Skip to main content

आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 3

धृतराष्ट्र का वन जाने का निश्चय

लोग यद्यपि युधिष्ठिर और धृतराष्ट्र के प्रति सम्मान में कोई अन्तर नहीं देखते, फिर भी भीम गुप्त रूप से वृद्ध राजा के विरुद्ध आचरण करते हैं और धृतराष्ट्र तथा गान्धारी को सुनाकर अपनी बाहुओं की डींग हाँकते हैं कि धृतराष्ट्र के पुत्रों को उन्होंने ही मृत्यु तक पहुँचाया। पन्द्रहवें वर्ष में इन वचनों से बिंधे हुए धृतराष्ट्र अपने सुहृदों को बुलाते हैं, मानते हैं कि हितकारी सम्मति न मानने से कुरुवंश का नाश उन्हीं के अपराध से हुआ, और बताते हैं कि वे चुपचाप कैसे व्रत और तप करते रहे हैं। फिर वे युधिष्ठिर से अनुमति माँगते हैं कि अपने कुल की रीति के अनुसार वृद्धावस्था में गान्धारी के साथ वन में रहें।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (15.3.1)

युधिष्ठिरस्य नृपतेर्दुर्योधनपितुस्तदा । नान्तरं ददृशू राज्ये पुरुषाः प्रणयं प्रति ॥

yudhiṣṭhirasya nṛpaterduryodhanapitustadā | nāntaraṃ dadṛśū rājye puruṣāḥ praṇayaṃ prati

उस समय राज्य में लोगों ने राजा युधिष्ठिर और दुर्योधन के पिता के प्रति आदर-भाव में कोई अन्तर नहीं देखा।

श्लोक 2 (15.3.2)

यदा तु कौरवो राजा पुत्रं सस्मार बालिशम् । तदा भीमं हृदा राजन्नपध्याति स पार्थिवः ॥

yadā tu kauravo rājā putraṃ sasmāra bāliśam | tadā bhīmaṃ hṛdā rājannapadhyāti sa pārthivaḥ

किन्तु जब कुरुराज धृतराष्ट्र को अपने नासमझ पुत्र की याद आती, तब, हे राजन्, वे हृदय में भीम के प्रति द्वेष-भाव सोचने लगते।

श्लोक 3 (15.3.3)

कौरवश्चैव भीमश्च हृदाऽन्योन्यमवर्तताम् । ध्यायन्तौ श्लक्ष्णया वाचा त्वन्योन्यमभितिष्ठताम् ॥

kauravaścaiva bhīmaśca hṛdā'nyonyamavartatām | dhyāyantau ślakṣṇayā vācā tvanyonyamabhitiṣṭhatām

कुरुराज और भीम दोनों मन ही मन एक-दूसरे के प्रति (द्वेष) रखते हुए सोचते रहते थे, फिर भी एक-दूसरे के सामने मधुर वाणी से ही पेश आते थे।

श्लोक 4 (15.3.4)

अप्रकाशं व्यलीकानि चकारास्य वृकोदरः । आज्ञां प्रत्यहरच्चापि कृतकैः पुरुषैः सदा ॥

aprakāśaṃ vyalīkāni cakārāsya vṛkodaraḥ | ājñāṃ pratyaharaccāpi kṛtakaiḥ puruṣaiḥ sadā

वृकोदर चुपके से उन्हें खिजाने वाले काम करते थे और अपने ही बनाए हुए आदमियों के द्वारा उनकी आज्ञाओं को सदा उलट देते थे।

श्लोक 5 (15.3.5)

स्मरन्दुर्मन्त्रितं तस्य वृत्तान्यप्यस्य कानिचित् । असकृच्चाप्युवाचेदं हतास्ते मन्दचेतसः ॥

smarandurmantritaṃ tasya vṛttānyapyasya kānicit | asakṛccāpyuvācedaṃ hatāste mandacetasaḥ

धृतराष्ट्र की बुरी मन्त्रणा और उनके कुछ आचरणों को याद करके वे बार-बार कहते — “वे मन्दबुद्धि मारे गए!”

