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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 6

धृतराष्ट्र का राजधर्म-उपदेश

अनुमति पाकर धृतराष्ट्र अपने भवन लौटकर भोजन करते हैं और फिर युधिष्ठिर को एकान्त में बुलाकर राजा के कर्तव्य सिखाते हैं। वे उन्हें विद्वानों की सेवा करने, इन्द्रियों की रक्षा करने, परखे हुए मन्त्री और गुप्तचर रखने, नगर को सुरक्षित बनाने और मन्त्रणा को गुप्त रखने को कहते हैं। आगे वे अपराधियों के दण्ड, मद्यपान के दोष, राजा की दिनचर्या, कोश, सेना और विश्वस्त जनों के पालन का उपदेश देते हैं।

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (15.6.1)

ततो राज्ञाऽभ्यनुज्ञातो धृतराष्ट्रो महामनाः । ययौ स्वभवनं राजा गान्धार्याऽनुगतस्तदा ॥

tato rājñā'bhyanujñāto dhṛtarāṣṭro mahāmanāḥ | yayau svabhavanaṃ rājā gāndhāryā'nugatastadā

तब राजा की अनुमति पाकर उदारचित्त धृतराष्ट्र गान्धारी के साथ अपने भवन को गए।

श्लोक 2 (15.6.2)

मन्दप्राणगतिर्धीमान्कृच्छ्रादिव समुद्वहन् । पदानि स महीपालो जीर्णो गजपतिर्यथा ॥

mandaprāṇagatirdhīmānkṛcchrādiva samudvahan | padāni sa mahīpālo jīrṇo gajapatiryathā

उनकी चाल और साँस मन्द थी; बुद्धिमान राजा कष्ट से मानो अपने को ढोते हुए बूढ़े गजराज की भाँति पग रख रहे थे।

श्लोक 3 (15.6.3)

तमन्वगच्छद्विदुरो विद्वान्सूतश्च संजयः । स चापि परमेष्वासः कृपः सारद्वतस्तथा ॥

tamanvagacchadviduro vidvānsūtaśca saṃjayaḥ | sa cāpi parameṣvāsaḥ kṛpaḥ sāradvatastathā

विद्वान् विदुर, सूतपुत्र सञ्जय और महाधनुर्धर शरद्वान् के पुत्र कृप भी उनके पीछे-पीछे गए।

श्लोक 4 (15.6.4)

स प्रविश्य गृहं राजा कृतपूर्वाह्णिकक्रियः । तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठानाहारमकरोत्तदा ॥

sa praviśya gṛhaṃ rājā kṛtapūrvāhṇikakriyaḥ | tarpayitvā dvijaśreṣṭhānāhāramakarottadā

घर में प्रवेश कर राजा ने प्रातःकाल के कर्म किए, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त किया और तब भोजन किया।

श्लोक 5 (15.6.5)

गान्धारी चैव धर्मज्ञा कुन्त्या सह मनस्विनी । वधूभिरुपचारेण पूजिताऽभुङ्क्त भारत ॥

gāndhārī caiva dharmajñā kuntyā saha manasvinī | vadhūbhirupacāreṇa pūjitā'bhuṅkta bhārata

हे भारत, धर्म को जानने वाली मनस्विनी गान्धारी ने भी कुन्ती के साथ बहुओं के सत्कार से सम्मानित होकर भोजन किया।

श्लोक 6 (15.6.6)

कृताहारं कृताहाराः सर्वे ते विदुरादयः । पाण्डवाश्च कुरुश्रेष्ठमुपातिष्ठन्त तं नृपम् ॥

kṛtāhāraṃ kṛtāhārāḥ sarve te vidurādayaḥ | pāṇḍavāśca kuruśreṣṭhamupātiṣṭhanta taṃ nṛpam

राजा के भोजन कर लेने पर विदुर आदि सबने भोजन किया, और पाण्डव उन कुरुश्रेष्ठ राजा की सेवा में उपस्थित हुए।

श्लोक 7 (15.6.7)

