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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 4

युधिष्ठिर की धृतराष्ट्र से विनती

युधिष्ठिर धृतराष्ट्र के उपवास का पता न होने पर स्वयं को दोष देते हैं और राज्य छोड़ने या उनके साथ वन जाने को कहते हैं। धृतराष्ट्र उत्तर देते हैं कि उनका मन तपस्या में लगा है और जाने की अनुमति माँगते हैं, फिर गान्धारी के सहारे संज्ञाहीन हो जाते हैं। युधिष्ठिर अपने स्पर्श से उन्हें होश में लाते हैं; दुर्बल धृतराष्ट्र फिर अनुमति माँगते हैं और कहते हैं कि वे युधिष्ठिर की अनुमति से ही भोजन करेंगे। युधिष्ठिर पहले भोजन करने की विनती करते हैं और तभी व्यास आ पहुँचते हैं।

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 1 (15.4.1)

न मां प्रीणयते राज्यं त्वय्येवं दुःखिते नृप । दिङ्मामस्तु सुदुर्बुद्धिं राज्यसक्तं प्रमादिनम् ॥

na māṃ prīṇayate rājyaṃ tvayyevaṃ duḥkhite nṛpa | diṅmāmastu sudurbuddhiṃ rājyasaktaṃ pramādinam

हे राजन्, आपको इस प्रकार दुःख में देखकर यह राज्य मुझे प्रसन्न नहीं करता। राज्य में आसक्त और प्रमादी मुझ दुर्बुद्धि को धिक्कार है।

श्लोक 2 (15.4.2)

गृहे वसन्तं दुःखार्तमुपवासकृशं भृशम् । यताहारं क्षितिशयं नाविदं भ्रातृभिः सह ॥

gṛhe vasantaṃ duḥkhārtamupavāsakṛśaṃ bhṛśam | yatāhāraṃ kṣitiśayaṃ nāvidaṃ bhrātṛbhiḥ saha

आप घर में रहते हुए दुःख से पीड़ित थे, उपवास से अत्यन्त दुर्बल हो गए थे, नियत आहार लेते थे और भूमि पर सोते थे, और मैंने अपने भाइयों सहित यह नहीं जाना।

श्लोक 3 (15.4.3)

अहोस्मि वञ्चितो मूढो भवता गूढबुद्धिना । विस्वासयित्वा पूर्वं मां यदिदं दुःखमश्नुथा ॥

ahosmi vañcito mūḍho bhavatā gūḍhabuddhinā | visvāsayitvā pūrvaṃ māṃ yadidaṃ duḥkhamaśnuthā

हाय, मैं मूर्ख आपके गूढ़ मन से ठगा गया; क्योंकि पहले मुझे विश्वास दिलाकर आप यह दुःख सहते रहे।

श्लोक 4 (15.4.4)

किं मे राज्येन भोगैर्वा किं यज्ञैः किं सुखेन वा । यस्य मे त्वं महीपाल दुखान्येतान्यवाप्तवान् ॥

kiṃ me rājyena bhogairvā kiṃ yajñaiḥ kiṃ sukhena vā | yasya me tvaṃ mahīpāla dukhānyetānyavāptavān

हे पृथ्वीपालक, जब मेरे कारण आपको ये दुःख प्राप्त हुए हैं, तब मुझे राज्य, भोग, यज्ञ या सुख से क्या प्रयोजन?

श्लोक 5 (15.4.5)

पीडितं चापि जानामि राज्यमात्मानमेव च । अनेन वचसा तेऽद्य दुःखितस्य जनेश्वरः ॥

pīḍitaṃ cāpi jānāmi rājyamātmānameva ca | anena vacasā te'dya duḥkhitasya janeśvaraḥ

हे जनेश्वर, आज दुःखी हुए आपके इन वचनों से मैं जानता हूँ कि राज्य और मैं स्वयं भी पीड़ित हैं।

श्लोक 6 (15.4.6)

भवान्पिता भवान्माता भवान्नः परमो गुरुः । भवता विप्रहीणा वै क्वनु तिष्ठामहे वयम् ॥

bhavānpitā bhavānmātā bhavānnaḥ paramo guruḥ | bhavatā viprahīṇā vai kvanu tiṣṭhāmahe vayam

आप हमारे पिता हैं, आप माता हैं, आप ही हमारे परम गुरु हैं। आपसे वियुक्त होकर हम कहाँ ठहरेंगे?

