आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 17
कुन्ती का धृतराष्ट्र के साथ वन जाने का निश्चय
नगरवासियों के विलाप के बीच धृतराष्ट्र वर्धमान द्वार से नगर से निकलते हैं, लोगों को लौटा देते हैं और कृप तथा युयुत्सु को युधिष्ठिर को सौंप देते हैं; विदुर और सञ्जय उनके साथ जाते हैं। युधिष्ठिर माता कुन्ती से लौट जाने की प्रार्थना करते हैं, पर गान्धारी को सँभाले हुए कुन्ती विदा के उपदेश देती हैं: सहदेव का ध्यान रखना, कर्ण को याद करके उसके नाम से दान देना, द्रौपदी को प्रसन्न रखना और भाइयों को सँभालना। युधिष्ठिर और भीमसेन उन्हें रोकते हैं, पर वे नहीं मानतीं; द्रौपदी और सुभद्रा उनके पीछे चलती हैं, और कुन्ती रुककर आँसू पोंछकर पुत्रों से कुछ कहती हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (15.17.1)
ततः प्रासादहर्म्येषु वसुधायां च पार्थिव । नारीणां च नराणां च निःस्वनः सुमहानभूत् ॥
tataḥ prāsādaharmyeṣu vasudhāyāṃ ca pārthiva | nārīṇāṃ ca narāṇāṃ ca niḥsvanaḥ sumahānabhūt
तब हे राजन्, प्रासादों और अट्टालिकाओं से तथा भूमि पर स्त्रियों और पुरुषों का बड़ा कोलाहल उठा।
श्लोक 2 (15.17.2)
स राजा राजमार्गेण नृनारीसंकुलेन च । कथञ्चिन्निर्ययौ धीमान्वेपमानः कृताञ्जलिः ॥
sa rājā rājamārgeṇa nṛnārīsaṃkulena ca | kathañcinniryayau dhīmānvepamānaḥ kṛtāñjaliḥ
वे बुद्धिमान् राजा, हाथ जोड़े काँपते हुए, स्त्री-पुरुषों से भरे राजमार्ग से किसी तरह निकले।
श्लोक 3 (15.17.3)
स वर्धमानद्वारेण निर्ययौ गजसाह्वयात् । विसर्जयामास च तं जनौघं स मुहुर्मुहुः ॥
sa vardhamānadvāreṇa niryayau gajasāhvayāt | visarjayāmāsa ca taṃ janaughaṃ sa muhurmuhuḥ
वे वर्धमान द्वार से गजसाह्वय (हस्तिनापुर) से बाहर निकले और उस जनसमूह को बार-बार लौटाते रहे।
श्लोक 4 (15.17.4)
वनं गन्तुं च विदुरो राज्ञा सह कृतक्षणः । संजयश्च महामात्रः सूतो गावल्गणिस्तथा ॥
vanaṃ gantuṃ ca viduro rājñā saha kṛtakṣaṇaḥ | saṃjayaśca mahāmātraḥ sūto gāvalgaṇistathā
वन में राजा के साथ जाने का निश्चय कर चुके विदुर, और महामात्य सूत गावल्गणि सञ्जय भी —
श्लोक 5 (15.17.5)
कृपं निवर्तयामास युयुत्सुं च महारथम् । धृतराष्ट्रो महीपालः परिदाप्य युधिष्ठिरे ॥
kṛpaṃ nivartayāmāsa yuyutsuṃ ca mahāratham | dhṛtarāṣṭro mahīpālaḥ paridāpya yudhiṣṭhire
पृथ्वी के पालक धृतराष्ट्र ने कृप और महारथी युयुत्सु को युधिष्ठिर को सौंपकर लौटा दिया।
श्लोक 6 (15.17.6)
निवृत्ते पौरवर्गे च राजा सान्तःपुरस्तदा । धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातो निवर्तितुमियेष ह ॥
nivṛtte pauravarge ca rājā sāntaḥpurastadā | dhṛtarāṣṭrābhyanujñāto nivartitumiyeṣa ha
जब पुरवासी लौट गए, तब राजा युधिष्ठिर ने, अन्तःपुर सहित, धृतराष्ट्र की अनुमति पाकर लौटने की इच्छा की।
श्लोक 7 (15.17.7)
सोऽब्रवीन्मातरं कुन्तीमुपेत्य भरतर्षभ । अहं राजानमन्विष्ये भवती विनिवर्तताम् ॥
so'bravīnmātaraṃ kuntīmupetya bharatarṣabha | ahaṃ rājānamanviṣye bhavatī vinivartatām
हे भरतश्रेष्ठ, उन्होंने माता कुन्ती के पास जाकर कहा: "मैं राजा के पीछे जाऊँगा; आप लौट जाइए।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 8 (15.17.8)
वधूपरिवृता राज्ञि नगरं गन्तुमर्हसि । राजा यात्वेष धर्मात्मा तपसे कृतनिश्चयः ॥
vadhūparivṛtā rājñi nagaraṃ gantumarhasi | rājā yātveṣa dharmātmā tapase kṛtaniścayaḥ
