya vai sukham | tāvatsukhamavāpnoti bhogāṃścaiva vyavasthitān

पुत्र जीवित होने पर किसी कुरुवीर को जितना सुख मिलता, उतना ही सुख वह पाता है, और उसके भोग भलीभाँति सुनिश्चित रहते हैं।

श्लोक 10 (15.2.10)

ततस्ते सहिताः पञ्च भ्रातरः पाण्डुनन्दनाः । तथाशीलाः समातस्थुर्धृतराष्ट्रस्य शासने ॥

tataste sahitāḥ pañca bhrātaraḥ pāṇḍunandanāḥ | tathāśīlāḥ samātasthurdhṛtarāṣṭrasya śāsane

तब पाण्डु के पाँचों पुत्र साथ मिलकर, उसी स्वभाव से धृतराष्ट्र के शासन में स्थित रहे।

श्लोक 11 (15.2.11)

धृतराष्ट्रश्च तान्सर्वान्विनीतान्नियमे स्थितान् । शिष्यवृत्तिं समापन्नान्गुरुवत्प्रत्यपद्यत ॥

dhṛtarāṣṭraśca tānsarvānvinītānniyame sthitān | śiṣyavṛttiṃ samāpannānguruvatpratyapadyata

और धृतराष्ट्र उन सबके साथ, जो विनम्र, संयमी और शिष्य के समान आचरण करने वाले थे, गुरु के समान व्यवहार करते थे।

श्लोक 12 (15.2.12)

गान्धारी चैव पुत्राणां विविधैः श्राद्धकर्मभिः । आनृण्यमगमत्कामान्विप्रेभ्यः प्रतिपाद्य सा ॥

gāndhārī caiva putrāṇāṃ vividhaiḥ śrāddhakarmabhiḥ | ānṛṇyamagamatkāmānviprebhyaḥ pratipādya sā

गान्धारी ने भी पुत्रों के अनेक श्राद्ध-कर्मों द्वारा, ब्राह्मणों को इच्छित वस्तुएँ देकर, ऋण से मुक्ति पाई।

श्लोक 13 (15.2.13)

एवं धर्मभृतांश्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातृभिः सहितो धीमान्पूजयामास तं नृपम् ॥

evaṃ dharmabhṛtāṃśreṣṭho dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | bhrātṛbhiḥ sahito dhīmānpūjayāmāsa taṃ nṛpam

इस प्रकार धर्मात्माओं में श्रेष्ठ, बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ उन राजा का सम्मान किया।

श्लोक 14 (15.2.14)

स राजा सुमहातेजा वृद्धः कुरुकुलोद्वहः । न ददर्श तदा किञ्चिदप्रियं पाण्डुनन्दने ॥

sa rājā sumahātejā vṛddhaḥ kurukulodvahaḥ | na dadarśa tadā kiñcidapriyaṃ pāṇḍunandane

महातेजस्वी, वृद्ध, कुरुकुल के वंशज उन राजा ने तब पाण्डुपुत्र की ओर से कुछ भी अप्रिय नहीं देखा।

श्लोक 15 (15.2.15)

वर्तमानेषु सद्वृत्तिं पाण्डवेषु महात्मसु । प्रीतिमानभवद्राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥

vartamāneṣu sadvṛttiṃ pāṇḍaveṣu mahātmasu | prītimānabhavadrājā dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ

महात्मा पाण्डवों के सदाचार से व्यवहार करने पर अम्बिका-पुत्र राजा धृतराष्ट्र बहुत प्रसन्न हुए।

श्लोक 16 (15.2.16)

सौबलेयी च गान्धारी पुत्रशोकमपास्य तम् । सदैव प्रीतिमत्यासीत्तनयेषु निजेष्विव ॥

saubaleyī ca gāndhārī putraśokamapāsya tam | sadaiva prītimatyāsīttanayeṣu nijeṣviva

और सुबल की पुत्री गान्धारी, पुत्रों का वह शोक त्यागकर, उन पाण्डवों पर सदा अपने पुत्रों के समान स्नेह रखती थीं।

श्लोक 17 (15.2.17)