श्लोक 6 (15.3.6)

अथ भीमः सुहृन्मध्ये बाहुशब्दं तथाऽकरोत् । संश्रवे धृतराष्ट्रस्य गान्धार्याश्चाप्यमर्षणः ॥

atha bhīmaḥ suhṛnmadhye bāhuśabdaṃ tathā'karot | saṃśrave dhṛtarāṣṭrasya gāndhāryāścāpyamarṣaṇaḥ

तब एक दिन असहिष्णु भीम ने मित्रों के बीच, धृतराष्ट्र और गान्धारी को सुनाते हुए, अपनी भुजाएँ ठोंककर ध्वनि की।

श्लोक 7 (15.3.7)

स्मृत्वा दुर्योधनं शत्रुं कर्णदुःशासनावपि । प्रोवाचेदं सुसंरब्धो भीमः सपरुषं वचः ॥

smṛtvā duryodhanaṃ śatruṃ karṇaduḥśāsanāvapi | provācedaṃ susaṃrabdho bhīmaḥ saparuṣaṃ vacaḥ

शत्रु दुर्योधन और कर्ण तथा दुःशासन को याद करके अत्यन्त क्रुद्ध भीम ने ये कठोर वचन कहे।

भीम उवाच

श्लोक 8 (15.3.8)

अन्धस्य नृपतेः पुत्रा मया परिघबाहुना । नीता लोकममुं सर्वे नानाशस्त्रास्त्रयोधिनः ॥

andhasya nṛpateḥ putrā mayā parighabāhunā | nītā lokamamuṃ sarve nānāśastrāstrayodhinaḥ

“अनेक शस्त्रों और अस्त्रों से लड़ने वाले अन्धे राजा के सब पुत्र मुझ परिघ-जैसी भुजाओं वाले के द्वारा परलोक पहुँचा दिए गए।”

श्लोक 9 (15.3.9)

इमौ तौ परिघप्रख्यौ भुजौ मम दुरासदौ । ययोरन्तरमासाद्य धार्तराष्ट्राः क्षयं गताः ॥

imau tau parighaprakhyau bhujau mama durāsadau | yayorantaramāsādya dhārtarāṣṭrāḥ kṣayaṃ gatāḥ

“लोहे की गदा जैसी, दुर्जेय ये मेरी दोनों भुजाएँ हैं — इन्हीं के बीच आकर धृतराष्ट्र के पुत्र विनाश को प्राप्त हुए।”

श्लोक 10 (15.3.10)

ताविमौ चन्दनेनाक्तौ वन्दनीयौ च मे भुजौ । याभ्यां दुर्योधनो नीतः क्षयं ससुतबान्धवः ॥

tāvimau candanenāktau vandanīyau ca me bhujau | yābhyāṃ duryodhano nītaḥ kṣayaṃ sasutabāndhavaḥ

“चन्दन से लिपी ये ही मेरी भुजाएँ वन्दनीय हैं, जिनके द्वारा दुर्योधन पुत्रों और बन्धुओं सहित विनाश को पहुँचाया गया।”

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (15.3.11)

एताश्चान्याश्च विविधाः शल्यभूता नराधिपः । वृकोदरस्य ता वाचः श्रुत्वा निर्वेदमागमत् ॥

etāścānyāśca vividhāḥ śalyabhūtā narādhipaḥ | vṛkodarasya tā vācaḥ śrutvā nirvedamāgamat

वृकोदर की ये तथा ऐसी ही अनेक और बातें, जो काँटे की तरह चुभने वाली थीं, सुनकर राजा खिन्नता में डूब गए।

श्लोक 12 (15.3.12)

सा च बुद्धिमती देवी कालपर्यायवेदिनी । गान्धारी सर्वधर्मज्ञा तान्यलीकानि शुश्रुवे । कुन्तीं वर्यां तु संवीक्ष्य शापे नास्याकरोन्मतिम् ॥

sā ca buddhimatī devī kālaparyāyavedinī | gāndhārī sarvadharmajñā tānyalīkāni śuśruve | kuntīṃ varyāṃ tu saṃvīkṣya śāpe nāsyākaronmatim

और समय के फेर को जानने वाली, सब धर्मों को समझने वाली बुद्धिमती देवी गान्धारी ने भी वे अपमानजनक बातें सुनीं; किन्तु पूज्य कुन्ती की ओर देखकर उन्होंने उसे शाप देने का विचार नहीं किया।