हे रानी, वधुओं से घिरी हुई आप नगर लौट जाइए; ये धर्मात्मा राजा दृढ़ निश्चय के साथ तप के लिए जाएँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (15.17.9)
इत्युक्ता धर्मराजेन बाष्पव्याकुललोचना । जगामैव तदा कुन्ती गान्धारीं परिगृह्य ह ॥
ityuktā dharmarājena bāṣpavyākulalocanā | jagāmaiva tadā kuntī gāndhārīṃ parigṛhya ha
धर्मराज के ऐसा कहने पर भी, आँखों में आँसू भरे कुन्ती गान्धारी को थामे आगे चलती ही गईं।
कुन्त्युवाच
श्लोक 10 (15.17.10)
सहदेवे महाराज माऽप्रसादं कृथाः क्वचित् । एष मामनुरक्तो हि राजंस्त्वां चैव सर्वदा ॥
sahadeve mahārāja mā'prasādaṃ kṛthāḥ kvacit | eṣa māmanurakto hi rājaṃstvāṃ caiva sarvadā
कुन्ती ने कहा: "महाराज, सहदेव पर कभी अप्रसन्न न होना; वह मुझ पर और, हे राजन्, तुम पर भी सदा अनुरक्त रहता है।
श्लोक 11 (15.17.11)
कर्णं स्मरेथाः सततं सङ्ग्रामेष्वपलायिनम् । अवकीर्णो हि स मया वीरो दुष्प्रज्ञया तदा ॥
karṇaṃ smarethāḥ satataṃ saṅgrāmeṣvapalāyinam | avakīrṇo hi sa mayā vīro duṣprajñayā tadā
कर्ण को सदा स्मरण रखना, जो संग्राम में कभी पीछे नहीं हटा; मैंने उस वीर को उस समय अपनी मूर्खता से त्याग दिया था।
श्लोक 12 (15.17.12)
आयसं हृदयं नूनं मन्दाया मम पुत्रक । यत्सूर्यजमपश्यन्त्याः शतधा न विदीर्यते ॥
āyasaṃ hṛdayaṃ nūnaṃ mandāyā mama putraka | yatsūryajamapaśyantyāḥ śatadhā na vidīryate
पुत्र, मेरा हृदय निश्चय ही लोहे का है, क्योंकि सूर्यपुत्र को न देखती हुई मेरी छाती सौ टुकड़े नहीं हो जाती।
श्लोक 13 (15.17.13)
एवं गते तु किं शक्यं मया कर्तुमरिंदम । मम दोषोऽयमत्यर्थं ख्यापितो यन्न सूर्यजः ॥
evaṃ gate tu kiṃ śakyaṃ mayā kartumariṃdama | mama doṣo'yamatyarthaṃ khyāpito yanna sūryajaḥ
हे अरिन्दम, ऐसी स्थिति में मैं क्या कर सकती हूँ? मेरा यह दोष अत्यन्त प्रकट कर दिया गया है कि सूर्यपुत्र को मैंने नहीं अपनाया।
श्लोक 14 (15.17.14)
तन्निमित्तं महाबाहो दानं दद्यास्त्वमुत्तमम् । सदैव भ्रातृभिः सार्धं सूर्यजस्यारिमर्दन ॥
tannimittaṃ mahābāho dānaṃ dadyāstvamuttamam | sadaiva bhrātṛbhiḥ sārdhaṃ sūryajasyārimardana
हे महाबाहो, उसके निमित्त तुम सदा भाइयों के साथ उत्तम दान देना, सूर्यपुत्र के नाम पर, हे शत्रुमर्दन।
श्लोक 15 (15.17.15)
द्रौपद्याश्च प्रिये नित्यं स्थातव्यमरिकर्शन । भीमसेनोऽर्जुनश्चैव नकुलश्च कुरूद्वह ॥
draupadyāśca priye nityaṃ sthātavyamarikarśana | bhīmaseno'rjunaścaiva nakulaśca kurūdvaha
हे शत्रुओं को सताने वाले, द्रौपदी के प्रिय बने रहना; और भीमसेन, अर्जुन तथा नकुल को भी, हे कुरुश्रेष्ठ,
श्लोक 16 (15.17.16)
समाधेयास्त्वया राजंस्त्वय्यद्य कुलधूर्गता । श्वश्रूश्वशुरयोः पादाञ्शुश्रूषन्ती वने त्वहम् । गान्धारीसहिता वत्स्ये तापसी मलपङ्किनी ॥
samādheyāstvayā rājaṃstvayyadya kuladhūrgatā | śvaśrūśvaśurayoḥ pādāñśuśrūṣantī vane tvaham | gāndhārīsahitā vatsye tāpasī malapaṅkinī
हे राजन्, इन सबकी देखभाल तुम्हें करनी है, क्योंकि आज कुल का भार तुम्हीं पर आ गया है। और मैं वन में अपने सास-ससुर के चरणों की सेवा करती हुई गान्धारी के साथ धूल से मलिन तपस्विनी बनकर रहूँगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (15.17.17)
एवमुक्तः स धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितो वशी । विषादमगमद्धीमान्न च किञ्चिदुवाच ह ॥