ततोऽब्रवीन्महाराजः कुन्तीपुत्रमुपह्वरे । निषण्णं पाणिना पृष्ठे संस्पृशन्नंबिकासुतः ॥

tato'bravīnmahārājaḥ kuntīputramupahvare | niṣaṇṇaṃ pāṇinā pṛṣṭhe saṃspṛśannaṃbikāsutaḥ

तब अम्बिका के पुत्र महाराज ने एकान्त में पास बैठे कुन्तीपुत्र की पीठ पर हाथ फेरते हुए उससे कहा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 8 (15.6.8)

अप्रमादस्त्वया कार्यः सर्वथा कुरुनन्दन । अष्टाङ्गे राजशार्दूल राज्ये धर्मपुरस्कृते ॥

apramādastvayā kāryaḥ sarvathā kurunandana | aṣṭāṅge rājaśārdūla rājye dharmapuraskṛte

"हे कुरुनन्दन, हे राजशार्दूल, धर्म को आगे रखने वाले आठ अंगों वाले राज्य के विषय में तुम्हें किसी भी प्रकार प्रमाद नहीं करना चाहिए।

श्लोक 9 (15.6.9)

तत्तु शक्यं महाराज रक्षितुं पाण्डुनन्दन । राज्यं धर्मेण कौन्तेय विद्वानसि निबोध तत् ॥

tattu śakyaṃ mahārāja rakṣituṃ pāṇḍunandana | rājyaṃ dharmeṇa kaunteya vidvānasi nibodha tat

हे महाराज, हे पाण्डुनन्दन, उसकी रक्षा की जा सकती है — हे कौन्तेय, धर्म से राज्य करो। तुम विद्वान् हो; सुनो।

श्लोक 10 (15.6.10)

विद्यावृद्धान्सदैव त्वमुपासीथा युधिष्ठिर । शृणुयास्ते च यद्ब्रूयुः कुर्याश्चैवाविचारयन् ॥

vidyāvṛddhānsadaiva tvamupāsīthā yudhiṣṭhira | śṛṇuyāste ca yadbrūyuḥ kuryāścaivāvicārayan

हे युधिष्ठिर, तुम सदा विद्या में वृद्ध पुरुषों की सेवा करना; वे जो कहें उसे सुनना और बिना संकोच किए करना।

श्लोक 11 (15.6.11)

प्रातरुत्थाय तान्राजन्पूजयित्वा यथाविधि । कृत्यकाले समुत्पन्ने पृच्छेथाः कार्यमात्मनः ॥

prātarutthāya tānrājanpūjayitvā yathāvidhi | kṛtyakāle samutpanne pṛcchethāḥ kāryamātmanaḥ

हे राजन्, प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक उनका सत्कार करना; और कार्य का समय आने पर अपना कर्तव्य उनसे पूछना।

श्लोक 12 (15.6.12)

ते तु सम्मानिता राजंस्त्वया लोकहितार्थिना । प्रवक्ष्यन्ति हितं तात सर्वथा तव भारत ॥

te tu sammānitā rājaṃstvayā lokahitārthinā | pravakṣyanti hitaṃ tāta sarvathā tava bhārata

हे राजन्, लोक का हित चाहने वाले तुम्हारे द्वारा सम्मानित होकर वे सब प्रकार से तुम्हारे लिए हितकर बात कहेंगे, हे तात, हे भारत।

श्लोक 13 (15.6.13)

इन्द्रियाणि च सर्वाणि वाजिवत्परिपालय । हितायैव भविष्यन्ति रक्षितं द्रविणं यथा ॥

indriyāṇi ca sarvāṇi vājivatparipālaya | hitāyaiva bhaviṣyanti rakṣitaṃ draviṇaṃ yathā

अपनी सब इन्द्रियों की घोड़ों की भाँति रक्षा करो; सुरक्षित रहने पर वे वैसे ही तुम्हारे हित में होंगी जैसे सुरक्षित धन होता है।

श्लोक 14 (15.6.14)

अमात्यानुपधातीतान्पितृपैतामहाञ्शुचीन् । दान्तान्कर्मसु सर्वेषु मुख्यान्मुख्येषु योजयेः ॥

amātyānupadhātītānpitṛpaitāmahāñśucīn | dāntānkarmasu sarveṣu mukhyānmukhyeṣu yojayeḥ

ऐसे अमात्य नियुक्त करो जो परीक्षाओं में खरे उतरे हों, पवित्र हों, तुम्हारे पिता-पितामह के समय से चले आए हों और संयमी हों; सब कामों में मुख्य कामों पर मुख्य पुरुषों को लगाओ।

श्लोक 15 (15.6.15)

चारयेथाश्च सततं चारैरविदितः परैः । परीक्षितैर्बहुविधैः स्वराष्ट्रेषु परेषु च ॥

cārayethāśca satataṃ cārairaviditaḥ paraiḥ | parīkṣitairbahuvidhaiḥ svarāṣṭreṣu pareṣu ca

शत्रुओं से अज्ञात, भली-भाँति परखे हुए और अनेक प्रकार के गुप्तचरों को अपने तथा दूसरों के राज्यों में निरन्तर भेजते रहो।

श्लोक 16 (15.6.16)

पुरं च ते सुगुप्तं स्याद्दृढप्राकारतोरणम् । अट्टाट्टालकसम्बाधं षट्पदं सर्वतो दिशम् ॥

puraṃ ca te suguptaṃ syāddṛḍhaprākāratoraṇam | aṭṭāṭṭālakasambādhaṃ ṣaṭpadaṃ sarvato diśam

तुम्हारा नगर सुरक्षित हो — दृढ़ परकोटों और द्वारों वाला, अट्टालिकाओं और बुर्जों से भरा हुआ, और चारों ओर छह स्थानों से युक्त।

श्लोक 17 (15.6.17)

तस्य द्वाराणि सर्वाणि पर्याप्तानि बृहन्ति च । सर्वतः सुविभक्तानि यन्त्रैरारक्षितानि च ॥

tasya dvārāṇi sarvāṇi paryāptāni bṛhanti ca | sarvataḥ suvibhaktāni yantrairārakṣitāni ca

उसके सब द्वार पर्याप्त और विशाल हों, चारों ओर ठीक-ठीक बँटे हुए हों और यन्त्रों से सुरक्षित हों।

श्लोक 18 (15.6.18)

पुरुषैरलमर्थस्ते विदितैः कुलशीलतः । आत्मा च रक्ष्यः सततं भोजनादिषु भारत । विहाराहारकालेषु माल्यशय्यासनेषु च ॥

puruṣairalamarthaste viditaiḥ kulaśīlataḥ | ātmā ca rakṣyaḥ satataṃ bhojanādiṣu bhārata | vihārāhārakāleṣu mālyaśayyāsaneṣu ca

तुम्हें ऐसे पुरुषों की आवश्यकता है जिनके कुल और शील का पता हो; और हे भारत, भोजन आदि में, विहार और आहार के समय, तथा मालाओं, शय्याओं और आसनों के विषय में तुम्हें सदा अपनी रक्षा करनी चाहिए।

श्लोक 19 (15.6.19)

स्त्रियश्च ते सुगुप्ताः स्युर्वृद्धैराप्तैरधिष्ठिताः । शीलवद्भिः कुलीनैश्च विद्वद्भिश्च युधिष्ठिर ॥

striyaśca te suguptāḥ syurvṛddhairāptairadhiṣṭhitāḥ | śīlavadbhiḥ kulīnaiśca vidvadbhiśca yudhiṣṭhira

तुम्हारी स्त्रियाँ भली-भाँति सुरक्षित रहें और शीलवान्, कुलीन तथा विद्वान् वृद्ध और विश्वस्त जनों की देख-रेख में हों, हे युधिष्ठिर।

श्लोक 20 (15.6.20)

मन्त्रिणश्चैव कुर्वीथा द्विजान्विद्याविशारदान् । विनीतांश्च कुलीनांश्च धर्मार्थकुशलानृजून् ॥

mantriṇaścaiva kurvīthā dvijānvidyāviśāradān | vinītāṃśca kulīnāṃśca dharmārthakuśalānṛjūn