श्लोक 13 (15.3.13)

ततः पञ्चदशे वर्षे समतीते नराधिपः । राजा निर्वेदमापेदे भीमवाग्बाणपीडितः ॥

tataḥ pañcadaśe varṣe samatīte narādhipaḥ | rājā nirvedamāpede bhīmavāgbāṇapīḍitaḥ

तब पन्द्रहवाँ वर्ष बीत जाने पर राजा भीम के वचन-रूपी बाणों से पीड़ित होकर खिन्न हो गए।

श्लोक 14 (15.3.14)

सुखासक्तं कृच्छ्रपरं ज्ञात्वा चैव युधिष्ठिरम् । तपोयोगात्तपस्तप्तुं मनश्चक्रे महामतिः ॥

sukhāsaktaṃ kṛcchraparaṃ jñātvā caiva yudhiṣṭhiram | tapoyogāttapastaptuṃ manaścakre mahāmatiḥ

यह जानकर कि वे सुख में आसक्त रहे थे और अब कठोर साधना की ओर झुके हैं, और युधिष्ठिर को भी जानकर, उन बुद्धिमान् राजा ने योग के बल से तप करने का मन बनाया।

श्लोक 15 (15.3.15)

नान्वबुध्यत तद्राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । श्वेताश्वोवाऽथकुन्ती वा द्रौपदी वा यशस्विनी ॥

nānvabudhyata tadrājā kuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | śvetāśvovā'thakuntī vā draupadī vā yaśasvinī

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने यह नहीं जाना, न श्वेताश्व अर्जुन ने, न कुन्ती ने, न यशस्विनी द्रौपदी ने।

श्लोक 16 (15.3.16)

माद्रीपुत्रौ च भीमस्य मतं तावन्ववर्तताम् । राज्ञस्तु चित्तं रक्षन्तौ नोचतुः स्वयमप्रियम् ॥

mādrīputrau ca bhīmasya mataṃ tāvanvavartatām | rājñastu cittaṃ rakṣantau nocatuḥ svayamapriyam

माद्री के दोनों पुत्र भीम के मत के अनुसार चलते थे, किन्तु राजा के मन की रक्षा करते हुए उन्होंने स्वयं कोई अप्रिय बात नहीं कही।

श्लोक 17 (15.3.17)

ततः समानयामास धृतराष्ट्रः सुहृज्जनम् । बाष्पसंदिग्धमत्यर्थमिदमाह च तान्भृशम् ॥

tataḥ samānayāmāsa dhṛtarāṣṭraḥ suhṛjjanam | bāṣpasaṃdigdhamatyarthamidamāha ca tānbhṛśam

तब धृतराष्ट्र ने अपने सुहृदों को बुलाया और आँसुओं से भरी वाणी में उनसे अत्यन्त भावपूर्वक यह कहा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 18 (15.3.18)

विदितं भवतामेतद्यथा वृत्तः कुरुक्षयः । ममापराधात्तत्सर्वमिति ज्ञेयं तु कौरवाः ॥

viditaṃ bhavatāmetadyathā vṛttaḥ kurukṣayaḥ | mamāparādhāttatsarvamiti jñeyaṃ tu kauravāḥ

कुरुओं का विनाश कैसे हुआ, यह आप सब जानते हैं; हे कौरवो, जान लें कि यह सब मेरे ही अपराध से हुआ।

श्लोक 19 (15.3.19)

योऽहं दुष्टमतिं मन्दो ज्ञातीनां भयवर्धनम् । दुर्योधनं कौरवाणामाधिपत्येऽभ्यषेचयम् । यच्चाहं वासुदेवस्य नाश्रौषं वाक्यमर्थवत् ॥

yo'haṃ duṣṭamatiṃ mando jñātīnāṃ bhayavardhanam | duryodhanaṃ kauravāṇāmādhipatye'bhyaṣecayam | yaccāhaṃ vāsudevasya nāśrauṣaṃ vākyamarthavat

मुझ मन्दबुद्धि ने दुष्ट मति वाले, स्वजनों का भय बढ़ाने वाले दुर्योधन को कौरवों के आधिपत्य पर अभिषिक्त किया, और वासुदेव के सार्थक वचन नहीं सुने।

