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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 8

धृतराष्ट्र का राजनीति-उपदेश

धृतराष्ट्र युधिष्ठिर को राजधर्म का उपदेश आगे देते हैं: सन्धि और विग्रह के दो भेद, शत्रु को घेरने और कुचलने की रीति, अपनी और शत्रु की शक्ति का आकलन, छह प्रकार की सेना, चढ़ाई का समय और उशना द्वारा बताए गए व्यूह। अन्त में वे कहते हैं कि धर्म से प्रजा का पालन करने पर हज़ार अश्वमेध यज्ञों के समान फल मिलता है।

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (15.8.1)

सन्धिविग्रहमप्यत्र पश्येथा राजसत्तम । द्वियोनिं विविधोपायं बहुकल्पं युधिष्ठिर ॥

sandhivigrahamapyatra paśyethā rājasattama | dviyoniṃ vividhopāyaṃ bahukalpaṃ yudhiṣṭhira

हे राजश्रेष्ठ युधिष्ठिर, तुम यहाँ सन्धि और विग्रह (युद्ध) पर भी विचार करना; ये दो प्रकार के हैं, इनके उपाय नाना प्रकार के हैं और भेद भी बहुत हैं।

श्लोक 2 (15.8.2)

कौरव्य पर्युपासीथाः स्थित्वा द्वैविध्यमात्मनः । तुष्टपुष्टजनः शत्रुरर्थवानिति च स्मरेत् ॥

kauravya paryupāsīthāḥ sthitvā dvaividhyamātmanaḥ | tuṣṭapuṣṭajanaḥ śatrurarthavāniti ca smaret

हे कुरुनन्दन, अपनी दोनों प्रकार की स्थिति, अर्थात् बल और निर्बलता, को ध्यान में रखकर दृढ़ता से डटे रहते हुए शत्रु को घेरना; और यह भी स्मरण रखना चाहिए कि जिस शत्रु की प्रजा सन्तुष्ट और पुष्ट है, वह साधनसम्पन्न है।

श्लोक 3 (15.8.3)

पर्युपासनकाले तु विपरीतं विधीयते । आमर्दकाले राजेन्द्र व्यवसायस्ततोऽपरः ॥

paryupāsanakāle tu viparītaṃ vidhīyate | āmardakāle rājendra vyavasāyastato'paraḥ

घेराबन्दी के समय एक रीति का विधान है; और हे राजेन्द्र, शत्रु को कुचलने के समय का निश्चय उससे भिन्न होता है।

श्लोक 4 (15.8.4)

व्यसनं भेदनं चैव शत्रूणां कारयेत्ततः । कर्षणं भीषणं चैव युद्धे चैव बहुक्षयम् ॥

vyasanaṃ bhedanaṃ caiva śatrūṇāṃ kārayettataḥ | karṣaṇaṃ bhīṣaṇaṃ caiva yuddhe caiva bahukṣayam

तब शत्रुओं पर विपत्ति और फूट डलवाए, उन्हें क्षीण करे और डराए, और युद्ध में उनकी भारी हानि करे।

श्लोक 5 (15.8.5)

प्रयास्यमानो नृपतिस्त्रिविधं परिचिन्तयेत् । आत्मनश्चैव शत्रोश्च शक्तिं शास्त्रविशारदः ॥

prayāsyamāno nṛpatistrividhaṃ paricintayet | ātmanaścaiva śatrośca śaktiṃ śāstraviśāradaḥ

चढ़ाई करने को उद्यत, शास्त्र में निपुण राजा अपनी और शत्रु की शक्ति पर तीन प्रकार से विचार करे।

श्लोक 6 (15.8.6)

उत्साहप्रभुशक्तिभ्यां मन्त्रशक्त्या च भारत । उपपन्नो नृपो यायाद्विपरीतं च वर्जयेत् ॥

utsāhaprabhuśaktibhyāṃ mantraśaktyā ca bhārata | upapanno nṛpo yāyādviparītaṃ ca varjayet

हे भारत, उत्साह, प्रभुत्व और मन्त्रणा, इन तीनों शक्तियों से सम्पन्न राजा चढ़ाई करे, और इसके विपरीत अवस्था में उसे टाल दे।

श्लोक 7 (15.8.7)

आददीत बलं राजा मौलं मित्रबलं तथा । अटवीबलं भृतं चैव तथा श्रेणीबलं प्रभो ॥

ādadīta balaṃ rājā maulaṃ mitrabalaṃ tathā | aṭavībalaṃ bhṛtaṃ caiva tathā śreṇībalaṃ prabho

राजा अपने बल एकत्र करे: मौल (वंशानुगत) बल, मित्रों का बल, वनवासियों का बल, वेतन पर रखा हुआ बल, और हे प्रभो, श्रेणियों (संघों) का बल।

श्लोक 8 (15.8.8)

मित्रामित्रबलं राजन्न्यायाद्वृद्ध्युदये धृतः । तत्र मित्रबलं राजन्मौलं चैव विशिष्यते । श्रेणीबलं भृतं चैव तुल्ये एवेति मे मतिः ॥

mitrāmitrabalaṃ rājannyāyādvṛddhyudaye dhṛtaḥ | tatra mitrabalaṃ rājanmaulaṃ caiva viśiṣyate | śreṇībalaṃ bhṛtaṃ caiva tulye eveti me matiḥ

हे राजन्, मित्रों और शत्रुओं के बल की गणना समृद्धि के उदय के समय नियम के अनुसार की जाती है। उनमें, हे राजन्, मित्र-बल और मौल-बल श्रेष्ठ हैं; श्रेणी-बल और भृत-बल मेरी समझ में समान हैं।

श्लोक 9 (15.8.9)

तथाऽऽचारबलं चैव परस्परसमं नृप । विज्ञेयं बलकालेषु राज्ञा काल उपस्थिते ॥

tathā''cārabalaṃ caiva parasparasamaṃ nṛpa | vijñeyaṃ balakāleṣu rājñā kāla upasthite

हे राजन्, आचार का बल भी इनके समान ही है; राजा को चाहिए कि काल उपस्थित होने पर बलों के प्रयोग के अवसरों पर इन सबको भली-भाँति समझ ले।

श्लोक 10 (15.8.10)

आपदश्चापि बोद्धव्या बहुरूपा नराधिप । भवन्ति राज्ञा कौरव्य यास्ताः पृथगतः शृणु ॥

āpadaścāpi boddhavyā bahurūpā narādhipa | bhavanti rājñā kauravya yāstāḥ pṛthagataḥ śṛṇu

हे नराधिप, राजाओं पर आने वाली आपदाएँ भी जाननी चाहिए; हे कौरव्य, वे अनेक रूप की होती हैं; उन्हें अलग-अलग सुनो।

श्लोक 11 (15.8.11)

विकल्पा बहुधा राजन्नापदां पाण्डुनन्दन । सामादिभिरुपन्यस्य गमयेत्तान्नृपः सदा ॥

vikalpā bahudhā rājannāpadāṃ pāṇḍunandana | sāmādibhirupanyasya gamayettānnṛpaḥ sadā

हे पाण्डुनन्दन, आपदाओं के भेद बहुत हैं; राजा को चाहिए कि उन्हें सुलझाकर साम आदि उपायों से सदा दूर करे।

श्लोक 12 (15.8.12)

यात्रां गच्छेद्बलैर्युक्तो राजा षड्भिः परंतप । युक्तश्च देशकालाभ्यां बलैरात्मगुणैस्तथा ॥

yātrāṃ gacchedbalairyukto rājā ṣaḍbhiḥ paraṃtapa | yuktaśca deśakālābhyāṃ balairātmaguṇaistathā

हे परंतप, राजा छह प्रकार के बलों से युक्त होकर, देश और काल के अनुकूल तथा सेनाओं और अपने गुणों से सम्पन्न होकर प्रस्थान करे।

श्लोक 13 (15.8.13)

हृष्टपुष्टबलो गच्छेद्राजा वृद्ध्युदये रतः । अकृशश्चाप्यथो यायादनृतावपि पाण्डव ॥

hṛṣṭapuṣṭabalo gacchedrājā vṛddhyudaye rataḥ | akṛśaścāpyatho yāyādanṛtāvapi pāṇḍava

राजा सेना को हृष्ट-पुष्ट रखकर, उन्नति में तत्पर रहकर और स्वयं दुर्बल न होकर चढ़ाई करे; और हे पाण्डव, वह अकाल में भी प्रस्थान कर सकता है।

श्लोक 14 (15.8.14)

तूणाश्मानं वाजिरथप्रवाहां । ध्वजद्रुमैः संवृतकूलरोधसम् । पदातिनागैर्बहुकर्दमां नदीं । सपत्ननाशे नृपतिः प्रयोजयेत् ॥

tūṇāśmānaṃ vājirathapravāhāṃ | dhvajadrumaiḥ saṃvṛtakūlarodhasam | padātināgairbahukardamāṃ nadīṃ | sapatnanāśe nṛpatiḥ prayojayet

शत्रुओं के विनाश के लिए राजा ऐसी 'नदी' (व्यूह) चलाए जिसके पत्थर तरकस हों, जिसका प्रवाह घोड़ों और रथों का हो, जिसके तट और किनारे ध्वजरूपी वृक्षों से घिरे हों और जो पैदल सैनिकों और हाथियों के कीचड़ से भरी हो।

श्लोक 15 (15.8.15)

अथोपपत्त्या शकटं पद्मवज्रं च भारत । उशना वेद यच्छास्त्रं तत्रैतद्विहितं विभो ॥

athopapattyā śakaṭaṃ padmavajraṃ ca bhārata | uśanā veda yacchāstraṃ tatraitadvihitaṃ vibho