evamuktaḥ sa dharmātmā bhrātṛbhiḥ sahito vaśī | viṣādamagamaddhīmānna ca kiñciduvāca ha
ऐसा कहे जाने पर वह धर्मात्मा, संयमी और बुद्धिमान् भाइयों सहित विषाद में पड़ गया और कुछ नहीं बोला।
श्लोक 18 (15.17.18)
मुहूर्तमिव तु ध्यात्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः । उवाच मातरं दीनश्चिन्ताशोकपरायणः ॥
muhūrtamiva tu dhyātvā dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | uvāca mātaraṃ dīnaścintāśokaparāyaṇaḥ
क्षण भर सोचकर धर्मराज युधिष्ठिर, दीन और चिन्ता-शोक में डूबे हुए, माता से बोले:
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 19 (15.17.19)
किमिदं ते व्यवसितं नैवं त्वं वक्तुमर्हसि । न त्वामभ्यनुजानामि प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥
kimidaṃ te vyavasitaṃ naivaṃ tvaṃ vaktumarhasi | na tvāmabhyanujānāmi prasādaṃ kartumarhasi
युधिष्ठिर ने कहा: "यह आपका कैसा निश्चय है? आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए। मैं आपको अनुमति नहीं देता; आप हम पर कृपा कीजिए।
श्लोक 20 (15.17.20)
व्यचोदयः पुराऽस्माकमुत्साहं शुभदर्शने । विदुलाया वचोभिस्त्वं नास्मान्संत्यक्तुमर्हसि ॥
vyacodayaḥ purā'smākamutsāhaṃ śubhadarśane | vidulāyā vacobhistvaṃ nāsmānsaṃtyaktumarhasi
हे शुभदर्शने, पहले आपने विदुला के वचनों से हमारा उत्साह जगाया था; अब आपको हमें त्यागना उचित नहीं।
श्लोक 21 (15.17.21)
निहत्य पृथिवीपालान्राज्यं प्राप्तमिदं मया । तव प्रज्ञामुपश्रुत्य वासुदेवान्नरर्षभात् ॥
nihatya pṛthivīpālānrājyaṃ prāptamidaṃ mayā | tava prajñāmupaśrutya vāsudevānnararṣabhāt
पृथ्वी के राजाओं को मारकर मैंने यह राज्य पाया है, आपकी प्रज्ञा को सुनकर और नरश्रेष्ठ वासुदेव से सुनकर।
श्लोक 22 (15.17.22)
क्व सा बुद्धिरियं चाद्य भवत्या या श्रुता मया । क्षत्रधर्मे स्थितं त्यक्त्वा न प्रयातुमिहार्हसि ॥
kva sā buddhiriyaṃ cādya bhavatyā yā śrutā mayā | kṣatradharme sthitaṃ tyaktvā na prayātumihārhasi
आपकी वह बुद्धि आज कहाँ है, जो मैंने आपसे सुनी थी? क्षत्रिय-धर्म में स्थित मुझे छोड़कर आपको यहाँ से नहीं जाना चाहिए।
श्लोक 23 (15.17.23)
अस्मानुत्सृज्य राज्यं च स्नुषाहीना यशस्विनि । कथं वत्स्यसि दुर्गेषु वनेष्वद्य प्रसीद मे ॥
asmānutsṛjya rājyaṃ ca snuṣāhīnā yaśasvini | kathaṃ vatsyasi durgeṣu vaneṣvadya prasīda me
हम सबको और राज्य को छोड़कर, बहुओं से हीन होकर, हे यशस्विनी, आज आप दुर्गम वनों में कैसे रहेंगी? मुझ पर प्रसन्न हों।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 24 (15.17.24)
इति बाष्पकला वाचः कुन्ती पुत्रस्य शृण्वती । जगामैवाश्रुपूर्णाक्षी भीमस्तामिदमब्रवीत् ॥
iti bāṣpakalā vācaḥ kuntī putrasya śṛṇvatī | jagāmaivāśrupūrṇākṣī bhīmastāmidamabravīt
पुत्र के आँसुओं से भरे ये वचन सुनकर भी कुन्ती अश्रुपूर्ण नेत्रों से आगे चलती ही गईं; तब भीमसेन ने उनसे यह कहा:
भीमसेन उवाच
श्लोक 25 (15.17.25)
यदा राज्यमिदं कुन्ति भोक्तव्यं पुत्रनिर्जितम् । प्राप्तव्या राजधर्माश्च तदेयं ते कुतो मतिः ॥
yadā rājyamidaṃ kunti bhoktavyaṃ putranirjitam | prāptavyā rājadharmāśca tadeyaṃ te kuto matiḥ
भीमसेन ने कहा: "जब पुत्रों द्वारा जीता हुआ यह राज्य भोगने और राजधर्मों का पालन करने का समय आया है, तब आपको यह विचार कहाँ से सूझा?