श्लोक 20 (15.3.20)

वध्यतां साध्वयं पापः सामात्य इति दुर्मतिः । पुत्रस्नेहाभिभूतस्तु हितमुक्तो मनीषिभिः ॥

vadhyatāṃ sādhvayaṃ pāpaḥ sāmātya iti durmatiḥ | putrasnehābhibhūtastu hitamukto manīṣibhiḥ

“इस पापी दुर्बुद्धि को मन्त्रियों सहित मार डाला जाए” — यह हित की बात विद्वानों ने मुझसे कही थी, पर मैं पुत्र-स्नेह से अभिभूत था।

श्लोक 21 (15.3.21)

विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च कृपेण च । पदेपदे भगवता व्यासेन च महात्मना । संजयेनाथ गान्धार्या तदिदं तप्यते मया ॥

vidureṇātha bhīṣmeṇa droṇena ca kṛpeṇa ca | padepade bhagavatā vyāsena ca mahātmanā | saṃjayenātha gāndhāryā tadidaṃ tapyate mayā

विदुर, भीष्म, द्रोण और कृप ने, और पग-पग पर महात्मा भगवान् व्यास ने, तथा संजय और गान्धारी ने भी यही कहा था — वही बात अब मुझे सन्ताप दे रही है।

श्लोक 22 (15.3.22)

यच्चाहं पाण्डुपुत्रेषु गुणवत्सु महात्मसु । न न्यस्तवाञ्श्रियं दीप्तां पितृपैतामहीमिमाम् ॥

yaccāhaṃ pāṇḍuputreṣu guṇavatsu mahātmasu | na nyastavāñśriyaṃ dīptāṃ pitṛpaitāmahīmimām

और जो यह पिता-पितामह से मिली प्रज्वलित राजलक्ष्मी थी, उसे मैंने गुणवान् महात्मा पाण्डुपुत्रों को नहीं सौंपा।

श्लोक 23 (15.3.23)

विनाशं पश्यमानो हि सर्वराज्ञां गदाग्रजः । एतच्छ्रेयस्तु परमममन्यत जनार्दनः ॥

vināśaṃ paśyamāno hi sarvarājñāṃ gadāgrajaḥ | etacchreyastu paramamamanyata janārdanaḥ

सब राजाओं का विनाश देखते हुए गद के बड़े भाई जनार्दन ने इसी को परम कल्याणकारी माना था।

श्लोक 24 (15.3.24)

सोहमेतान्यलीकानि दुर्वृत्तान्यात्मनस्तदा । हृदये शल्यभूतानि धारयामि सहस्रशः ॥

sohametānyalīkāni durvṛttānyātmanastadā | hṛdaye śalyabhūtāni dhārayāmi sahasraśaḥ

वही मैं उस समय के अपने इन अनुचित दुष्कर्मों को हृदय में काँटों की तरह हजारों की संख्या में धारण किए हुए हूँ।

श्लोक 25 (15.3.25)

विशेषतस्तु दह्यामि वर्षे पञ्चदशेऽद्य वै । अस्य पापस्य शुद्ध्यर्थं नियतोस्मि सुदुर्मतिः ॥

viśeṣatastu dahyāmi varṣe pañcadaśe'dya vai | asya pāpasya śuddhyarthaṃ niyatosmi sudurmatiḥ

विशेष रूप से अब, पन्द्रहवें वर्ष में, मैं जल रहा हूँ; इस पाप की शुद्धि के लिए मैंने नियम धारण कर रखे हैं — मैं जो अत्यन्त दुर्बुद्धि हूँ।

श्लोक 26 (15.3.26)

चतुर्थे नियते काले कदाचिदपि चाष्टमे । तृष्णाविनयनं भुञ्जे गान्धारी वेद तन्मम ॥

caturthe niyate kāle kadācidapi cāṣṭame | tṛṣṇāvinayanaṃ bhuñje gāndhārī veda tanmama

चौथे निश्चित समय पर, या कभी-कभी आठवें पर, मैं केवल प्यास बुझाने वाली वस्तु ग्रहण करता हूँ; गान्धारी मेरी यह बात जानती हैं।

