आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 5
व्यास का युधिष्ठिर को परामर्श
व्यास युधिष्ठिर से कहते हैं कि वे धृतराष्ट्र को वन जाने की अनुमति दें, क्योंकि वृद्ध और पुत्रहीन राजा अपना शोक अधिक समय तक नहीं सह सकता और वन राजर्षियों का अन्तिम आश्रय है। युधिष्ठिर उन्हें गुरु मानकर कहते हैं कि पुत्र को पिता की आज्ञा माननी चाहिए। व्यास राजा के दीर्घ शासन और युधिष्ठिर की की हुई सेवा का स्मरण कराकर उनसे पिता को तप के लिए जाने देने को कहते हैं और चले जाते हैं। युधिष्ठिर वचन देते हैं कि वे सबकी सलाह के अनुसार करेंगे, बस धृतराष्ट्र पहले भोजन कर लें।
व्यास उवाच
श्लोक 1 (15.5.1)
युधिष्ठिर महाबाहो यदाह कुरुनन्दनः । धृतराष्ट्रो महातेजास्तत्कुरुष्वाविचारयन् ॥
yudhiṣṭhira mahābāho yadāha kurunandanaḥ | dhṛtarāṣṭro mahātejāstatkuruṣvāvicārayan
हे महाबाहु युधिष्ठिर, कुरुनन्दन महातेजस्वी धृतराष्ट्र ने जो कहा है, उसे बिना विचार किए कर दो।
श्लोक 2 (15.5.2)
अयं हि वृद्धो नृपतिर्हतपुत्रो विशेषतः । नेदं कृच्छ्रं चिरतरं सहेदिति मतिर्मम ॥
ayaṃ hi vṛddho nṛpatirhataputro viśeṣataḥ | nedaṃ kṛcchraṃ cirataraṃ sahediti matirmama
यह राजा वृद्ध है और विशेष रूप से पुत्रहीन हो गया है; मेरा मत है कि वह इस कष्ट को अधिक समय तक नहीं सह सकेगा।
श्लोक 3 (15.5.3)
गान्धारी च महाभागा प्राज्ञा करुणवेदिनी । पुत्रशोकं महाराज धैर्येणोद्वहते भृशम् ॥
gāndhārī ca mahābhāgā prājñā karuṇavedinī | putraśokaṃ mahārāja dhairyeṇodvahate bhṛśam
और महाभाग्यशालिनी, बुद्धिमती तथा करुणा को जानने वाली गान्धारी भी, हे महाराज, पुत्र-शोक को बड़े धैर्य से सह रही है।
श्लोक 4 (15.5.4)
अहमप्येतदेव त्वां ब्रवीमि कुरु मे वचः । अनुज्ञां लभतां राजा मां वृथेह मरिष्यति ॥
ahamapyetadeva tvāṃ bravīmi kuru me vacaḥ | anujñāṃ labhatāṃ rājā māṃ vṛtheha mariṣyati
मैं भी तुमसे यही कहता हूँ; मेरी बात मानो। राजा को अनुमति मिलनी चाहिए, नहीं तो वह यहाँ व्यर्थ ही मर जाएगा।
श्लोक 5 (15.5.5)
स्वस्थो भवत्वयं धीमान्वनेषु मधुगन्धिषु । राजर्षीणां पुराणानामनुयातु गतिं नृपः । राजर्षीणां हि सर्वेषामन्ते वनमुपाश्रयः ॥
svastho bhavatvayaṃ dhīmānvaneṣu madhugandhiṣu | rājarṣīṇāṃ purāṇānāmanuyātu gatiṃ nṛpaḥ | rājarṣīṇāṃ hi sarveṣāmante vanamupāśrayaḥ
यह बुद्धिमान राजा मधु की सुगन्ध से भरे वनों में स्वस्थ और सुखी रहे। वह प्राचीन राजर्षियों के मार्ग का अनुसरण करे; क्योंकि सभी राजर्षियों का अन्तिम आश्रय वन ही होता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 6 (15.5.6)
इत्युक्तः स तदा राजा व्यासेनाद्भुतकर्मणा । प्रत्युवाच महातेजा धर्मराजो महामुनिम् ॥
ityuktaḥ sa tadā rājā vyāsenādbhutakarmaṇā | pratyuvāca mahātejā dharmarājo mahāmunim