प्रियाण्येव तु कौरव्यो नाप्रियाणि कुरूद्वहः । वैचित्रवीर्य नृपतौ समाचरत सर्वदा ॥

priyāṇyeva tu kauravyo nāpriyāṇi kurūdvahaḥ | vaicitravīrya nṛpatau samācarata sarvadā

कुरुकुल-श्रेष्ठ युधिष्ठिर विचित्रवीर्य के पुत्र उन राजा के साथ सदा प्रिय ही करते थे, अप्रिय कभी नहीं।

श्लोक 18 (15.2.18)

यद्यद्ब्रूते च किञ्चित्स धृतराष्ट्रो जनाधिपः । गुरु वा लघु वा कार्यं गान्धारी च तपस्विनी ॥

yadyadbrūte ca kiñcitsa dhṛtarāṣṭro janādhipaḥ | guru vā laghu vā kāryaṃ gāndhārī ca tapasvinī

नरेश धृतराष्ट्र जो कुछ भी कहते — बड़ा या छोटा कार्य — और तपस्विनी गान्धारी जो कहतीं,

श्लोक 19 (15.2.19)

तं स राजा महाराज पाण्डवानां धुरंधरः । पूजयित्वा वचस्तत्तदकार्षीत्परवीरहा ॥

taṃ sa rājā mahārāja pāṇḍavānāṃ dhuraṃdharaḥ | pūjayitvā vacastattadakārṣītparavīrahā

हे महाराज, पाण्डवों के भार को वहन करने वाले, शत्रु-वीरों का संहार करने वाले उन राजा ने उनकी उस-उस बात का आदर करके उसे पूरा किया।

श्लोक 20 (15.2.20)

तेन तस्याभवत्प्रीतो वृत्तेन स नराधिपः । अन्वतप्यत संस्मृत्य पुत्रं तं मन्दचेतसम् ॥

tena tasyābhavatprīto vṛttena sa narādhipaḥ | anvatapyata saṃsmṛtya putraṃ taṃ mandacetasam

उस व्यवहार से राजा धृतराष्ट्र उन पर प्रसन्न रहते थे, फिर भी अपने मन्दबुद्धि पुत्र को स्मरण करके वे पश्चात्ताप से जलते थे।

श्लोक 21 (15.2.21)

सदा च प्रातरुत्थाय कृतजप्यः शुचिर्नृपः । आशास्ते पाण्डुपुत्राणां समरेष्वपराजयम् ॥

sadā ca prātarutthāya kṛtajapyaḥ śucirnṛpaḥ | āśāste pāṇḍuputrāṇāṃ samareṣvaparājayam

प्रतिदिन प्रातः उठकर, जप करके, पवित्र होकर राजा पाण्डुपुत्रों के लिए युद्धों में अपराजय की कामना करते थे।

श्लोक 22 (15.2.22)

ब्राह्मणान्स्वस्तिवाच्याथ हुत्वा चैव हुताशनम् । आयूंषि पाण्डुपुत्राणामाशंसत नराधिपः ॥

brāhmaṇānsvastivācyātha hutvā caiva hutāśanam | āyūṃṣi pāṇḍuputrāṇāmāśaṃsata narādhipaḥ

ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर और अग्नि में आहुति देकर राजा पाण्डुपुत्रों की दीर्घ आयु की कामना करते थे।

श्लोक 23 (15.2.23)

न तां प्रीतिं परामाप पुत्रेभ्यः स तदा पुरा । यां प्रीतिं पाण्डुपुत्रेभ्यः सदाऽवाप नराधिपः ॥

na tāṃ prītiṃ parāmāpa putrebhyaḥ sa tadā purā | yāṃ prītiṃ pāṇḍuputrebhyaḥ sadā'vāpa narādhipaḥ

पाण्डुपुत्रों के प्रति राजा को जो परम प्रेम सदा रहता था, वह प्रेम उन्हें पहले अपने पुत्रों के प्रति भी नहीं हुआ था।

श्लोक 24 (15.2.24)

