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आश्रमवासिक पर्व · अध्याय 22

नारद द्वारा धृतराष्ट्र की कुबेरलोक-यात्रा की भविष्यवाणी

शतयूप नारद से पूछते हैं कि धृतराष्ट्र को कौन-सा लोक मिलेगा, क्योंकि नारद ने दूसरे राजाओं की गति बताई है, उनकी नहीं। नारद कहते हैं कि इन्द्र की सभा में, जहाँ उन्होंने पाण्डु को देखा, उन्होंने स्वयं इन्द्र से सुना कि राजा की आयु के तीन वर्ष शेष हैं; उसके बाद धृतराष्ट्र गान्धारी के साथ कुबेर के भवन जाएँगे और व्यास के तपोबल से देवों, गन्धर्वों और राक्षसों के लोकों में स्वच्छन्द विचरेंगे। मुनि प्रसन्न होकर इच्छानुसार चले जाते हैं।

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (15.22.1)

नारदस्य तु तद्वाक्यं शशंसुर्द्विजसत्तमाः । शतयूपस्तु राजर्षिर्नारदं वाक्यमब्रवीत् ॥

nāradasya tu tadvākyaṃ śaśaṃsurdvijasattamāḥ | śatayūpastu rājarṣirnāradaṃ vākyamabravīt

श्रेष्ठ द्विजों ने नारद की उस बात की प्रशंसा की, और राजर्षि शतयूप ने नारद से कहा।

शतयूप उवाच

श्लोक 2 (15.22.2)

अहो भगवता श्रद्धा कुरुराजस्य वर्धिता । सर्वस्य च जनस्यास्य मम चैव महाद्युते ॥

aho bhagavatā śraddhā kururājasya vardhitā | sarvasya ca janasyāsya mama caiva mahādyute

अहो! भगवन्, आपने कुरुराज की श्रद्धा बढ़ा दी है, और इन सब लोगों की भी, और मेरी भी, हे महातेजस्वी।

श्लोक 3 (15.22.3)

अस्ति काचिद्विवक्षा तु तां मे निगदतः शृणु । धृतराष्ट्रं प्रति नृपं देवर्षे लोकपूजित ॥

asti kācidvivakṣā tu tāṃ me nigadataḥ śṛṇu | dhṛtarāṣṭraṃ prati nṛpaṃ devarṣe lokapūjita

धृतराष्ट्र राजा के विषय में मुझे कुछ कहना है; हे देवर्षि, लोक में पूजित! मैं कहता हूँ, उसे सुनिए।

श्लोक 4 (15.22.4)

सर्ववृत्तान्ततत्त्वज्ञो भवान्दिव्येन चक्षुषा । युक्तः पश्यसि विप्रर्षे गतयो विविधा नृणाम् ॥

sarvavṛttāntatattvajño bhavāndivyena cakṣuṣā | yuktaḥ paśyasi viprarṣe gatayo vividhā nṛṇām

हे विप्रर्षि! आप सब घटनाओं का तत्त्व जानते हैं, और दिव्य दृष्टि से युक्त होकर मनुष्यों की नाना गतियों को देखते हैं।

श्लोक 5 (15.22.5)

उक्तवान्नृपतीनां त्वं महेन्द्रस्य सलोकताम् । न त्वस्य नृपतेर्लोकाः कथितास्ते महामुने ॥

uktavānnṛpatīnāṃ tvaṃ mahendrasya salokatām | na tvasya nṛpaterlokāḥ kathitāste mahāmune

आपने राजाओं के महेन्द्र के साथ एक ही लोक पाने की बात कही, परन्तु हे महामुनि! इस राजा के लोकों के विषय में नहीं बताया।

श्लोक 6 (15.22.6)

स्थानमप्यस्य नृपतेः श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो । त्वत्तः कीदृक्कदा चेति तन्ममाख्याहि तत्त्वतः ॥

sthānamapyasya nṛpateḥ śrotumicchāmyahaṃ vibho | tvattaḥ kīdṛkkadā ceti tanmamākhyāhi tattvataḥ

हे विभो! मैं आपसे इस राजा के स्थान के विषय में भी सुनना चाहता हूँ कि वह कैसा होगा और कब; वह मुझे यथार्थ रूप से बताइए।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 7 (15.22.7)

इत्युक्तो नारदस्तेन वाक्यं सर्वमनोनुगम् । व्याजहार सभामध्ये दिव्यदर्शी महातपाः ॥

ityukto nāradastena vākyaṃ sarvamanonugam | vyājahāra sabhāmadhye divyadarśī mahātapāḥ

उनके यों कहने पर दिव्यदर्शी महातपस्वी नारद ने सभा के बीच सबके मन को भाने वाली बात कही।

नारद उवाच

श्लोक 8 (15.22.8)