अद्भुत कर्म करने वाले व्यास के ऐसा कहने पर महातेजस्वी धर्मराज ने उन महामुनि को उत्तर दिया।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 7 (15.5.7)
भगवानेव नो मान्यो भगवानेव नो गुरुः । भगवानस्य राज्यस्य कुलस्य च परायणम् ॥
bhagavāneva no mānyo bhagavāneva no guruḥ | bhagavānasya rājyasya kulasya ca parāyaṇam
भगवन्, आप ही हमारे माननीय हैं, आप ही हमारे गुरु हैं; आप ही इस राज्य और हमारे कुल के परम आश्रय हैं।
श्लोक 8 (15.5.8)
अहं तु पुत्रो भगवन्पिता राजा गुरुश्च मे । निदेशवर्ती च पितुः पुत्रो भवति धर्मतः ॥
ahaṃ tu putro bhagavanpitā rājā guruśca me | nideśavartī ca pituḥ putro bhavati dharmataḥ
भगवन्, मैं तो पुत्र हूँ; राजा मेरे पिता और गुरु हैं; और धर्म के अनुसार पुत्र वही है जो पिता की आज्ञा का पालन करता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (15.5.9)
इत्युक्तः स तु तं प्राह व्यासो वेदविदांवरः । युधिष्ठिरं महातेजाः पुनरेव महाकविः ॥
ityuktaḥ sa tu taṃ prāha vyāso vedavidāṃvaraḥ | yudhiṣṭhiraṃ mahātejāḥ punareva mahākaviḥ
ऐसा कहे जाने पर वेदज्ञों में श्रेष्ठ, महातेजस्वी महाकवि व्यास ने युधिष्ठिर से फिर कहा।
व्यास उवाच
श्लोक 10 (15.5.10)
एवमेतन्महाभाग यथा वदसि भारत । राजाऽयं वृद्धतां प्राप्तः प्रमाणे परमे स्थितः ॥
evametanmahābhāga yathā vadasi bhārata | rājā'yaṃ vṛddhatāṃ prāptaḥ pramāṇe parame sthitaḥ
हे महाभाग, हे भारत, जैसा तुम कहते हो वैसा ही है। यह राजा वृद्धावस्था को प्राप्त हो चुका है और जीवन की परम सीमा पर खड़ा है।
श्लोक 11 (15.5.11)
सोयं मयाऽभ्यनुज्ञातस्त्वया च पृथिवीपतिः । करोतु स्वमभिप्रायं मा स्म विघ्नकरो भव ॥
soyaṃ mayā'bhyanujñātastvayā ca pṛthivīpatiḥ | karotu svamabhiprāyaṃ mā sma vighnakaro bhava
मैंने इसे अनुमति दे दी है, और तुम भी दो; राजा अपनी इच्छा के अनुसार करे, तुम उसमें बाधक न बनो।
श्लोक 12 (15.5.12)
एष एव परो धर्मो राजर्षीणां युधिष्ठिर । समरे वा भवेन्मृत्युर्वने वा विधिपूर्वकम् ॥
eṣa eva paro dharmo rājarṣīṇāṃ yudhiṣṭhira | samare vā bhavenmṛtyurvane vā vidhipūrvakam
हे युधिष्ठिर, राजर्षियों का यही परम धर्म है कि उनकी मृत्यु या तो युद्ध में हो, या विधिपूर्वक वन में।
श्लोक 13 (15.5.13)
पित्रा तु तव राजेन्द्र पाण्डुना पृथिवीक्षिता । शिष्यभूतेन राजाऽयं गुरुवत्पर्युपासितः ॥
pitrā tu tava rājendra pāṇḍunā pṛthivīkṣitā | śiṣyabhūtena rājā'yaṃ guruvatparyupāsitaḥ
तुम्हारे पिता पृथ्वीपति पाण्डु ने शिष्य की भाँति इस राजा की गुरु के समान सेवा की थी।
श्लोक 14 (15.5.14)
क्रतुभिर्दक्षिणावद्भिः रत्नपर्वतशोभितैः । महद्भिरिष्टं गौर्भुक्ता प्रजाश्च परिपालिताः ॥
kratubhirdakṣiṇāvadbhiḥ ratnaparvataśobhitaiḥ | mahadbhiriṣṭaṃ gaurbhuktā prajāśca paripālitāḥ
रत्नों के पर्वतों से सुशोभित, प्रचुर दक्षिणा वाले बड़े-बड़े यज्ञ किए गए; पृथ्वी का भोग किया गया और प्रजा का पालन हुआ।