ब्राह्मणानां यथा वृत्तः क्षत्रियाणां यथाविधः । तथा विट्शूद्रसङ्घानामभवत्स प्रियस्तदा ॥

brāhmaṇānāṃ yathā vṛttaḥ kṣatriyāṇāṃ yathāvidhaḥ | tathā viṭśūdrasaṅghānāmabhavatsa priyastadā

जैसे वे ब्राह्मणों के प्रिय थे, वैसे ही क्षत्रियों के भी; और उसी प्रकार वे तब वैश्यों और शूद्रों के समुदायों के भी प्रिय हो गए।

श्लोक 25 (15.2.25)

यच्च किञ्चित्तदा पापं धृतराष्ट्रसुतैः कृतम् । अकृत्वा हृदि तत्पापं तं नृपं सोन्ववर्तत ॥

yacca kiñcittadā pāpaṃ dhṛtarāṣṭrasutaiḥ kṛtam | akṛtvā hṛdi tatpāpaṃ taṃ nṛpaṃ sonvavartata

धृतराष्ट्र के पुत्रों ने उस समय जो कुछ पाप किया था, उसे मन में न रखकर वे उन राजा का अनुसरण करते रहे।

श्लोक 26 (15.2.26)

यः कश्चिदपि यत्किञ्चित्प्रमादादंबिकासुते । कुरुते द्वेष्यतामेति स कौन्तेयस्य धीमतः ॥

yaḥ kaścidapi yatkiñcitpramādādaṃbikāsute | kurute dveṣyatāmeti sa kaunteyasya dhīmataḥ

जो कोई भी असावधानी से अम्बिका-पुत्र के प्रति कुछ भी अनुचित करता, वह बुद्धिमान् कुन्तीपुत्र की अप्रीति का पात्र बन जाता।

श्लोक 27 (15.2.27)

न राज्ञो धृतराष्ट्रस्य न च दुर्योधनस्य वै । उवाच दुष्कृतं कश्चिद्युधिष्ठिरभयान्नरः ॥

na rājño dhṛtarāṣṭrasya na ca duryodhanasya vai | uvāca duṣkṛtaṃ kaścidyudhiṣṭhirabhayānnaraḥ

युधिष्ठिर के भय से कोई भी मनुष्य न राजा धृतराष्ट्र की निन्दा करता था, न दुर्योधन की।

श्लोक 28 (15.2.28)

धृत्या तुष्टो नरेन्द्रः स गान्धारी विदुरस्तथा । अजातशत्रोर्वृत्तेन न तु भीमस्य पार्थिवः ॥

dhṛtyā tuṣṭo narendraḥ sa gāndhārī vidurastathā | ajātaśatrorvṛttena na tu bhīmasya pārthivaḥ

राजा धृतराष्ट्र युधिष्ठिर की धीरता से सन्तुष्ट थे, और गान्धारी तथा विदुर भी अजातशत्रु के आचरण से; परन्तु राजा भीम के आचरण से सन्तुष्ट नहीं थे।

श्लोक 29 (15.2.29)

अन्ववर्तत भीमोपि निश्चितो धर्मजं नृपम् । धृतराष्ट्रं च सम्प्रेक्ष्य सदा भवति दुर्मनाः ॥

anvavartata bhīmopi niścito dharmajaṃ nṛpam | dhṛtarāṣṭraṃ ca samprekṣya sadā bhavati durmanāḥ

भीम भी दृढ़ निश्चय करके धर्मपुत्र युधिष्ठिर के अनुगामी रहे; किन्तु धृतराष्ट्र को देखकर वे सदा खिन्नमन हो जाते थे।

श्लोक 30 (15.2.30)

राजानमनुवर्तन्तं धर्मपुत्रममित्रहा । अन्ववर्तत संक्रुद्धो हृदयेन पराङ्मुखः ॥

rājānamanuvartantaṃ dharmaputramamitrahā | anvavartata saṃkruddho hṛdayena parāṅmukhaḥ

शत्रुओं का संहार करने वाले भीम, राजा का अनुसरण करने वाले धर्मपुत्र युधिष्ठिर के पीछे चलते रहे; किन्तु भीतर से क्रोध में भरे हुए उनका हृदय विमुख ही रहा।

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