श्लोक 27 (15.3.27)

करोत्याहारमिति मां सर्वः परिजनः सदा । युधिष्ठिरभयाद्वेत्ति भृशं तप्यति पाण्डवः ॥

karotyāhāramiti māṃ sarvaḥ parijanaḥ sadā | yudhiṣṭhirabhayādvetti bhṛśaṃ tapyati pāṇḍavaḥ

मेरा सारा परिजन-वर्ग युधिष्ठिर के भय से सदा यही मानता है कि मैं नियमित भोजन करता हूँ; और पाण्डव युधिष्ठिर बहुत दुःखी होते हैं।

श्लोक 28 (15.3.28)

भूमौ शये जप्यपरो दर्भेष्वजिनसंवृतः । नियमव्यपदेशेन गान्धारी च यशस्विनी ॥

bhūmau śaye japyaparo darbheṣvajinasaṃvṛtaḥ | niyamavyapadeśena gāndhārī ca yaśasvinī

मैं जप में लगा हुआ, दर्भ-घास पर बिछे मृगचर्म से ढका, व्रत के बहाने भूमि पर सोता हूँ — और यशस्विनी गान्धारी भी वैसा ही करती हैं।

श्लोक 29 (15.3.29)

अहं पुत्रशतं वीरं सङ्ग्रामेष्वपलायिनम् । नानुतप्ये हतं तत्र क्षत्रधर्मं हि तं विदुः ॥

ahaṃ putraśataṃ vīraṃ saṅgrāmeṣvapalāyinam | nānutapye hataṃ tatra kṣatradharmaṃ hi taṃ viduḥ

युद्धों में पीठ न दिखाने वाले अपने सौ वीर पुत्रों के मारे जाने पर मैं शोक नहीं करता, क्योंकि ज्ञानी लोग उसे क्षत्रिय का धर्म जानते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 30 (15.3.30)

इत्युक्त्वा धर्मराजानमभ्यभाषत कौरवः । भद्रं ते यादवीमातर्वचश्चेदं निबोध मे ॥

ityuktvā dharmarājānamabhyabhāṣata kauravaḥ | bhadraṃ te yādavīmātarvacaścedaṃ nibodha me

यह कहकर कुरुराज ने धर्मराज से कहा — हे यादवी के पुत्र, तुम्हारा कल्याण हो; मेरी यह बात सुनो।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 31 (15.3.31)

सुखमध्युषितः पुत्र त्वया सुपरिपालितः । मया दानानि दत्तानि श्राद्धानि च पुनःपुनः ॥

sukhamadhyuṣitaḥ putra tvayā suparipālitaḥ | mayā dānāni dattāni śrāddhāni ca punaḥpunaḥ

पुत्र, तुमसे भली-भाँति पाले जाने पर मैं सुखपूर्वक रहा हूँ; मैंने दान दिए हैं और बार-बार श्राद्ध किए हैं।

श्लोक 32 (15.3.32)

प्रकृष्टं च मया पुत्र पुण्यं चीर्णं यथाबलम् । गान्धारी हतपुत्रेयं धैर्येणोदीक्षते च माम् ॥

prakṛṣṭaṃ ca mayā putra puṇyaṃ cīrṇaṃ yathābalam | gāndhārī hataputreyaṃ dhairyeṇodīkṣate ca mām

पुत्र, मैंने अपनी शक्ति के अनुसार पुण्य भी किया है; और यह पुत्रहीन गान्धारी धैर्य के साथ मेरी ओर देखती है।

श्लोक 33 (15.3.33)

द्रौपद्या ह्यपकर्तारस्तव चैश्वर्यहारिणः । समतीता नृशंसास्ते स्वधर्मेण हता युधि ॥

draupadyā hyapakartārastava caiśvaryahāriṇaḥ | samatītā nṛśaṃsāste svadharmeṇa hatā yudhi

जिन्होंने द्रौपदी का अपकार किया और तुम्हारा ऐश्वर्य छीना, वे क्रूर लोग चले गए; वे अपने धर्म के अनुसार युद्ध में मारे गए।

श्लोक 34 (15.3.34)