विद्या में निपुण, विनीत, कुलीन, धर्म और अर्थ में कुशल तथा सरल ब्राह्मणों को अपना मन्त्री बनाओ।

श्लोक 21 (15.6.21)

तैः सार्धं मन्त्रयेथास्त्वं नात्यर्थं बहुभिः सह । समस्तैरपि च व्यस्तैर्व्यपदेशेन केनचित् ॥

taiḥ sārdhaṃ mantrayethāstvaṃ nātyarthaṃ bahubhiḥ saha | samastairapi ca vyastairvyapadeśena kenacit

उनके साथ परामर्श करो, पर अधिक नहीं और बहुतों के साथ नहीं; सबके साथ मिलकर या अलग-अलग, किसी बहाने से।

श्लोक 22 (15.6.22)

सुसंवृतं मन्त्रगृहं स्थलं चारुह्य मन्त्रयेः । अरण्ये निःशलाके वा न च रात्रौ कथञ्चन ॥

susaṃvṛtaṃ mantragṛhaṃ sthalaṃ cāruhya mantrayeḥ | araṇye niḥśalāke vā na ca rātrau kathañcana

परामर्श भली-भाँति ढके हुए मन्त्रणागृह में करो, या किसी खुले ऊँचे स्थान पर चढ़कर, या तिनकों और सरकण्डों से रहित वन में; रात में किसी प्रकार नहीं।

श्लोक 23 (15.6.23)

वानराः पक्षिणश्चैव ये मनुष्यानुकारिणः । सर्वे मन्त्रगृहे वर्ज्या ये चापि जडपङ्गवः ॥

vānarāḥ pakṣiṇaścaiva ye manuṣyānukāriṇaḥ | sarve mantragṛhe varjyā ye cāpi jaḍapaṅgavaḥ

बन्दर और मनुष्यों की नकल करने वाले पक्षी मन्त्रणागृह से सर्वथा दूर रखे जाएँ, और वे भी जो जड़बुद्धि या पंगु हों।

श्लोक 24 (15.6.24)

मन्त्रभेदे हि ये दोषा भवन्ति पृथिवीक्षिताम् । न ते शक्याः समाधातुं कथञ्चिदिति मे मतिः ॥

mantrabhede hi ye doṣā bhavanti pṛthivīkṣitām | na te śakyāḥ samādhātuṃ kathañciditi me matiḥ

क्योंकि मन्त्र के प्रकट हो जाने से राजाओं पर जो दोष आते हैं, उनका किसी प्रकार निवारण नहीं हो सकता — ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 25 (15.6.25)

दोषांश्च मन्त्रभेदस्य ब्रूयास्त्वं मन्त्रिमण्डले । अभेदे च गुणा राजन्पुनःपुनररिंदम ॥

doṣāṃśca mantrabhedasya brūyāstvaṃ mantrimaṇḍale | abhede ca guṇā rājanpunaḥpunarariṃdama

हे अरिंदम, मन्त्रिमण्डल में तुम मन्त्र के प्रकट होने के दोष और उसके गुप्त रहने के गुण बार-बार बताया करो।

श्लोक 26 (15.6.26)

पौरजानपदानां च शौचाशौचे युधिष्ठिर । यथा स्याद्विदितं राजंस्तथा कार्यं कुरूद्वह ॥

paurajānapadānāṃ ca śaucāśauce yudhiṣṭhira | yathā syādviditaṃ rājaṃstathā kāryaṃ kurūdvaha

हे युधिष्ठिर, ऐसा करो कि नगरवासियों और जनपदवासियों की शुद्धता और अशुद्धता का तुम्हें पता रहे।

श्लोक 27 (15.6.27)

व्यवहारश्च ते राजन्नित्यमाप्तैरधिष्ठितः । योज्यस्तुष्टैर्हितै राजन्नित्यं चारैरनुष्ठितः ॥

vyavahāraśca te rājannityamāptairadhiṣṭhitaḥ | yojyastuṣṭairhitai rājannityaṃ cārairanuṣṭhitaḥ