श्लोक 15 (15.5.15)
पुत्रसंस्थं च विपुलं राज्यं विप्रोषिते त्वयि । त्रयोदशसमा भुक्तं दत्तं च विविधं वसु ॥
putrasaṃsthaṃ ca vipulaṃ rājyaṃ viproṣite tvayi | trayodaśasamā bhuktaṃ dattaṃ ca vividhaṃ vasu
तुम्हारे प्रवास में रहते हुए पुत्रों के आश्रित इस विशाल राज्य का तेरह वर्ष तक भोग किया गया और नाना प्रकार का धन दान किया गया।
श्लोक 16 (15.5.16)
त्वया चायं नरव्याघ्र गुरुशुश्रूषयाऽनघ । आराधितः स भृत्येन गान्धारी च यशस्विनी ॥
tvayā cāyaṃ naravyāghra guruśuśrūṣayā'nagha | ārādhitaḥ sa bhṛtyena gāndhārī ca yaśasvinī
और हे नरव्याघ्र, हे निष्पाप, तुमने गुरुजनों की सेवा के भाव से, सेवक की भाँति, इस राजा तथा यशस्विनी गान्धारी की आराधना की है।
श्लोक 17 (15.5.17)
अनुजानीहि पितरं समयोऽस्य तपोविधौ । न मन्युर्विद्यते चास्य सुसूक्ष्मोऽपि युधिष्ठिर ॥
anujānīhi pitaraṃ samayo'sya tapovidhau | na manyurvidyate cāsya susūkṣmo'pi yudhiṣṭhira
पिता को अनुमति दो; यह उनके तप करने का समय है। हे युधिष्ठिर, उनमें अब थोड़ा-सा भी क्रोध नहीं रह गया है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (15.5.18)
एतावदुक्त्वा वचनमनुमान्य च पार्थिवम् । तथाऽस्त्विति च तेनोक्तः कौन्तेयेन ययौ वनम् ॥
etāvaduktvā vacanamanumānya ca pārthivam | tathā'stviti ca tenoktaḥ kaunteyena yayau vanam
इतना कहकर और राजा का सम्मान करके, कुन्तीपुत्र के "ऐसा ही हो" कहने पर वे वन को चले गए।
श्लोक 19 (15.5.19)
गते भगवति व्यासे राजा पाण्डुसुतस्तदा । प्रोवाच पितरं वृद्धं मन्दंमन्दमिवानतः ॥
gate bhagavati vyāse rājā pāṇḍusutastadā | provāca pitaraṃ vṛddhaṃ mandaṃmandamivānataḥ
भगवान् व्यास के चले जाने पर पाण्डुपुत्र राजा ने अपने वृद्ध पिता से झुककर बहुत धीमे स्वर में कहा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 20 (15.5.20)
यदाह भगवान्व्यासो यच्चापि भवतो मतम् । यथाऽऽह च महेष्वासः कृपो विदुर एव च ॥
yadāha bhagavānvyāso yaccāpi bhavato matam | yathā''ha ca maheṣvāsaḥ kṛpo vidura eva ca
"भगवान् व्यास ने जो कहा है, जो आपका भी अभिमत है, और जो महाधनुर्धर कृप और विदुर ने कहा है,
श्लोक 21 (15.5.21)
युयुत्सुः संजयश्चैव तत्कर्तास्म्यहमञ्जसा । सर्व एव हि मान्या मे कुलस्य हि हितैषिणः ॥
yuyutsuḥ saṃjayaścaiva tatkartāsmyahamañjasā | sarva eva hi mānyā me kulasya hi hitaiṣiṇaḥ
तथा युयुत्सु और सञ्जय ने भी — वह सब मैं तुरन्त करूँगा। क्योंकि ये सभी कुल के हितैषी होने से मेरे लिए माननीय हैं।
श्लोक 22 (15.5.22)
इदं तु याचे नृपते त्वामहं शिरसा नतः । क्रियतां तावदाहारस्ततो गच्छाश्रमं प्रति ॥
idaṃ tu yāce nṛpate tvāmahaṃ śirasā nataḥ | kriyatāṃ tāvadāhārastato gacchāśramaṃ prati
परन्तु हे राजन्, मैं सिर झुकाकर आपसे यह माँगता हूँ कि पहले भोजन कर लीजिए, फिर आश्रम को जाइए।"