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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 18

कुन्ती द्वारा पुत्रों को जगाने का कारण बताना

कुन्ती पुत्रों को बताती हैं कि राज्य खो देने पर उन्हें उबारने के लिए उन्होंने विदुला के वचनों से उन्हें कर्म के लिए जगाया था, ताकि पाण्डु का वंश और उनका यश नष्ट न हो और वे तथा द्रौपदी आगे कष्ट न पाएँ। वे सभा में द्रौपदी के अपमान को याद करती हैं। वे कहती हैं कि यह सब अपने लाभ के लिए नहीं था; राजलक्ष्मी का सुख वे पहले भोग चुकी हैं और अब तप तथा सास-ससुर की सेवा से केवल पति के लोक चाहती हैं; अन्त में वे युधिष्ठिर से लौट जाने और धर्म में मन लगाने को कहती हैं।

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कुन्त्युवाच

श्लोक 1 (15.18.1)

एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि पाण्डवः । कृतमुद्धरणं पूर्वं मया वः सीदतां नृपाः ॥

evametanmahābāho yathā vadasi pāṇḍavaḥ | kṛtamuddharaṇaṃ pūrvaṃ mayā vaḥ sīdatāṃ nṛpāḥ

कुन्ती ने कहा: "हे महाबाहो पाण्डव, जैसा तुम कहते हो, वैसा ही है। पहले जब तुम, हे राजाओ, डूब रहे थे, तब मैंने तुम्हें ऊपर उठाया था।

श्लोक 2 (15.18.2)

द्यूतापहृतराज्यानां पतितानां सुखादपि । ज्ञातिभिः परिभूतानां कृतमुद्धरणं मया ॥

dyūtāpahṛtarājyānāṃ patitānāṃ sukhādapi | jñātibhiḥ paribhūtānāṃ kṛtamuddharaṇaṃ mayā

जब द्यूत में तुम्हारा राज्य छिन गया था, तुम सुख से गिर गए थे और जाति-बन्धुओं ने तुम्हारा तिरस्कार किया था, तब मैंने तुम्हें उठाया।

श्लोक 3 (15.18.3)

कथं पाण्डोर्न नश्येत संततिः पुरुषर्षभाः । यशश्च वो न नश्येत इति चोद्धरणं कृतम् ॥

kathaṃ pāṇḍorna naśyeta saṃtatiḥ puruṣarṣabhāḥ | yaśaśca vo na naśyeta iti coddharaṇaṃ kṛtam

‘हे पुरुषश्रेष्ठो, पाण्डु की सन्तति कैसे नष्ट न हो, और तुम्हारा यश कैसे नष्ट न हो’ — इसी विचार से मैंने तुम्हें उठाया।

श्लोक 4 (15.18.4)

यूयमिन्द्रसमाः सर्वे देवतुल्यपराक्रमाः । मा परेषां मुखप्रेक्षाः स्थेत्येवं तत्कृतं मया ॥

yūyamindrasamāḥ sarve devatulyaparākramāḥ | mā pareṣāṃ mukhaprekṣāḥ sthetyevaṃ tatkṛtaṃ mayā

‘तुम सब इन्द्र के समान हो, देवताओं-जैसे पराक्रमी; दूसरों का मुँह मत ताको’ — ऐसा सोचकर मैंने यह किया।

श्लोक 5 (15.18.5)

कथं धर्मभृतां श्रेष्ठो राजा त्वं वासवोपमः । पुनर्वने न दुःखी स्या इति चोद्धरणं कृतम् ॥

kathaṃ dharmabhṛtāṃ śreṣṭho rājā tvaṃ vāsavopamaḥ | punarvane na duḥkhī syā iti coddharaṇaṃ kṛtam

‘धर्म धारण करने वालों में श्रेष्ठ, इन्द्र-तुल्य तुम राजा वन में फिर दुखी कैसे न हो’ — इसी विचार से मैंने तुम्हें उठाया।

श्लोक 6 (15.18.6)

नागायुतसमप्राणः ख्यातविक्रमपौरुषः । नायं भीमोऽत्ययं गच्छेदिति चोद्धरणं कृतम् ॥

nāgāyutasamaprāṇaḥ khyātavikramapauruṣaḥ | nāyaṃ bhīmo'tyayaṃ gacchediti coddharaṇaṃ kṛtam