हे राजन्, तुम्हारा शासन-व्यवहार सदा विश्वस्त पुरुषों की देख-रेख में रहे, सन्तुष्ट और हितैषी जनों को सौंपा जाए और गुप्तचरों द्वारा निगरानी में रखा जाए।

श्लोक 28 (15.6.28)

परिमाणं विदित्वा च दण्डं दण्ड्येषु भारत । प्रणयेयुर्यथान्यायं पुरुषास्ते युधिष्ठिर ॥

parimāṇaṃ viditvā ca daṇḍaṃ daṇḍyeṣu bhārata | praṇayeyuryathānyāyaṃ puruṣāste yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, तुम्हारे पुरुष परिमाण को जानकर दण्ड के योग्य लोगों को न्यायपूर्वक दण्ड दें।

श्लोक 29 (15.6.29)

आदानरुचयश्चैव परदाराभिमर्शिनः । उग्रदण्डिप्रधानाश्च मिथ्याव्याहारिणस्तथा ॥

ādānarucayaścaiva paradārābhimarśinaḥ | ugradaṇḍipradhānāśca mithyāvyāhāriṇastathā

जो घूस लेने के शौकीन हैं, जो परायी स्त्रियों को छूते हैं, जो कठोर दण्ड को ही प्रधान मानते हैं और जो झूठ बोलने वाले हैं,

श्लोक 30 (15.6.30)

आक्रोष्टारश्च लुब्धाश्च हर्तारः साहसप्रियाः । सभाविहारभेत्तारो वर्णानां च प्रदूषकाः । हिरण्यदण्ड्या वध्याश्च कर्तव्या देशकालतः ॥

ākroṣṭāraśca lubdhāśca hartāraḥ sāhasapriyāḥ | sabhāvihārabhettāro varṇānāṃ ca pradūṣakāḥ | hiraṇyadaṇḍyā vadhyāśca kartavyā deśakālataḥ

निन्दा करने वाले, लोभी, चोर, हिंसा-प्रिय, सभाओं और विहारों में विघ्न डालने वाले तथा वर्णों को दूषित करने वाले — इन्हें देश और काल के अनुसार स्वर्ण-दण्ड या वध-दण्ड देना चाहिए।

श्लोक 31 (15.6.31)

अवरोधभूमौ भृत्यैश्च पानं सह विवर्जयेत् । आक्रोशन्त्यनुमत्तास्ते कलत्रं वाऽपि गृह्णते ॥

avarodhabhūmau bhṛtyaiśca pānaṃ saha vivarjayet | ākrośantyanumattāste kalatraṃ vā'pi gṛhṇate

अन्तःपुर में सेवकों के साथ मद्यपान से बचना चाहिए। मतवाले होकर वे गाली-गलौज करते हैं और स्त्रियों तक पर हाथ डालते हैं।

श्लोक 32 (15.6.32)

जिघांसन्त्यपि शस्त्रेण नष्टाः क्रीडन्ति चोत्कटाः । नानाक्षेपा व्याहरन्ति गम्यागम्यं न जानते ॥

jighāṃsantyapi śastreṇa naṣṭāḥ krīḍanti cotkaṭāḥ | nānākṣepā vyāharanti gamyāgamyaṃ na jānate

वे शस्त्र से मार डालने का यत्न करते हैं; बिगड़े हुए उद्दण्ड लोग क्रीड़ा करते हैं; नाना प्रकार की निन्दा करते हैं और गम्य-अगम्य का भेद नहीं जानते।

श्लोक 33 (15.6.33)

अतिपानेन राजाऽपि सर्वं कोशं विनाशयेत् । वितरेद्गायकेभ्यश्च वृथा च द्रव्यसञ्चयम् ॥

atipānena rājā'pi sarvaṃ kośaṃ vināśayet | vitaredgāyakebhyaśca vṛthā ca dravyasañcayam

अधिक मद्यपान से राजा भी सारा कोश नष्ट कर सकता है और गायकों को व्यर्थ ही धन लुटा सकता है।