श्लोक 26 (15.17.26)
किं वयं कारिताः पूर्वं भवत्या पृथिवीक्षयम् । कस्य हेतोः परित्यज्य वनं गन्तुमभीप्ससि ॥
kiṃ vayaṃ kāritāḥ pūrvaṃ bhavatyā pṛthivīkṣayam | kasya hetoḥ parityajya vanaṃ gantumabhīpsasi
क्या आपने पहले हमसे पृथ्वी का यह विनाश इसीलिए करवाया था कि सब छोड़कर वन चली जाएँ? किस कारण से आप वन जाना चाहती हैं?
श्लोक 27 (15.17.27)
वनाच्चापि किमानीता भवत्या बालका वयम् । दुःखशोकसमाविष्टौ माद्रीपुत्राविमौ तथा ॥
vanāccāpi kimānītā bhavatyā bālakā vayam | duḥkhaśokasamāviṣṭau mādrīputrāvimau tathā
और जब हम बालक थे, तब आप हमें वन से क्यों ले आईं — और इन दोनों माद्रीपुत्रों को भी, जो अब दुःख और शोक से घिरे हैं?
श्लोक 28 (15.17.28)
प्रसीद मातर्मा गास्त्वं वनमद्य यशस्विनि । श्रियं यौधिष्ठिरीं मातर्भुङ्क्ष्व पार्थबलार्जिताम् ॥
prasīda mātarmā gāstvaṃ vanamadya yaśasvini | śriyaṃ yaudhiṣṭhirīṃ mātarbhuṅkṣva pārthabalārjitām
माँ, प्रसन्न हों; हे यशस्विनी, आज वन न जाएँ। माँ, पार्थ के बल से जीती हुई युधिष्ठिर की राजलक्ष्मी का भोग कीजिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (15.17.29)
इति सा निश्चितैवाशु वनवासकृतक्षणा । लालप्यतां बहुविधं पुत्राणां नाकरोद्वचः ॥
iti sā niścitaivāśu vanavāsakṛtakṣaṇā | lālapyatāṃ bahuvidhaṃ putrāṇāṃ nākarodvacaḥ
परन्तु वह इस प्रकार निश्चय कर चुकी थीं और वनवास का समय शीघ्र निश्चित कर चुकी थीं; विलाप करते हुए पुत्रों की बातों को उन्होंने नहीं माना।
श्लोक 30 (15.17.30)
द्रौपदी चान्वयाच्छ्वश्रूं विषण्णवदना तदा । वनवासाय गच्छन्तीं रुदती भद्रया सह ॥
draupadī cānvayācchvaśrūṃ viṣaṇṇavadanā tadā | vanavāsāya gacchantīṃ rudatī bhadrayā saha
और द्रौपदी भी उदास मुख से, रोती हुई, भद्रा (सुभद्रा) के साथ वनवास को जाती हुई अपनी सास के पीछे चली।
श्लोक 31 (15.17.31)
सा पुत्रान्रुदतः सर्वान्मुहुर्मुहुरवेक्षती । जगामैव महाप्राज्ञा वनाय कृतनिश्चया ॥
sā putrānrudataḥ sarvānmuhurmuhuravekṣatī | jagāmaiva mahāprājñā vanāya kṛtaniścayā
रोते हुए सब पुत्रों को बार-बार देखती हुई वह महाप्राज्ञा वन के लिए दृढ़ निश्चय करके चलती ही गईं।
श्लोक 32 (15.17.32)
अन्वयुः पाण्डवास्तां तु सभृत्यान्तःपुरास्तथा । ततः प्रमृज्य साऽश्रूणि पुत्रान्वचनमब्रवीत् ॥
anvayuḥ pāṇḍavāstāṃ tu sabhṛtyāntaḥpurāstathā | tataḥ pramṛjya sā'śrūṇi putrānvacanamabravīt
पाण्डव सेवकों और अन्तःपुर की स्त्रियों सहित उनके पीछे चले। तब आँसू पोंछकर उन्होंने पुत्रों से कहा: