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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 7

धृतराष्ट्र का राजमण्डल-उपदेश

धृतराष्ट्र युधिष्ठिर को राज्यों की नीति का उपदेश आगे बढ़ाते हैं — मित्र, शत्रु और उदासीन राजाओं का मण्डल, बारह राजा और बहत्तर गुण, तथा छह प्रकार की नीति (षाड्गुण्य)। वे बताते हैं कि कब शत्रुओं पर चढ़ाई करनी चाहिए और कब सन्धि, साधन-संचय कैसे हो, और मित्रों, बन्धकों तथा पड़ोसी राजाओं के साथ कैसा व्यवहार हो। अन्त में वे बलवान् राजा के सामने झुके रहने और आवश्यकता पड़ने पर कोश तथा प्रमुख जनों के साथ निकलकर प्राण बचाने की सलाह देते हैं।

अध्याय 6अध्याय-सूचीअध्याय 8

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (15.7.1)

मण्डलानि च बुध्येथाः परेषामात्मनस्तथा । उदासीनगुणानां च मध्यस्थानां च भारत ॥

maṇḍalāni ca budhyethāḥ pareṣāmātmanastathā | udāsīnaguṇānāṃ ca madhyasthānāṃ ca bhārata

"हे भारत, तुम्हें शत्रुओं के और अपने मण्डल को समझना चाहिए, तथा उदासीन और मध्यस्थ राजाओं के मण्डल को भी।

श्लोक 2 (15.7.2)

चतुर्णां शत्रुजातानां सर्वेषामाततायिनाम् । मित्रं चामित्रमित्रं च बोद्धव्यं तेऽरिकर्शन ॥

caturṇāṃ śatrujātānāṃ sarveṣāmātatāyinām | mitraṃ cāmitramitraṃ ca boddhavyaṃ te'rikarśana

हे अरिकर्शन, चार प्रकार के शत्रुओं और सब आततायियों में से मित्र और अमित्र-मित्र को तुम्हें पहचानना चाहिए।

श्लोक 3 (15.7.3)

अथ नानाजनपदा दुर्गाणि विविधानि च । बलानि च कुरुश्रेष्ठ भवत्येषां यथेच्छकम् ॥

atha nānājanapadā durgāṇi vividhāni ca | balāni ca kuruśreṣṭha bhavatyeṣāṃ yathecchakam

इसके अतिरिक्त अनेक जनपद, विविध दुर्ग और सेनाएँ हैं; हे कुरुश्रेष्ठ, ये उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार प्राप्त होते हैं।

श्लोक 4 (15.7.4)

ते च द्वादश कौन्तेय राजानो विविधात्मकाः । मन्त्रिप्रधानाश्च गुणाः षष्टिर्द्वादश च प्रभो ॥

te ca dvādaśa kaunteya rājāno vividhātmakāḥ | mantripradhānāśca guṇāḥ ṣaṣṭirdvādaśa ca prabho

हे कौन्तेय, ये बारह राजा अनेक स्वभाव के होते हैं; और हे प्रभो, मन्त्र को प्रधान रखने वाले गुण साठ और बारह हैं।

श्लोक 5 (15.7.5)

एतन्मण्डलमित्याहुराचार्या नीतिकोविदाः । अत्र षाड्गुण्यमायत्तं युधिष्ठिर निबोध तत् ॥

etanmaṇḍalamityāhurācāryā nītikovidāḥ | atra ṣāḍguṇyamāyattaṃ yudhiṣṭhira nibodha tat

नीति में निपुण आचार्य इसी को मण्डल कहते हैं। षाड्गुण्य इसी पर निर्भर है; हे युधिष्ठिर, उसे समझो।

श्लोक 6 (15.7.6)

वृद्धिक्षयौ च विज्ञेयौ स्थानं च कुरुसत्तम । द्विसप्तत्यां महाबाहो ततः षाड्गुण्यजा गुणाः ॥

vṛddhikṣayau ca vijñeyau sthānaṃ ca kurusattama | dvisaptatyāṃ mahābāho tataḥ ṣāḍguṇyajā guṇāḥ

हे कुरुश्रेष्ठ, वृद्धि, क्षय और स्थान को जानना चाहिए; और हे महाबाहु, बहत्तर में से षाड्गुण्य से उत्पन्न होने वाले गुण निकलते हैं।