श्लोक 34 (15.6.34)

शब्दमात्मनि दोषांश्च पिबेदेकश्च जायया । युक्त्या प्रकाशमयति सुवीर्यस्य विवृद्धये ॥

śabdamātmani doṣāṃśca pibedekaśca jāyayā | yuktyā prakāśamayati suvīryasya vivṛddhaye

लोकनिन्दा और उसके दोषों को जानकर वह केवल अपनी पत्नी के साथ ही, संयम से और खुलेआम, अपने बल की वृद्धि के लिए पान करे।

श्लोक 35 (15.6.35)

प्रातरेव हि पश्येथा ये कुर्युः प्रियकर्म ते । अलङ्कारमथो भोज्यमत ऊर्ध्वं समाचरेः ॥

prātareva hi paśyethā ye kuryuḥ priyakarma te | alaṅkāramatho bhojyamata ūrdhvaṃ samācareḥ

प्रातःकाल ही उन लोगों से मिलो जो तुम्हारे प्रिय कार्य करने वाले हैं; उसके बाद अलंकार और भोजन का प्रबन्ध करना।

श्लोक 36 (15.6.36)

पश्येथाश्च ततो योधान्सदा त्वं प्रतिहर्षयन् । दूतानां च चराणां च प्रदोषस्ते सदा भवेत् ॥

paśyethāśca tato yodhānsadā tvaṃ pratiharṣayan | dūtānāṃ ca carāṇāṃ ca pradoṣaste sadā bhavet

तब योद्धाओं से मिलो और सदा उन्हें हर्षित करते रहो; सायंकाल सदा दूतों और गुप्तचरों के लिए रहे।

श्लोक 37 (15.6.37)

सदा चापररात्रान्ते भवेत्कार्यार्थनिर्णयः । मध्यरात्रे विहारस्ते मध्याह्ने च सदा भवेत् ॥

sadā cāpararātrānte bhavetkāryārthanirṇayaḥ | madhyarātre vihāraste madhyāhne ca sadā bhavet

रात का अन्तिम भाग सदा कार्यों के निर्णय के लिए हो; और आधी रात तथा दोपहर को तुम्हारा विहार हो।

श्लोक 38 (15.6.38)

सर्वे त्वौपयिकाः कालाः कार्याणां भरतर्षभ । तथैवालङ्कृतः काले तिष्ठेथा भूरिदक्षिणः ॥

sarve tvaupayikāḥ kālāḥ kāryāṇāṃ bharatarṣabha | tathaivālaṅkṛtaḥ kāle tiṣṭhethā bhūridakṣiṇaḥ

हे भरतश्रेष्ठ, सभी समय कार्यों के लिए उपयुक्त हैं; और उचित समय पर अलंकृत होकर प्रचुर दान देने वाले बने रहो।

श्लोक 39 (15.6.39)

न विद्राव्य च तिष्ठेत परिहार्य विभूषणम् । प्रयोज्यं सर्वदैवेह मङ्गल्यं पापनाशनम् ॥

na vidrāvya ca tiṣṭheta parihārya vibhūṣaṇam | prayojyaṃ sarvadaiveha maṅgalyaṃ pāpanāśanam

धारण करने योग्य आभूषणों को छोड़कर अलग न रहे; जो मंगलकारी और पाप-नाशक है, उसका यहाँ सदा प्रयोग करना चाहिए।

श्लोक 40 (15.6.40)

चक्रवत्तात कार्याणां पर्यायो दृश्यते सदा । कोशस्य निचये यत्नं कुर्वीथा न्यायतः सदा । विविधस्य महाराज विपरीतं विवर्जयेः ॥

cakravattāta kāryāṇāṃ paryāyo dṛśyate sadā | kośasya nicaye yatnaṃ kurvīthā nyāyataḥ sadā | vividhasya mahārāja viparītaṃ vivarjayeḥ

हे तात, कर्मों का क्रम सदा चक्र की भाँति घूमता दिखाई देता है। कोश के संचय में सदा न्यायपूर्वक यत्न करो; और हे महाराज, अनेक प्रकार के उसके विपरीत जो कुछ हो उसे त्याग दो।