हे भारत, इसके अतिरिक्त युक्ति से शकट, पद्म और वज्र नामक व्यूह भी हैं; हे विभो, उशना जिस शास्त्र को जानते हैं, उसमें यह विहित है।

श्लोक 16 (15.8.16)

चारयित्वा परबलं कृत्वा स्वबलदर्शनम् । स्वभूमौ योजयेद्युद्धं परभूमौ तथैव च ॥

cārayitvā parabalaṃ kṛtvā svabaladarśanam | svabhūmau yojayedyuddhaṃ parabhūmau tathaiva ca

शत्रु की सेना की टोह लगवाकर और अपनी सेना का प्रदर्शन करके राजा अपनी भूमि में अथवा शत्रु की भूमि में भी युद्ध करे।

श्लोक 17 (15.8.17)

बलं प्रसादयेद्राजा निक्षिपेद्बलिनो नरान् । ज्ञात्वा स्वविषयं तत्र सामादिभिरुपक्रमेत् ॥

balaṃ prasādayedrājā nikṣipedbalino narān | jñātvā svaviṣayaṃ tatra sāmādibhirupakramet

राजा सेना को प्रसन्न रखे और बलवान् पुरुषों को नियुक्त करे; अपने राज्य को जानकर वह वहाँ साम आदि उपायों से कार्य आरम्भ करे।

श्लोक 18 (15.8.18)

सर्वथैव महाराज शरीरं धारयेदिह । प्रेत्य चेह च कर्तव्यमात्मनिःश्रेयसं परम् ॥

sarvathaiva mahārāja śarīraṃ dhārayediha | pretya ceha ca kartavyamātmaniḥśreyasaṃ param

हे महाराज, राजा सब प्रकार से यहाँ अपने शरीर की रक्षा करे; क्योंकि परलोक में और इस लोक में अपना परम कल्याण ही करणीय है।

श्लोक 19 (15.8.19)

एवं कुर्वञ्शुभा वाचो लोकेऽस्मिञ्शृणु ते नृप । प्रेत्य स्वर्गमवाप्नोति प्रजा धर्मेण पालयन् ॥

evaṃ kurvañśubhā vāco loke'smiñśṛṇu te nṛpa | pretya svargamavāpnoti prajā dharmeṇa pālayan

हे राजन्, ऐसा करने पर सुनो: इस लोक में तुम्हारी शुभ कीर्ति होगी; और जो राजा धर्म से प्रजा का पालन करता है, वह मरकर स्वर्ग पाता है।

श्लोक 20 (15.8.20)

एवं त्वया कुरुश्रेष्ठ वर्तितव्यं प्रजासु वै । उभयोर्लोकयोस्तात प्राप्तये नित्यमेव हि ॥

evaṃ tvayā kuruśreṣṭha vartitavyaṃ prajāsu vai | ubhayorlokayostāta prāptaye nityameva hi

हे कुरुश्रेष्ठ, हे तात, दोनों लोकों की प्राप्ति के लिए तुम्हें प्रजाओं के साथ सदा इसी प्रकार बर्ताव करना चाहिए।

श्लोक 21 (15.8.21)

भीष्मेण सर्वमुक्तोसि कृष्णेन विदुरेण च । मयाऽप्यवश्यं वक्तव्यं प्रीत्या ते नृपसत्तम ॥

bhīṣmeṇa sarvamuktosi kṛṣṇena vidureṇa ca | mayā'pyavaśyaṃ vaktavyaṃ prītyā te nṛpasattama

भीष्म, कृष्ण और विदुर ने तुमसे सब कुछ कह दिया है; फिर भी हे नृपश्रेष्ठ, प्रेम के कारण मुझे भी तुमसे अवश्य कहना चाहिए।

श्लोक 22 (15.8.22)

एतत्सर्वं यथान्यायं कुर्वीथा भूरिदक्षिण । प्रियस्तथा प्रजानां त्वं स्वर्गे सुखमवाप्स्यसि ॥

etatsarvaṃ yathānyāyaṃ kurvīthā bhūridakṣiṇa | priyastathā prajānāṃ tvaṃ svarge sukhamavāpsyasi

हे भूरिदक्षिण, यह सब न्यायपूर्वक करना; प्रजा के प्रिय होकर तुम स्वर्ग में सुख पाओगे।

श्लोक 23 (15.8.23)

अश्वमेधसहस्रेण यो यजेत्पृथिवीपतिः । पालयेद्वाऽपि धर्मेण प्रजास्तुल्यं फलं लभेत् ॥

aśvamedhasahasreṇa yo yajetpṛthivīpatiḥ | pālayedvā'pi dharmeṇa prajāstulyaṃ phalaṃ labhet

जो राजा हज़ार अश्वमेध यज्ञ करता है और जो धर्म से प्रजा का पालन करता है, वे दोनों समान फल पाते हैं।

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