न तेषु प्रतिकर्तव्यं पश्यामि कुरुनन्दन । सर्वे शस्त्रजिताँल्लोकान्गतास्तेऽभिमुखं हताः ॥

na teṣu pratikartavyaṃ paśyāmi kurunandana | sarve śastrajitām̐llokāngatāste'bhimukhaṃ hatāḥ

हे कुरुनन्दन, उनके विषय में अब मुझे कुछ करना शेष नहीं दिखता; वे सब सम्मुख मारे जाकर शस्त्र से जीते हुए लोकों को चले गए हैं।

श्लोक 35 (15.3.35)

आत्मनस्तु हितं पुण्यं प्रतिकर्तव्यमद्य ते । गान्धार्याश्चैव राजेन्द्र तदनुज्ञातुमर्हसि ॥

ātmanastu hitaṃ puṇyaṃ pratikartavyamadya te | gāndhāryāścaiva rājendra tadanujñātumarhasi

अपने आत्मा के लिए जो हितकर और पुण्यप्रद है, उसे अब करना चाहिए; और गान्धारी के लिए भी, हे राजेन्द्र, तुम्हें उसकी अनुमति देनी चाहिए।

श्लोक 36 (15.3.36)

त्वं तु शस्त्रभृतां श्रेष्ठः सततं धर्मवत्सलः । राजा गुरुः प्राणभृतां तस्मादेतद्ब्रवीम्यहम् ॥

tvaṃ tu śastrabhṛtāṃ śreṣṭhaḥ satataṃ dharmavatsalaḥ | rājā guruḥ prāṇabhṛtāṃ tasmādetadbravīmyaham

तुम शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हो, सदा धर्म से प्रेम करने वाले हो, राजा हो और सब प्राणियों के संरक्षक हो; इसलिए मैं तुमसे यह कहता हूँ।

श्लोक 37 (15.3.37)

अनुज्ञातस्त्वया वीर संश्रयेयं वनान्यहम् । चीरवल्कलभृद्राजन्गान्धार्या सहितोऽनया ॥

anujñātastvayā vīra saṃśrayeyaṃ vanānyaham | cīravalkalabhṛdrājangāndhāryā sahito'nayā

हे वीर, तुम्हारी अनुमति पाकर मैं चीर और वल्कल धारण करके इन गान्धारी के साथ वन का आश्रय लूँगा।

श्लोक 38 (15.3.38)

तवाशिषः प्रयुञ्जानो भविष्यामि वनेचरः । उचितं नः कुले तात सर्वेषां भरतर्षभ । पुत्रेष्वैश्चर्यमाधाय वयसोन्ते वनं नृप ॥

tavāśiṣaḥ prayuñjāno bhaviṣyāmi vanecaraḥ | ucitaṃ naḥ kule tāta sarveṣāṃ bharatarṣabha | putreṣvaiścaryamādhāya vayasonte vanaṃ nṛpa

तुम्हें आशीर्वाद देता हुआ मैं वन में विचरने वाला बनूँगा। हे तात, हे भरतश्रेष्ठ, हमारे कुल में सबके लिए यही उचित है कि पुत्रों को राज्य सौंपकर आयु के अन्त में वन जाएँ, हे राजन्।

श्लोक 39 (15.3.39)

तत्राहं वायुभक्षो वा निराहारोपि वा वसन् । पत्न्या सहानया वीर चरिष्यामि तपः परम् ॥

tatrāhaṃ vāyubhakṣo vā nirāhāropi vā vasan | patnyā sahānayā vīra cariṣyāmi tapaḥ param

वहाँ मैं केवल वायु पर, या निराहार रहकर, हे वीर, अपनी इस पत्नी के साथ परम तप करूँगा।

श्लोक 40 (15.3.40)

त्वं चापि फलभाक्तात तपसः पार्थिवो ह्यसि । फलभाजो हि राजानः कल्याणस्येतरस्य वा ॥

tvaṃ cāpi phalabhāktāta tapasaḥ pārthivo hyasi | phalabhājo hi rājānaḥ kalyāṇasyetarasya vā

और हे तात, तुम भी उस तप के फल के भागी होगे, क्योंकि तुम राजा हो; राजा कल्याण के और उसके विपरीत के भी फल के भागी होते हैं।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4