‘दस हज़ार हाथियों के बल वाला, पराक्रम और पौरुष में प्रसिद्ध यह भीम नष्ट न हो’ — इसी विचार से मैंने तुम्हें उठाया।

श्लोक 7 (15.18.7)

भीमसेनादवरजस्तथाऽयं वासवोपमः । विजयो नावसीदेत इति चोद्धरणं कृतम् ॥

bhīmasenādavarajastathā'yaṃ vāsavopamaḥ | vijayo nāvasīdeta iti coddharaṇaṃ kṛtam

‘भीमसेन से छोटा और इन्द्र-तुल्य यह विजय (अर्जुन) कहीं निराश न हो’ — इसी विचार से मैंने तुम्हें उठाया।

श्लोक 8 (15.18.8)

नकुलः सहदेवश्च तथेमौ गुरुवर्तिनौ । क्षुधा कथं न सीदेतामिति चोद्धरणं कृतम् ॥

nakulaḥ sahadevaśca tathemau guruvartinau | kṣudhā kathaṃ na sīdetāmiti coddharaṇaṃ kṛtam

‘गुरुजनों के प्रति निष्ठावान ये नकुल और सहदेव भूख से कैसे कष्ट न पाएँ’ — इसी विचार से मैंने तुम्हें उठाया।

श्लोक 9 (15.18.9)

इयं च बृहती श्यामा तथाऽत्यायतलोचना । वृथा सभातले क्लिष्टा मा भूदिति च तत्कृतं ॥

iyaṃ ca bṛhatī śyāmā tathā'tyāyatalocanā | vṛthā sabhātale kliṣṭā mā bhūditi ca tatkṛtaṃ

‘यह ऊँची कद-काठी वाली, श्यामवर्णा, विशाल नेत्रों वाली स्त्री सभा-भवन में व्यर्थ पीड़ित न हो’ — यह भी उस कर्म का कारण था।

श्लोक 10 (15.18.10)

अपेक्षतामेव वो भीम वेपन्तीं कदलीमिव । स्त्रीधर्मिणीमरिष्टाङ्गीं तथा द्यूतपराजिताम् ॥

apekṣatāmeva vo bhīma vepantīṃ kadalīmiva | strīdharmiṇīmariṣṭāṅgīṃ tathā dyūtaparājitām

भीम, तुम सबके देखते-देखते वह केले के वृक्ष की तरह काँपती हुई, स्त्री-धर्म का पालन करने वाली, निर्दोष अंगों वाली द्यूत में हार दी गई।

श्लोक 11 (15.18.11)

दुःशासनो यदा मौर्ख्याद्दासीवत्पर्यकर्षत । तदैव विदितं मह्यं पराभूतमिदं कुलम् ॥

duḥśāsano yadā maurkhyāddāsīvatparyakarṣata | tadaiva viditaṃ mahyaṃ parābhūtamidaṃ kulam

जब दुःशासन ने मूर्खतावश उसे दासी की तरह घसीटा, तभी मैंने जान लिया कि यह कुल पराभूत हो गया है।

श्लोक 12 (15.18.12)

निषण्णाः कुरवश्चैव तदा मे श्वशुरादयः । सा दैवं नाथमिच्छन्ती व्यलपत्कुररी यथा ॥

niṣaṇṇāḥ kuravaścaiva tadā me śvaśurādayaḥ | sā daivaṃ nāthamicchantī vyalapatkurarī yathā

तब कुरुजन और मेरे ससुर आदि सब निराश बैठे रहे, और वह दैव को ही अपना रक्षक मानती हुई कुररी की तरह विलाप करती रही।

श्लोक 13 (15.18.13)

केशपक्षे परामृष्टा पापेन हतबुद्धिना । यदा दुःशासनेनैषा तदा मुह्याम्यहं नृपाः ॥

keśapakṣe parāmṛṣṭā pāpena hatabuddhinā | yadā duḥśāsanenaiṣā tadā muhyāmyahaṃ nṛpāḥ

जब पापी और मन्दबुद्धि दुःशासन ने उसे केशों से पकड़ा, तब मैं मूर्छित-सी हो गई, हे राजाओ।

श्लोक 14 (15.18.14)

युष्मत्तेजोविवृद्ध्यर्थं मया ह्युद्धरणं कृतम् । तदानीं विदुलावाक्यैरिति तद्वित्त पुत्रकाः ॥

yuṣmattejovivṛddhyarthaṃ mayā hyuddharaṇaṃ kṛtam | tadānīṃ vidulāvākyairiti tadvitta putrakāḥ