श्लोक 7 (15.4.7)

औरसो भवतः पुत्रो युयुत्सुर्नृपसत्तम । अस्तु राजा महाराज यमन्यं मन्यते भवान् ॥

auraso bhavataḥ putro yuyutsurnṛpasattama | astu rājā mahārāja yamanyaṃ manyate bhavān

हे नृपश्रेष्ठ, युयुत्सु आपका औरस पुत्र है। हे महाराज, वही राजा हो, अथवा आप जिसे उचित समझें वह हो।

श्लोक 8 (15.4.8)

अहं वनं गमिष्यामि भवान्राजा प्रशास्त्विदम् । नमामयशसा दग्धं भूयस्त्वं दग्धुमर्हसि ॥

ahaṃ vanaṃ gamiṣyāmi bhavānrājā praśāstvidam | namāmayaśasā dagdhaṃ bhūyastvaṃ dagdhumarhasi

मैं वन को जाऊँगा; आप इस राज्य पर शासन कीजिए। अपयश से पहले ही जले हुए मुझे आप फिर न जलाइए।

श्लोक 9 (15.4.9)

नाहं राजा भवान्राजा भवता परवानहम् । कथं गुरुं त्वां धर्मज्ञमनुज्ञातुमिहोत्सहे ॥

nāhaṃ rājā bhavānrājā bhavatā paravānaham | kathaṃ guruṃ tvāṃ dharmajñamanujñātumihotsahe

मैं राजा नहीं हूँ, आप राजा हैं; मैं आपके अधीन हूँ। धर्म को जानने वाले अपने गुरु आपको मैं अनुमति देने का साहस कैसे करूँ?

श्लोक 10 (15.4.10)

न मन्युर्हृदि नः कश्चित्सुयोधनकृतेऽनघ । भवितव्यं तथा तद्धि वयं चान्ये च मोहिताः ॥

na manyurhṛdi naḥ kaścitsuyodhanakṛte'nagha | bhavitavyaṃ tathā taddhi vayaṃ cānye ca mohitāḥ

हे निष्पाप, सुयोधन के किए हुए कर्म को लेकर हमारे हृदय में कोई क्रोध नहीं है। वैसा ही होना था; हम और दूसरे सभी मोह में पड़ गए थे।

श्लोक 11 (15.4.11)

वयं पुत्रा हि भवतो यथा दुर्योधनादयः । गान्धारी चैव कुन्ती च निर्विशेषे मते मम ॥

vayaṃ putrā hi bhavato yathā duryodhanādayaḥ | gāndhārī caiva kuntī ca nirviśeṣe mate mama

जैसे दुर्योधन आदि आपके पुत्र थे, वैसे ही हम भी आपके पुत्र हैं। मेरे मत में गान्धारी और कुन्ती में कोई भेद नहीं है।

श्लोक 12 (15.4.12)

स मां त्वं यदि राजेन्द्र परित्यज्य गमिष्यसि । पृष्ठतस्त्वनुयास्यामि सत्यमात्मानमालभे ॥

sa māṃ tvaṃ yadi rājendra parityajya gamiṣyasi | pṛṣṭhatastvanuyāsyāmi satyamātmānamālabhe

इसलिए हे राजेन्द्र, यदि आप मुझे छोड़कर जाएँगे तो मैं आपके पीछे-पीछे चलूँगा; मैं सत्य की शपथ लेता हूँ।

श्लोक 13 (15.4.13)

इयं हि वसुसंपूर्णा मही सागरमेखला । भवता विप्रहीणस्य न मे प्रीतिकरी भवेत् ॥

iyaṃ hi vasusaṃpūrṇā mahī sāgaramekhalā | bhavatā viprahīṇasya na me prītikarī bhavet

समुद्र से घिरी, धन से परिपूर्ण यह पृथ्वी आपके बिना मुझे आनन्द देने वाली नहीं होगी।

श्लोक 14 (15.4.14)

भवदीयमिदं सर्वं शिरसा त्वां प्रसादये । त्वदधीनाः स्म राजेन्द्र व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥

bhavadīyamidaṃ sarvaṃ śirasā tvāṃ prasādaye | tvadadhīnāḥ sma rājendra vyetu te mānaso jvaraḥ

यह सब आपका ही है; मैं सिर झुकाकर आपको प्रसन्न करता हूँ। हे राजेन्द्र, हम आपके अधीन हैं; आपके मन का ताप दूर हो।

श्लोक 15 (15.4.15)

भवितव्यमनुप्राप्तो मन्ये त्वं वसुधाधिप । दिष्ट्या शुश्रूषमाणस्त्वां मोक्षिष्ये मनसो ज्वरं ॥

bhavitavyamanuprāpto manye tvaṃ vasudhādhipa | diṣṭyā śuśrūṣamāṇastvāṃ mokṣiṣye manaso jvaraṃ

हे पृथ्वीपति, मैं समझता हूँ कि आप उस स्थिति को पहुँच गए हैं जो होनी थी। सौभाग्य से आपकी सेवा करते हुए मैं आपके मन का ताप दूर करूँगा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 16 (15.4.16)

तापस्ये मे मनस्तात वर्तते कुरुनन्दन । उचितं च कुलेऽस्माकमरण्यगमनं प्रभो ॥

tāpasye me manastāta vartate kurunandana | ucitaṃ ca kule'smākamaraṇyagamanaṃ prabho

हे तात, हे कुरुनन्दन, मेरा मन तपस्या में लगा है; और हे प्रभो, हमारे कुल में वन को जाना उचित भी है।

श्लोक 17 (15.4.17)

चिरमध्युषितः पुत्र चिरं शुश्रूषितस्त्वया । वृद्धं मामप्यनुज्ञातुमर्हसि त्वं नराधिप ॥

ciramadhyuṣitaḥ putra ciraṃ śuśrūṣitastvayā | vṛddhaṃ māmapyanujñātumarhasi tvaṃ narādhipa

हे पुत्र, मैं बहुत समय रह चुका और आपने बहुत समय तक मेरी सेवा की है। हे नराधिप, मुझ वृद्ध को भी आप जाने की अनुमति दीजिए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 18 (15.4.18)

इत्युक्त्वा धर्मराजानं वेपमानं कृताञ्जलिम् । उवाच विदुरं राजा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥

ityuktvā dharmarājānaṃ vepamānaṃ kṛtāñjalim | uvāca viduraṃ rājā dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ

हाथ जोड़े काँपते हुए धर्मराज से यह कहकर अम्बिका के पुत्र राजा धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 19 (15.4.19)

संजयं च महात्मानं कृपं चापि महारथम् । अनुनेतुमिहेच्छामि भवद्भिर्वसुधाधिपम् ॥

saṃjayaṃ ca mahātmānaṃ kṛpaṃ cāpi mahāratham | anunetumihecchāmi bhavadbhirvasudhādhipam

"मैं आप सब के द्वारा — आपके, महात्मा सञ्जय के और महारथी कृप के द्वारा — राजा को मनाना चाहता हूँ।

श्लोक 20 (15.4.20)

म्लायते मे मनो हीदं मुखं च परिशुष्यति । वयसा च प्रकृष्टेन वाग्व्यायामेन चैव ह ॥

mlāyate me mano hīdaṃ mukhaṃ ca pariśuṣyati | vayasā ca prakṛṣṭena vāgvyāyāmena caiva ha

मेरा मन ग्लानि से भरा जा रहा है और मुख सूख रहा है — अत्यधिक वृद्धावस्था के कारण और बोलने के श्रम से।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (15.4.21)

इत्युक्त्वा स तु धर्मात्मा वृद्धो राजा कुरूद्वहः । गान्धारीं शिश्रिये धीमान्सहसैव गतासुवत् ॥

ityuktvā sa tu dharmātmā vṛddho rājā kurūdvahaḥ | gāndhārīṃ śiśriye dhīmānsahasaiva gatāsuvat

यह कहकर वह बुद्धिमान, धर्मात्मा, वृद्ध कुरुश्रेष्ठ राजा सहसा प्राणहीन-सा होकर गान्धारी के सहारे झुक गया।

श्लोक 22 (15.4.22)

तं तु दृष्ट्वा समासीनं विसंज्ञमिव कौरवम् । आर्तिं राजाऽगमत्तीव्रां कौन्तेयः परवीरहा ॥

taṃ tu dṛṣṭvā samāsīnaṃ visaṃjñamiva kauravam | ārtiṃ rājā'gamattīvrāṃ kaunteyaḥ paravīrahā

कुरुराज को इस प्रकार बैठा देखकर, मानो वे संज्ञाहीन हों, शत्रुवीरों का संहार करने वाले कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर तीव्र पीड़ा से भर उठे।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 23 (15.4.23)

यस्य नागसहस्रेण शतसङ्ख्येन वै बलम् । सोयं नारीं व्यपाश्रित्य शेते राजा गतासुवत् ॥

yasya nāgasahasreṇa śatasaṅkhyena vai balam | soyaṃ nārīṃ vyapāśritya śete rājā gatāsuvat

जिसका बल सौ गुने हज़ार हाथियों के बराबर है, वही यह राजा एक स्त्री का आश्रय लेकर प्राणहीन-सा पड़ा है।

श्लोक 24 (15.4.24)

आयसी प्रतिमा येन भीमसेनस्य सा पुरा । चूर्णीकृता बलवता सोबलामाश्रितः स्त्रियम् ॥

āyasī pratimā yena bhīmasenasya sā purā | cūrṇīkṛtā balavatā sobalāmāśritaḥ striyam

जिसने पहले भीमसेन की लोहे की प्रतिमा को बलपूर्वक चूर-चूर कर दिया था, वही अब एक अबला स्त्री की शरण में है।

श्लोक 25 (15.4.25)

धिगस्तु मामधर्मज्ञं धिग्बुद्धिं धिक्च मे श्रुतम् । यत्कृते पृथिवीपालः शेतेऽयमतथोचितः ॥

dhigastu māmadharmajñaṃ dhigbuddhiṃ dhikca me śrutam | yatkṛte pṛthivīpālaḥ śete'yamatathocitaḥ

मुझ धर्म न जानने वाले को धिक्कार है; मेरी बुद्धि और मेरे शास्त्र-ज्ञान को धिक्कार है, जिनके कारण यह पृथ्वीपति ऐसी अयोग्य दशा में पड़ा है।

श्लोक 26 (15.4.26)

अहमप्युपवत्स्यामि यथैवायं गुरुर्मम । यदि राजा न भुङ्क्तेऽयं गान्धारी च यशस्विनी ॥

ahamapyupavatsyāmi yathaivāyaṃ gururmama | yadi rājā na bhuṅkte'yaṃ gāndhārī ca yaśasvinī

यदि राजा और यशस्विनी गान्धारी भोजन नहीं करते, तो मैं भी अपने इन गुरु की भाँति उपवास करूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 27 (15.4.27)

ततोस्य पाणिना राजञ्जलशीतेन पाण्डवः । उरो मुखं च शनकैः पर्यमार्जत धर्मवित् ॥

tatosya pāṇinā rājañjalaśītena pāṇḍavaḥ | uro mukhaṃ ca śanakaiḥ paryamārjata dharmavit

तब धर्म को जानने वाले पाण्डव ने जल से शीतल किए हुए अपने हाथ से राजा की छाती और मुख को धीरे-धीरे पोंछा।

श्लोक 28 (15.4.28)

तेन रत्नौषधिमता पुण्येन च सुगन्धिना । पाणिस्पर्शेन राज्ञः स राजा संज्ञामवाप ह ॥

tena ratnauṣadhimatā puṇyena ca sugandhinā | pāṇisparśena rājñaḥ sa rājā saṃjñāmavāpa ha

रत्नों और औषधियों के गुण से युक्त, पवित्र और सुगन्धित उस हाथ के स्पर्श से राजा को होश आ गया।

श्लोक 29 (15.4.29)

स्पृशन्तं पाणिना भूयः परिष्यज्य च पाण्डवम् । उवाच राजा धर्मज्ञो धृतराष्ट्रः शुभं वचः ॥

spṛśantaṃ pāṇinā bhūyaḥ pariṣyajya ca pāṇḍavam | uvāca rājā dharmajño dhṛtarāṣṭraḥ śubhaṃ vacaḥ

अपने को फिर स्पर्श करते हुए पाण्डव को गले लगाकर धर्मज्ञ राजा धृतराष्ट्र ने ये शुभ वचन कहे —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 30 (15.4.30)

जीवामीवातिसंस्पर्शात्तव राजीवलोचन । मूर्धानं च तवाघ्रातुमिच्छामि मनुजाधिप । पाणिभ्यां हि परिस्प्रष्टुं प्राणानां हितमात्मनि ॥

jīvāmīvātisaṃsparśāttava rājīvalocana | mūrdhānaṃ ca tavāghrātumicchāmi manujādhipa | pāṇibhyāṃ hi parispraṣṭuṃ prāṇānāṃ hitamātmani

"हे कमलनयन, तुम्हारे स्पर्श से मानो मैं फिर जी उठा हूँ। हे नरेश्वर, मैं तुम्हारा मस्तक सूँघना और तुम्हें दोनों हाथों से छूना चाहता हूँ; यह मेरे प्राणों के लिए हितकर है।

श्लोक 31 (15.4.31)

अष्टमो ह्यद्य कालोऽयमाहारस्य कृतस्य मे । येनाहं कुरुशार्दूल शक्नोमि न विचेष्टितुम् ॥

aṣṭamo hyadya kālo'yamāhārasya kṛtasya me | yenāhaṃ kuruśārdūla śaknomi na viceṣṭitum

हे कुरुशार्दूल, मेरे भोजन किए हुए को आज आठवाँ समय बीत रहा है, इसी कारण मुझमें हिलने-डुलने की भी शक्ति नहीं है।

श्लोक 32 (15.4.32)

व्यायामश्चायमत्यर्थं कृतस्त्वामभियाचता । ततो ग्लानमनास्तात नष्टसंज्ञ इवाभवम् ॥

vyāyāmaścāyamatyarthaṃ kṛtastvāmabhiyācatā | tato glānamanāstāta naṣṭasaṃjña ivābhavam

तुमसे याचना करते हुए मैंने बहुत श्रम किया, इसी से हे तात, मन खिन्न हो गया और मैं संज्ञाहीन-सा हो गया।

श्लोक 33 (15.4.33)

तवामृतसुखस्पर्शं हस्तस्पर्शमिमं प्रभो । लब्ध्वा संजीवितोस्मीति मन्ये कुरुकुलोद्वह ॥

tavāmṛtasukhasparśaṃ hastasparśamimaṃ prabho | labdhvā saṃjīvitosmīti manye kurukulodvaha

हे प्रभो, हे कुरुकुलश्रेष्ठ, अमृत के समान सुख देने वाले तुम्हारे इस हस्त-स्पर्श को पाकर मैं मानो पुनः जी उठा हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 34 (15.4.34)

एवमुक्तस्तु कौन्तेयः पित्रा ज्येष्ठेन भारत । पस्पर्श सर्वगात्रेषु स्नेहार्द्रस्तं शनैस्तदा ॥

evamuktastu kaunteyaḥ pitrā jyeṣṭhena bhārata | pasparśa sarvagātreṣu snehārdrastaṃ śanaistadā

हे भारत, अपने बड़े पिता के ऐसा कहने पर स्नेह से भरे हुए कुन्तीपुत्र ने तब उनके सब अंगों पर धीरे-धीरे हाथ फेरा।

श्लोक 35 (15.4.35)

उपलभ्य ततः प्राणान्धृतराष्ट्रो महीपतिः । बाहुभ्यां सम्परिष्वज्य मूर्ध्न्याजिघ्रत पाण्डवम् ॥

upalabhya tataḥ prāṇāndhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ | bāhubhyāṃ sampariṣvajya mūrdhnyājighrata pāṇḍavam

प्राण लौट आने पर राजा धृतराष्ट्र ने पाण्डव को दोनों बाँहों में भरकर उसका मस्तक सूँघा।

श्लोक 36 (15.4.36)

विदुरादयश्च ते सर्वे रुरुदुर्दुःखिता भृशम् । अतिदुःखात्तु राजानं नोचुः किञ्चन पाण्डवम् ॥

vidurādayaśca te sarve rurudurduḥkhitā bhṛśam | atiduḥkhāttu rājānaṃ nocuḥ kiñcana pāṇḍavam

विदुर आदि सभी लोग दुःख से बहुत रोए; अत्यन्त शोक के कारण उन्होंने राजा या पाण्डव से कुछ नहीं कहा।

श्लोक 37 (15.4.37)

गान्धारी त्वेव धर्मज्ञा मनसोद्वहती भृशम् । दुःखान्यधारयद्राजन्मैवमित्येव चाब्रवीत् ॥

gāndhārī tveva dharmajñā manasodvahatī bhṛśam | duḥkhānyadhārayadrājanmaivamityeva cābravīt

धर्म को जानने वाली गान्धारी अकेली ही अपने मन में भारी शोक को धारण किए रहीं और हे राजन्, केवल यह कहती रहीं कि "ऐसा नहीं"।

श्लोक 38 (15.4.38)

इतरास्तु स्त्रियः सर्वाः कुन्त्या सह सुदुःखिताः । नेत्रैरागतविक्लेदैः परिवार्य स्थिताऽभवन् ॥

itarāstu striyaḥ sarvāḥ kuntyā saha suduḥkhitāḥ | netrairāgatavikledaiḥ parivārya sthitā'bhavan

कुन्ती के साथ अन्य सब स्त्रियाँ भी अत्यन्त दुःखी होकर आँखों में आँसू भरे चारों ओर खड़ी थीं।

श्लोक 39 (15.4.39)

अथाब्रवीत्पुनर्वाक्यं धृतराष्ट्रो युधिष्ठिरम् । अनुजानीहि मां राजंस्तापस्ये भरतर्षभ ॥

athābravītpunarvākyaṃ dhṛtarāṣṭro yudhiṣṭhiram | anujānīhi māṃ rājaṃstāpasye bharatarṣabha

तब धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से फिर कहा — "हे राजन्, हे भरतश्रेष्ठ, मुझे तपस्या के लिए जाने की अनुमति दो।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 40 (15.4.40)

ग्लायते मे मनस्तात भूयोभूयः प्रजल्पतः । न मामतः परं पुत्र परिक्लेष्टुमिहार्हसि ॥

glāyate me manastāta bhūyobhūyaḥ prajalpataḥ | na māmataḥ paraṃ putra parikleṣṭumihārhasi

हे तात, बार-बार बोलने से मेरा मन थक जाता है। हे पुत्र, अब इससे अधिक तुम्हें मुझे कष्ट नहीं देना चाहिए।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 41 (15.4.41)

तस्मिंस्तु कौरवेन्द्रे तं तथा ब्रुवति पाण्डवम् । सर्वेषामवरोधानामार्तनादो महानभूत् ॥

tasmiṃstu kauravendre taṃ tathā bruvati pāṇḍavam | sarveṣāmavarodhānāmārtanādo mahānabhūt

जब कुरुओं के वे स्वामी पाण्डव से इस प्रकार कह रहे थे, तब सब रनिवास की स्त्रियों में बड़ा आर्तनाद उठा।

श्लोक 42 (15.4.42)

दृष्ट्वा कृशं विवर्णं च राजानमतथोचितम् । उपवासपरिश्रान्तं त्वगस्थिपरिवारितम् ॥

dṛṣṭvā kṛśaṃ vivarṇaṃ ca rājānamatathocitam | upavāsapariśrāntaṃ tvagasthiparivāritam

उन्होंने राजा को कृश और विवर्ण देखा, जो ऐसी दशा के योग्य नहीं थे; उपवास से थके हुए, केवल हड्डी और चमड़ी रह गए थे।

श्लोक 43 (15.4.43)

धर्मपुत्रः स्वपितरं परिष्वज्य महाप्रभुम् । शोकजं बाष्पमुत्सृज्य पुनर्वचनमब्रवीत् ॥

dharmaputraḥ svapitaraṃ pariṣvajya mahāprabhum | śokajaṃ bāṣpamutsṛjya punarvacanamabravīt

धर्मपुत्र ने अपने महान् पिता को गले लगाकर शोक से उत्पन्न आँसू बहाए और फिर बोले।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 44 (15.4.44)

न कामये नरश्रेष्ठ जीवितं पृथिवीं तथा । यथा तव प्रियं राजंश्चिकीर्षामि परंतप ॥

na kāmaye naraśreṣṭha jīvitaṃ pṛthivīṃ tathā | yathā tava priyaṃ rājaṃścikīrṣāmi paraṃtapa

"हे नरश्रेष्ठ, मुझे जीवन या पृथ्वी की उतनी चाह नहीं है जितनी इसकी कि हे परंतप राजन्, मैं वही करूँ जो आपको प्रिय हो।

श्लोक 45 (15.4.45)

यदि चाहमनुग्राह्यो भवतो दयितोऽपि वा । क्रियतां तावदाहारस्ततो वेत्स्याम्यहं परम् ॥

yadi cāhamanugrāhyo bhavato dayito'pi vā | kriyatāṃ tāvadāhārastato vetsyāmyahaṃ param

यदि आप मुझ पर अनुग्रह करने योग्य समझते हैं, अथवा मैं आपको प्रिय हूँ, तो पहले आहार कीजिए; उसके बाद मैं आगे की बात जानूँगा।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 46 (15.4.46)

ततोऽब्रवीन्महातेजा धृतराष्ट्रो युधिष्ठिरम् । अनुज्ञातस्त्वया पुत्र भुञ्जीयामिति कामये ॥

tato'bravīnmahātejā dhṛtarāṣṭro yudhiṣṭhiram | anujñātastvayā putra bhuñjīyāmiti kāmaye

तब महातेजस्वी धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से कहा — "पुत्र, तुम्हारी अनुमति पाकर ही मैं भोजन करूँ, यही मेरी इच्छा है।"

श्लोक 47 (15.4.47)

इति ब्रुवति राजेन्द्रे धृतराष्ट्रे युधिष्ठिरम् । ऋषिः सत्यवतीपुत्रो व्यासोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ॥

iti bruvati rājendre dhṛtarāṣṭre yudhiṣṭhiram | ṛṣiḥ satyavatīputro vyāso'bhyetya vaco'bravīt

राजेन्द्र धृतराष्ट्र जब युधिष्ठिर से इस प्रकार कह रहे थे, तब सत्यवती के पुत्र ऋषि व्यास वहाँ आकर बोले।

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