यदृच्छया शक्रसदो गत्वा शक्रं शचीपतिम् । दृष्टवानस्मि राजर्षे तत्र पाण्डुं नराधिपम् ॥

yadṛcchayā śakrasado gatvā śakraṃ śacīpatim | dṛṣṭavānasmi rājarṣe tatra pāṇḍuṃ narādhipam

हे राजर्षि! संयोग से मैं इन्द्र की सभा में गया और शचीपति इन्द्र को देखा, और वहाँ राजा पाण्डु को भी देखा।

श्लोक 9 (15.22.9)

तत्रेयं धृतराष्ट्रस्य कथा समभवन्नप । तपसो दुष्करस्यास्य यदयं तपते नृपः ॥

tatreyaṃ dhṛtarāṣṭrasya kathā samabhavannapa | tapaso duṣkarasyāsya yadayaṃ tapate nṛpaḥ

हे राजन्! वहाँ धृतराष्ट्र के विषय में यह चर्चा चली कि यह राजा कैसी कठिन तपस्या कर रहा है।

श्लोक 10 (15.22.10)

तत्राहमिदमश्रौषं शक्रस्य वदतः स्वयम् । वर्षाणि त्रीणि शिष्टानि राज्ञोस्य परमायुषः ॥

tatrāhamidamaśrauṣaṃ śakrasya vadataḥ svayam | varṣāṇi trīṇi śiṣṭāni rājñosya paramāyuṣaḥ

वहाँ मैंने इन्द्र के अपने मुख से यह सुना कि इस राजा की पूरी आयु के तीन वर्ष शेष हैं।

श्लोक 11 (15.22.11)

ततः कुबेरभवनं गान्धारीसहितो नृपः । प्रयाता धृतराष्ट्रोऽयं राजराजाभिसत्कृतः ॥

tataḥ kuberabhavanaṃ gāndhārīsahito nṛpaḥ | prayātā dhṛtarāṣṭro'yaṃ rājarājābhisatkṛtaḥ

तब राजा धृतराष्ट्र गान्धारी के साथ कुबेर के भवन को जाएँगे, जहाँ राजराज कुबेर उनका सत्कार करेंगे।

श्लोक 12 (15.22.12)

कामगेन विमानेन दिव्याभरणभूषितः । ऋषिपुत्रो महाभागस्तपसा दग्धकिल्बिषः ॥

kāmagena vimānena divyābharaṇabhūṣitaḥ | ṛṣiputro mahābhāgastapasā dagdhakilbiṣaḥ

इच्छानुसार चलने वाले विमान में, दिव्य आभूषणों से सजे हुए, तप से पाप जला चुके ऋषिपुत्र महाभाग

श्लोक 13 (15.22.13)

सञ्चरिष्यति लोकांश्च देवगन्धर्वरक्षसाम् । स्वच्छन्देनेति धर्मात्मा व्यासस्य तु तपोबलात् ॥

sañcariṣyati lokāṃśca devagandharvarakṣasām | svacchandeneti dharmātmā vyāsasya tu tapobalāt

व्यास के तपोबल से वह धर्मात्मा देवों, गन्धर्वों और राक्षसों के लोकों में स्वच्छन्द विचरण करेगा।

श्लोक 14 (15.22.14)

देवगुह्यमिदं प्रीत्या मया वः कथितं महत् । भवन्तो हि श्रुतधनास्तपसा दग्धकिल्बिषाः ॥

devaguhyamidaṃ prītyā mayā vaḥ kathitaṃ mahat | bhavanto hi śrutadhanāstapasā dagdhakilbiṣāḥ

मैंने प्रेम से तुम्हें यह देवताओं का महान् रहस्य बताया है; क्योंकि तुम लोग शास्त्रज्ञान रूपी धन वाले हो और तप से तुम्हारे पाप जल चुके हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 15 (15.22.15)

इति ते तस्य तच्छ्रुत्वा देवर्षेर्मधुरं वचः । सर्वे सुमनसः प्रीता बभूवुः स च पार्थिवः ॥

iti te tasya tacchrutvā devarṣermadhuraṃ vacaḥ | sarve sumanasaḥ prītā babhūvuḥ sa ca pārthivaḥ

देवर्षि के उन मधुर वचनों को सुनकर वे सब प्रसन्नचित्त और सन्तुष्ट हुए, और वह राजा भी।

श्लोक 16 (15.22.16)

एवं कथाभिरन्वास्य धृतराष्ट्रं मनीषिणः । विप्रजग्मुर्यथाकामं ते सिद्धगतिमास्थिताः ॥

evaṃ kathābhiranvāsya dhṛtarāṣṭraṃ manīṣiṇaḥ | viprajagmuryathākāmaṃ te siddhagatimāsthitāḥ

इस प्रकार बातों से धृतराष्ट्र का मन बहलाकर, सिद्धों की गति का आश्रय लिए हुए वे मनीषी जन अपनी इच्छा के अनुसार चले गए।

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