तुम्हारे तेज को बढ़ाने के लिए ही मैंने उस समय विदुला के वचनों से तुम्हें उठाया था; पुत्रो, यह जान लो।

श्लोक 15 (15.18.15)

कथं न राजवंशोऽयं नश्येत्प्राप्य सुतान्मम । पाण्डोरिति मया पुत्र तस्मादुद्धरणं कृतम् ॥

kathaṃ na rājavaṃśo'yaṃ naśyetprāpya sutānmama | pāṇḍoriti mayā putra tasmāduddharaṇaṃ kṛtam

‘पाण्डु का यह राजवंश मेरे पुत्रों को पाकर कैसे नष्ट न हो’ — इसी विचार से, पुत्र, मैंने तुम्हें उठाया।

श्लोक 16 (15.18.16)

न तस्य पुत्राः पौत्रा वा क्षतवंशस्य पार्थिव । लभते सुकृताँल्लोकान्यस्माद्वंशः प्रणश्यति ॥

na tasya putrāḥ pautrā vā kṣatavaṃśasya pārthiva | labhate sukṛtām̐llokānyasmādvaṃśaḥ praṇaśyati

हे राजन्, जिसका वंश उच्छिन्न हो जाए, उसके न पुत्र रहते हैं न पौत्र; और वह पुण्य लोकों को नहीं पाता, क्योंकि उसका कुल नष्ट हो जाता है।

श्लोक 17 (15.18.17)

भुक्तं राज्यफलं पुत्रा भर्तुर्मे विपुलं पुरा । महादानानि दत्तानि पीतः सोमो यथाविधि ॥

bhuktaṃ rājyaphalaṃ putrā bharturme vipulaṃ purā | mahādānāni dattāni pītaḥ somo yathāvidhi

पुत्रो, पहले मैंने अपने पति के राज्य का विपुल फल भोगा है; महादान दिए गए हैं और विधि से सोमपान हुआ है।

श्लोक 18 (15.18.18)

नाहमात्मफलार्थं वै वासुदेवमचूचुदम् । विदुलायाः प्रलापैस्तैः पालनार्थं च तत्कृतम् ॥

nāhamātmaphalārthaṃ vai vāsudevamacūcudam | vidulāyāḥ pralāpaistaiḥ pālanārthaṃ ca tatkṛtam

मैंने अपने किसी लाभ के लिए वासुदेव को प्रेरित नहीं किया; विदुला के उन वचनों के द्वारा यह रक्षा के लिए किया था।

श्लोक 19 (15.18.19)

नाहं राज्यफलं पुत्राः कामये पुत्रनिर्जितम् । पतिलोकानहं पुण्यान्कामये तपसा विभो ॥

nāhaṃ rājyaphalaṃ putrāḥ kāmaye putranirjitam | patilokānahaṃ puṇyānkāmaye tapasā vibho

पुत्रो, मैं पुत्रों द्वारा जीते हुए राज्य का फल नहीं चाहती; हे विभो, तप के द्वारा मैं अपने पति के पुण्य लोकों को चाहती हूँ।

श्लोक 20 (15.18.20)

श्वश्रूश्वशुरयोः कृत्वा शुश्रूषां वनवासिनोः । तपसा शोषयिष्यामि युधिष्ठिर कलेवरम् ॥

śvaśrūśvaśurayoḥ kṛtvā śuśrūṣāṃ vanavāsinoḥ | tapasā śoṣayiṣyāmi yudhiṣṭhira kalevaram

वन में रहने वाले सास-ससुर की सेवा करके, हे युधिष्ठिर, मैं तप से इस शरीर को सुखा दूँगी।

श्लोक 21 (15.18.21)

निवर्तस्व कुरुश्रेष्ठ भीमसेनादिभिः सह । धर्मे ते धीयतां बुद्धिर्मनस्तु महदस्तु च ॥

nivartasva kuruśreṣṭha bhīmasenādibhiḥ saha | dharme te dhīyatāṃ buddhirmanastu mahadastu ca

हे कुरुश्रेष्ठ, भीमसेन आदि के साथ लौट जाओ; तुम्हारी बुद्धि धर्म में लगी रहे और तुम्हारा मन उदार हो।"

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