श्लोक 7 (15.7.7)

यथा स्वपक्षो बलवान्परपक्षस्तथाबलः । विगृह्य शत्रून्कौन्तेय यायात्क्षितिपतिस्तदा ॥

yathā svapakṣo balavānparapakṣastathābalaḥ | vigṛhya śatrūnkaunteya yāyātkṣitipatistadā

जब अपना पक्ष बलवान् हो और शत्रु का पक्ष निर्बल हो, तब हे कौन्तेय, राजा को शत्रुओं से युद्ध छेड़कर चढ़ाई करनी चाहिए।

श्लोक 8 (15.7.8)

यदा परे च बलिनः स्वपक्षश्चैव दुर्बलः । सार्धं विद्वांस्तदा क्षीणः परैः सन्धिं समाश्रयेत् ॥

yadā pare ca balinaḥ svapakṣaścaiva durbalaḥ | sārdhaṃ vidvāṃstadā kṣīṇaḥ paraiḥ sandhiṃ samāśrayet

जब शत्रु बलवान् हों और अपना पक्ष दुर्बल हो, तब विद्वान् राजा क्षीण होकर साथियों सहित शत्रुओं से सन्धि का आश्रय ले।

श्लोक 9 (15.7.9)

द्रव्याणां सञ्चयश्चैव कर्तव्यः सुमहांस्तथा । यदा समर्था यानाय नचिरेणैव भारत ॥

dravyāṇāṃ sañcayaścaiva kartavyaḥ sumahāṃstathā | yadā samarthā yānāya nacireṇaiva bhārata

हे भारत, धन-सामग्री का बहुत बड़ा संचय करना चाहिए, ताकि जब सेना चढ़ाई के योग्य हो तब देर न लगे।

श्लोक 10 (15.7.10)

तदा सर्वं विधेयं स्यात्स्थानेन च विचारयेत् । भूमिरल्पफला देया विपरीतस्य भारत ॥

tadā sarvaṃ vidheyaṃ syātsthānena ca vicārayet | bhūmiralpaphalā deyā viparītasya bhārata

तब सब कुछ व्यवस्थित किया जाए और अपनी स्थिति पर विचार किया जाए। हे भारत, विरोधी पक्ष को कम उपज वाली भूमि देनी चाहिए।

श्लोक 11 (15.7.11)

हिरण्यरूप्यभूयिष्ठं मित्रं क्षीणमकोशभृत् । विपरीतं निगृह्णीयात्स्वयं सन्धिविशारदः ॥

hiraṇyarūpyabhūyiṣṭhaṃ mitraṃ kṣīṇamakośabhṛt | viparītaṃ nigṛhṇīyātsvayaṃ sandhiviśāradaḥ

सोने-चाँदी से भरपूर किन्तु क्षीण और कोशहीन मित्र के विषय में, सन्धि में निपुण राजा को विरोधी पक्ष का स्वयं निग्रह करना चाहिए।

श्लोक 12 (15.7.12)

सन्ध्यर्थं राजपुत्रं वा लिप्सेथा भरतर्षभ । विपरीतं न तच्छ्रेयः पुत्र कस्यांचिदापदि ॥

sandhyarthaṃ rājaputraṃ vā lipsethā bharatarṣabha | viparītaṃ na tacchreyaḥ putra kasyāṃcidāpadi

हे भरतश्रेष्ठ, सन्धि के लिए राजपुत्र को प्राप्त करने का यत्न करना; पर हे पुत्र, किसी भी आपत्ति में इसका उलटा करना श्रेयस्कर नहीं है।

श्लोक 13 (15.7.13)

तस्याः प्रमोक्षे यत्नं च कुर्याः सोपायमन्त्रवित् । प्रकृतीनां च राजेन्द्र राजा दीनान्विभावयेत् ॥

tasyāḥ pramokṣe yatnaṃ ca kuryāḥ sopāyamantravit | prakṛtīnāṃ ca rājendra rājā dīnānvibhāvayet

उपायों और मन्त्र को जानने वाला उससे छुटकारा पाने का यत्न करे; और हे राजेन्द्र, राजा प्रजाजनों में जो दीन हैं उन पर ध्यान दे।

श्लोक 14 (15.7.14)

क्रमेण युगपद्बुद्ध्वा व्यसनानां बलाबलम् । पीडनं स्तंभनं चैव कोशभङ्गस्तथैव च ॥

krameṇa yugapadbuddhvā vyasanānāṃ balābalam | pīḍanaṃ staṃbhanaṃ caiva kośabhaṅgastathaiva ca

आपत्तियों के — पीड़न, स्तम्भन और कोश-भंग के — बलाबल को एक-एक करके या एक साथ समझकर,

श्लोक 15 (15.7.15)

कार्यं यत्नेन शत्रूणां स्वराज्यं रक्षता स्वयम् । न च हिंस्योऽभ्युपगतः सामन्तो वृद्धिमिच्छता ॥

kāryaṃ yatnena śatrūṇāṃ svarājyaṃ rakṣatā svayam | na ca hiṃsyo'bhyupagataḥ sāmanto vṛddhimicchatā

अपने राज्य की स्वयं रक्षा करते हुए शत्रुओं के विरुद्ध यत्न करना चाहिए; और जो पड़ोसी राजा शरण में आया हो, वृद्धि चाहने वाले को उसकी हिंसा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 16 (15.7.16)

कौन्तेय तद्धितं ते स्यात्पृथिवीं विजिगीषतः । गुणानां भेदने योगमीप्सेथाः सह मन्त्रिभिः ॥

kaunteya taddhitaṃ te syātpṛthivīṃ vijigīṣataḥ | guṇānāṃ bhedane yogamīpsethāḥ saha mantribhiḥ

हे कौन्तेय, पृथ्वी को जीतने की इच्छा रखने वाले तुम्हारे लिए यही हितकर होगा कि तुम मन्त्रियों के साथ शत्रु के बलों को भेदने का उपाय खोजो।

श्लोक 17 (15.7.17)

साधुसङ्ग्रहणाच्चैव पापनिग्रहणात्तथा । आत्मसात्करणे नित्यं पालनानि गृहे तथा । दुर्बलाश्चैव सततं नान्वेष्टव्या बलीयसा ॥

sādhusaṅgrahaṇāccaiva pāpanigrahaṇāttathā | ātmasātkaraṇe nityaṃ pālanāni gṛhe tathā | durbalāścaiva satataṃ nānveṣṭavyā balīyasā

सज्जनों को अपनाने और दुष्टों को रोकने से, उन्हें अपना बनाने और घर में उनका पालन करने से; और बलवान् को दुर्बलों का कभी पीछा नहीं करना चाहिए।

श्लोक 18 (15.7.18)

तिष्ठेथा राजशार्दूल वैतसीं वृत्तिमास्थितः । यद्येनमभियायाच्च बलवान्दुर्बलं नृपः ॥

tiṣṭhethā rājaśārdūla vaitasīṃ vṛttimāsthitaḥ | yadyenamabhiyāyācca balavāndurbalaṃ nṛpaḥ

हे राजशार्दूल, यदि कोई बलवान् राजा ऐसे दुर्बल पर चढ़ाई करे तो तुम बेंत की वृत्ति का आश्रय लेकर टिके रहना।

श्लोक 19 (15.7.19)

सामादिभिरुपायैस्तं क्रमेण विनिवर्तयेः । अशक्नुवंश्च युद्धाय निष्पतेत्सह मन्त्रिभिः ॥

sāmādibhirupāyaistaṃ krameṇa vinivartayeḥ | aśaknuvaṃśca yuddhāya niṣpatetsaha mantribhiḥ

साम आदि उपायों से उसे धीरे-धीरे लौटाओ; और यदि युद्ध करने में असमर्थ हो तो मन्त्रियों के साथ बाहर निकल जाए,

श्लोक 20 (15.7.20)

कोशेन पौरैर्दण्डेन ये चास्य प्रियकारिणः । असम्भवे तु सर्वस्य यथा मुख्येन निष्पतेत् । क्रमेणानेन मोक्षः स्याच्छरीरं प्रति केवलम् ॥

kośena paurairdaṇḍena ye cāsya priyakāriṇaḥ | asambhave tu sarvasya yathā mukhyena niṣpatet | krameṇānena mokṣaḥ syāccharīraṃ prati kevalam

कोश, नगरवासियों, सेना और अपने प्रियकारी जनों के साथ। यदि सबको ले जाना सम्भव न हो तो मुख्य को लेकर निकल जाए; इस क्रम से केवल शरीर की ही रक्षा हो सकती है।"

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