श्लोक 41 (15.6.41)

चारैर्विदित्वा शत्रूंश्च ये राज्ञामन्तरैषिणः । तानाप्तैः पुरुषैर्दूराद्धातयेथा नराधिप ॥

cārairviditvā śatrūṃśca ye rājñāmantaraiṣiṇaḥ | tānāptaiḥ puruṣairdūrāddhātayethā narādhipa

गुप्तचरों से जानकर कि जो शत्रु राजाओं के छिद्र खोजते हैं वे कौन हैं, हे नराधिप, उन्हें विश्वस्त पुरुषों द्वारा दूर से ही मरवा दो।

श्लोक 42 (15.6.42)

कर्म दृष्ट्वाऽथ भृत्यांस्त्वं वरयेथाः कुरूद्वह । कारयेथाश्च कर्माणि युक्तायुक्तैरधिष्ठितैः ॥

karma dṛṣṭvā'tha bhṛtyāṃstvaṃ varayethāḥ kurūdvaha | kārayethāśca karmāṇi yuktāyuktairadhiṣṭhitaiḥ

हे कुरुनन्दन, काम देखकर सेवकों का चयन करो और बड़े-छोटे अधिकारियों की देख-रेख में कार्य कराओ।

श्लोक 43 (15.6.43)

सेनाप्राणेता च भवेत्तव तात दृढव्रतः । शूरः क्लेशसहश्चैव हितो भक्तश्च पूरुषः ॥

senāprāṇetā ca bhavettava tāta dṛḍhavrataḥ | śūraḥ kleśasahaścaiva hito bhaktaśca pūruṣaḥ

हे तात, तुम्हारा सेनापति दृढ़ व्रत वाला हो — शूर, कष्ट सहने वाला, हितैषी और भक्त पुरुष।

श्लोक 44 (15.6.44)

सर्वे जनपदाश्चैव तव कर्माणि पाण्डव । गोवद्रासभवच्चैव कुर्युर्ये व्यवहारिणः ॥

sarve janapadāścaiva tava karmāṇi pāṇḍava | govadrāsabhavaccaiva kuryurye vyavahāriṇaḥ

और हे पाण्डव, सब जनपदों में जो व्यवसायी और कारीगर हैं, वे तुम्हारे कार्य बैल और गधे की भाँति करें।

श्लोक 45 (15.6.45)

स्वरन्ध्रं पररन्ध्रं च स्वेषु चैव परेषु च । उपलक्षयितव्यं ते नित्यमेव युधिष्ठिर ॥

svarandhraṃ pararandhraṃ ca sveṣu caiva pareṣu ca | upalakṣayitavyaṃ te nityameva yudhiṣṭhira

हे युधिष्ठिर, तुम्हें अपने और शत्रु के छिद्रों को, अपने और पराये लोगों में, सदा देखते रहना चाहिए।

श्लोक 46 (15.6.46)

देशजाश्चैव पुरुषा विक्रान्ताः स्वेषु कर्मसु । यात्राभिरनुरूपाभिरनुग्राह्या हितास्त्वया ॥

deśajāścaiva puruṣā vikrāntāḥ sveṣu karmasu | yātrābhiranurūpābhiranugrāhyā hitāstvayā

देश में उत्पन्न, अपने कार्यों में पराक्रमी और हितैषी पुरुषों पर तुम्हें उपयुक्त वृत्तियों से अनुग्रह करना चाहिए।

श्लोक 47 (15.6.47)

गुणार्थिनां गुणः कार्यो विदुषा वै जनाधिप । अविचार्याश्च ते ते स्युरचला इव नित्यशः ॥

guṇārthināṃ guṇaḥ kāryo viduṣā vai janādhipa | avicāryāśca te te syuracalā iva nityaśaḥ

हे जनाधिप, विद्वान् को गुणार्थी जनों का उपकार करना चाहिए; और वे सब सदा पर्वतों की भाँति अचल तथा संदेह से परे रहें।"

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